युवा कवयित्री।संपादित काव्य संग्रह सातवां युवा द्वादशमें कविताएं संगृहीत।असिस्टेंट प्रो़फेसर पद पर कार्यरत।

शक्कर से जरा बचकर रहना

मेरी दोस्त जब कोई तुमसे
सिर्फ फूल-पत्तियों की बातें करे
तो सतर्क हो जाना
ज्यादा मीठा बोलने वाले
अकसर सबके हिस्से की मिठाई खुद खा जाते हैं

याद रखना मेरी दोस्त
शक्कर के गोदाम जलने के बाद कुछ नहीं देते
मगर नीम की पत्तियां
धुआं बनकर भी मच्छर भगा देती हैं

मुझे तुमसे बस इतना कहना है
हमेशा मीठा लिखने वालों को मत पढ़ती रहना
ऐसे लेखक तुम्हें शक्कर की बीमारी लगा सकते हैं
कुछ नीम लेखकों को भी पढ़ लेना
ऐसे लेखक तुम्हें शक्कर की बीमारी से बचा लेंगे

मेरी दोस्त तुमने देखा होगा
जिनके स्नानघरों में चीटियां रेंगती हैं
उनके रसोईघरों में
जलेबियां छिपा कर रखी जाती हैं
ऐसे लोग उम्रभर चाशनी में डूबना चाहते हैं
मगर तुम शक़्कर से जरा बचकर जीना
वे नहीं जानते कि शक्कर का आधिक्य
रक्त से सिर्फ ग्लूकोज़ ही नहीं छीनता
शरीर से जवानी भी छीन लेता है

बेशक तुम्हें झुर्रियों से प्रेम हो
बेशक तुम्हें औरों की अपेक्षा
थोड़ा कम जीने की चाह हो
फिर भी कभी ‘मीठी मौत’ मत मरना मेरी दोस्त!

तीन लड़कियां

वे तीन लड़कियां हैं
तीनों बुद्धिमान हैं, कलाकार हैं, खिलाड़ी हैं…
मगर बेटियां नहीं हैं
वे भार हैं, बोझ हैं, ब्याज हैं अपने माता-पिता पर
मगर बेटियां नहीं हैं
उनकी मां अपना नाम तक भूल गई है
उसका नाम अब बस यही है-
‘तीन लड़कियों वाली मां’
तीनों लड़कियां उसे कमतर महसूस करवाती हैं
उन मांओं के सामने जिनके लड़के हैं
और जिनकी छाती गर्व से फूल गई है
पहली पहले बच्चे की चाह में हो गई
दूसरी लड़के की चाह में हो गई
और तीसरी समय पर जांच न हो पाई
इसलिए बस हो गई
तीनों में से एक भी ऐसी नहीं
जिसे खेत, खलिहान, अटरिया और
मकान दिया जा सके

मां निराश होकर कहती है-
‘ये सब तो बेटे को दिया जाता है
और ये तीनों तो लड़कियां हैं’
सोचती हूँ उन तीनों का बालमन
क्या सोचता होगा इस बारे में…
कि वे बेटियां नहीं, लड़कियां हैं बस!
उनकी मां को बेटे का इंतजार है
उन तीनों को भाई का इंतजार है
घर और संपत्ति को
भविष्य के मालिक का इंतजार है
कोई नहीं जिसे बेटियों के
लड़कियों में बदलने की चिंता हो…

मेरी हथेलियां

मैं बिस्तर पर लेटी ही थी
तभी मेरी निगाह मेरी हथेलियों पर चली गई
मैंने देखा मेरी हथेलियों की खाल काफी सख़्त है
मैंने धीरे-धीरे खाल की एक परत उचाटी
फिर एक के बाद एक कई परतें उचटती चली गईं
उन परतों के नीचे कुछ हुनर की स्याही निकली
कुछ निकली भोजन की महक
कुछ पोंछे का मैला पानी
कुछ साबुन के रसायन निकले
कुछ निकले धूल के कण
कुछ मल की बू निकली
वैसे फूलों की महक वाली
क्रीम की बोतल रखी है मेरे घर में
पर इन हाथों पर कुछ बूंदें उड़ेलने की फुर्सत
मैंने कविताएं लिखने में जाया कर दी।

संपर्क : शासकीय श्रीमंत माधवराव सिंधिया महाविद्यालय, कोलारस, जिलाशिवपुरी, मध्यप्रदेश-473770