
वरिष्ठ कवि। पिछले 10 वर्षों से ‘मरुधर के स्वर’ पत्रिका का संपादन।
चूल्हा
झोपड़ी के एक कोने में मां सोई है
दूसरे में पिता
तीसरे में बच्चे
चौथे में रखा है चूल्हा
बस इतनी सी ही जगह है यहां
सुबह होगी
एक-एक करके लोग उठते जाएंगे
जगह खाली होती जाएगी
खाना पकाने का प्रबंध होगा
सबसे पहले मां उठेगी
फिर पिता और अंत में बच्चे
चूल्हा कभी टस से मस नहीं होगा
उसे वहीं मुस्तैद रहना है
जलना है, बुझना है
जिस दिन वह जगह से हटा
समझो कि झोपड़ी नहीं रही
रहनेवाले बेदखल हुए तो
दूर से एक बड़ी इमारत दिखाई देगी!
यह नहीं सोचा
प्रकृति को कोई लज्जा नहीं कि
बिलकुल छोटे-छोटे आवासों में
मनुष्य को छोड़
बाकी प्राणियों को रखा
पक्षियों के लिए सिर्फ एक घोंसला
ततैयों को छाले जितना घर
दीमक किताब के भीतर
चीटियां कभी यहां, कभी वहां
असंख्य मछलियों को भर दिया
समुद्र में बिना किसी घर के
भले प्यार करने के लिए
सभी को एक जैसी जगह दी
हृदय में
फूल अपनी डाल से हिल नहीं सकते
कांटे कभी चल नहीं सकते
सभी को अंधेरा दिया
लेकिन मनुष्यों को कृत्रिम रोशनी भी
इंसान को ही
अपना सबसे नजदीकी और प्यारा बनाया
शायद यह सोच कर कि
उसकी संरचना को समझेगा
उसके अनूठे सृजन पर दाद देगा
लेकिन यह नहीं सोचा
वह ईर्ष्यालु और विध्वंसकर्ता भी है।
मार काट के बाद भी
कितना प्यारा है
शतरंज का खेल
उंट मारा जाता, हाथी भी
मारे जाते राजा और रानी भी
एक हारता है, दूसरा जीतता
एक हँसता दूसरा रोता
फिर भी बने रहते मित्र
मित्रता हार-जीत के बाद भी कायम
यह कायम वर्षों-वर्षों तक
किसने रचा यह खेल
बड़ा खूबसूरत होगा उसका दिल
वह जितना काली गोटियों के पक्ष में
उतना ही सफेद गोटियों के
खेल खत्म होते ही
सभी गाोटियां एक डिब्बे में
ढेर सारा प्रेम वहां बंद
मार काट के बाद भी
जैसे समाज जुड़ा हुआ एक साथ।
संपर्क : हाउस नंबर 35, रोड नंबर 2, सोनारी गुरुद्वारा के पास, कागलनगर, सोनारी, जमशेदपुर – 831011 मो.9334825981


चूल्हा एक अद्भुत कविता है जो कम शब्दों में अधिक कहती है।
सराहनीय प्रयास
जीवन के विषमता और सरलता का सौम्य वर्णन
बधाई आपको
यह नहीं सोचा –बच्चों जैसे मासूम सवाल और बच्चों जैसी निश्छल नाराजगी –ततैयों को ताले जितना घर ,
असंख्य मछलियों को हर दिया समुद्र में/बिना किसी घर ।
मानव को सारी विरासत दे दी पर उसने तो नाश करना शुरू कर दिया
एक ही साथ यह कविता बहुत सरस भी है और गंभीर अर्थवत्ता भी रखती है