वरिष्ठ कवि। जोधपुर, महिला पीजी महाविद्यालय में सहायक आचार्य, संस्कृत। कविता संग्रहअंधेरे का उत्तराधिकारी

घास

सुबह-सुबह
हँसती है घास
जागती है ओस
या
अंबर की प्यास!


घास किसी बच्चे की मुस्कान-सी
खिल आती है
कहीं भी, कभी भी
किसी ऋतु की अपेक्षा के बिना
वह उपेक्षा का उपहास करती है!


वह उग आती है
इतिहास की दीवारों पर
वर्तमान के चेहरे पर भी
भर देती है उन्मुक्त हँसी
धरती की झुर्रियों में
उगी हुई लाड़ली घास
उसके बुढ़ापे का सहारा
सबसे बड़ी बेटी
एक पुरानी युवती सी!

भीमबेटका

भीमबेटका की गुफाओं के
भित्तिचित्रों से
निकल आया एक चित्र
हो गया किंकर्तव्यविमूढ़ देखकर
बिना चित्रों की
चलती-फिरती दीवारें
और
बगैर दीवारों के
चलते-फिरते चित्र।

जीवन

पेड़ से बरसती
चिड़ियों की चहचहाहट में
नहा गया मैं
फिर जीवन में आ गया।

पीड़ा

पीड़ा रिस रही थी
और वह…हँस रही थी
गिलहरी देख उसको
अपने भीतर धंस रही थी।

शब्दों के पर

शब्दों के पर किसने काटे
अर्थों को घर किसने बांटे
अब भी हैं कुछ शब्द गगन में
सूने घर में ज्यों सन्नाटे!