हिंदी और राजस्थानी भाषा के कवि, अनुवादक। संपादन-अनुवाद की इक्कीस पुस्तकें प्रकाशित। अद्यतन हिंदी कविता संग्रह ‘धार के विपरीत दौड़ती मछलियों की तरह’।

हम औरतों का क्या

गालियां तो और भी बहुत हैं
उलाहने भी

चुगलखोर
लंका
होली
विधवा
ढीठ
नपूती
नातेकरी

हम औरतों का क्या
हम फरोगड़ी
हम बीजल
हम ही डायन-चुड़ैल
बांझ और बदचलन भी हम ही

और भी न जाने कितने, क्या-क्या ही
नित नाम धरे तुम मर्दों ने हम औरतों के

कभी-कभी सोचती तो
अचरज में डूब जाती अथाह

जूण में जस आया जरा-सा
लेकिन गालियां अनगिन मिली

और
हमारी ही लूगड़ी के पल्लू में कंकड़ बांध
आंगन में छांव तानने को उतावले मर्द
अपने नाम किसी गाली का नाम धरे
तो पता लगे
कि इतनी गालियां
इतने उलाहने सुन सहकर भी
न हमारी कोख बांझ हुई
और न हृदय की स्नेहिल झरण सूखी

हम औरतों का क्या
हम तो ठूंठ होके भी हरी है
पत्थर मारो या कुल्हाड़ी चलाओं

हम औरतें
तपते मरुस्थल की अमर खेजड़ी है।

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