दो कविता संग्रह आम आदमी के आस पास’, ‘कविता में सब कुछ संभव’, उपन्यास रावी से यमुना तक

आदमी

मैं एक पेड़ के पास गया
उसने मुझे दिए फल और छाया
मैं एक पाखी के पास गया
उसने मुझे दिए पंख और परवाज
मैं एक नदी के पास गया
उसने मुझे दिया जल और गति
मैं एक सागर के पास गया
उसने मुझे दिया नमक और गहराई
मैं सूरज के पास गया
उसने मुझे दी ऊर्जा और प्रकाश
मैं धरती के पास गया
उसने मुझे दिया अन्न और धीरज
मैं एक फूल के पास गया
उसने मुझे दी गंध और मुस्कान
मैं एक फकीर के पास गया
उसने मुझे दीं दुआएं और संतोष
मैं एक बच्चे के पास गया
उसने मुझे दी मुस्कान और मासूमियत
मैं एक आदमी के पास गया
उसने छीन ली मेरी मुस्कान और मासूमियत।

कैसे बच पाएगी मेरी कविता

आज के इस भयावह समय में
जबकि शब्दों के अर्थ बदल रहे हैं
और सारी दुनिया
एक बहुत बड़े मास्क में तब्दील हो गई है
कैसे बचाऊं अपनी कविता को
इन विषैली हवाओं से
सोचता हूँ इसे लिख दूं
एक पाखी के पंख पर जो जा बैठे
दूर किसी छोटे द्वीप के एक ऊंचे पेड़ पर
और सुनाए इसे
अपने बच्चों को
और यह सिलसिला चलता रहे
शायद इसी तरह
बच पाए मेरी कविता।

गौरैया

मेरे भीतर
एक नन्ही-सी गौरैया बसती है
वह मेरे बचपन की
बची-खुची मासूमियत है
या सुखद स्मृतियां
या दादी का
झुर्रियों से खिला चेहरा
या फिर माँ के माथे पर
पसीने की बूंदें
या फिर पिता का मजबूत कंधा
या बचपन का वह दोस्त
जो अचानक चला गया एक दिन
बिना अलविदा कहे
मुझे बचा कर रखना है
इस नन्ही गौरैया को
हर कीमत पर
अपने अंतःकरण के किसी कोने में
जिस दिन यह नहीं रहेगी
मैं भी नहीं रहूंगा, शायद।

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