
युवा कवि।विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।
जंगल
मैं जब भी जंगल की ओर देखता हूँ
मुझे एक घर दिखता है
एक ऐसा घर जहां मुझे छोड़ सब दिखते हैं
मां, पिता, दादा, दादी
और श्रृंखलाबद्ध पहाड़
पहाड़ों के बीच अपना रास्ता तरासती
केदार जी की नदी भी
मैं जब भी जंगल की ओर देखता हूँ
मुझे एक घर दिखता है
उस घर के पीछे
पक्षियों का एक झुंड
संगीत की एक नई परिभाषा रचते
तो कभी
मोगली की हुड़दंग और बघीरा के साहस को गढ़ते
दिख जाते है
मैं जब भी जंगल की ओर देखता हूँ
मुझे देवदार दिखते हैं
देवदार की टहनियों पर महाश्वेता के पात्र
अपने संवादों का रिहर्शल करते
तो कभी जल, जंगल, जमीन की वकालत करते
दिख जाते हैं
मैं जब भी जंगल की ओर देखता हूँ
मुझे जंगल नहीं एक घर दिखता है
एक ऐसा घर जहां
गौरैयों के बच्चों की चहचहाहट से सुबह
और जुगनुओं के चमकने से शाम होती है
मैं जब भी जंगल की ओर देखता हूँ
मुझे एक घर दिखता है
अपनी अंकवार में दुनिया को समेटने वालो
सुनो
मैं ये कहना चाहता हूँ
एक नजर जंगल पर डालो
तुम हो कौन इसको पहचानो
जंगल का जंगल बने रहना
तुम्हारा और तुम्हारी उम्मीदों का बने रहना है
तुम्हारे भविष्य का बने रहना है…।
ढोलक बजाती एक लड़की
ढोलक की आवाज
और तुम्हारी याद
अक्सर साथ-साथ आती है
और जब भी आती है
मेरी धड़कनों की गति अनायास बढ़ जाती है
आज भी बढ़ रही है
बिलकुल वैसे ही
जैसे बढ़ी थी पहली बार
तुम्हारे ढोलक की पहली थाप पर
तुम्हारे कंठ से निकले वो मधुर गीत
मेरी धमनियों में अब भी ऑक्सीजन की तरह
बह रहे हैं
तुम्हारी मुस्कान
बिलकुल किसी गौरैये के बच्चे जैसी मासूम थी
मुझे नहीं मालूम
तुम्हारे इस मुस्कान के पीछे
कितनी उम्मीदें दफ्न थीं
कितनी नदियों ने इकट्ठा किए होंगे तुमसे नमक
और न ही ये जानता हूँ कि
कितनी तितलियों के पास होंगे तुम्हारे पंख
मैं तो इस बात से भी अनभिज्ञ हूँ कि
कौन थी तुम
कहां से आई थीं
क्या था तुम्हारा नाम?
लेकिन
तुम्हारी आंखों में चमकते हुए चांद की चमक
मेरे जेहन में आज भी जिंदा है
बिलकुल वैसे ही जैसे रहता है आसमान
किसी गिलहरी की आंखों में
तुम कहां हो
किस हालात में हो
मैं अनजान हूँ इस बात से भी
लेकिन मेरा तुम्हें मुड़-मुड़ के वापस देखना
बखूबी याद है
जो हजारों नहीं
लाखों सवाल पैदा करता है मेरे जेहन में
ये जानते हुए
कि नहीं मिलेगा मुझे कोई जवाब
मैं एंटीलिया की दीवारों से पूछना चाहता हूँ
तुम्हारे हक की रोटी के बारे में
मैं पूछना चाहता हूँ
लुटियन के गलियारों में चहकते आदमियों से
तुम्हारे चेहरे पर बिखरी उदासी के बारे में
मैं चाहता हूँ पूछना
सात आसमानों के उस मालिक से
तुम्हारे भविष्य के बारे में
यह जानते हुए भी
कि नहीं मिलेगा कोई जवाब
मैं पूछना चाहता हूँ।
संपर्क :१९ अ, अंबर विहार कॉलोनी, फैज़ुल्लाहगंज, सीतापुर रोड, लखनऊ –२२६०२०मो.८०९०६६६६०३


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