
हिंदी–मैथिली में लेखन। हिंदी में पांच कविता संग्रह और मैथिली में तीन पुस्तकें। संप्रति आंबेडकर मेडिकल कॉलेज रोहिणी में काउंसलर।
कितने युग और
अच्छा लगता है
जब सभी कहते हैं
बेटियां बढ़ रही हैं पढ़ रही हैं
तभी उनकी चुन्नी खींच ली जाती है
जब हम शांति पर इतराते हैं
तभी कहीं रची जाती है साजिश
तभी फैल जाता है दंगा
और हम दरवाजे बंद कर
अपनों का इंतज़ार करते हैं
जब हम व्यवस्था पर देते हैं भाषण
अस्पतालों में पैर रखने की जगह नहीं होती
भूख से तड़प रहे होते हैं बच्चे
गंदी नाली भरी रहती है
सड़कों पर बिखरे होते हैं ढेर
भूख व्यग्रता को
और खामोशी अवसाद को जन्म देती है
विकासशील से विकसित होने में
और कितने युग चाहिए!
जंगल बस भीगना चाहता है
सावन में
शहर परेशान है
कलई खुलने का मौसम
गटर गड्ढों को ढकने का
फिसल कर हड्डी की मरम्मतों का
चलने लगता है दौर
जंगलों में इस बरसात में
अंकुरित होता है प्रेम
पत्तियां रंग बिरंगे परिधानों में
रातरानी बेली और जूही की कचनार
बांस ऐसे झुकता जैसे कर देगा
प्रेम का इजहार आज ही
छुईमुई लाजवंती लजाती
बरखा रानी से कह देती है सच
मन मयूर हो जाता है
शहर कंप्यूटर पर देखना चाहता है बारिश
जंगल अपनों के संग बस भीगना चाहता है!
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