गुरुप्रसाद मैनाली

 (1900-1971) नेपाली के प्रख्यात साहित्यकार। ‘नासो’ एकमात्र कहानी संग्रह है जो नेपाली ग्रामीण समाज पर केंद्रित है।

निमा लामा

युवा प्रतिभा। नार्थ बंगाल यूनिवर्सिटी में हिंदी शोधार्थी।

 

चामे की बीवी गौंथली बहुत मुंहफट थी। सीधे मुंह बात करने पर भी टेढ़ा-मेढ़ा जबाव देकर झगड़ा करने का बहाना खोजती थी। दो-चार दिन के अंतराल में पति-पत्नी के बीच झगड़े होते ही रहते थे।

एक दिन शाम को चामे खेत जोतकर घर लौटा तो देखा कि गौंथली घर पर ताला लगाकर गांव में विवाह देखने गई हुई है। दिनभर खेत में काम करने से वह थका और भूखा था। वह हल और रस्सी टांगकर बैल बांधने जा रहा था कि तभी गौंथली आई। गौंथली को देखकर चामे क्रोधित हो गया। खाना पकाना तो दूर, इस समय तक चूल्हा भी नहीं जला था। गौंथली हड़बड़ाते हुए दरवाजा खोलकर नल की तरफ पानी भरने गई। चामे चूल्हे में आग जलाकर तंबाकू भरने लगा।

चामे काले और घने बादल के समान मुंह फुलाए दलान में बैठकर तंबाकू पीने लगा। गौंथली घड़े में पानी लेकर आई। वह अंदर प्रवेश कर ही रही थी, ‘रांड़, दिनभर बारातियों के साथ नैन मटक्का कर रही थी, अब ढोंग कर रही है।’ कहकर उसने जोर से एक लात मारा। गौंथली लुढ़कते हुए बरामदे में जा गिरी। घड़े के फूटने से दरवाजे के पास पानी फैल गया। गौंथली घड़े के टुकड़े उठा-उठाकर आंगन की तरफ फेंक ही रही थी कि तभी ‘मेरे घर में थोड़ी देर भी मत रुक, जहां जाना है जा!’ कहकर चामे ने फिर से गौंथली को बालों से घसीटते हुए आंगन में पटक दिया।

गौंथली थोड़ी बीमार थी, इसलिए लात मारने तक वह कुछ न बोली। लेकिन बाल पकड़कर घसीटने पर गौंथली तमतमा उठी- ‘हाथ में कोढ़ लगे, मां-बाप रांड़-रांड़ी की आंखें फूटी हुई थीं, जो मुझे इस कसाई के हाथों में सौंप दिया। ऐसे कंगाल की बीवी होने से अच्छा है, डूबकर मर जाऊं।’

‘रांड़ अपने पिता को खूब धनी समझती है। गांव में खेत जोते बिना सुबह-शाम खाने को नहीं मिलता, मायके की धाक जमाती है!’ यह कहकर उसने फिर से एक लात मारा।

गौंथली चिल्लाकर रोने लगी। गांव के लड़के-लड़कियां कान्ला1 के ऊपर तमाशा देख रहे थे। ‘स्सालो, यहां क्या कोई तमाशा चल रहा है, जो देखने आए हो?’ कहकर चामे छड़ी उठाकर उन्हें भगाने लगा। पति-पत्नी की लड़ाई देख रही भीड़ तितर-बितर होकर भागने लगी।

गौंथली रो रही थी, चामे दलान में चटाई बिछाकर सो गया।

अगली सुबह चामे भूखे ही हल और बैल लेकर खेत चला गया। जब शाम को वह घर लौटा, तो देखा गौंथली नहीं है। पड़ोसी से पूछने पर उन्होंने बताया कि वह दोपहर में कपड़ा-लत्ता लेकर मायके की ओर चली जा रही थी।

इस समय तक भैंस आंगन में ही बंधी थी। चामे को देखकर ‘भों’ करने लगी। उसने भैंस को घास डालकर बछड़े की रस्सी खोल दी। वह थोड़ी देर बाद दूध का बर्तन लेकर दूहने बैठा। पहले दो बार दूहा ही था कि भैंस चामे को लात मारकर उछल पड़ी। चामे गोबर में चित्त हो गया। दूध का बर्तन तीन हाथ दूर जा गिरा। चामे का ईस्टकोट2 और लंगोट गोबर से लथपथ हो गया। उसने दीवार पर टंगी लाठी उतारकर भैंस को दो बार मारा ही था कि भैंस बंधी हुई रस्सी तोड़कर उछल-कूद करते हुए कोकले के मक्के की खेत में जा घुसी। चामे ‘हो-हो’ करते हुए भैंस पकड़ने की कोशिश करने लगा, जबकि वह बिदककर इस तरफ से उस तरफ, उस तरफ से इस तरफ कूदने लगी।

हाल ही में गुड़ाई किए गए मक्के के पौधे तहस-नहस हो गए थे। कोकली की मां आंगन में निकलकर श्राप देने लगी- ‘चामे स्साला निपूता हो जाए! स्साले को तो दस्त भी नहीं ले पाई! कल इसने अपनी बीवी को पीटा, आज भैंस को। इतना ही नहीं, दूसरे के अनाज को भी बर्बाद कर दिया! इतना गुस्सा तो किसी का नहीं। पिछले साल धनवीर की लात खाकर बरसात-भर बिस्तर पर पड़ा रहा, खुद को ताकतवर समझता है! दूसरे लोगों को मारे तो जानूं। अपनी बीवी को जो उसके यहां एक बंधी हुई वस्तु है, उसे मारना भी भला क्या मारना हुआ! शाम हुई नहीं कि एक न एक बहाना खोजकर गांव भर में हल्ला-चिल्ला करने लगता है।’

धनवीर के घर में विवाह का भोज था। गांव भर के लड़के शराब पीकर नशे में चूर थे। कोकले नर्तकी बनकर ढोल बजाते हुए नाच रहा था। बाकी लड़के कोकले के सुर-में-सुर मिलाते हुए गा रहे थे। उसी समय कोकले की बहन ने मक्के की खेत में चामे की भैंस के घुसने की सूचना दी।

कोकले नर्तकी के भेस में ही दौड़ते हुए खेत में पहुंचा। कोकले को उस पोशाक में देखकर भैंस पूंछ उठाकर इधर-उधर भागने लगी। बाकी बचे हुए मक्के के पौधे भी स्वाहा हो गए। फसल को बर्बाद होता देख कोकले आग-बबूला हो गया। उसने चामे की गाल पर कस के दो थप्पड़ जड़ दिया। बेचारे चामे ने कुछ नहीं कहा। आखिरकार आधी रात को चार-पांच लोग मिलकर भैंस हांककर ले आए।

अगली सुबह चामे कंधे पर पानी का घड़ा लिए आ रहा था। सामने से जुठे दमै की बीवी आ रही थी। जुठे दमै के साथ चामे के संबंध अच्छे थे। वह जुठे की बीवी को भाभी कहता था। चामे को पानी का घड़ा लाते देख जुठे की बीवी ने हँसकर कहा- ‘हाय…! मर्दों का घड़ा उठाना कितना अटपटा दिखता है!’

‘क्या करूं भाभी! रांड़ चली गई, मैं नहीं करूंगा, तो भला कौन कर देगा?’

‘मारते वक्त न आव देखते हो न ताव, बेचारी भागेगी नहीं तो क्या करेगी?’

‘उसकी जुबान छुरी की तरह है, मारूं नहीं तो और क्या करूं?’

‘मुंहफट हुई है कुछ तुम्हारे मार के कारण भी प्यारे!’

‘चुप रहो! जब पिछले दशहरे में जुठे भैया ने तुम्हें कैसे पीटा था! तुमने क्यों कोई जवाब दिया?’

‘आह… आप एक बार कहते हैं, सेवा कर रहे हैं। पहले एक दिन भी ऐसा नहीं था जब पिटाई नहीं होती थी। शाम को भूटिया गांव से शराब पीकर आता और कोई बहाना खोजकर पीटने लगता। त्यौहार के दिन में तो क्या ही कहें। आज भी शरीर दुखता है। इतनी उम्र हो गई है, मगर मैंने अभी तक उसे पलटकर जवाब दिया हो मुझे याद नहीं।’

‘ये तो है, फिर क्यों कह रही हो कि वह मार खाकर मुंहफट हुई है? तुम्हारी तरह सुशील और संस्कारी होती तो पूजा करके रखता।’

‘जो भी हो, बीवी के साथ जिद करने से नहीं होगा। कितने दिन चूल्हा-चौका करोगे? कल ही लेने चले जाओ।’

‘मती फिरेगी तो खुद आएगी। मैं कोई बेशर्म नहीं जो जाऊं।’

चामे शरीर से दुबला-पतला, मूंछ की पतली रेखावाला और देखने में सांवला था। वह आधे बांह की कमीज के ऊपर से ईस्टकोट पहनता, तिरछी करके लंगोट कसता। उसके सिर में मैल से सनी हुई काली टोपी और माथे पर सिंदूर का टिका रहता था।

एक दिन सुबह चामे बरामदे में बैठकर तंबाकू पी रहा था। सामने से जुठे दमै आया। जुठे अपने बेटे को गोद में लेकर आगे-आगे आ रहा था। उसकी पत्नी बांह में छोटी गठरी ढोकर पीछे-पीछे आ रही थी। चामे को देखकर जुठे हँसा और बोला-

‘क्या हाल है भाई?’

‘बस चल रहा है।’

‘बीवी को तो मायके खदेड़ दिया। अब अकेले मौज कर।’

जुठे और उसकी बीवी के संबंध काफी मधुर थे। जुठे हमेशा अपनी बीवी को लेकर पास के गांव में कपड़ा सिलने जाता था। पति-पत्नी रास्ते भर घर-गृहस्थी और दुख-सुख की बातें करते। जुठे रात को ताक पर दीया जलाकर विराटपर्व के श्लोक का उच्चारण करता। उसकी बीवी चूल्हा-चौका करते हुए श्लोक सुना करती। कभी-कभार जुठे के बीमार पड़ने पर वह गांव भर में ओझा खोजती फिरती। ठाकुरों के घर कपड़े सिलते वक्त मियां-बीवी हँसी मजाक करते, कभी-कभी एक-दूसरे के गर्दन खींचते और कभी-कभी तो लोगों से बचकर आंखें भी मारते। उसकी बीवी बोली, ‘आ… बूढ़े होने पर भी मजाक करने की आदत नहीं गई!’ यह कहकर वह मुस्कुरा देती।

जुठे पूजा-पाठ भी करता था। प्रातःकाल ही स्नान-ध्यान करता। वह स्नान करने के बाद राख की भभूत लगाकर रामायण के श्लोकों का पाठ करता था।

चामे जुठे के गृहस्थ जीवन के साथ अपने जीवन की तुलना करके बहुत दुखी होता। जब जुठे के यहां खाना-पीना खाकर विराट पर्व पढ़ा जाता, तब उसके यहां रोना-धोना चलता था। जुठे और उसकी बीवी के बीच इतना गहरा प्रेम है। एक-दूसरे के साथ दुख-सुख बांटते हैं। एक मेरी बीवी है, जो झगड़ा करके मायके चली जाती है। विवाह के इतने वर्ष हो गए कभी सीधे मुंह बात हुई हो, मुझे याद नहीं।

और एक भैंस है, जो नजदीक आने नहीं देती। खुद तो गई, भैंस पर भी जादू चलाकर चली गई। इसी भैंस के कारण गाल पर कोकले का थप्पड़ पड़ा। सोचता हूँ, ऊंचाई से धकेल दूं। मगर पूंजी तो साहूकार की है, कल आकर मुझपर करवाई कर देगा। खुद चूल्हा-चौका न करूं, तो भूखा रहना पड़ता है। इतनी दयनीय जिंदगी जीने से अच्छा है, राख मलकर चलूं। लेकिन राख मलकर भी क्या करूं, दस घरों का कुत्ता हुए बिना खाना नसीब नहीं होता। उसमें भी आजकल लोग मजाक उड़ाते हुए कहते हैं- ‘मेहनत के डर से जोगी का भेस धारण किया है।’ आश्रम में रहने की नौबत आ जाएगी।

अगर बीमार पड़ा, तो एक मुट्ठी अन्न देने के लिए कोई नहीं रहेगा। दूसरे कहे या न कहे खुद ‘नमो नारायण!’ दूर से देखने पर सांसारिक मोह-माया से अलग यह जिंदगी अच्छी दिखती है, मगर ऐसा है नहीं।

शुरुआती आठ-दस दिन तो चामे गौंथली का नाम सुनने पर भी झपटने जैसा करता था। लेकिन बाद में वह अकेला महसूस करने लगा। वह सोचने लगा- मुंहफट होने के साथ-साथ बहुत फुर्तीली भी थी। मन लगाकर एक गठरी घास लाती थी तो भैंस भी अघा जाती थी। सुबह-शाम एक मुट्ठी खाना पकाकर देती थी। उसके जाने के बाद से तीन-चार दिन भात खाया होऊंगा, नहीं तो केवल भूने हुए भुट्टे पर निर्भर हूँ। जब वह थी, तब भैंस भर-भरकर दूध देती थी। वह खुद दूध दुहती थी। उसके जाने के बाद भैंस जो बिदकी, बिदकी ही है। सभी लोग बुलाकर लाने को कहते हैं। जुठे भैया की बीवी भी यही कहती है। आएगी तो आएगी नहीं आएगी तो न सही, एक बार तो लेने जान ही पड़ेगा।

अगली सुबह चामे खाना-वाना खाकर ससुराल जाने के लिए तैयार हुआ। उसने संदूक से पनेला3 का दौरा-सुरुवाल4 निकालकर पहना। गौंथली ने टोपी के अंदर तंबाकू की पुड़िया रख दी थी, जिससे टोपी में दाग लग गया और वह मुड़ भी गई थी। चामे गुस्से से बड़बड़ाने लगा- ‘रांड़ का ढंग तो देखो, सामान मिलने पर भी क्या करूं, गुण ठीक मिले तब न! उसके बाप ने बिर्के टोपी5 पहनी होती तो उसे पता होता! बाप जूट की टोपी और गादो6 पहनकर चलता है तो बेटी कैसे ढंग की हो सकती है। बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!’

थोड़ी देर बड़बड़ाने के बाद चामे ने खींच-तानकर टोपी पहन ली। दूसरा कोई ईस्टकोट नहीं था, इसलिए वही पुराना पहन लिया। ओढ़ने के लिए एक चादर पीठ पर तिरछा करके बांध लिया और हाथ में एक पुरानी छतरी लेकर निकल पड़ा।

चामे ससुराल पहुंचने से ठीक पहले एक चबूतरे पर बैठकर अपना पसीना पोंछ रहा था। गांव से थोड़ी दूर जंगल के पास से सुस्ताती गौंथली की गुनगुनाती आवाज आई- ‘उडी जाऊँ भने म पंछी होइन, बस्न त मन छैन।’(उड़ जाऊं तो मैं पंछी नहीं, रहने की तो इच्छा नहीं।)

चामे ऐंठने लगा- ‘भैंस का पेट बिना घास खाए सारंगी की तरह पिचक गया है, रांड़ यहां रहकर जंगल का मनोरंजन कर रही है!’

थोड़ी देर चबूतरे पर थकान मिटाने के बाद चामे धीरे-धीरे आगे बढ़ा। खुजली वाले विशाल पेड़ के पास पहुंचते-पहुंचते चामे के घुटनों में दर्द होने लगा था। सास-ससुर क्या कहेंगे, यह सोचकर वह कुछ असहज हो गया। वह धीरे-धीरे करके ससुराल की सीमा तक पहुंचा। सास बाहर बर्तन मांज रही थी। ससुर दलान में बैठकर तंबाकू पी रहे थे। सास को देखकर चामे ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। सास ने भी जूठे हाथों से ही प्रणाम का जवाब दिया। चामे दलान में बैठा। ससुर चामे के हाथों में हुक्का देकर प्रणाम करने के लिए झुके, चामे ने भी अपना पैर आगे बढ़ाया।

थोड़ी देर बाद घास की गठरी लेकर गौंथली घर पहुंची। पनेला का ब्लाउज और घुटने से ऊपर की साड़ी, कमर में पटुका7, हाथ में कड़ा, गले में मंगल सूत्र, पुष्ट वक्ष, मांग में सिंदूर लगाई हुई, जुड़ो में गुरांस का फूल खोंस कर, थोड़ी-थोड़ी सांवली वर्ण की गौंथली बहुत सुंदर दिख रही थी। गौंथली का यह मनोहर रूप देखकर चामे तृप्त हुआ। चामे को लगा जैसे घर में साक्षात गृहलक्ष्मी प्रवेश कर रही है।

शाम को गौंथली ने चामे का पैर छूकर प्रणाम किया। चामे गदगद हो गया। आज उसका मन हुआ गौंथली को हृदय से लगाकर हजार बार चूमे। चामे ने गौंथली को पकड़ने के लिए एक हाथ बढ़ाया। वह हाथ झटककर घर के अंदर चली गई।

खाना-वाना खाने के बाद चामे के लिए दलान में बिस्तर लगा दिया गया। चामे बिस्तर पर लेट गया। मगर उसकी आंखों में लेशमात्र नींद नहीं थी। वह बस राह देख रहा था, यह सोचकर कि गौंथली आएगी। सभी ने खाना खा लिया। जूठे बर्तन धुल गए और साफ-सफाई भी हो गई। थोड़ी देर बाद कोई दीया लेकर ऊपर के कमरे की ओर गया। उसके बाद पता नहीं किसने दरवाजा बंद करके कुंडी लगा ली। यह सब देखकर चामे दंग रह गया।

चामे के मन में कई बातें चलने लगी। अरे! उस दिन बेचारी गौंथली को भला क्यों मारा? स्त्रियां तो शादी-विवाह देखने के लिए आतुर रहती ही हैं। ऊपर से बढ़ती उम्र, थोड़ी देर शादी ही तो देखने गई। गांव-घर में कुछ समय के लिए उत्सव देखने गई थी, उसको भी मैं सह नहीं पाया, ऐसा तुच्छ आदमी क्या अपनी बीवी को संभालेगा! देर से खाना पकाने पर अपनी बीवी को पीटने से बड़ा अधर्म दूसरा क्या हो सकता है? थोड़ी मुंहफट हुई है, वह भी बार-बार मार खाकर ही। घर लौटी तो, अब कभी नहीं मारूंगा। जुठे भैया की बीवी से भी अधिक इज्जत और सम्मान नहीं किया तब कहना! मन में जितनी बातें चल रही थीं, उतना ही खटमल भी नीचे से काट रहा था।

दरवाजा खुलने की आवाज आई। गौंथली आ रही है, सोचकर चामे ने अपने कान खड़े किए। पीछे मुड़कर देखा तो ससुर थे। ससुर दरवाजा खोलकर खेत की तरफ पेशाब करने चले गए। वह पूरी रात छप्पर को अनवरत ताकता रहा। उसने खुली आंखों से अगली सुबह की कल्पना करते हुए पूरी रात काट दी।

मवेशियों को बाहर निकालने का समय हो गया था। ससुर चबूतरे पर बैठकर तंबाकू पीने लगे। सास दलान में बैठकर भुट्टे छुड़ा रही थी। गौंथली रसोई में चूल्हा-चौका कर रही थी। चामे ने थोड़ा शर्माते हुए ससुर से कहा- ‘खेत में काम करने का समय है, ससुर जी! बेटी को विदा कर दीजिए।’

ससुर ने खांसते हुए हुक्के की नली को गाल पर टिकाकर कहा- ‘वैसे तो दामाद जी, गरीब-सरीब कहकर कई नाम रखे हैं! लेकिन गरीब हूँ, पर आज तक किसी के यहां झोली फैलाने नहीं गया। कन्यादान कर दिया है! अपनी पत्नी को खुद मनाओ, ले जाओ, किसने रोका है!’ चामे दांत दिखाकर मुस्कुराने लगा।

थोड़ी देर बाद गौंथली चूल्हा-चौका करके डोकोनाम्लो8 लेकर जंगल की तरफ जाने लगी, चामे ने उसकी बांह पकड़कर कहा- ‘डोकोनाम्लो लेकर कहां? चलो, घर चलते हैं।’

‘मर जाऊंगी, लेकिन घर नहीं जाऊंगी।’

‘घर नहीं जाओगी, तो कहां जाओगी?’

‘अकेली जान का क्या, जहां भी जा सकती हूँ! जोगिनी हो जाऊंगी।’

‘भैंस के लिए घास कौन काटेगा भला, अगर जोगिनी हो जाओगी!’

‘तुम्हारी भैंस के लिए तुम खुद ही घास काटो।’

‘पागल मत बनो, तुरंत चलो।’

‘घर ले जा रहे हो, फिर से बहाना खोजकर मारते रहने के लिए?’

‘अब ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम निश्चिंत रहो।’

‘अच्छा! ऐसा है क्या?’

थोड़ी देर बाद गौंथली सज-धजकर बाहर निकली। बूढ़ी सास ने एक छोटी-सी पोटली और एक दही की हांडी लाकर सामने रख दिया। गौंथली पोटली को बांह में दबाकर आगे-आगे चली, चामे हाथ में दही की हांडी झुलाते हुए पीछे-पीछे चलने लगा। रास्ते में चामे और गौंथली बात करने लगे- ‘आजकल भैंस कितना दूध देती है?’

‘सुबह-शाम मिलाकर दो सेर।’

गौंथली ने चामे की ओर मुड़कर मुंह बनाया।

सूर्यास्त हो रहा था। चरवाहे मवेशियों को हांककर धूल उड़ाते हुए धीरे-धीरे बढ़ रहे थे। चामे गौंथली को लेकर पनघट के पास पहुंचा था। दूसरी ओर से जुठे की बीवी पानी का घड़ा लेकर आ रही थी। चामे को देखकर जुठे की बीवी लंबी जीभ निकालकर हँसते हुए बोली-  ‘अहा! चकवा-चकोर की जोड़ी जैसे आगे-आगे दूल्हा पीछे-पीछे दुल्हन, कितना सुखद लग रहा है!’

गौंथली ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘मत हँसो दीदी, फिर किसी दिन ऐसा ही झगड़ा होगा।’

‘अरे… लाड़ प्यार करने में भी तो देर नहीं लगती है, पति-पत्नी का झगड़ा पुआल की आग है!’

——————–

  1. पहाड़ों पर बनाया गया सीढ़ीनुमा खेत की मे़ड़ सदरी, नेहरूकोट 3. एक प्रकार का कपड़ा 4. नेपाली पुरुषों द्वारा पहना जाने वाली पोशाक 5. नेपाली टोपी 6.नेपाली पोशाक 7.कमरबंद 8.एक विशेष प्रकार की टोकड़ी, जिसे पहाड़ों में सामान उठाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

संपर्क :निमा लामा, शोधार्थी, हिंदी विभाग, उत्तर बंग विश्वविद्यालय, सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग-734013, पश्चिम बंगाल मो. 9474190678