
वरिष्ठ कवयित्री। काव्य संग्रह- ‘बस कह देना कि आऊंगा’, ‘मनरंगना’।

पिता
आसान नहीं है उसके लिए
उस पीठ और उस कंधे को भुलाना
जिस कंधे पर बैठ कर
दुनिया के हर मेले को देखता आया अब तक
उस पीठ की अंतहीन मौन आवाजें
आज भी सुनाई देती हैं उसे
वह अंधेरे में भी पहचान लेता था
उस पीठ को
रात के घटाटोप अंधेरे में भी पढ़ सकता था
पीठ पर लिखी इबारत
आत्मीयता की ऊष्मा से भींगी उस पीठ पर
कितनी ही बार अपनी आंखों के मरुस्थल को
धोकर आया है
वह पिघलता था प्रेम के उद्भेदन में
छोड़ आता था हर वेदना को उसी पीठ पर
जिसपर सर रखने से मिल जाता था
उसे अपने हर सवाल का जवाब
उसे विश्वास था कि यह पीठ
सिर्फ पीठ नहीं है
एक मजबूत पुल है जो टूटेगा नहीं
बिखरेगा नहीं
हमेशा रहेगा उसके पास
वह पीठ उसके लिए
शरीर का अंग भर नहीं था
उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य का प्रतीक था
उस पर बीत रहे वक्त के साथ
समय के निशान दिखने लगे थे
हर खरोंच, हर दाग, हर निशान
बयां करते थे बीते हर पल को
यादें ताजा होती थीं
जैसे कोई पुराना खत हो!
अब नहीं रही वह पीठ, वह कंधा
खाली-खाली लग रहा है सबकुछ
यादों के सहारे है हर पल
नहीं भूल पा रहा उस पीठ को
जो उसकी दुनिया हुआ करती थी
चांद-सितारों की मौजूदगी में
उस पीठ को पीठ दिखाकर आ गया
आ गया पिता को पंचकाठ देकर…!
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