शिक्षाविद एवं आलोचक। ‘लोकप्रिय कविता का समाजशास्त्र’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र और पद्मावत’, ‘अनमिल आखर’ समेत आठ पुस्तकें।

‘समालोचना का अर्थ पक्षपात रहित होकर न्यायपूर्वक किसी पुस्तक के यथार्थ  गुण-दोष की विवेचना करना और उसके ग्रंथकर्ता को एक विज्ञप्ति देना है, क्योंकि रचित ग्रन्थ की रचना के गुणों की प्रशंसा कर रचयिता के उत्साह को बढ़ाना एवं दोषों को दिखलाकर उसके सुधार का यत्न बताना कुछ न्यून उपकार का विषय नहीं है।’ -बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’

नवजागरणयुगीन साहित्यिक अभिरुचि का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करते हुए रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि उस जमाने में ‘यद्यपि देश में नए-नए विचारों और भावनाओं का संचार हो गया था,पर हिंदी उनसे दूर थी। लोगों की अभिरुचि बदल चली थी, पर हमारे साहित्य पर उसका कोई प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता था। शिक्षित लोगों के विचारों और व्यापारों ने तो दूसरा मार्ग पकड़ लिया था, पर उनका साहित्य उसी पुराने मार्ग पर था। प्राय: सभी सभ्य जातियों का साहित्य उनके विचारों और व्यापारों से लगा चलता है, यह नहीं कि उनकी चिंताओं और कार्यों का प्रवाह एक ओर जा रहा हो और उनके साहित्य का प्रवाह दूसरी ओर।’ (चिंतामणि : पहला भाग)

जाहिर है कि शुक्ल जी समेत तमाम विचारकों एवं आलोचकों ने ठीक ही उस संक्रांति काल में ‘हिंदी साहित्य को नए मार्ग पर खड़ा’ करने का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र समेत उनकी मंडली के रचनाकारों, विचारकों और समाज सुधारकों को दिया है। अपने विचारधारात्मक रुझान के तहत नए अंदाज़ में इस तथ्य को रेखांकित करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है, ‘भारतेंदु युग का साहित्य जनवादी इस अर्थ में है कि वह भारतीय समाज के पुराने ढाँचे से संतुष्ट न रहकर उसमें सुधार भी चाहता है। वह केवल राजनीतिक स्वाधीनता का साहित्य न होकर मनुष्य की एकता, समानता और भाईचारे का भी साहित्य है। भारतेंदु स्वदेशी आंदोलन के ही अग्रदूत न थे। वे समाज-सुधारकों में भी प्रमुख थे। स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, विदेश-यात्रा आदि के वे समर्थक थे।’ (भारतेंदु युग)

नवजागरण काल में ‘हिंदी नए चाल में ढली’ और आलोचना समेत तमाम साहित्यिक विधाओं में आधुनिक दृष्टि का प्रवेश हुआ। इस काल के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता इसमें निहित सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना है। यह चेतना भारतेंदु और उनके जिन साथी साहित्यकारों में प्रखरता के साथ मिलती है उनमें बालकृष्ण भट्ट, बालमुकुन्द गुप्त, प्रताप नारायण मिश्र, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ शामिल हैं।

भारतेंदु से पहले भारतीय काव्यशास्त्र में न तो नए सिद्धांतों का प्रतिपादन मिलता है और न ही किसी कविता का सूक्ष्म विवेचन। संभवत: इसी वजह से रीतिकालीन लक्षण ग्रंथों के बारे में नंददुलारे वाजपेयी ने लिखा है, ‘इन्हें आलोचना ग्रंथ किस अर्थ में कहा जाए, यह भी एक समस्या ही है।’ (हिंदी साहित्य : बीसवीं शताब्दी) वस्तुत: रसवादी और अलंकारवादी दृष्टि से रचित रीतियुगीन लक्षण ग्रंथों में तत्कालीन सामाजिक जीवन की कोई स्थिति दिखाई नहीं पड़ती। मुक्तिबोध की शब्दावली उधार लेकर कहें तो रीतिग्रंथ ‘बोधहीन बौद्धिकता’ के शिकार प्रतीत होते हैं।

साहित्यालोचन के क्षेत्र में ऐसी जबदी हुई मनोवृत्ति से भिन्न ही नहीं, बल्कि विपरीत भारतेंदु और उनके साथी रचनाकार-आलोचक साहित्य को ‘रस युक्त वाक्य’ या ‘रमणीय अर्थों को प्रतिपादित करनेवाली शब्द संरचना’ के बजाए जब ‘जनसमूह के हृदय का विकास’ या ‘जनसमूह के चित्त का चित्रपट’ कहते हैं तो इससे साहित्य के बारे में उनकी समाज सापेक्ष आधुनिक दृष्टि का पता चलता है। अपनी पुस्तक ‘भारतेंदु युग’ में बालकृष्ण भट्ट के निबंध ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’ के महत्व को रेखांकित करते हुए रामविलास शर्मा ने बालकृष्ण भट्ट से ‘हिंदी आलोचना का जन्म’ मानते हुए कहा है, ‘लेख के नाम से ही भट्ट जी का आधुनिक दृष्टिकोण प्रकट हो जाता है। साहित्य रसात्मक वाक्य या कवि के अंत:पुर का लीला-विनोद न होकर जनसमूह के हृदय का विकास है।’

नवजागरण काल में रचित साहित्य की सभी विधाओं में वैचारिकता का आग्रह दिखाई पड़ता है। रामचंद्र शुक्ल ने इसे ठीक ही ‘गद्य युग’ कहा है। विचार को पद्य के बजाए गद्य में व्यक्त करना ज्यादा सहज होता है, इसलिए इस युग में विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक मुद्दों पर पत्र-पत्रिकाओं में अनेकानेक निबंध एवं टिप्पणियाँ प्रकाशित होने लगीं। जिनसे कालांतर में आलोचना का विकास हुआ। इन निबंधों एवं टिप्पणियों में तत्कालीन भारतीय समाज की आवश्यकताओं तथा जनता की परिवर्तित अभिरुचि के मद्देनज़र रचना की अंतर्वस्तु एवं रूप में परिवर्तन की जरूरत पर बल दिया गया है। उदाहरण के लिए भारतेंदु ने जब ‘दृश्य काव्य अथवा नाटक’ (1883) निबंध लिखा तो उनका मकसद समसामयिक जनाभिरुचि के तहत प्राचीन नाट्यशास्त्र की उपयोगिता पर विचार करते हुए यह स्पष्ट करना था कि बदली हुई सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति में ‘हिंदी के नाटकों का स्वरूप कैसा होना चाहिए’। गौरतलब है कि वे अपने समय के नाटकों में प्राचीन नाट्य-कृतियों की तरह अस्वाभाविक एवं अलौकिक दृश्यों को दिखाए जाने के सख्त खिलाफ थे।

साहित्यदर्पणकार पंडितराज विश्वनाथ के एक सुविख्यात श्लोक में ‘काव्यानंद’ को ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ कहा गया है। उनका नाम लिए बगैर ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ जैसी आध्यात्मिक शब्दावली की बखिया उधेड़ते हुए बालकृष्ण भट्ट लिखते हैं, ‘लोग कहते हैं ब्रह्मानंद का-सा कोई दूसरा आनंद नहीं है पर सच पूछिए तो ऐसा समझनेवालों ने खूब डूबकर नहीं सोचा।

कितने ऐसे आनंद हैं जिनके आगे ब्रह्मानंद झख मारता है, कवि लोग श्रृंगार आदि नौ रसों का स्वरूप लिखते ही हैं ‘ब्रह्मानंद सहोदर’, अर्थात ब्रह्म के ज्ञान और साक्षात्कार में जो सुख की प्राप्ति होती है यह रस का ज्ञान और अनुभव का सुख भी उसी ब्रह्मानंद का सगा भाई है… सरदी खूब सुरखी पकड़े हो, मारे जाड़े के दांत किटाकिट बोलते हों, रात का समय हो, पांच सेर रूई का लिहाफ ओढ़ किसी कोमलांगी विकसित यौवना नवयुवती के कोमल अंगों में अंग साट सो रहना ब्रह्मानंद से क्या कम है?… लिखने बैठा जब कोई उमदा बात सूझ गई और एक जी में चुभ जाने वाला चोटीला आशय लिखकर तैयार हो गया, उस समय हमारे जी के आनंद के सामने ब्रह्मानंद खड़ा-खड़ा हाथ जोड़े पछताया करता है।’

बालकृष्ण भट्ट के आलोचनात्मक अवदान पर विचार करने के पूर्व ध्यातव्य है कि किसी आलोचक की आलोचना-दृष्टि इस बात पर निर्भर हुआ करती है कि उसके पास साहित्य के बारे में कोई नवीन धारणा है या नहीं और साहित्य चूँकि जीवन की ही पुनर्रचना है, इसलिए जिस आलोचक के पास इतिहास के साथ ही अपने वर्तमान जीवन के बारे में नई धारणा होगी, उसी के पास साहित्य को लेकर किसी नई धारणा की उम्मीद की जा सकती है। चूंकि ‘कला का मोती समाज की सीपी में ही आकार ग्रहण करता है’ (क्रिस्टोफर कौडवेल), इसलिए गहरे इतिहास-बोध और प्रखर सामाजिक चेतना के बगैर किसी लेखक की रचना या आलोचना-दृष्टि की बात बेमानी है।

उल्लेखनीय है कि इतिहास या साहित्य-परंपरा का बोध होना और उसके बोझ से दबे होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। परंपरा से आक्रांत रचनाकार या आलोचक से अपने समय की सामाजिक जड़ता और यथास्थिति को तोड़ने के लिए कुछ सार्थक लिख पाना असंभव है।

नवजागरणयुगीन हिंदी आलोचकों में गहरे इतिहास-बोध एवं प्राच्य एवं पाश्चात्य साहित्य-परंपरा के अगाध पांडित्य साथ ही अपने समय और समाज में व्याप्त जड़ता को तोड़कर नए भारत के निर्माण का माद्दा था। उनमें से अधिकांश रचनाकार पत्रकार और समाजसेवी भी थे। इस युग के अग्रगण्य लेखकों में बालकृष्ण भट्ट ने 1877 से लगातार 33 वर्षों तक ‘हिंदी प्रदीप’ का संपादन करने के साथ ही दो कहानियाँ, तकरीबन पचपन कविताएँ और चार मौलिक (कलिराज की सभा, रेल का विकट खेल, बाल विवाह, चंद्रसेन) तथा अनेक अनूदित नाटकों की रचना की है, जिनकी संख्या भट्ट जी के पौत्र और भट्ट निबंधावली पुस्तक के संपादक डॉ. मधुकर भट्ट ‘सरल’ के अनुसार 18  है। उनकी आलोचना का दायरा केवल साहित्य न होकर व्यापक समाज तक फैला हुआ है। उसमें सैद्धांतिक शुष्कता के बजाय संवेदनशीलता, संवादधर्मिता और ताजगी है। उसे ‘सभ्यतालोचन’ कहा जाना चाहिए। साहित्य और सभ्यता के बीच अन्योन्याश्रित संबंध की ओर इंगित करते हुए बालकृष्ण भट्ट ने लिखा है, ‘साहित्य का सभ्यता से घनिष्ठ संबंध है, वरन साहित्य ही सभ्यता का प्रधान अंग है। यह कभी हो ही नहीं सकता कि कोई देश सभ्यता में बढ़ जाए और साहित्य वहाँ की भाषा का पीछे हटा रहे। जो देश सभ्यता के छोर तक पहुँच पीछे गिरी दशा में आ गया है तो वहाँ का साहित्य ही उस देश का नपाना होता है कि यहाँ सभ्यता किस सीमा तक पहुँच चुकी थी।’

हिंदी आलोचना के विकास में बालकृष्ण भट्ट के योगदान को महत्वपूर्ण मानने के बावजूद रामचंद्र शुक्ल ने भारतेंदु और विशेषत: प्रेमघन से हिंदी आलोचना का आरंभ माना है। किंतु भारतेंदु-प्रेम के लिए विख्यात रामविलास शर्मा ने ‘बालकृष्ण भट्ट और हिंदी आलोचना का जन्म’ निबंध में लिखा है,

‘भट्ट जी अपने गंभीर अध्ययन, आलोचन-प्रतिभा, संयत शैली आदि गुणों के कारण बहुत कुछ आज के-से लगते हैं…। उनकी वास्तविक प्रतिभा एक अध्ययनशील विद्वान और तीक्ष्ण बुद्धि आलोचक की है। उन्हें आधुनिक हिंदी आलोचना का जन्मदाता न कहना उचित न होगा।’ रामस्वरूप चतुर्वेदी ने भी भट्ट जी के ‘हिंदी प्रदीप’ में प्रकाशित निबंधों से व्यावहारिक आलोचना का उद्भव स्वीकार किया है।

सच यह है कि लाला श्रीनिवास दास रचित ‘संयोगिता स्वयंवर’ नामक ऐतिहासिक नाटक की भट्ट जी द्वारा ‘सच्ची समालोचना’ शीर्षक से लिखित आलोचना ही कायदे से हिंदी की सर्वप्रथम व्यावहारिक आलोचना है। इसकी शुरुआत सवालिया अंदाज़ में होती है : ‘लाला जी यदि बुरा न मानिए तो एक बात आपसे धीरे से पूछें, वह यह कि आप ऐतिहासिक नाटक किसको कहेंगे? क्या किसी पुराने समय के ऐतिहासिक पुरावृत्त की छाया लेकर नाटक लिख डालने से ही वह ऐतिहासिक हो जाएगा? यदि ऐसा है तो गप्प हाँकने वाले दस्तानगो और नाटक के ढंग में कुछ भी भेद न रहा…किसी समय के लोगों के ह्रदय की दशा क्या थी उसके आभ्यंतरिक भाव किस पहलू पर ढुलके हुए थे… इन सब बातों को ऐतिहासिक रीति पर पहले समझ लीजिए, तब उसके दरसाने का यत्न नाटकों के द्वारा कीजिए।’

भट्ट जी लिखते हैं कि नाटक में लेखक द्वारा पांडित्य प्रदर्शन के बजाए मनुष्य के हृदय से उसका गाढ़ा परिचय झलकना चाहिए पर ‘संयोगिता स्वयंवर’ में ‘राजा, मंत्री, कवि यहाँ तक कि संयोगिता बेचारी भी अपना पांडित्य ही प्रकाश करने के यत्न में हैरान हो रहे हैं।’ इससे खीझकर भट्ट जी टिप्पणी करते हैं, ‘भला बताइए यह कौन-सा ढंग भावों के दरसाने का है? कविता के मीठे रस के बदले नैयायिकों की तरह कोरा तर्क-वितर्क करना भाव का गला घोंटना है या और कुछ? …मनुष्य के बदले आपके नाटक के पात्रों को नीरस और रूखे से रूखे अर्थांतरन्यास गढ़ने का कलंक कहें तो अनुचित न होगा।’ (निबंधों की दुनिया)।

साहित्य क्षेत्र में आलोचकों के पांडित्य प्रदर्शन की बखिया उघेड़ते हुए बालमुकुंद गुप्त लिखते हैं: ‘विद्वान को अपने गले में ढोल डालकर अपनी विद्या का डंका बजाने की कोई जरूरत नहीं है। आलोचक में केवल दूसरों की आलोचना करने का साहस ही न होनी चाहिए, वरंच अपनी आलोचना दूसरों से सुनने और उसकी तीव्रता सहने की हिम्मत भी होना चाहिए। जिस प्रकार वह समझता है कि मेरी बातों को दूसरे ध्यान से सुनें, उसी प्रकार उसे स्वयं भी दूसरों की बातें बड़ी धीरता और स्थिरता से सुननी चाहिए। यह नहीं कि आप तो जो चाहे सो कह डालें और दूसरा कुछ कहे तो गुस्से से मुँह में झाग भर लावें, जबान काबू में न रख सकें।’ (निबंधों की दुनिया)

 

बालकृष्ण भट्ट हमारे समय के अनेक आलोचकों से भिन्न थे। वे रचनाकार के प्रति पूर्वग्रह से पीड़ित नहीं थे। उनमें जहाँ एक ओर असहमति का साहस है वहीं दूसरी ओर सहमति का विवेक भी। लाला श्रीनिवासदास के ही ‘रणधीर प्रेममोहिनी’ नाटक की उनकी आलोचना इसका प्रमाण है। उनके शब्दों में ‘ट्रेजेडी के किस्म का यह पहला नाटक है जो हिंदी भाषा में रचा गया है। इसमें श्रृंगार, हास्य और करुण ये तीनों रस उत्तम रीति से निबाहे गए हैं। बीच-बीच में सदुपदेश और लोकोक्ति इस ढंग से रची गई है जिससे उन रसों में मानो जान पिरो दी गई हो। रणधीर और प्रेममोहिनी का प्रेम, रिपुदमन का सच्चा मैत्री भाव, जीवन की स्वामिभक्ति, नाथूराम का माड़वारियों का-सा बनियापन, सुखवासी लाल की स्वार्थपरता सबकुछ अच्छी तरह से इसमें दिखाई गई है।’

बालकृष्ण भट्ट ने ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’ शीर्षक अपने सुप्रसिद्ध निबंध में साहित्य के बारे में अपनी धारणा को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ‘प्रत्येक देश का साहित्य उस देश के मनुष्यों के ह्रदय का आदर्श रूप है। जो जाति जिस समय जिस भाव से परिपूर्ण या परिलुप्त रहती है वे सब उसके भाव उस समय के साहित्य की समालोचना से अच्छी तरह प्रकट हो सकते हैं… साहित्य यदि जनसमूह (नेशन) के चित्त का चित्रपट कहा जाए तो संगत है। किसी देश का इतिहास पढ़ने से केवल बाहरी हाल हम उस देश का जान सकते हैं पर साहित्य के अनुशीलन से कौम के सब समय-समय के आभ्यंतरिक भाव हमें प्रस्फुटित हो सकते हैं। ‘(निबंधों की दुनिया)

वस्तुत: भट्ट जी की नई दृष्टि का विकास हमें शुक्ल जी की उस स्थापना में दिखाई पड़ता है जिसमें उन्होंने लिखा है, ‘जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ–साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चलता है।’ बालकृष्ण भट्ट एवं रामचंद्र शुक्ल की साहित्य-विषयक धारणाओं की तुलना करते हुए मैनेजर पांडेय कहते हैं, ‘आचार्य शुक्ल की धारणा बालकृष्ण भट्ट की साहित्य की जनवादी धारणा का ही परिष्कृत रूप है।’ सच तो यह है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, मुक्तिबोध सरीखे बाद के अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों-आलोचकों के चिंतन में भट्ट जी की साहित्य-विषयक धारणा की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है। हजारी प्रसाद द्विदी जहाँ मनुष्य को ही साहित्य का लक्ष्य घोषित करते हैं वहीं मुक्तिबोध की स्पष्ट मान्यता है, ‘साहित्य वह समन्वय है जिसकी रूप-रचना का आकार व्यक्ति की शक्ति से बना होकर भी जिसके तत्व सामाजिक हैं।’ (मुक्तिबोध रचनावली, भाग-5)।

अपने समय में काव्य-सृजन के क्षेत्र में प्रचलित परिपाटीबद्ध लेखन की बख़िया उधेड़ते हुए बालकृष्ण भट्ट लिखते हैं, ‘हिंदी के कवि भी उन्हीं पुराने कवियों की शैली का अनुकरण कर आज तक चले आए हैं और उस ढंग को छोड़ कोई दूसरे प्रकार की भी कविता हो सकती है यह बात उनके मन में धँसती ही नहीं जिसकी उपमा हम एक छोटे से तालाब की देंगे, जिसमें न कहीं से पानी का निकास है और न नया ताज़ा पानी उसमें आने की आशा है तब इसके अतिरिक्त और क्या हो सकता है कि उसका पानी दिन-दिन सड़ता ही जाए और गंदगी बढ़ती जाए…।’

वाल्मीकि, व्यास, गुणाढ्य से लेकर कालिदास, भवभूति, श्री हर्ष, दंडी, भारवि आदि के समय को कविता का क्लासिक युग बताते हुए भट्ट जी आगे कहते हैं- कालांतर में ‘गांभीर्य इन कवियों के अक्षरों का घटता ही चला आया।’

वे गांभीर्य उस लेखन में मानते हैं ‘जिसे ज्यों-ज्यों मनन कीजिए त्यों-त्यों उसका आशय गूढ़ होता जाए और नई बातें ऐसी निकलती आवें जिसे आपकी विचार शक्ति सिवाय अंगीकार करने के उसकी सजावट को किसी तरह इनकार न कर सकें…

सुसंस्कृत कविता अवश्यमेव कृत्रिमता दोष से पूरित रहेगी… यदि हमारे मन की उमंगें सच्ची हैं तो जो बातें हमारे चित्त से निकलेंगी सच्ची होंगी और उसका असर भी सच्चा ही होगा।’ इसके विपरीत जब नियमबद्ध होकर रचना की जाएगी रचनाकार के खयालात बिलकुल निराले ढंग पर दौड़ें यह असंभव है। भट्ट जी का बल सहजता और स्वाभाविकता पर है। भट्ट जी के सच्ची कविता विषयक इस मंतव्य के आलोक में यदि वैदिक ‘उषा-स्तुति’ और शमशेर की ‘उषा’ कविता में पहली सच्ची कविता है और दूसरी में कला की सिद्धि है।

इसी निबंध में बालकृष्ण भट्ट जब ‘ग्राम कविता’ को ‘उत्तम श्रेणी की भाषा कविता’ के मुकाबले ज्यादा महत्व देते हैं तो अनायास ही रेमंड विलियम्स की ‘देहात और शहर’ (‘कंट्री एंड सिटी’) पुस्तक के साथ ही भारतेंदु के ‘जातीय संगीत’ निबंध की याद हो आती है। भट्ट जी के अनुसार ग्राम कविता में ‘चित्त की एक सच्ची और वास्तविक भावना की तस्वीर खिंची पाई जाती है… काव्य के नियम और कायदों से वे कोसों दूर हैं।’ मल्लाहों के गीत, कहारों का कहरवा, बिरहा अथवा आल्हा आदि का नाम सुनकर नाक-भौं सिकोड़ने वालों पर व्यंग्य करते हुए भट्ट जी लिखते हैं : ‘इनकी प्रशंसा में यदि हम कुछ कहें तो नागरिक जन जो भाषा की उत्तम कविता के रसपान के घमंड में फूले नहीं समाते, वे अवश्य हम पर आक्षेप करेंगे और हमें निपट गंवार कहेंगे।’ इस संदर्भ में निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं कि ‘डूबकर दूर तक सोचिए तो कविता पहले ग्रामीण हुए बिना प्रचलित नहीं हो सकती और उसी ग्रामीण कविता को मांजते-मांजते वही नागरिक यश उच्च श्रेणी की कविता बन जाती है।’

भारत में ‘जातीयता’ एवं ‘जातीय भावना’ के सम्यक विकास की आवश्यकता पर बल देते हुए बालकृष्ण भट्ट ने हमारे समाज की बहुलतावादी संरचना को ध्यान में रखते हुए लिखा है, ‘सहानुभूति और विश्वास- यही दो जातीयता-नदी के दो किनारे हैं। एक भाषा, एक मत, व एक धर्म, एक ही कुल गोत्र या वंश में जन्म आदि से भी सहानुभूति और विश्वास-वृक्ष की जड़ पुष्ट पड़ती जाती है। प्रयोजन की सिद्धि इस जातीयता का फल है। सो जातीयता बिना सहानुभूति के अकेली भाषा, अकेला धर्म वा मत से कभी नहीं होती। वरन अलग-अलग ये तीनों जातीयता के विरोधी हैं।’ प्रकारांतर से यहाँ जाति, भाषा, क्षेत्र आदि पर आधारित कट्टरता का निषेध करते हुए बालकृष्ण भट्ट द्वारा जिस प्रकार अनेकता में एकता पर बल दिया गया है वह भारत के लिए ऐच्छिक या वैकल्पिक नहीं, बल्कि एक राष्ट्र-राज्य के रूप में हमारे अस्तित्त्व की बुनियाद है।

संपर्क सूत्र : प्रोफ़ेसर एवं पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केंद्रीय-विश्वविद्यालय ,हैदराबाद500046. मो.9000606742, e-mail:  raviranjan_hcu@yahoo.com