युवा कवि। ‘शब्द जब बन जाता है आईना’ काव्य संग्रह प्रकाशित।

जो बनना चाहती हैं
मेरी कविताएं

मुझे अब खोजनी होगी
कोई अलग पृथ्वी
जहां नहीं दौड़ते हों रूढ़ियों के रथ
जहां नहीं मिलता हो अंधविश्वास को सुकून
जहां धर्म से नहीं निकलती निर्दयता की चीत्कारें

मुझे खोजना होगा कोई विशाल हृदय वाला पहाड़
जिसमें समाया रहता है जिजीविषा का संगीत
जिसमें समाहित हो धैर्य
और अडिग रहने की हो आदत

मुझे खोजनी है वह नदी
जो ढो सके सच को
धो सके वैचारिक मतभेदों के पाप को
जो मिल सके प्रेम के समंदर से

मुझे खोजना है एक पाताल
जिसकी गहराई से जान सकूं
आदमी की अंतिम तह
कि वह मनुष्य कितना है

मुझे खोजना होगा
एक अलग ही मानव
जो संवेदना के करीब हो
जो केवल मानवीय मूल्यों को स्थापित करता हो
जो औपचारिक पुस्तकों में नहीं हो

मेरी खोजी गई अलग-अलग कल्पनाएं
किसी मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं हैं
जहां बीज ही बोया गया हो संवेदनहीनता का

मेरी खोजी गई कल्पनाएं मेरे इर्द-गिर्द
समाहित हैं
जो बनना चाहती हैं मेरी कविताएं।

संपर्क :कैलाश नगर, सांचोर-जालोर, राजस्थान-343041 मो. 9414792013