युवा कवि। काजी नजरुल यूनिवर्सिटी, आसनसोल में सहायक प्रोफेसर। अद्यतन पुस्तक ‘जीवन हो तुम’ (कविता संग्रह)।

 

इधर कविता के संसार में नए कवियों का आगमन तेजी से हुआ है। यहां जिनकी पुस्तकों पर चर्चा है उनमें इन कवियों में दो थोड़े पुराने हैं- आर चेतनक्रांति और हेमंत देवलेकर। जमुना बीनी, उस्मान खान, पराग पावन का यहां पहला संग्रह है। पहला संग्रह हर युवा कवि के लिए पहले सपने जैसा होता है जो यथार्थ की धरती पर फूल बनकर खिलता है। इसकी खुशबू से ही वह भविष्य में पहचाना जाता है। ये सभी कवि भविष्य की उम्मीदों और सपनों को जिलाए-बचाए रखने की वकालत करते हैं।

 

आर चेतनक्रांति का तीसरा संग्रह ‘आत्मद्रोह’ है। उनका स्वर इस संग्रह में भी वही है जो पहले संग्रह में था। उनका स्वरभंग नहीं हुआ है बल्कि सुर और चढ़ा है, तेज हुआ है। व्यंग्य की धार पैनी हुई है और बोलने का तरीका अधिक जनोन्मुखी हुआ है। उनकी एक कविता है ‘व्यतीत वीर’ जिसमें वे कहते हैं कि जिन्हें वर्तमान में जगह नहीं मिली, वे अतीत की तरफ चले गए। यह कहते हुए कि अतीत में उनके पास महानता के लिए काफी कुछ है। अब वे अपने वर्तमान को उसी अतीत की तरह फिर से चमकाना चाहते हैं। कविता खत्म होती है- ‘विचित्र थे ये लोग/बहुत फबते होंगे/पाषाण और लौह वाले युग में’ और कविता की अंतिम पंक्ति है- ‘लेकिन डिजिटल में काहे भसड़ पोत रहे बे!’ यह अंतिम पंक्ति उस जनता जनार्दन की तरफ इशारा करती है जो इसी भाषा में बात करता है। यह वह भाषा है जो सबको समझ में आती है। यह वह हिंदुस्तानी है जिसमें उर्दू और यहां की मादरे वतन की जुबान अपने आप चली आती है। आर चेतनक्रांति की भाषा हिंदुस्तानी है- ‘उठाए कीमतों की तख्तियां फिरते हैं सभी/जो बिक चुके हैं उन्हें और भी बिकना है अभी/इधर ये जिस्म के अज्ज़ा की सेल जारी है/उधर वो छूट बढ़ा दी गई ज़मीर प’ भी’। यही वो हिंदुस्तानी जबान है जिसकी वकालत गांधी जी से लेकर सारे लोग करते थे।

हिंदुस्तानी जबान ही नहीं, हिंदुस्तान की भी चिंता बार-बार कविता में उतर आती है। वे एक बेहतर हिंदुस्तान का सपना देखते हैं और सबसे बड़े यथार्थ के सामने भी आशा और विश्वास से कहते हैं, ‘वे हारेंगे।’ वे काली शक्तियों के साथ हैं, उनका संगठन बड़ा है। वे योजनाबद्ध तरीके से काम करते हैं, फिर भी वे हारेंगे। दरअसल एक कवि भविष्य के सपनों को बचाए रखने की वकालत हमेशा करता रहता है। आर चेतनक्रांति सिर्फ उन्हीं ‘वे’ का चित्रण नहीं करते, जो गलीज और गंदे हैं और जो सबकुछ को इतिहास की गलियों में ढकेलकर फिर से देश को ‘आर्यावर्त्त’ बनाना चाहते हैं। वे उन ‘वे’ के बारे में भी लिखते हैं जो हमारे बीच के हैं और सफेद शर्ट पहनकर हमें ठगते हैं। उनकी ‘वे-2’ एक ऐसी ही कविता है जिसमें वे जिक्र करते हैं कि यह वह समाज है जो मौखिक जमा पूंजी खर्च करके क्रांतिकारी बना हुआ है- ‘वे हर जुलूस में शामिल होते/ ढूंढ़-ढूंढ़कर विरोध-पत्रों पर हस्ताक्षर करते/ पर जेल जाने से हर बार/रह जाते/हर जालिम रात के बाद सुबह अपने दफ्तरों में वे वहीं बैठे मिलते/कभी गुस्सा करते, कभी हँसते/कभी कहते हुए कोई भीषण रचनात्मक बात/अनहोनी से कभी-कभी कांपते हुए भीतर-भीतर/करते हुए अपने रोजमर्रा के काम। ‘ये वही ‘वे’ हैं जो अंगुली कटाकर शहीद होने का जिक्र फक्र से करते हैं। आर चेतनक्रांति ऐसे अंध राष्ट्रवादियों से समाज को सचेत करते हैं और जब वे ऐसा करते हैं तो उनकी भाषा में व्यंग्य का वह पैनापन आपको नजर आता है जो एक समय नागार्जुन के यहां था। व्यंग्य उनकी कविताओं को धार देता है जो जनता को आगाह करने का काम करता हुआ प्रतीत होता है। यह व्यंग्य ध्वंस के लिए नहीं निर्माण के लिए है। एक सार्थक और सफल व्यंग्य का निर्वाह यहां हमें देखने को मिलता है, जिसके केंद्र में यह राष्ट्र है।

इस संग्रह के अंत में कुछ गजलें और एक नज्म ‘दुकान’ शीर्षक से है। यहां भाषा की रवानगी और उर्दू की उस लयात्मकता और खूबसूरती के दर्शन होते हैं जिसे अलग से रेखांकित किए जाने की जरूरत है। पाठक इसे पढ़कर आसानी से समझ सकता है कि भले यहां उर्दू के शब्दों की बहुतायत हो पर है यह इसी मिट्टी की देशज परंपरा। यहां सिर्फ परंपरा का निर्वाह नहीं परंपरा का विस्तार भी दिखता है।

दरअसल एक कवि यही तो करता है कि वह अपने समय में रहते हुए इतिहास और भविष्य को कविता के तराजू पर रखते हुए बेहतर कल की वकालत करता है।

जिज्ञासा : आपकी कविता में नागरिकता (सिविल सोसायटी) के प्रति काफी सजगता है कि आम आदमी को कैसे इस समाज में रहना चाहिए। क्या आप इससे नागरिक समाज में कुछ फर्क पड़ता हुआ देख पाते हैं?

आर. चेतनक्रांति : नागरिक समाज से कुछ कहने की कोशिश तो हर चीज करती है कविता हो, किताब हो, फिल्म हो। उसका असर कितना होगा ये इसपर निर्भर है कि वह पहुंचती कहां तक है।

जिज्ञासा: व्यंग्य आपकी कविताओं में प्रमुखता से आता है, क्यों?

आर. चेतनक्रांति: व्यंग्य आपके तर्क के साथ आपकी असहमति और गुस्से को भी व्यक्त करता है। अगर वह कहीं पहुंचता है तो असर भी ज्यादा करता है। ये समझायश से परे जा चुके व्यक्ति को उसके पतन से अवगत कराने के आखिरी औजारों में से एक है शायद।

 

कविताएं कभी सुबह की ब्रह्मवेला में शांति के साम्राज्य का आभास कराती हैं। कभी वे दोपहर के गुस्से की अभिव्यक्ति (उस्मान खान एवं पराग पावन) जैसी भी हो जाती हैं। कभी शाम के धुंधलके की तरह सबकुछ धुंधला-धुंधला दिखता है। कविता कभी-कभी कांतासम्मित उपदेश की तरह होती है। हेमंत देवलेकर की कविताएं ब्रह्मवेला का आभास कराती हैं।

वे जीवन को एकआयामी ढंग से नहीं, थोड़ा विस्तार देते हुए कविता की दुनिया में वास्तविक दुनिया को लाने की कोशिश करते हैं। एक खुशनुमा अहसास के साथ जहां गम है भी तो अपनी गरिमा में सहज स्वीकार्य है। शिकायत भी है तो संयम के साथ। हेमंत प्रेम से, धीरज से और भले शब्दों में कविता करते हैं। शायद एक कवि यही करता है कि जीवन में अच्छी चीजों की तरफ इशारा करता रहता है। उनके कविता संग्रह ‘प्रूफ रीडर’की कविताएं यह काम करती हैं।

जीवन में जीवन के विश्वास और वापसी को संभव करती हुई हेमंत की कविताएं प्रेम को संभव करती हैं। कवि को यह प्रेम हर जगह दिखता है। तभी प्रकृति में निहित प्रेम को भी कवि लिखता है- पत्तियां जो झरी पड़ी हैं वे हवाओं की चप्पलें हैं। देखो, कैसे-कैसे दौड़ती है हवा उनको पहने या कितना कुछ विकृत हो रहा- किंतु आश्चर्य कि वसंत अभी भी उतना ही मादक है, उतना ही काम जगानेवाला, उतना ही नवीन और उत्साहवर्द्धक। यह धूप की कोख फूलों से भर देता है!

हेमंत के यहां गद्य, निखालिस गद्य में भी उत्कृष्ट काव्य का दर्शन होता है। गद्य हो या पद्य, प्रेम की आत्मा कविता में सुरक्षित रहती है। दरअसल ‘गद्य कवियों की कसौटी है’ और इस कसौटी पर कवि खरा उतरता है। ‘भीड़ : एक मोनोलॉग’ इसी तरह की एक और उम्दा गद्य कविता है।

हेमंत के पास लंबी कविताएं लिखने का हुनर है। ‘भीड़ : एक मोनोलॉग’ और ‘ख्यालगाथा’ काव्यमय और नाटकीयता के साथ उसी खूबसूरत भाषा में लिखी गई लंबी कविता है। ‘ख्यालगाथा’ पढ़ते हुए अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ की याद बरबस आ जाती है। दोनों में एक व्यक्ति कॉमन है-कलाकार। वह अपनी इयत्ता को समर्पित करके ही कला के उच्च सोपान तक पहुंचता है। दरअसल कला जो समर्पण मांगती है, उसी समर्पण को रेखांकित करना कवि का ध्येय होता है। यह समर्पण सिर्फ व्यक्ति और समाज के प्रति ही नहीं होता। इसमें चिड़िया-चुरंग से लेकर प्रकृति का एक-एक उपादान सम्मिलित होता है।

प्रकृति के प्रति काफी संवेदनशील है यह कवि। प्रकृति के काफी शेड्स हैं हेमंत के पास। ये ऐसी फूल-पत्तियों वाली कविताएं नहीं हैं जिनमें इनका कविता लिखने के उपादान के रूप में इस्तेमाल होता है। हेमंत प्रकृति के बहाने अपने परिवेश से एकाकार और उसकी मूक संवेदना को मनुष्य के रूप में परिवर्तित करके उसे वाणी देने का कार्य करते हैं- ‘पीपल के पेड़ तले/एक गोल चबूतरे पर/मैं अक्सर संगीत खोजने आता हूँ’ या ‘देवताओं को भी करुणा से देखा जा सकता है’ जैसी काव्य पंक्तियां कवि की उस अंतर्दृष्टि की तरफ इशारा करती हैं जो सामाजिक भी है और करुणा से भरी हुई भी। पुस्तक के समर्पण पृष्ठ पर भवभूति की यह पंक्ति द्रष्टव्य है, ‘करुण ही एकमात्र रस है।’ यह पूरे काव्य संग्रह पर फिट बैठता हुआ प्रतीत हो रहा है।

जिज्ञासा: आपकी कविता की भाषा लयात्मकता से भरी हुई है। इस भाषा का राज?

हेमंत देवलेकर: मेरी सृजन यात्रा में संगीत रचना भी शामिल है। यह काम कविता की शुरुआत के थोड़े ही समय बाद शुरू हो गया था, गीत लिखना और संगीतबद्ध करना। इस वजह से आरंभ में छंद और तुकांतता रही कविता में। बाद में न छंद रहा, न तुक यानी आनुप्रासिकता। शायरी भी पढ़ता था। गजल के अलावा नज्म विधा में लय की बह़ुत महत्वपूर्ण उपस्थिति रही है। उसे भी समझा। मुक्तिबोध, शमशेर जी की कविताओं में भी उसे देखा।

जब दूसरे संग्रह ‘गुल मकई’ की कविता गुल मकई लिख रहा था, तब मैंने सचेत सजग होकर लय का ध्यान रखा। यह 2016 की बात होगी। उस कविता को लिखते हुए उसे बार-बार पढ़ रहा था और विन्यास को सुव्यवस्थित करते जा रहा था। उसे लिखते हुए मुझे लय का महत्व, उसकी खूबी और सुंदरता का अहसास हुआ। इसके बाद मैंने उस संग्रह की कई कविताओं को बोल-बोलकर पढ़ा। देखा, जांचा कि कोई रुकावट तो नहीं। कोई उच्चारण रिवर्स तो नहीं आ रहा। फ्लो की तरह आगे ही आगे बढ़ रहा है न?

उसके बाद से शिल्प में लय को साधने की कोशिश लगातार करता रहा हूँ।

जिज्ञासा : आपकी कविताओं में यथार्थ बहुत है, पर अभिव्यक्ति मुलायमियत से भरी हुई। ऐसे शिल्प का कारण?

हेमंत देवलेकर : अपने लेखन के बारे में मेरा सिद्धांत कुछ ऐसा है कि यथार्थ कल्पना की तरह लगे और कल्पना यथार्थ की तरह।

दूसरा सिद्धांत यह है कि कोई भी चीज़ या तत्व निर्जीव नहीं है। जो कुछ हमारे इर्दगिर्द है, वह अचल या जड़ हो सकता है लेकिन प्राणहीन नहीं है। उसमें भी स्पंदन है, उसकी भी आकांक्षाएं हैं, उसके दुख हैं, उसकी भी कल्पनाएं हैं। ऐसी चीजें भी सबकुछ कहना चाहती हैं। मैं कवि के नाते उनके पास जाता हूँ। उनसे प्रेम-करुणा का रिश्ता बनता है, फिर वे अपनी बातें मुझसे कहने लगती हैं!

 

‘जब आदिवासी गाता है’कहने को तो जमुना बीनी का पहला संग्रह है पर थोड़ा संपादित है। कुछ शब्दों, कुछ वाक्यों को हेर-फेर देने से कविता की जादुई शक्ति का आभास होने लगता है। इसमें कई बार कवि की अपनी प्रतिभा होती है तो कई बार संपादन कला भी। वैसे भी एक अच्छे कवि को एक अच्छा संपादक भी होना चाहिए। हम सभी जानते है कि मुक्तिबोध अपनी कविताओं को छपने के बाद तक संपादित करते रहते थे। दरअसल संपादन कला में निष्णात कवि अपनी कविताओं को बार-बार लिखता है और सिर्फ भावावेग से नहीं, बौद्धिकता से भी उसे सिरजता है। जमुना बीनी ने इस काव्य संग्रह पर फिर-फिर मेहनत की है, इसे पढ़ते हुए यह अहसास बराबर होता रहा। लगता रहा कि ये पढ़ी हुई कविताएं हैं पर कहां? यह याद नहीं आ रहा था।

हर अच्छी और प्यारी कविता अहसास दिलाती है कि यह तो वही बात है जो हमारे दिल में है पर भाषा इसे कवि ने दी है। ऐसी कविताएं ही जनता में अपनी जगह बनाती हैं, क्योंकि ये व्यक्ति के अनुभव के बहाने अपने समय-समाज की अभिव्यक्ति होती हैं।

जमुना बीनी के पास उन सुदूर पहाड़ों के अनुभव हैं जो अरुणाचल के हैं। लेकिन कविता में आई हुई अनुभूतियों की अभिव्यक्ति आदिवासी विमर्श के रूप में है। कवयित्री को इस पहचान या विमर्श से कोई आपत्ति नहीं है। इसे वह कविता संग्रह के शीर्ष पर लगाती हैं- ‘जब आदिवासी गाता है’। यहां आदिवासी वह आदिवासी नहीं है जिसे आधुनिक सभ्यता हेय दृष्टि से देखती है। यहां आदिवासी अपनी पूरी गरिमा के साथ उपस्थित है। वह आदिवासी होने को गर्व की तरह देखता है और बताता है कि मेरा यह होना मेरी नियति नहीं, मेरी उपलब्धि है।

इतना ही नहीं लेखन को लेकर भी एक स्पष्ट पहचान है, ‘तुम्हारा लेखन/सहानुभूति भर/और/हमारा लेखन/आत्मसम्मान से मदमाता!’ सिर्फ आत्मसम्मान ही नहीं है यहां विस्थापन भी है। मां नहीं चाहती कि उसका बेटा शहर से घर आए क्योंकि घर आने पर जंगलवाले उसे उठा ले जाएंगे और नहीं तो सेना! कभी सेना के विरुद्ध स्त्रियों ने आक्रोश प्रदर्शित किया था। उनकी गूंज हिंदी ही नहीं विश्व पटल पर सुनी गई थी। जमुना बीनी के यहां भी वह आक्रोश है, लेकिन भाषा का संयम जबरदस्त है। आप अपनी बात दृढ़ता से रख सकते हैं, बिना गुस्सा हुए।

दरअसल गुस्सा तुरंता अभिव्यक्ति है तो दृढ़ता की वैचारिकता भविष्यगामी होती है। वैचारिक दृढ़ता भविष्य को साफ-साफ देख पाती है। जमुना बीनी का यह संग्रह दृढ़ता का परिचय देता है, वह भी काव्यमय भाषा के साथ। युवा कविता में इसे साध पाना एक बड़ी उपलब्धि होती है क्योंकि यह सामान्य मान्यता है कि युवा या जवानी तो वह होती है जो चलती है तो धरती-आकाश कांप उठते हैं। उस्मान-विहाग वैभव के पास युवा भाषा है, लेकिन जमुना बीनी इसे साध ले गई है। वह संघर्ष लिखती हैं पर भाषा में एक सुंदर दृढ़ता के साथ। उनका यहां युवकोचित गुस्सा नहीं है।

एक स्त्री रचनाकार, भले वह पढ़ी-लिखी और पीएच. डी. डिग्रीधारी ही क्यों न हो लेकिन जब कविता में अपनी बात कहती है तो वह अपने अनुभव को सबसे ज्यादा महत्व देती है। उसे परंपरा का ज्ञान होता है। उसे लिखने-कहने की अदा भी आती है पर वह सबकुछ अपने ढंग से कहती है। जो रचनाकार ऐसा नहीं कर पाते वे लकीर के फकीर बनकर रह जाते हैं। जमुना बीनी पहले से बनी लकीर को तोड़ने का या उसपर चलने के बदले अपने अनुभव को लिखने में ज्यादा पैबस्त है। इसलिए उनकी कविताएं उनकी परंपरा का अनुपालन करने के बदले उसे देखने की एक नई दृष्टि देती हैं- ‘तुम अपने बचाव में/आधुनिक शिक्षा का तर्क देते हो/मात्र/तर्क के लिए तर्क/प्रश्न के लिए प्रश्न/बिना उस दर्शन को जाने/जो तुम्हारे पूर्वजों की/विश्वदृष्टि हुआ करती थी।’ यह बात वही कह सकता है जो आदिवासी जीवन दर्शन-संस्कृति में गहरे धंसा हो। उसके लिए आदिवासी होना शर्म की नहीं बल्कि गर्व की बात होती है। वह अपने और अपने दर्शन को पहचानता है। उसे जानता है, उसे जीता है।

अरुणाचल प्रदेश के गली, कोने-अंतरे, घर, गांव-देहात, लोक कथाएं-लोक गीत, संस्कृति और प्रकृति-परिवेश को लयात्मक भाषा में प्रस्तुत करती हुई जमुना बीनी अपनी कविताओं को ठोस जीवन संदर्भों से जोड़ती है।

जिज्ञासा : प्रकृति के साथ-साथ प्रतिरोध की आवाज भी आपकी कविताओं में है। दोनों को एक साथ कैसे साध लेती हैं आप?

जमुना बीनी:  प्रतिरोध करना मैंने प्रकृति से ही सीखा है। मैं ऐसी पृष्ठभूमि से आती हूँ, जहां मैंने प्रकृति के सौम्य और रौद्र दोनों रूपों को देखा है। यह बड़ी हैरानी की बात है कि जब किसी संपत्ति (इमारत वगैरह) को क्षति पहुंचाई जाती है तो उसे उपद्रवपूर्ण तोड़-फोड़ कहा जाता है। यह घोषित रूप से एक आपराधिक कृत्य है। लेकिन जब प्राकृतिक संपत्ति को विनष्ट किया जाता है तो उसे विकास का नाम दिया जाता है। अंततः इसका प्रतिशोध प्रकृति लेती है। यकीन मानिए ऐसा मैंने अनेक बार देखा है। हमारे आदिवासी दर्शन में प्रकृति की सदा से ही एक स्वतंत्र सत्ता रही है। इसलिए हम कभी भी प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की नहीं सोचते, वरना प्रकृति भयंकर तौर पर प्रतिरोध करेगी।

जिज्ञासा : क्या आप मानती हैं कि आज के समय में अच्छे कवि-संपादक की जरूरत है?

जमुना बीनी: जी, नितांत आवश्यक है। साहित्य की कोई भी विधा क्यों न हों, उसके संपादन के लिए कवि हृदय का होना बेहद जरूरी है। इसकी जरूरत हर युग में रही है। आज के दौर में और  ज्यादा जरूरत है। कृत्रिम मेधा, आभासी दुनिया वगैरह के इस दौर में जहां संवेदना छीजती जा रही है, वहां हर व्यक्ति में कवि मन की तरलता और स्निग्धता की दरकार है।

 

कुछ युवा कवि अपने साथ भाषा की आग लेकर आते हैं। यह वही आग है जिसे जरथुष्ट्र ने इंसानों के लिए देवताओं के यहां से चुराई थी। यह आग बुद्धिमत्ता और मानवता की थी। इसी आग में तपकर युवा कवि उस्मान खान और  पराग पावन की कविताएं पावन हुई हैं। ये दोनों युवा कवि हैं पर दोनों की उम्र में दस साल का अंतर है। दोनों बेरोजगार हैं और दोनों के पास भारत की सबसे उच्च यूनिवर्सिटी की डिग्रियां हैं। दोनों जेएनयू से भी हैं।

उस्मान खान2025 में उभरे कवियों की नई लहलहाती फसल से हैं, पर थोड़े ज्यादा परिपक्व। वे अपने कविता संग्रह ‘इच्छाओं के जीवाश्म’में थोड़ी ज्यादा नंगी और बेलौस भाषा का प्रयोग करते हैं। यह भाषा उनकी तिक्तता, रिक्तता और उपेक्षा से निकली हुई प्रतीत होती है। सच इतना भयावह है कि कवि को लगता है कि भाषा भी भयावह होनी चाहिए। वह ‘बाकी प्रेम कविताएं’ भी लिखता है तो वहां भी कोमलता के बदले कठोरता ‘टूटी हुई-बिखरी हुई’ मिलती है। वैसे भी समय की विद्रूपताओं से जन्मा आक्रोश कोमल भाषा की वकालत नहीं कर सकता, तब भाषा की जीभ पर ‘कटहल की पीठ’ का उग आना आम बात हो जाती है। फिर कवि जो बोलेगा- वह आपको अंदर तक लहूलुहान कर देगा। यह भाषा ऐसी है जो आपकी चमड़ी छील दे और आपकी भाषा के सौंदर्यशास्त्र को नंगा करके बीच बाजार में खड़ा कर दे। आप कर ही क्या सकते हैं- ऐसे कवियों को कवि मानने से इनकार कर सकते हैं या संपादित करके छाप सकते हैं। ऐसी कविताओं को संपादक-आलोचक, कुछ कवि अश्लील बोलें, लेकिन ये कविताएं हैं।

देवीप्रसाद मिश्र लिखते हैं- ‘उस्मान खान की कविता उखड़े हुए नागरिक के एलियनेशन की कविता है। आततायी राज्य, अन्याय, सत्तात्मक दंभ, लूट, निर्बुद्धिकरण और कुबुद्धिकरण, राजनीतिक पतन, विषमता और विभाजन ने उस्मान को आंदोलित कर रखा है। यह मामूली मोहभंग नहीं है।’ (फ्लैप से) दरअसल आक्रोश की अभिव्यक्ति कविता के अंदर ही अंदर एक धारा की तरह चलती रहती है, यह मोहभंग है। इसलिए आज कविता की भाषा एक खास दौर की ‘अकविता’ की तरह दिखाई-सुनाई दे तो अचरज की बात नहीं है।

उस्मान खान कविता के ‘लुकमान अली’ हैं। लुकमान अली अपने समय का बेलौस और नंगा सच था जिसे मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो लोगों को नंगा देख लेने की उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

युवा कविता की असली बनक और भभक उस्मान खान के यहां दिखाई देती है। यहां कविताएं थोड़ी खुरदरी, अनगढ़ और प्रभावों से प्रभावित दिखती हैं। उस्मान की कविताओं की भाषा कच्ची आग की भट्ठी से निकलकर सामने आती है। इसलिए यहां ताप ज्यादा है। यहां विरोध ज्यादा है, यहां सच भी थोड़ा ज्यादा और और ज्यादा है, बनाव-शृंगार कम से कम है।

जिज्ञासा: आपकी भाषा इतनी रूखी क्यों, बिंब खुरदुरे क्यों?

उस्मान खान: आधुनिक मुक्त (छंद) कविता के सामने ये दोनों सवाल शुरू से खड़े रहे हैं, और तब से, लेखक और पाठक या समीक्षक इसका जवाब देते आए हैं। रूखे और खुरदुरे के विपरीत एक अकेला शब्द रखा जा सकता है – चिकना। आधुनिक कविता का महत्वपूर्ण हिस्सा इस चिकनेपन को चुनौती देता है। वह आधुनिक जीवन को, परंपरा को, और खुद कविता को चुनौती देता है। इसलिए वह रूखा है, खुरदुरा है।

आधुनिक मनुष्य-जीवन के केंद्र में श्रम है, रोज़गार है। इसको उलटकर कहें तो पूंजी है, बेरोजगारी है। यह जीवन व्यवस्था कई तरह की विसंगतियों-विडंबनाओं को, दुख-उदासी-निराशा को जन्म देती है। इस खास जीवन की गहराई में जाकर इसे उजागर करने में, इसके प्रतिरोध में यह रूखापन/खुरदुरापन सामने आता है।

हमारा समकालीन जीवन, जिस स्व-मुग्धता और स्व-घातीपन से ग्रस्त है, कवि और पाठक/समीक्षक भी उससे मुक्त नहीं हैं। एक खास तरह के स्वाद से बाहर निकलना असुविधाजनक लगता है। इसके चलते दूसरी तरह की कविताओं/साहित्य को बेस्वाद या बदस्वाद कह दिया जाता है, रूखा और खुरदुरा कह दिया जाता है।

यह खास हमारे जीवन का सतहीपन है, जो लेखक और पाठक को रूखे-खुरदुरे सत्य को छूने नहीं देता। वे किसी भी वस्तु, व्यक्ति, विचार की गहराई या व्यापकता में जाकर किसी असुविधाजनक स्थिति में नहीं पड़ते। वे अपने तथाकथित आनंद लोक की चिकनाई में डूबकर मर जाते हैं। लेकिन दुख को जन्म देने वाली इस जीवन व्यवस्था के रूखे-खुरदुरेपन का सामना नहीं करते। वे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के अलगाव और शोषण को छुपाते हैं, अनदेखा करते हैं, उसपर तथाकथित खुशी का मुलम्मा चढ़ाते रहते हैं। अपनी ही अवमानना और अपमान का कड़वा घूंट पीकर भी मीठी-मीठी बातों को ही कविता समझते हैं। वे अपनी झूठी उम्मीदों और विश्वासों पर जीवन काट देते हैं।

लेखक और पाठक का अपने जीवन के सतहीपन का सामना करना, इस दुखदायी जीवन व्यवस्था का सामना करना उतना ही कठिन है जितना कि यह मानना कि इन्सान ही इन्सान को बनाता है, कोई और नहीं। अगर भाषा रूखी है, बिंब खुरदुरे हैं, तो इसका मतलब यह है कि जीवन रूखा-खुरदुरा है। यह जीवन है, जो कविता को जन्म देता है न कि कोई विपरीत बात है।

 

उस्मान खान और पराग पावन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ‘आत्मा के सहचर!’। उस्मान की भाषा से बेलौसपन निकाल कर बनारस के धूमिल की सपाटबयानी को डाल दें तो वह पराग पावन की कविता की तरह हो जाएगी। कविता सिर्फ अनुभव से नहीं बनती। वह भाषा के संस्कार से भी बनती है।

पराग पावन का संग्रह ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’इतिहास की नहीं, वर्तमान की कविता है। इसकी भाषा पर उसी सपाटबयानी का प्रभाव है जो भाषा के ‘लोकेल’ (स्थानीयता) को हमारे सामने प्रत्यक्ष करती है। जब पराग कहते हैं, ‘ताकतवरों के लिए लिखनी है रचनात्मक गाली’ तो वह अपनी मंशा स्पष्ट कर देते हैं कि हिंदी कविता को वे किस तरह से इस्तेमाल करनेवाले हैं। आज की हिंदी कविता की भाषा चाहे जितनी आधुनिक हो जाए, उसपर अपने लोकेल का एक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव रहता ही है। मध्यप्रदेश वालों पर मध्यप्रदेश का और बनारस के रहनेवाले पर बनारस का। साथ ही दमित-उत्पीड़ित होने पर उस दमन-उत्पीड़न के खिलाफ भी एक भाषा बनी हुई है जो ओमप्रकाश वाल्मीकि से लेकर पराग पावन तक चली आ रही है।

भाषा के कई प्रभाव हैं। पराग के यहां वे सभी एक ही जगह आकर खड़े होते हैं- प्रतिपक्ष पर। दरअसल जब दिल में आग जल रही हो तो आपको हर हँसी संदिग्ध लगेगी। कोई ताकतवर आदमी जिसे आपकी नजर ताकतवर मानती है, चाहे वह ‘एन.एफ.एस.तिवारी’ हो या कोई अध्यापक या कोई तोता बाला ठाकुर का पिता, आपको उसकी हर हरकत संदिग्ध लगेगी। सामाजिक नियम की तरह भाषा-संस्कृति का भी नियम है। ठीक कविता लिखने के नियम की तरह कि ‘एक शब्द के प्रदूषण से गिर सकता है कविता का महल’ और एक वाक्य से चमक सकती है कविता की यह पंक्ति- ‘प्रेम आदमी का अवैतनिक चिकित्सक है।’ पराग की कविताएं कविता को और कविता में प्रतिरोध दोनों को साध लेती हैं। एक युवा कवि के लिए यह बहुत आश्वस्तकारी बात है।

पराग की एक कविता ‘मुक्तिबोध के मेहतर का बयान’ उसी तरह की आश्वस्तकारी कविता है जो मुक्तिबोध नहीं, उनके मेहतर के बयान को दर्ज करती है। यह दूसरे के जीवनानुभवों को इस तरह बयान करती है कि पराग की कविता लिखने की क्षमता पर आश्चर्य होता है। दरअसल जब दूसरों के अनुभव अपने अनुभव में बदलते हैं तो रागात्मक संबंधों की अभिवृद्धि होती है। यहां वे संबंध दिखाई पड़ते हैं। पराग ने अपने जीवनानुभवों को कविता की शक्ल में खूब लिखा है, खासकर बेरोजगारी के जीवनानुभव के और प्रेम के भी। प्रेम और बेरोजगारी ऐसे विषय हैं जो हर युवा को आकर्षित करते हैं। निलय उपाध्याय, आर चेतनक्रांति, सुंदरचंद ठाकुर, नीलेश रघुवंशी, मनोज कुमार झा, विशाल श्रीवास्तव, कुमार अनुपम, गौरव सोलंकी, रितेश मिश्र आदि तमाम कवियों ने इस विषय पर शिद्दत से लिखा है।

पवन पराग ने भी इनके दंश को गहराई से महसूस करते हुए तीस कविताएं लिखी हैं। ‘आधुनिक अछूत थे बेरोजगार’ से शुरू हुई कविता यहां खत्म होती है-‘बहुत कठकरेज थे बेरोजगार/वे अपनी लाश पर भी हँस सकते थे।’ ये वे पंक्तियां हैं जो पराग के जीवनानुभव से निकलती हैं। यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि ‘हमने कैसा युवा समाज रच डाला है’ जहां ‘नौकरी ही उनका आरंभ थी/नौकरी ही अंत’। यह हमारे सामाजिक सिस्टम के फैल्योर की दास्तान है जहां नौकरी ही सबकुछ है। हमें ऐसा युवा समाज बनाना चाहिए था जहां युवा कह सके कि नौकरी बहुत कुछ है, सबकुछ नहीं!

पराग पावन युवा हैं और वे युवाओं की समस्याओं को जितनी अच्छी तरह अभिव्यक्त करते हैं, वह शानदार है। ‘वासना का चंद्रोदय’ या ‘सभी फूलों को हवाओं ने जूठा कर दिया था प्रिये’, ‘पंजे भर जमीन’, ‘प्रेमोक्ति’ जैसी सरस-सुंदर कविताएं युवा मानस की अभिव्यक्ति हैं। आज के युवाओं की समस्या को चाहे वह प्रेम की हो या बेरोजगारी की, उसे कविता में कहने का हुनर उन्हें आता है। उनकी भाषा पर पकड़ भी ऐसी है कि भोजपुरी भी अपनी सरसता और प्रतिरोधकता के कारण मन ही नहीं मोहती, बहुत कुछ कह जाती है- ‘ताल ठोंक के हाथ बढ़ावा/समय करी पंचाइत/केकर आखर सांच सरासर/झूठ केकर हौ साइत/हमहू देखब’। आनेवाले समय में इन पांच कवियों और ऐसे तमाम कवियों की उपस्थिति को हमारा कवि समाज देखेगा, देखेगा उनके ताप को। ऐसे ही ताप से कविता का तापमान मापा जाएगा।

जिज्ञासा: आपकी कविता में आक्रोश-असहमति की अभिव्यक्ति है, फिर भाषा काफी आवेगमय है। क्यों?

पराग पावन: गालिब का एक शेर है: फरियाद की कोई लय नहीं है/नाला पाबंद-ए-नय नहीं है।

कविता में अभिनय नहीं किया जा सकता। उसमें अपना होना ही दिया जाएगा। यही उचित है और यही प्रकाश भी पैदा करता है। मेरी पहचान और मेरी सामाजिक अवस्थिति पूरे परिदृश्य से खिन्न रहती है, क्योंकि अधिकांशतः यह संसार प्रायः उसके विपरीत ही रचा गया है। मेरा असंतोष और उससे उद्भूत आक्रोश जैविक है, सहज है। वह नहीं होता तो जरूर  सवाल बनता।

जिज्ञासा: आपकी कविता में आपको क्या छूटता हुआ लग रहा है या किन विषयों पर आपको लिखने का मन था पर हो नहीं पाया, बताएं?

पराग पावन: मैंने एक दिन कहा कि मुझसे असंतुष्ट लोगों की सूची में मेरा नाम सबसे ऊपर है। यह कविता के ही बारे में था। मेरी कविता से ही उम्मीद बहुत अधिक है; कुछ-कुछ अवास्तविक सी। फिर स्वयं से भी उस उम्मीद की भारवाहक भाषा खोजने की शर्त लगाता हूँ। मुझे और साफ, और दृढ़ भाषा चाहिए जो किसी इकहरेपन से नहीं बल्कि सरलता की दुर्लभ ऊंचाई से संभव होती है।

 

 समीक्षित पुस्तकें
1. आत्मद्रोह : आर.चेतनक्रांति, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, मूल्य-199, सं.2024
2. प्रूफ रीडर : हेमंत देवलेकर, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य-250, सं.2025
3.जब आदिवासी गाता है : जमुना बीनी, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य-250, सं.- 2025
4.इच्छाओं के जीवाश्म : उस्मान खान, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, मूल्य-250, सं.-2025
5.जब हर हँसी संदिग्ध थी : पराग पावन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, मूल्य-250, सं.-2025

हिंदी विभाग, काजी नजरुल यूनिवर्सिटी, आसनसोल-713340 (प.बं) मो.8250412914

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