वरिष्ठ कथाकार।कहानी संग्रह सरई के फूल

आज विश्व भर में आदिवासी, आदिवासी साहित्य और आदिवासियत की चर्चा होती है।आदिवासी साहित्य अर्थात वह साहित्य जिसमें आदिवासियों का जीवन, समाज और दर्शन अभिव्यक्त हो।आदिवासी साहित्य तीन प्रकार का है- (1) आदिवासी विषय पर गैर-आदिवासी लेखकों द्वारा लिखा गया साहित्य, (2) आदिवासी रचनाकारों द्वारा खुद लिखा गया साहित्य और (3) ‘आदिवासियत’ अर्थात आदिवासी दर्शन को व्यक्त करने वाला साहित्य।विभिन्न देशों में अलग-अलग नाम से पुकारा जानेवाला आदिवासी साहित्य आज बेहद प्रासंगिक है।यह विदेशी विद्वानों का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहा है, उसे मान्यता मिल रही है जो बड़ी बात है।अब पूरा संसार आदिवासियों के विचारों को, इनकी जीवन शैली को समझना चाहता है।

वास्तव में आदिवासी, आदिवासियत और उसके साहित्य के प्रति लेखकों, पाठकों, दर्शकों में आदर भाव इधर बढ़ा है।यह बदलाव न एक दिन में आया, न ही यह क्षणिक तड़ित कौंध है।सदियों से आदिवासी लोकगीतों, लोककथाओं के मौखिक रूप की उपलब्धता और उनसे जुड़ाव एक मुख्य कारण है।आदिम जातियों के जीवन-संघर्ष, स्वतंत्रता आंदोलन में विद्रोह और बलिदान, उनके शोषण, हँसी-खुशी, उनकी सभ्यता-संस्कृति पर काफी वाचिक साहित्य उपलब्ध है।

आदिवासी बहुल झारखंड के कई प्रांतों में आदिवासी हैं और सभी की अपनी-अपनी विशिष्टताएं हैं।इनकी कथाओं में मनुष्य जीवन के ही लोकरंग नहीं हैं, बल्कि बेजुबान, मासूम जीवों के अलावा हिंसक जानवरों के साथ मानव के रिश्तों को भी स्वर मिला है।प्रकृति और पर्यावरण आदिवासी लोकगीतों, लोककथाओं में बड़ी गहराई से गुंथे हुए हैं।अभी भी अमेरिका के रेड इंडियन, लैटिन अमेरिका के इंडीजेनस, अफ्रीका के अश्वेत, ग्रीनलैण्ड के इन्युट, कनाडा, न्यूजीलैण्ड, आस्ट्रेलिया या भारत के आदि जन सभी प्रकृति की रक्षा की वकालत करते हैं।अपने पुरखों के साहित्य को बचाने के प्रति साहित्यकार भी सजग हैं। ‘रमणिका फाउंडेशन’ सहित अनेक आदिवासी संस्थाओं ने इसे सहेजने का श्लाघनीय कार्य किया है, हालांकि इन प्रयासों को और धार देने की जरूरत है।

आदिवासी लेखक आज अपने शोषण, उत्पीड़न, अभाव, पलायन, दुरंगे भाव-व्यवहार के प्रति तो सजग हैं ही, वे अपनी आदिवासी सोच और सांस्कृतिक अस्मिता पर फख्र भी करते हैं।इन दिनों जब आदिवासी लेखक अनेक विधाओं में निरंतर रचनारत हैं, आदिवासी साहित्य के नवीनतम रुझानों की पड़ताल करने की जरूरत है।ऐसे में कुछ प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं।वैश्विक स्तर पर भी कई प्रश्न हैं।

कई आदिवासी लेखक अब वैश्विक अनुभवों से लैश हैं फिर भी कई विधाओं में अभी उनकी आवाजाही नगण्य है।इस बिंदु पर भी विचार की जरूरत है।

यह चुनौतीपूर्ण है कि अभी काफी आदिवासी विकास की अवधारणा को अपना नहीं पाए हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।वे नए विकासों से जुड़ नहीं पाए हैं।इस तरह आदिवासी साहित्य पर चर्चा में ‘विकास’ से संबंध एक बड़ा मुद्दा है।पिछले दो दशकों में आदिवासी जीवन और साहित्य में आए परिवर्तनों का रेखांकन भी जरूरी है, क्योंकि आधुनिकता का तकाजा बढ़ने लगा है।इन संदर्भों में यहां एक परिचर्चा प्रस्तुत है, जिसपर बहस आगे बढ़नी चाहिए।

सवाल

(1) आदिवासी नए विकासों से कितना जुड़ पा रहे हैं और कितना संदेह से भरे हैं? वे भूमंडलीकरण को किस नजरिए से देखते हैं?

(2) आधुनिकता की तरफ बढ़ चुके आदिवासियों में किस तरह के मानसिक बदलाव आए हैं?

(3) आदिवासी समाज में सदियों से साहित्य की वाचिक परंपरा रही है।इस समाज की विपुल लोककथाओं, लोकगीतों और जीवन संस्कृति के उदात्त चिह्नों को कैसे बचाया जा सकता है?

(4) आदिवासी लेखक कुछ निश्चित विधाओं में, खासकर कविता, कहानी और कुछ विमर्श- प्रधान लेखन कर रहे हैं।उनमें आत्मकथा, यात्रा वृत्तांत जैसी विधाओं में रुचि क्यों नहीं है? देश के दूसरे हिस्सों, शहरों में रहने के अनुभवों की अभिव्यक्ति किन रूपों में हो रही है?

(5) क्या संपूर्ण आदिवासी साहित्य का स्वर एक समान है? वर्तमान आदिवासी साहित्य की प्रवृत्तियों और उपलब्धियों के बारे में कुछ बताएं।

(6) पिछले दो दशकों में आदिवासी जीवन और साहित्य में क्या परिवर्तन आए हैं?

आदिवासी साहित्य किसे कहा जाए

विद्याभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार और मुखर वक्ता।बेहतरीन संपादक।24 विविधवर्णी पुस्तकें प्रकाशित।

(1)  कभी न कभी हर जाति का जीवन कबीलाई रहा होगा।इस अर्थ में हर जाति के इतिहास का आदिम चरण विकास क्रम के उसी प्रस्थान बिंदु पर खड़ा होगा, जहां आज आदिवासी कही जाने वाली जातियां दिखलाई पड़ रही हैं।इसी तरह प्रायः हर आदिम समुदाय में, गद्यभाषा और लिपि के विकास से पहले तक, पीढ़ी दर पीढ़़ी छंदबद्ध गीतों और लोककथाओं के माध्यम से ही जीवन के अनुभवों और ज्ञान का अटूट अंतरण होता रहा है।वाचिक परंपरा हजारों वर्षों से लोक जीवन के नियामक सूत्रों को संरक्षित करती आ रही है।

सर्वविदित है कि संस्कृत में गणित और ज्योतिष के सूत्र भी छंदबद्ध पद्धति से ही संचित हुए हैं।समग्रता में देखें तो हर समुदाय में लिखित साहित्य का अभ्युदय एक परवर्ती विकास है।लोकगीतों और लोककथाओं का उद्भव और संरक्षण इसी सामूहिक सहभागिता की उपज है।आज उनके मूल रचनाकारों की नामतः खोज की कोशिश को एक निरर्थक उद्यम माना जा सकता है।वैसे देवेन्द्र सत्यार्थी, जगदीश त्रिगुणायत और नारायण जहानाबादी जैसे अनेक श्रमसाधकों ने लोककथाओं-लोकगीतों के संग्रह और प्रकाशन का शुभारंभ बहुत पहले कर दिया था।आज इस अध्याय में नए पन्ने जोड़े जा रहे हैं, विश्वविद्यालयों के भाषा विभाग में और निजी प्रयत्न के जरिए।

(2) साहित्य में आदिवासी अभिव्यक्ति की केंद्रीय विधाएं हैं कविता और कथा।विमर्श-प्रधान लेखन को मैं महत्वपूर्ण मान देते हुए भी सृजनात्मक साहित्य के दायरे से बाहर रखता हूँ।जहां तक आत्मकथा, यात्रावृत्त, संस्मरण, नाटक जैसी विधाओं में आदिवासी कलम की क्रियाशीलता का सवाल है, मान लेना चाहिए कि हर भाषा में रचनाकार के अनुभव के मेल में उपयुक्त विधाओं का चयन एक निजी मामला है।ज्ञानपीठ या साहित्य अकादमी जैसे तमाम बड़े साहित्यिक सम्मानों और पुरस्कारों की तालिका देखी जाए तो इन्हीं विधाओं में रचनात्मकता के शिखर की खोज के बहुसंख्यक नतीजे सामने होंगे।लघुकथा और गजल जैसे साहित्य रूपों की जो प्रतिष्ठा आज है, वह कुछ दशक पहले नहीं थी।निष्कर्षतः श्रेष्ठ रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए किसी खास विधा के शिल्प-सांचे का निर्देश अर्थहीन है।

इस सवाल के औचित्य को अगर झारखंड के संदर्भ में परखा जाए तो याद रखना होगा कि इसके लिए आदिवासी रचनाकारों के अनुभव संसार की कोई सीमा नहीं बताई जा सकती।कई आदिवासी हिंदी लेखकों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का परिपार्श्व कई हिंदी लेखकों से अधिक फैला हुआ है।रामदयाल मुंडा की जीवन यात्रा देश-विदेश की सरहदों से बहुत ऊपर थी।रोज केरकेट्टा गृह मंत्रालय द्वारा गठित झारखंड विषयक समिति में अकेली महिला प्रतिनिधि थीं।इनके अलावा वंदना टेटे, अनुज लुगुन, वाल्टर भेंगरा तरुण, महादेव टोप्पो, ग्रेस कुजुर आदि कई महत्वपूर्ण नाम हैं।

 आदिवासी कलमकार देश-देशांतर के भरपूर अनुभवों से लैस रहे हैं।उन सबकी रचनाओं की अंतर्वस्तु उनकी आंचलिक जमीन से जुड़ी है और शिल्प उसके मेल में गढ़ा हुआ है तो बेशक यह उनके कथन चयन की प्राथमिकता है, न कि देश-दुनिया के बारे में उनकी समझ की सीमा।

(3) विकास की अवधारणा अपने आप में घनघोर मतांतर का मुद्दा है।आदिवासी इलाकों में सड़कों-इमारतों के निर्माण की मार्फत कस्बों-शहरों की संरचनाओं को कुछ लोग विकास का मानक मानते हैं और होंगे।लेकिन आबादी को उजाड़ कर भूखंड के विकास को विनाश का वाहक भी माना जा सकता है।यही स्थिति भूमंडलीकरण की अवधारणा की भी है।आर्थिक उपनिवेशवाद का स्वागत किया जाए या आत्मनिर्भर और विकेंद्रित अर्थ व्यवस्था को स्वीकार किया जाए? आज का भारतीय नागरिक, आदिवासी भारत भी उसका  एक अनिवार्य अंग है, इसी द्विधाग्रस्त मानसिकता के दोराहे पर खड़ा है।क्या चुने या किसे छोड़ दे?

सन 2000 में अलग राज्य के गठन से पहले झारखंड आंदोलन के दौर में, केंद्र और बिहार सरकार की विकास योजनाओं और बजट आवंटन को इस अंचल में उपनिवेशवादी करार दिया जाता था।राजनीतिक हलकों में कहा जाता था कि इस प्रदेश की हरियाली प्रवासी लोगों के लिए चरागाह बन गई है।वह बहस जनवादी विकास बनाम धनवादी विकास के फलक पर जारी रही।झारखंडी अस्मिता को सबसे बड़ी चुभन इस अनुभव से होती रही है कि नगरीकरण, औद्योगीकरण, बड़ी बांध परियोजनाएं, वन संपदा का विनाश और खनिज संपदा के अनियोजित दोहन के कारण बड़े पैमाने पर स्थानीय आबादी को विस्थापन का त्रास झेलना पड़ा है।अपनी बुनियाद से, गांव-घर, खेत-खलिहान, आजीविका, समाज और संस्कृति से उजड़ने की पीड़ा इतने रूपों और स्तरों पर पसरी रही है कि विकास की सरकारी अवधारणा और उसके क्रियान्वयन को विनाश का वाहक मान लिया  गया।उपनिवेशी विकास की यह संरचना इस इलाके में अस्तित्व और अस्मिता के लिए गंभीर संकट बन कर लंबे समय तक हावी रही।आज भी यह स्थिति कमोबेश जारी है।शहरों, कस्बों और औद्योगिक क्षेत्रों में जितनी चमक-दमक दिखती है, उससे दूर व अनजान है ग्रामीण अंचलों का अंधेरा।आबादी के बीहड़ में नए पैरों की बढ़ती हलचलों की ताजा मिसाल है झारखंड में क्षेत्रीय भाषा और स्थानीय/रोजगार नीति पर भारी विरोध-प्रदर्शन और आबादी के मान्य घटकों में दावों-प्रतिदावों की होड़।

(4) इस प्रश्न को परंपरा और आधुनिकीकरण के टकराव से जोड़ कर भी देखा जा सकता है।आजादी के बाद  भारतीय अर्थतंत्र को कृषि आधारित व्यवस्था से निकाल कर औद्योगिक विकास के रास्ते पर ले जाने का फैसला आदिवासी अंचलों के लिए खास असर डालने वाला साबित हुआ।उद्योगों के लिए कच्चा माल और खनिज इन्हीं क्षेत्रों में अकूत सुलभ थे।लिहाजा जंगलों और पहाड़ों का सन्नाटा टूटा और कल तक उपेक्षित रहे दुर्गम क्षेत्र नई आर्थिक-औद्योगिक हलचलों के केंद्र बनते गए।इस तरह इन इलाकों में कथित आधुनिकीकरण का राजमार्ग खुला।नए नगर और कस्बे बनने लगे, ढेर सारी खनन परियोजनाएं चालू हुईं, सुगम यातायात के लिए सड़कें और रेल मार्ग तैयार हुए।उद्योगों और परियोजनाओं को संचालित करने वाला तकनीकी और प्रशासनिक ढांचा बना।अफसरों और कामगारों का संजाल क्रियाशील हुआ।पंचायती राज कायम हुआ और प्रखंड विकास कार्यालय नयी व्यवस्था लादने लगे।उन्हीं दिनों अनेक सरकारी-गैरसरकारी संस्थान और संगठन भी सक्रिय हुए।

इन तमाम गतिविधियों के चलते नई आबादी के आने-बसने की रफ्तार तेज हुई और एक अजनबी कार्य-संस्कृति से आदिवासियों का परिचय हुआ।नतीजतन शिक्षा और रोजगार के आरक्षण-अवसरों का लाभ उठाते हुए जनजातीय समुदायों में एक नया मध्यवर्ग उठ खड़ा हुआ।इसी दौर में स्थानीय आबादी को विस्थापन के दंश का अपूर्व अनुभव मिला।परंपरा की विरासत से जुड़े आदिवासी जन इस नई व्यवस्था में अपने को मिसफिट पाने लगे।परिणामतः विकास की पूरी अवधारणा तीखे सवालों के घेरे में आ गई।झारखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि में इस ऐतिहासिक बदलाव के असरदार निशान खोजे जा सकते हैं।

क्या इसे आधुनिकता के अभ्युदय का मान दिया जा सकता है? क्या आदिवासी आबादी के एक छोटे से तबके को सरकारी कार्यालयों और औद्यागिक प्रतिष्ठानों में तीसरे और चौथे दर्जे की नौकरियों में जगह पा लेने को आधुनिकीकरण की आधारभूमि के रूप में स्वीकार किया जा सकता है?

बेशक इस ऐतिहासिक मोड़ के बाद आदिवासियों के बीच शिक्षा और रोजगार की पात्रता धीरे-धीरे विकसित होती गई।परिवर्तन के इस दौर ने आदिवासी समाज को नए विचारों और संस्कारों से जुड़ने के अवसर भी दिए।लेकिन परंपरा और आधुनिकता के बीच टकराव की स्थितियां आज भी प्रभावी हैं।इस दिशांतर के विवेचन और व्याख्या के लिए संस्कृति के समाजशास्त्र की एक पूरी परिक्रमा जरूरी है।सिर्फ इस बुनियाद पर आदिवासियों के मानसिक बदलाव की पहचान किसी संक्षिप्त चर्चा से परिभाषित नहीं हो सकती।

(5) जब इस बड़े देश में, अरुणाचल से केरल तक और झारखंड से गुजरात तक, मूल्य परंपरा, आस्था और आहार से आचार तक की कसौटियों पर आदिवासी जीवन शैली एक समान नहीं है, तो इस वि-सम सांस्कृतिक धरातल पर उनके साहित्य का स्वर एक कैसे हो सकता है! जब सिर्फ झारखंड प्रदेश में कथाकार हांसदा सोवेंद्र शेखर और पीटर पॉल एक्का की समाज दृष्टि एक दूसरे से अलहदा है तो समग्र आदिवासी लेखन को एक ही लय में कैसे समेटा जा सकता है? रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित संकलन-पुस्तक ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’ में विविध विधाओं में आदिवासी लेखन की वैविध्यपूर्ण बानगी को मानक मान लेने में किसी को एतराज नहीं हो सकता।इसी तरह समकालीन आदिवासी रचनाशीलता के व्यापक रुझानों को प्रस्तुत करने के लिहाज से वंदना टेटे की पत्रिका ‘अखड़ा’ के दर्जनों अंक धरोहर की तरह याद आते हैं।

वर्तमान समय में आदिवासी साहित्य की प्रवृत्तियों और उपलब्धियों के बारे में कहने योग्य बातें कई हैं।बात यहां से भी शुरू हो सकती है कि आदिवासी साहित्य किसे कहा जाए? क्या आदिवासी समाज जीवन  पर केंद्रित गैर-आदिवासी लेखकों के साहित्य को भी इस दायरे में रखा जाए या सिर्फ आदिवासी लेखकों द्वारा लिखा जा रहा साहित्य ही यहां प्रासंगिक है? महाश्वेता या संजीव जैसे अनेक लेखकों को किस शिविर में बिठाया जाए?

एक और मुद्दा भी फिलहाल चर्चा में है।जैसे आदिवासी साहित्य वही है जिसमें आदिवासी जीवन दर्शन है।अभिप्राय यह कि वही आदिवासी लेखन मान्य है जो आदिवासी दर्शन की कसौटी पर खरा उतरे और उसमें विजातीय दृष्टि का हस्तक्षेप नहीं हो।इस मान्यता के अपने पक्ष हो सकते हैं, लेकिन जरूरी सवाल यह भी है कि क्या देशज सृजन का रिमोट अब जीवन दर्शन के नियामक सूत्रों से अनुशासित होगा? फिर इस ‘दर्शन’ का दायरा कहां से कहां तक फैला होगा? राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक? ईसाई, सरना या हिंदू अवधारणाओं के विवादित परिदृश्य में उसका पहचान योग्य चेहरा कैसा होगा? अभिव्यक्ति की सार्थकता की कसौटी अरस्तू के आचार-विचार के आसपास होगी या मार्क्स, गांधी और बिरसा या फ्रायड-युंग की मान्यताओं के अनुरूप होने की छूट भी मिलेगी?

सभी जानते हैं कि इतिहास की प्रयोगशाला में ऐसी कसौटियां कालजीवी नहीं होतीं।अगर इस नजरिए से सिर्फ झारखंड की आदिवासी कविता-कलम को परखा जाए तो रामदयाल मुंडा, ग्रेस कुजूर, रोज केरकेट्टा, मंजु ज्योत्स्ना, निर्मला पुतुल, वंदना टेटे, जसिंता केरकेट्टा, सरिता सिंह बड़ाइक, ज्योति लकड़ा, महादेव टोप्पो, अनुज लुगुन और सावित्री बड़ाइक की रचनाओं की जमीन तलाशने के लिए एक से अधिक कसौटियों की जरूरत होगी।

सच है कि वैचारिकता के इन विवादी सुरों के पीछे चिंताओं का लंबा काफिला है।अगर खोजी नजर से देखा जाए तो कई सांस्कृतिक चुनौतियों के बीच से गुजरना एक अनिवार्य विवशता है।सच यह भी है कि सांस्कृतिक संदर्भों में इन प्रतिप्रश्नों की अनदेखी नहीं हो सकती।पिछले सौ-सवा सौ वर्षों से देश के आदिवासी अंचलों में औद्योगिक विकास के जो मॉडल लागू हुए हैं, और आज भी कमोबेश जारी हैं, अगर उनके साथ बड़े बांधों और खनन परियोजनाओं को भी जोड़ दें तो कहना होगा कि उनके चौतरफा असर से इन क्षेत्रों के जनजीवन में उजाड़ का मौसम सदाबहार बन गया है।केंद्रीय एजेंसियों की ओर से उपभोग और मुनाफे के लिए देशज संसाधनों का बेहिसाब इस्तेमाल आंतरिक उपनिवेश जैसा ट्रीटमेंट लगे तो अचरज नहीं है।

सनद रहे कि हम संस्कृति को रूपंकर कलाओं यानी परफॉर्मिंग आर्ट का संग्रहालय समझने की गलती नहीं करें, चूंकि वह लोकजीवन का मूल्यमान भी है और नैसर्गिक प्रवाह का गतिमान भी।ध्यान दीजिए कि आज सत्ता संस्कृति सभागारों में है जबकि प्रतिरोध की संस्कृति सड़कों पर।इन दिनों जन संस्कृति को अपसंस्कृति के रास्ते पर मोड़ा जा रहा है और मूल संदेशों को छोड़ा जा रहा है।

अब मूल प्रश्न की ओर एक बार फिर लौटें।समग्रता में अगर विस्तृत दृष्टि से देखें तो आदिवासी पृष्ठभूमि के साहित्य लेखन के अब सौ साल पूरे हो चुके हैं।निजी और सामाजिक मनोभावों की तमाम विभिन्नताओं के बीच वह आज भी प्रकृति और मनुष्य के आत्मीय लगाव से जुड़ी है।खिलाफ हवाओं से संघर्ष, आक्रोश और प्रतिरोध उसके मिजाज पर तारी हैं।

(6) नई सदी के पिछले दो दशकों में आदिवासी जीवन और साहित्य में युगांतरकारी परिवर्तन सामने आए हैं।रामदयाल मुंडा की कविता पुस्तकें ‘नदी और उसके संबंधी और अन्य गीत’ और ‘वापसी, पुर्नमिलन और अन्य गीत’ की अंतर्वस्तु से लेकर ट्रीटमेंट तक में जमीन से लेकर आसमान जैसा अंतर दिखता है।इस दिशांतर को अगर कोई नाम देना हो तो कहेंगे कि मुंडा जी ने सदाबहार रूमानी रुझान की बिदाई के बाद सामयिक चुनौतियों के दबाव में देशकाल से यथार्थपरक नाता जोड़ा था।

बाद के समय में जसिंता केरकेट्टा के कविकर्म में परिपार्श्व से अंतःक्रिया के समांतर राजनीतिक विवेक का उद्घोष भी सामने आया।विवेक और संवेदना की यह कौंध अनुज लुगुन की रचनाशीलता में मुखर होती दिखी।अगर पीढ़ियों के अंतराल की ओर मुखातिब होना चाहें तो दिखेगा कि कविता की अंतर्वस्तु के स्तर पर निर्मला पुतुल से लेकर सरिता सिंह बड़ाइक तक बरास्त ग्रेस कुजूर, वंदना टेटे और महादेव टोप्पो में प्रकृति, परिवेश और परिवार से सहज मानवीय जुड़ाव के साथ बाहरी दखलंदाजी के प्रति आक्रोश और प्रतिरोध की मनःस्थितियां भी बारबार आवाजाही कर रही हैं।

इसी तरह, बदलाव की दृष्टि से समग्रता में देखें तो हिंदी संसार में आदिवासी कलम की धार समय की शिला पर घिसते हुए बहुत नुकीली हो चुकी है।बेशक अबतक कविता की विधा आदिवासी मानस की सर्वाधिक मुखर अभिव्यक्ति बनी हुई है, शेष प्रतिपूर्ति के लिए अनवरत हो रहे विमर्शपरक लेखन की टेक अनिवार्य है।इस निष्कर्ष की प्रासंगिक विवेचना के लिए न सामग्री की कमी है, न उद्धरणों की।

द्वारा श्री नीरज कुमार, गेट नं. 1, सरला बिरला यूनिवर्सिटी कैंपस, महिलौंग, टाटीसिलवे, रांची835103 मो.9955161422

तथाकथित सभ्य समाज अपना दृष्टिकोण आदिवासियों पर न थोपे

महादेव टोप्पो

वरिष्ठ लेखक।प्रमुख पत्रपत्रिकाओं में रचनाएं।कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद।कुछ फिल्मों में अभिनय।मातृभाषा कुँड़ुख की सेवा और इसमें लेखन।

(1) आदिवासी आज के विकास, सभ्यता, शिक्षा, तकनीक और विज्ञान से गहरे प्रभावित हो रहे हैं।वे दुनिया में मात्र अपने अस्तित्व की रक्षा की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि वे समस्त पृथ्वी को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं।यह उनके आधुनिक लिखित साहित्य में प्रमुखता के साथ उभरा है।झारखंड के अलावा पूर्वोत्तर तथा अन्य राज्यों के आदिवासी साहित्यकारों ने इस संकट को तीखे स्वरों में उभारा है।हिंदी और अन्य भारतीय विद्वानों का ध्यान इस ओर गया है।वे भी धरती, मनुष्य पर आसन्न संकट को समझकर अपनी रचनाओं में प्रमुखता से स्थान दे रहे हैं।इस तरह देखें तो आदिवासी साहित्य ने न केवल भारतीय साहित्य, बल्कि विश्व-समुदाय की सहायता कर रहा है, संवेदना जगा रहा है।

(2) आधुनिक बदलाव अधिकांशतः नकारात्मक हैं।कुछ व्यक्ति कहते हैं कि सरकारी तथा कई तरह के मिशनरी-प्रयासों से आदिवासी लोग हुए हैं।मुझे लगता है कि वे साक्षर हुए है, शिक्षित नहीं।वे पहले ही अपनी पुरानी परंपराओं और व्यवस्थाओं में ज्यादा शिक्षित थे जब वे धरती, प्रकृति, मनुष्य, जीव-जंतु, पत्थर-पहाड़, हवा-पानी, नदी-झरनों का सम्मान करते थे और प्रकृति तथा मनुष्य की एकजुटता के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीते थे।

नई शिक्षा, सभ्यता और पूंजीवादी विकास ने उन्हें उपभोक्तावादी नजरिये से अपने लिए एक खरीददार या उपभोक्ता की तरह विकसित करने का गुनाह किया है।इस तरह आदिवासी न केवल आधुनिकता, बल्कि सभ्यता, विकास, शिक्षा के नाम पर छला गया है, क्योंकि इन सबने उसे भौतिक और मानसिक रूप से दोयम बनाने का कुप्रयास किया है।अतः ये बदलाव सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक हैं जिनपर भविष्य में और अधिक काम करने की आवश्यकता है।शुक्र है कि इसपर समय रहते लोग संवाद करने लगे हैं, सोचने लगे हैं।

(3) आदिवासी समाज की अपनी समृद्ध वाचिक परंपरा रही है।इसने जीवन के कई तरह के अनुभव तथा ज्ञान को मौखिक परंपरा में बचाकर रखा है।विश्व भर के आदिवासियों में यही चलन है।यह ज्ञान, एक चलती-फिरती सामूहिक लाइब्रेरी की तरह है जहां बुजुर्ग एक बड़े इनसाइक्लोपीडिया की तरह होता है।नई पीढ़ी उनसे बातें करते, सामूहिक जीवन जीते हुए उनसे बहुत कुछ ग्रहण करती रहती है।हालांकि कई आदिवासी समाजों में धुमकुड़िया, घोटुल, गिति ओड़ा ः जैसी पारंपरिक शिक्षण संस्थाएं थीं जो स्कूल की तरह काम करती थीं।वहाँ अक्षर-ज्ञान नहीं होता था, लेकिन जीवन जीने के हर जरूरी तरीके, सलीके, तरकीबें सिखाई जाती थीं।आधुनिकता के दुष्प्रभाव ने यह सब बरबाद कर दिया और आदिवासियों की ज्ञान सहेजने की जो समृद्ध परंपरा थी, वह खत्म-सी हो गई है।

उपनिवेशवादियों और पूंजीवादियों को आदिवासियों की एकजुटता और सामूहिकता के बने रहने से डर लगता है।इस कारण उन्होंने बहुत ही सुनियोजित ढंग से आधुनिकता के नाम पर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और धर्म के नाम पर उनकी समृद्ध परंपरा और विरासत का नाश कर दिया।दुख है कि आज भी ऐसा ही कर रहे हैं।इस तरह लोकगीत, लोककथा बचाने की जो एक सशक्त परंपरा समाज में थी, वह कड़ी टूट गई।पूर्वोत्तर के कुछ विश्वविद्यालयों में वाचिक परंपरा को बचाने के लिए स्वतंत्र विभाग काम कर रहे हैं।लेकिन, आदिवासी बहुल हिंदी प्रदेशों में ऐसा नहीं दिखता है।इतना तक है कि आदिवासी भाषाओं के विभागों में जो काम हो रहे हैं वे समाज के समक्ष नहीं आ पाते।इनका प्रकाशन भी एक समस्या है।फलतः इस विषय पर अच्छे शोध-कार्यों का प्रकाशन या चर्चा नहीं हो रही है।

वर्तमान युवा पीढ़ी आधुनिक तकनीक का सहारा लेकर गीत, कहानी, लोककथा आदि को बचाती दिख रही है।सरकारी संस्थान भी इसमें सहयोग करते हैं।जैसे  रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान (रांची) ने आदिवासी साहित्य पर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया।साथ ही, यह आदिम आदिवासी समुदाय की भाषाओं के व्याकरण और लोककथाओं की नेशनल बुक ट्रस्ट की सहायता से पुस्तकें भी प्रकाशित कर रहा है।

मध्य प्रदेश की आदिवासी लोक परिषद ‘चौमासा’ पत्रिका प्रकाशित करने के साथ आदिवासी भाषा, लोक साहित्य संबंधी कई किताबें प्रकाशित कर चुकी है।अहिंदी भाषी प्रदेशों में भी ऐसे महत्वपूर्ण कार्य हो रहे हैं।लेकिन हमारे झारखंड में असीम संभावना रहने के बावजूद, गंभीर कार्य कम दिखाई पड़ता है।इस मानसिकता में हर तरह से परिवर्तन आने पर बेहतर उपलब्धि प्राप्त की जा सकती है।रांची में ‘प्यारा फाउंडेशन’, ‘झारखंड झरोखा’, ‘जन माध्यम’, जमशेदपुर का ‘डबांकी प्रेस’ तथा कोलकाता में ‘आदिवाणी’ ने इस शून्य को भरने का सराहनीय प्रयास किया है और कई किताबें प्रकाशित की हैं।

(4) आत्मकथा निश्चय ही आदिवासियों ने बहुत कम लिखे हैं।लेकिन मेनस ओड़ेया की ‘मतुरअः कहनी’ आदिवासी मुण्डा-जीवन का वृत्तांत जैसा है।हरिराम मीणा के तीन यात्रा वृत्तांत- ‘साइबर सिटी से नंगे आदिवासियों तक’, ‘जंगल जंगल जालियांवाला बाग’ और ‘आदिवासी लोक की यात्रा’ हैं।फ्रांसिस्का कुजूर के दो यात्रा वृत्तांत- ‘बीसवीं शताब्दी में अंडमान निकोबार’ और ‘उरांवों की विरासत रोहतासगढ़’ आदिवासियों से संबंधित हैं।वैसे लद्दाख से लेकर केरल और अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक आदिवासी लेखक अपनी मातृभाषा, प्रांतीय भाषा और अंगरेजी में भी लगातार लिख रहे हैं।अभी 17 दिसंबर-2021 के फ्रंटलाइन के अंक में मलयाली आदिवासी लेखक नारायण की कहानी प्रकाशित हुई है।तो इस तरह उनके लिखे अंगरेजी में भी प्रकाशित होे रहे हैं।पूर्वोत्तर में मेघालय, नगालैंड, मिजोरम के कई आदिवासी लेखक अंगरेजी में ही लिख रहे हैं।

झारखंड में  लेखक संतोष किड़ो, हांसदा सोवेंद्र शेखर और समीर भगत ने अंगरेजी में उपन्यास लिखे हैं।कुछ पुरस्कृत होकर चर्चित भी हुए हैं।संताली कवि, अनुवादक चंद्रमोहन किस्कू ने कई हिंदी, बांग्ला कवियों की रचनाओं का संताली में अनुवाद किया है।इसके लिए वे साहित्य अकादमी के अनुवाद पुरस्कार से भी नवाजे गए हैं।अरुणाचल से ममंग देई (अंगरेजी), येसे दोरजी थोंगछी (असमिया) के बाद जोराम यालाम नाबाम, यमुना बीनी तोदेर,  मोर्जुम लोई मूलतः हिंदी में लिख रहे हैं।आप देखें कि अब बस्तर के कवि, लेखक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए हैं।लेकिन वे आत्मकथा नहीं लिख रहे हैं तो ऐसा लगता है आदिवासी लेखक पिछले कुछ वर्षों से ही इतने छप रहे हैं।आनेवाले वर्षों में वे बाकी सभी विधाओं पर भी जरूर लिखेंगे।

(5) लगभग संपूर्ण देश में आदिवासियों द्वारा लिखा आदिवासी साहित्य का स्वर एक समान है।लेकिन राजनीतिक और आध्यात्मिक कारणों से यह स्वर कहीं-कहीं बदला हुआ भी दिखता है।लेकिन समग्रतः आदिवासी या इंडिजेनस साहित्य मूलतः मनुष्य, प्रकृति और धरती की हिफाजत में एकजुट खड़ा है।यह वर्तमान विकास, शिक्षा, सभ्यता, तकनीक के दृष्टिकोण से असहमत दिखता है।यह धरती को जख्मी और घायल अवस्था में देखना नहीं चाहते।चाहे वह कनाडा, ग्रीनलैंड के इन्युट हो, अमेरिका के रेड इंडियन या अश्वेत (ब्लैक), लैटिन अमेरिका के इंडीजीनियस, अफ्रीका के अश्वेत, न्यूजीलैण्ड के माओरी या आस्ट्रेलिया के अबॉरिजनल या भारत के आदिवासी हों।सभी पृथ्वी के जल, जंगल, जमीन, जीव-जंतु, नदी, झील, झरनों, पहाड़ों, खेत-खलिहानों को स्वच्छ,  स्वस्थ, पुष्ट और सदा उर्वर देखना चाहते हैं, क्योंकि वे प्रकृति-पूजक और प्रकृति-प्रेमी हैं।

हर किसी को अपनी चोट की चिंता है तो मां कहनेवाली घायल धरती के लिए क्यों नहीं? सभ्य-समाज  आदिवासियों का यह जीवन-दर्शन और चिंता नहीं समझता।इसलिए आदिवासी जीवन से जुड़ीं इच्छाएं मुनाफाखोर कंपनियों तथा अंतरराष्ट्रीय-संगठनों द्वारा कुचली जा रही हैं।लेखन इन्हीं से जुड़े पृथ्वी तथा मनुष्य-संबंधी मुद्दे साहित्य में उठा रहे हैं।खुशी है, पूरी दुनिया इसे समझने के बाद, मान्यता देने के पक्ष में खड़ी दिखती है।यही हमारी उपलब्धि और सफलता है।

(6) पिछले दो दशकों में आदिवासी जीवन में परिवर्तन यह आया है कि आदिवासी अपने हर प्रकार के अधिकार के लिए पहले से ज्यादा संघर्षशील हुआ है।एक छोटे-से मध्य-वर्ग के अलावा, युवा बौद्धिक वर्ग उभरा है।फलतः सामाजिक-राजनीतिक मोर्चे पर धरना-प्रदर्शन के अलावा वह साहित्य, संस्कृति, कला, भाषा, अध्यात्म, खेल, सिनेमा आदि के क्षेत्र में भी अपने हक व बेहतर छवि के लिए संघर्ष कर रहा है।वह अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहा है।इसमें आदिवासी युवाओं का ज्यादा योगदान है।

आदिवासियों के साथ गैर-आदिवासी भी उनके संघर्ष में शामिल हुए हैं और उनकी चेतना, विचार तथा संघर्ष को आगे बढ़ाने में योगदान देकर चर्चा में आए हैं।लेकिन कई बार ऐसे लेखकों से बड़ी चूक हो जाती है जब वे अपने तथाकथित सभ्य-समाज (दीकू समाज) के अनुभवों और आदर्शों से आदिवासी समाज को देखने लगते हैं।जब भी वे वैसा करते दिखते हैं मुझे अच्छे नहीं लगते।लेकिन यह साहित्य का मामला है।हम किसी को रोक नहीं सकते।हम आदिवासियों के प्रति उभरी उनकी संवेदना का सम्मान करते हैं, कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।इसका यह मतलब नहीं कि वे अपना कोई भी दृष्टिकोण हम पर थोपने लगें।

हम यह आग्रह करते हैं कि जब भी ऐसे लेखक आदिवासी जीवन पर लिखें मेहरबानी कर थोड़ा इस मुद्दे पर कुछ जानकारी जरूर ले लें।आज देश नहीं, विश्व भर में आदिवासी साहित्य पर चर्चा हो रही है तो सभी आदिवासी बनने, दिखने या उसके शुभचिंतक बनने की होड़ में हैं और कई अपनी सभ्य-मानसिकता की आदिवासियत थोप रहे हैं।ऐसे चंद अति-महत्वाकांक्षी और उत्साही लोगों से आदिवासी-साहित्य का नुकसान यह हो रहा है कि आदिवासी साहित्य के नाम पर वे आदिवासियों की उपस्थिति को गौण कर रहे हैं।वे अपनी उपस्थिति को ज्यादा महत्वपूर्ण बताने का कार्य जाने-अनजाने कर रहे हैं।

निवेदन है, आदिवासियों को हर विधा में अपनी सोच-समझ और गति से बढ़ने दीजिए।कुछ स्थानों पर आदिवासी लेखकों का मनोबल जानबूझ कर तोड़ा गया है।वैसे सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि साहित्य में महिलाओं की हिस्सेदारी देश में बढ़ी है।असल में राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी लेखक कुछ दशक पहले ही कलम उठाकर चर्चा में आया है।अतः उसे थोड़ा समय दीजिए, फिर पूछिए कि तुमने यह नहीं लिखा, वह नहीं लिखा।

बाई पास हरमू हाई कोर्ट कॉलोनी के पीछे, कार्तिक उरांव चौक के पश्चिम, पोस्ट : हीनू, रांची834002  (झारखंड) मो.7250212369

आदिवासियों के लिए स्वायत्तता की मांग ही केंद्रीय प्रश्न है

अनुज लुगुन

युवा कहानीकार, कवि और स्तंभ लेखक।दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया में सहायक प्रोफेसर।अद्यतन काव्य संग्रह पत्थलगड़ी

(1) आज नव-साम्राज्यवादी ‘नैरेटिव’ से प्रेरित वर्ग, समूह और लोग आदिवासियों के बारे में कहते हैं कि वे ‘विकास विरोधी’ हैं।यह ‘नैरेटिव’ वर्चस्व और हिंसा की भावना से ग्रसित है।आजकल आदिवासी समाज को लेकर जो धारणा विकसित हुई है, वह त्रुटिपूर्ण है।इस धारणा ने आजादी के बाद आदिवासी समाज की आकांक्षाओं और उसके मनोविज्ञान का अध्ययन नहीं किया है।एक तरह से यह कपोल कल्पित, हवा-हवाई धारणा है जो न केवल सामान्य व्यवहार में देखने को मिलता है, बल्कि राज्यकीय नीति निर्माण और अकादमिक ज्ञान-मीमांसा में भी गहराई से मौजूद है।

आज आदिवासी समाज विस्थापन का, विदेशी विनिवेश का, और पूंजीकरण की वैसी सभी प्रक्रियाओं का विरोध करता है जो आदिवासी समाज सहित समूची मानवता और प्रकृति के खिलाफ है।आदिवासी समाज वर्चस्व और दमन को कभी स्वीकार नहीं करता है।

देश जब आजाद हुआ तो आजादी को लेकर आदिवासी समाज भी उत्साहित था।आदिवासी समाज के विचारक और संविधान सभा के सदस्य जयपाल सिंह मुंडा ने नेहरू की औद्योगिक नीतियों का समर्थन इस भरोसे के साथ किया था कि देश का शासक वर्ग आदिवासियों के प्रति संवेदनशील होगा।उन्होंने कहा था, ‘नेहरू जिन्हें विकास का मंदिर कह रहे हैं, वे आने वाले दिनों में आदिवासियों के लिए विनाश के कारण होंगे, बावजूद इसके हम नेहरू के नेतृत्व में भरोसा करते हैं।’ यह बहुत बड़ी बात थी।

आदिवासी समाज ने आजादी के बाद स्वतंत्र भारत का हिस्सा होने में अपना भविष्य देखा था और उसके नेताओं पर भरोसा किया था।यह भरोसा आजादी के ठीक बाद की रचनाओं में देखने को मिलता है।रामदयाल मुंडा के कविता संग्रह ‘सेलेद’ में यह विचार मौजूद है।लेकिन यह दुखद रहा कि आजादी के बाद स्वतंत्र भारत के कर्णधारों ने आदिवासियों के साथ धोखा किया।मुख्यधारा के संपूर्ण समाज ने अपना ‘दिकूपन’ प्रदर्शित किया।आदिवासी समाज की जमीनें ‘विकास’ के नाम पर राज्य के संरक्षण में लूटी जाने लगीं।उनका नृशंसता से दमन किया गया।एक पूरी आबादी को बरबाद किया गया।

पहली एवं दूसरी पंचवर्षीय योजना में बने बड़े कल-कारखानों का नाम बहुत गौरव से लिया जाता है, लेकिन वे परियोजनाएं जहां लगीं वहां के स्थानीय आदिवासी लोगों का अस्तित्व क्रूरता से मिटा दिया गया।क्या इसका आंकड़ा है किसी के पास? क्या कोई इस पक्ष पर बात करता है?

आज जब साहित्यिक विमर्श का दौर चल पड़ा है, सभी वंचित समुदाय अपने-अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।लेकिन वे आदिवासी अस्मिता के हनन पर बात करने से इसलिए बचते हैं कि इसपर बात करने का मतलब ‘स्टेट’ यानी ‘राज्य सत्ता’ से टकराना होगा।स्टेट से कोई टकराना नहीं चाहता है।यानी आजादी के बाद बृहद समाज के ‘दिकू’ व्यवहार ने आदिवासी समाज का भरोसा तोड़ा है।

आदिवासी समाज की जो छोटी-मोटी उपलब्धि या सफलता दिखाई देती है- उसे इस समाज की प्रगति का मानक नहीं माना जा सकता।मुझे ऐसे सवाल बेमानी लगते हैं जो आदिवासी विकास को व्यक्तिगत उपलब्धियों के आधार पर मापते हैं।एक पूरी आबादी है, जिसे कुचला गया है।आज तो उसे और भी ज्यादा बेहरमी से ‘राज्य के स्पांसरशिप’ में कुचला जा रहा है।यह दृश्य नगालैंड, सारंडा, कालाहांडी से लेकर बस्तर तक अंतहीन रूप से फैला हुआ है।

(2) जिसे हम आधुनिकता कहते हैं, उसका सबसे बड़ा हिस्सा पूंजीकरण से संबंधित है।पूंजीकरण जीवन को लाभ और हानि, अर्थात मुनाफे की नजर से देखता है।आदिवासी समाज लाभ-हानि या मोल-तोल करने वाला समाज नहीं रहा है।उसने हमेशा सहजीविता के मूल्य को सहेज कर रखा और उसके लिए संघर्ष किया।उसकी कुर्बानी सहजीविता के लिए रही है, जिसे हम ‘जल,जंगल जमीन’ की लड़ाई के रूप में देखते हैं।

तथाकथित आधुनिकता ने आदिवासी समाज की इस मानसिकता को बदलने पर जोर दिया है।इसने व्यक्ति को एक इकाई के रूप में चिह्नित कर उसकी सामाजिक पहचान को मिटाने की कोशिश की है।आदिवासी समाज के साथ ऐसा ही हुआ है।यह तथाकथित आधुनिकता आदिवासी समाज की ज्ञान परंपरा और उसकी विशिष्टता को नकारती है।आधुनिक शिक्षा, नौकरी, शहरीकरण आदि ने आदिवासी समाज के अंदर एक छोटा मध्यवर्ग तैयार किया है (यह बढ़ेगा)।मध्यवर्गीय समाज का एक हिस्सा आधुनिकीकरण के नाम पर दिकू मूल्यों का ही अनुकरण कर रहा है, लेकिन बड़ा तबका आदिवासी समाज के मध्यवर्ग का है जो चेतना-संपन्न है।वह अपनी पहचान से जुड़ा है, उसके लिए संघर्ष कर रहा है।वह भाषा, संस्कृति, और अपनी स्वायत्तता को लेकर सक्रिय है।यह अपनी जड़ों से अब भी जुड़ा हुआ है, जो उम्मीद की बात है।

(3) आदिवासी साहित्य की मौखिक परंपरा में ही आदिवासी जीवन दर्शन, इतिहास और स्मृतियां अभिव्यक्त हुई हैं।आदिवासी समाज को समझने के लिए उनकी मौखिक अभिव्यक्ति को समझना जरूरी है।चूंकि आदिवासी समाज ने अपने को लिखित रूप में बहुत बाद में अभिव्यक्त किया है, और उसने अपने इतिहास को किलों, शिलालेखों, आदि में दर्ज नहीं किया है, इसलिए उसे समझने के लिए उनकी वाचिक परंपरा को दरकिनार नहीं किया जा सकता है।

जिस तरह कथित मुख्यधारा के समाज ने लोक की मौखिक और लिखित अभिव्यक्ति को अलग-अलग किया है, उस तरह आदिवासी समाज में विभाजन नहीं है।यदि ऐसा विभाजन किया जाए तो हम न ही आदिवासी समाज की वाचिक परंपरा को समझ पाएंगे और न ही उनकी लिखित अभिव्यक्ति को।आदिवासी साहित्य विमर्श अभिन्न रूप से अपनी वैचारिक प्रेरणा वाचिक परंपरा से ही प्राप्त करता है।आदिवासी साहित्य विमर्शकार आदिवासियत और सहजीविता की जो बात करते हैं वह वाचिक परंपरा से ही ग्रहण किया गया है।सोसो बोंगा, सेंगेल द:आ जैसी गाथा एवं कथा इसके उदाहरण हैं।

वर्तमान आदिवासी समाज वाचिक अभिव्यक्ति के विचार को साथ लेकर न केवल आगे बढ़ रहा है, बल्कि वह इनका रचनात्मक प्रयोग भी कर रहा है।ग्रेस कुजूर की कविता ‘एक और जनी शिकार’ महादेव टोप्पो की कविता ‘जंगल पहाड़ के पाठ’ और पूनम वासम की कविता ‘मछलियां गाएंगी एक दिन पंडुम गीत’ इसके उदाहरण हैं।मैंने भी वाचिक परंपरा से प्राप्त विचार के आधार पर ही ‘बाघ और सुगना मुंडा की बेटी’ शीर्षक लंबी कविता लिखी।यद्यपि सामाजिक स्तर पर पारंपरिक आदिवासी संस्थाएं लगभग ध्वस्त हो गई हैं (बाह्य अतिक्रमण आदि से)।ऐसे में पहले की तरह वाचिक अभिव्यक्ति नहीं रह गई हैं।फिर भी यह आज आदिवासी समाज के लिए महत्वपूर्ण है।आदिवासी समाज उसके प्रति सजग है।आदिवासी समाज की नई युवा पीढ़ी इस दिशा में शोध के लिए प्रवृत्त हो रही है।

(4) आदिवासी विमर्श को शुरू हुए अभी कुछ ही समय हुए हैं।इसके लेखन का विकास होना बाकी है।फिलहाल आदिवासी समाज की दो पीढ़ियां लेखन में सक्रिय है।आजादी के बाद रामदयाल मुंडा, महादेव टोप्पो, ग्रेस कजूर, वाल्टर भेंगरा तरुण, ऊषा अतराम आदि के लेखन को मैं पहली पीढ़ी का लेखन मानता हूँ।इस पीढ़ी ने आदिवासी लेखन के लिए नए रास्तों की तलाश की।इस पीढ़ी का संघर्ष बड़ा है, हमें इनके संघर्ष को अभिव्यक्त होने का इंतजार करना चाहिए।उम्मीद है कोई बेहतर आत्मकथात्मक रचना मिलेगी।रही बात यात्रा वृत्तांत की, तो इस दिशा में लेखन हो रहा है।हरिराम मीणा ने ‘जंगल, जंगल जालियांवाला’, और ‘साइबर सिटी से नंगे आदिवासियों के बीच’ जैसे महत्वपूर्ण यात्रा-वृत्तांत की रचना की है।

(5) हां, संपूर्ण आदिवासी साहित्य का स्वर एक ही है।अर्थात जो भी आदिवासी स्वर आ रहा है उसमें ‘स्वायत्तता’ की मांग प्रबल है।इसी अर्थ में यह दूसरे विमर्शों से भिन्न और विशिष्ट है।आदिवासी समाज की ‘स्वायत्तता की मांग’ पुरानी है।यह प्राचीन वैदिक-पौराणिक साहित्य में भी दर्ज है।औपनिवेशिक समय का आदिवासी इतिहास तो इसी मांग और इसके लिए संघर्ष से जुड़ा है।आज की नव-वैश्विक पूंजीवादी शक्तियां ‘स्वायत्तता’ की शत्रु हैं।यही वजह है कि यहां अब गांधी के ग्राम स्वराज जैसी व्यवस्था पर भी हमला है।पूंजी की तरह ही सत्ता का भी केंद्रीकरण हां रहा है।

जब तक आदिवासी समाज की ‘स्वायत्तता की मांग’ और उसके विचार को नहीं समझा जाएगा, तब तक उसकी साहित्यिक प्रवृत्ति को समझना कठिन होगा।उनकी स्वायत्तता का प्रावधान संविधान की ५वीं एवं ६वीं अनुसूची में दर्ज है।नगालैंड हो या बस्तर हो, यहां की सामाजिक-साहित्यिक अभिव्यक्ति में यह मांग प्रबल होकर उठी है।दरअसल आदिवासी समाज का जिस पूंजीवादी सत्ता-तंत्र और उसके दिकू एजेंटों से संघर्ष है, उसके प्रतिकार का सबसे सशक्त औजार ‘स्वायत्तता की मांग’ है।हाल में झारखंड में जो ‘पत्थलगड़ी’ आंदोलन चला उसका केंद्रीय विचार ही रहा है – ‘स्वायत्तता’।

(6) पिछले दो दशकों में आदिवासी जीवन-दर्शन और समाज व्यवस्था पर अब तक का क्रूरतम हमला हुआ है।पहले कम से कम न्यायालय में बात रखी जा सकती थी।अब तो सीधे देशद्रोही या नक्सली समझ कर एनकाउंटर कर दिया जा रहा है।जितनी संख्या में आज आदिवासी समाज के लोग देश के विभिन्न जेलों में देशद्रोही के नाम पर बंद हैं उतने संभवतः अंग्रेजी शासन में भी उन्हें बंदी नहीं बनाया गया होगा।स्टेन स्वामी ने इन्हीं निर्दोष आदिवासी बंदियों का सवाल उठाया था।सवाल उठाने के जुर्म में उन्हें भी देशद्रोही कहा गया।एक संविधान-सम्मत देश में उन्हें न्यूनतम मानवाधिकार तक उपलब्ध नहीं कराया गया।

साहित्य में परिवर्तन यही आया है कि आदिवासी विमर्श ने अकादमिक विमर्श में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया है, लेकिन अभी उसके विचारों और ज्ञान परंपराओं को व्यापक स्वीकृति मिलना बाकी है।अभी और लंबा संघर्ष चलने वाला है, तब तक किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता है।

सहायक प्रोफेसर, विनोबा नगर, चंदौती, गया-823002  बिहारमो.7677570764

इंटरनेट ने आदिवासी समस्याओं और सोच को आपस में जोड़ा है

मीनाक्षी मुंडा

लेखिका और सामाजिक रूप से निरंतर सक्रिय।इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स’, रांची के अतिथि संकाय में।

(1) समाज आज दो वर्गों में विभाजित है।एक वर्ग, जो आज भी विकास के नाम पर हो रहे जल, जंगल, जमीन, प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ एकजुट होकर लड़ रहा है और सतत विकास की बात करता है।जंगल को महज एक संसाधन की तरह नहीं देखता, बल्कि जीवन में जंगल को आत्मसात करके जीता है आदिवासियों के साथ।यह वर्ग प्रकृति के हर बदलाव को भलीभांति समझता है।प्रकृति के साथ ताना-बाना बनाकर चलना कितना महत्वपूर्ण है, इस बात की जानकारी बखूबी रखता है।

दूसरा वर्ग, विकास के नाम पर हो रहे हर बदलाव को देखता आ रहा है, लेकिन चुपचाप अपने काम से काम रखने में अपनी समझदारी मानता है।आज आदिवासी नए विकास से खुद को नहीं जोड़ पा रहे हैं, क्योंकि पुराने अनुभव काफी कड़वे रहे हैं।अच्छे अनुभव के अभाव में हर बात को संदेह की नजर से देखते हैं, पारदर्शिता का अभाव हमेशा महसूस किया गया है।बहुत स्पष्ट है कि सारी नीतियां भूमंडलीकरण के बाद अब बाजार तय करता है।यहां हम एक तरफ तो अपनी मातृभाषा को बचाने की बात करते हैं, पर आज मातृभाषा से ज्यादा रोजी, रोटी और जिंदगी दांव पर लगी है।ऐसे में भीड़ में हम खुद को बचाएं या अपनी भाषा और संस्कृति को?  

(2) आधुनिकता की तरफ बढ़ चुके आदिवासियों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के मानसिक बदलाव हुए हैं।सकारात्मक बदलाव देखा जाए तो आदिवासी समाज ने कुरीतियों के प्रति अपना नजरिया बदला है।वह रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों को आजमा रहा है।किसी जमाने में कहा गया था, ‘आदिवासी समाज बनिया नहीं बन सकता है।’ लेकिन आज बिजनेस के क्षेत्र में भी आदिवासी किस्मत आजमा रहे हैं।मैं नकारात्मक प्रभाव उनको मानूंगी जो पढ़ा-लिखा होकर भी महिलाओं को खुलकर बोलने, समाज में अगुआ बनने की आजादी नहीं देता, मानसिक कुंठा से ऊपर नहीं उठ पाता, धार्मिक विभिन्नताओं को राजनीतिक एवं अन्य फायदे के लिए वह हथियार की तरह इस्तेमाल करता है।

(3) वर्तमान आदिवासी समाज अपनी लोककथाओं, गीतों को संग्रह करने की चिंता करता है और कहना चाहिए, बहुत हद तक प्रयासरत भी र्हैं लेकिन यहां  चुनौतियां बहुत हैं।वाचिक साहित्य को बचाने के लिए क्षेत्र में काम करना आवश्यक है।आज के समय में हम साहित्य, भाषा को बचाने की बात तो करते हैं, लेकिन कैसे बचा पाएंगे, इस मामले में काम बहुत धीमी गति से चल रहा है।वाचिक साहित्य को बचाने के लिए उसे लिपिबद्ध करने की आवश्यकता होती है और शोध की भी।बहुत सारे शोधकर्ताओं ने काम किया है, पर उन्होंने अपने काम को प्रकाशित-प्रसारित नहीं किया।इस वजह से उनके काम की जानकारी एक सीमित वर्ग को ही हो पाती है।

आज एक बड़ी चुनौती सोशल मीडिया है जो स्वंतत्र रूप से लोगों को लिखने-बोलने का स्थान तो देती है पर दुविधा ये है कि यहां कभी-कभी भावनाओं में बहकर लोग अपने ऐसे साहित्य और संस्कृतियों की बातें साझा करते हैं जो अधिकतर वाचिक परंपरा-आधारित होती हैं।शोध और तथ्य आधारित न होने के कारण वे आलोचना और सवालों का शिकार होते हैं।

(4) आत्मकथा लिखने के लिए हिम्मत की जरूरत होती है।अभी भी आदिवासी समाज अपने अस्तित्व की खोज में ही लगा हुआ है।आदिवासियों के प्रति अभी भी अन्य समाज के लोगों की सोच नहीं बदली है।आज भी आदिवासी अपनी और अपनी संस्कृति को बराबरी का सम्मान दिलाने की होड़ में प्रयासरत हैं।एक ऐसे समाज में जिसे आज शोध करके पारिभाषित किया जाता हो और जो समाज वर्तमान स्थिति के अनुसार अगर बदलता भी है तो शोध का विषय बन जाता है, तो वैसे समाज में अगर कोई आत्मकथा लिखे भी तो अपने आपको समाज के समक्ष खोल देने जैसा होता है।वस्तुतः समाज के अधिकांश लोग कुछ न कुछ ऐसे कटु अनुभवों से गुजरे होते हैं, जो साझा करने लायक कभी-कभी नहीं भी होते हैं या कहना चाहिए साझा कर देने पर फिर चर्चा का विषय बन जाते हैं।चर्चा का विषय बनना सबके हिम्मत की बात नहीं होती और अपनी बातों को सवाल से घिरा हुआ देखना या सवालों का जवाब भी देना लोग पसंद नहीं करते।

(5) वर्तमान समय में देखा जाए तो संपूर्ण आदिवासी साहित्य एक ही विषय वस्तु पर अत्यधिक केंद्रित हैं।वर्तमान आदिवासी साहित्यकारों की लेखनी ने अन्य समाज के लोगों के सामने आदिवासियों की मन:स्थिति एवं प्रकृति को देखने और इनके नजरिया को समझाने की भली-भांति कोशिश की है।

(6) पिछले दो दशकों में आदिवासी जीवन और साहित्य की विषयवस्तु में अत्यधिक परिवर्तन हुए हैं।पारंपरिक लेखनी की जगह वैश्विक परिवर्तन, भूमंडलीकरण, भाषा और अस्तित्व को बचाने के कार्यों तथा आदिवासी एवं प्रकृति के संबंध को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाने की कोशिशों पर जोर दिया गया है।आदिवासी के लिए प्रकृति क्या मायने रखती है, इस बात पर अत्यधिक चर्चा होती है एवं उसे लिपिबद्ध करने की कोशिश की गई है।प्राकृतिक आपदाओं का आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान द्वारा समाधान को भी दुनिया भर में अत्यधिक महत्व दिया गया है।इधर इंटरनेट ने दुनिया भर के आदिवासियों की वैश्विक समस्याओं के प्रति सोच को साझा करने का एक बड़ा माध्यम दिया है।

बजरा, डेला टोली, आइ टी आइ, हेहेल, रांची 834005, झारखंड

आदिवासी साहित्य में विविधता रही है

वाल्टर भेंगरा तरुण

वरिष्ठ आदिवासी साहित्यकार।कथा संग्रह लौटते हुए’, ‘देने का सुख’, ‘जंगल की ललकार’, ‘अपनाअपना युद्धऔर विकल्प।उपन्यास शाम की सुबह’, ‘तलाश’, ‘गैंग लीडरआदि।कृतसंकल्प’, ‘जग ज्योतिका संपादनप्रकाशन।

(1) भूमंडलीकरण का प्रभाव आम आदमी की तरह आदिवासियों पर भी है।विशेषकर जिन आदिवासी क्षेत्रों में खनिज संपदा का अपार भंडार है, विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का वहां की राज्य सरकारें उद्योगों के विस्तार के लिए अंधाधुंध दोहन करा रही हैं, आदिवासी लेखक इस पर आंखें बंद नहीं रख सकते।पीटर पॉल एक्का, हांसदा सौवेंद्र शेखर और मेरे सहित कई अन्य कथाकारों ने इस संबंध में बराबर अपनी कहानियों और उपन्यासों में हथौड़ा मारने की कोशिश की है।

दूसरी ओर, सरकार की ओर से चलाई जा रही लाभकारी योजनाओं का आदिवासी लेखक समय और स्थान के  हिसाब से अपने लेखन में चर्चा कर रहे हैं।जहां विस्थापन का शिकार आदिवासी समाज की एक बड़ी आबादी बनती है, जैसे बड़े जलाशयों, कल-कारखानों के निर्माण, खनिजों का दोहन आदि वजहों से तो आदिवासी रचनाकार लगभग आक्रामक हो उठते हैं।कवियों ने इसपर जोर-शोर से आवाज उठाई है।अपनी कहानियों व उपन्यासों में हांसदा सौवेंद्र शेखर, पीटर पॉल एक्का, वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’, ज्योति लकड़ा, फ्रांसिस्का एक्का, विश्वासी एक्का, सुंदर मनोज हेम्ब्रम और ग्लैडसन डुंगडुंग आदि विनाशकारी योजनाओं का जहां विरोध करते हैं, वहीं लाभकारी योजनाओं की अच्छाइयों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

इसलिए इस सवाल पर आदिवासी रचनाकारों की दृष्टि बिलकुल साफ है।जहां आदिवासी समाज का अहित हो रहा है, वहां मुखर हो कर उसका विरोध करना और जिस कार्यक्रम के माध्यम से समाज की उन्नति हो, आर्थिक विकास हो, उसका स्वागत करना है।

(2) आदिवासी भारत के आम नागरिकों की तरह ‘हम किसी से कम नहीं’ की तर्ज पर हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं।राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के काम हों, प्रशासनिक भागीदारी हो, विज्ञान का क्षेत्र हो या साहित्यिक गतिविधियां- आज आदिवासी हर जगह उपस्थित हैं।संख्या में अभी वे थोड़े से लोग हैं।राजनीति में आजादी से पहले और भारत के संविधान निर्माण समिति के सदस्य के रूप में जयपाल सिंह मुंडा, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पी एन संगमा, कार्तिक उरांव, निरल एनेम होरो, सुशील कुमार बागे, बागुन सुम्ब्रुई आदि प्रमुख आदिवासी चेहरा रहे हैं।

आज की पीढ़ी विभिन्न रूपों में आधुनिकता को अंगीकार कर चुकी है।उड़ीसा की रिया रेशम बारी, छत्तीसगढ़ की रेनी कुजूर फैशन शो की दुनिया में अपना लोहा मनवा चुकी हैं।यह आदिवासी समाज के लिए गौरव की बात है कि विपरीत परिस्थितियों में भी आदिवासी बेटियां चुनौती स्वीकार कर रही हैं।भारतीय हॉकी टीम में आदिवासी महिला तथा पुरुष पूरे दम-खम के साथ मैदान में हैं।उच्च शिक्षा संस्थानों के माध्यम से आदिवासी आधुनिक शिक्षण  पा रहे हैं।सिनेमा के क्षेत्र में भी बीजू टोप्पो जैसा नाम परिचय का मोहताज नहीं है।उन्होंने डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण तथा निर्देशन द्वारा अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान अपनी झोली में बटोरे हैं।

(3) आदिवासी समाज का एक बड़ा तबका अब शिक्षित हो चुका है।झारखंड, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में जहां हिंदी प्रमुख भाषा के रूप में प्रचलित है, आज की पीढ़ी अपने समाज की लोककथाओं, लोकगीतों को, जो सदियों से वाचिक परंपरा के तहत चले आ रहे थे, लिपिबद्ध करने में लगी है।

राजस्थान के हरि राम मीणा ने अपने उपन्यासों ‘डांग’ और ‘धूनी तपे तीर’ के माध्यम से पाठकों के सामने आदिवासी जीवन के कई रूपों को प्रस्तुत किया है।अरुणाचल प्रदेश की जोराम यालाम नबाम अपने उपन्यास ‘साक्षी है पीपल’ में पुरखों की कथा को सामने लाती हैं।झारखंड की वरिष्ठ साहित्यकार रोज केरकेट्टा अपने कथा संग्रह ‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटो’ की कहानियों के माध्यम से ग्रामीण अंचल की आदिवासी जीवन शैली को परोसती हैं।इस क्रम में झारखंड के अन्य आदिवासी लेखकों में राम दयाल मुंडा, पीटर पॉल एक्का, मंगल सिंह मुंडा ने भी पुरखा साहित्य को लिपिबद्ध करने में अहम भूमिका निभाई है।

हिंदी के अलावा आदिवासी बोली-भाषाओं में भी आज की पीढ़ी पुरखा साहित्य को लिपिबद्ध कर रही है।गोंडी भाषा में वरिष्ठ कथाकार वहारू सोनवणे, मणिपुर की रोजी कामेई, नगालैंड की तेमसुला आओ, अरुणाचल प्रदेश की जमुना बीनी, बंगाल की शोवा यामो आदि कथाकारों के नाम लिए जा सकते हैं।

(4) निश्चय ही आदिवासी रचनाकार कविता, कहानी और विमर्श-प्रधान लेखन कर रहे हैं।हाल के वर्षों में महादेव टोप्पो, निर्मला पुतुल, वंदना टेटे, जसिंता केरकेट्टा, ग्रेस कुजूर, विश्वासी एक्का, रेमिस कंडुलना आदि आदिवासी रचनाकारों ने अपनी कविताओं के माध्यम से आदिवासी परंपरा को जीवंत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।असम और बंगाल के डुवार्स चाय बागानों की स्थिति और दर्द को अपनी कविताओं और आलेखों के माध्यम से युवा कवयित्री एमलेन बोदरा और प्रफुल्ला मिंज उजागर कर रही हैं।संताली रचनाकारों में चंद्र मोहन किस्कु, सुंदर मनोज हेम्ब्रम और कई अन्य लेखक संताली भाषा साहित्य की विभिन्न विधाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

आत्मकथा और यात्रा वृत्तांत लेखन में अभी तक किसी आदिवासी लेखक का नाम उभर कर सामने नहीं आया है।झारखंड के हेराल्ड सैमसन तोपनो अस्सी के दशक में अपनी यात्रा रिपोर्ताज के लिए काफी चर्चित थे।लेकिन सड़क दुर्घटना में उनकी असामयिक मृत्यु हो गई।मुंडारी में मेनस ओड़ेया द्वारा लिखित ‘मतुरः कहनि’ को आत्मकथा के रूप में देखा जा सकता है।मेनस ओड़ेया ने पांच खंडों की इस पुस्तक की रचना 1920 में की थी।अभी हाल में अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ के निर्मल तिग्गा ने अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं पर लगातार सोशल मीडिया पर हिंदी में आत्मकथा और यात्रा वृत्तांत लिखे हैं।निर्मल तिग्गा अपनी यात्रा कथाओं और आत्मकथा को पुस्तक रूप में प्रकाशित करने में लगे हुए हैं।इस दिशा में कई आदिवासी रचनाकारों ने अपनी कहानियों में अपने अनुभवों और जीवन के विभिन्न पहलुओं का समावेश करने का प्रयास किया है।

(5) आदिवासी समाज के लिए लिखने वाला साहित्यकार उसी समाज का हिस्सा है।भारत में विस्थापन, गरीबी, अशिक्षा और भेदभावपूर्ण माहौल में रहकर भी आदिवासी साहित्यकार अपनी रचनाओं का सृजन करता रहा है।सच कहें तो आदिवासी साहित्य का स्वर लगभग एक समान है।इसमें संदेह नहीं कि पहले वह अपने समाज के बारे में लिखता है और पूरी संजीदगी के साथ उसके दुख-दर्द में शामिल होता है।आदिवासी महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय, सरकारी नौकरियों में कथित उच्च समाज द्वारा प्रताड़ित किए जाने वाली स्थितियों के बारे में वह सजग व सतर्क दिखाई देता है।

रमणिका गुप्ता ने भारत के विभिन्न प्रदेशों के आदिवासी रचनाकारों के लिए बहुत काम किया है।उन्होंने पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर गुजरात, कश्मीर और केरल तक के आदिवासी लेखक-लेखिकाओं को साहित्य अकादमी के साथ मिलकर भारतीय साहित्य पटल पर सामने लाने का काम किया।

(6) हिंदी साहित्य में दलित और स्त्री विमर्श के बाद आदिवासी साहित्य की भी चर्चा होने लगी थी।संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व आदिवासी दिवस के रूप में 9 अगस्त का दिन घोषित करने के बाद से असीमित परिवर्तन दिखाई देने लगे।आदिवासी समाज विभिन्न समूहों में अपने अधिकारों और अपने समाज की उन्नति के लिए विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सक्रिय हो उठे।सोशल मीडिया के माध्यम से भी आदिवासी रचनाकार अपनी बातें रख रहे हैं।अस्सी के दशक तक कुछ गिने-चुने आदिवासी रचनाकारों के नाम आते थे, विगत बीस वर्षों में आदिवासी लेखक-लेखिकाओं की एक लंबी कतार है।जन जागरूकता भी जबरदस्त आई है।आदिवासी समाज आज हर क्षेत्र में आगे आना चाहता है, अपने बलबूते।इसे अच्छा संकेत माना जाना चाहिए।

इग्नेस सदन, 123, अमृतपुर, डाक + जिला खूंटी-835210 (झारखंड) मो. 9798943597

उत्तरोत्तर विकसित और समृद्ध हो रहा हैआदिवासी साहित्य

राकेश कुमार सिंह

वरिष्ठ उपन्यासकार।कथेतर साहित्य की एक किताब लो आज गुल्लक तोड़ता हूँ

(1) आदिवासी समाज के समक्ष विडंबना यह है कि विकास और विनाश एक ही सिक्के के दो पहलू नजर आने लगे हैं।आदिवासी क्षेत्रों में विकास की अनिवार्य परिणति है आदिवासी विस्थापन।वर्तमान विकास की अवधारणा में आदिवासी खर-पतवार की भांति हैं।उनका उखड़ना और विस्थापित होना वर्तमान विकास की अनिवार्य शर्त बनता जा रहा है।इसे नियंत्रित करने की फौरी जरूरत है, अन्यथा एफ्रोनिग्राईट समाज की नियति जगजाहिर है।

(2) आदिवासी समाज के मानसिक बदलाव के संदर्भ में किसी गैर-आदिवासी का बयान काल्पनिक, भ्रामक और एकतरफा ही माना जाएगा।मुझे धूमिल याद आ रहे हैं, ‘लोहे का स्वाद/लोहार से मत पूछो/उस घोड़े से पूछो/जिसके मुंह में लगाम है।’

(3) यही सच है कि हिंदी साहित्य के सौ-सवा सौ साल पुराने इतिहास से बहुत-बहुत प्राचीन है आदिवासी साहित्य का इतिहास…बेशक वाचिक परंपरा का इतिहास।और बात है कि मानक लिपि के अभाव में आदिवासी साहित्य में कागजी लेखन लगभग नहीं के बराबर हो सका था।अब स्थितियां बदल रही हैं।

वर्तमान में आदिवासी समाज अपने वाचिक साहित्य को लिपिबद्ध करने लगा है।खोजी साहित्यकारों ने ढूंढ-ढूंढ कर महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक महत्व के वाचिक साहित्य का दस्तावेजीकरण शुरू कर दिया है।विगत वर्षों में ‘रमणिका फाउंडेशन’ ने इस दिशा में महत्वपूर्ण काम किए हैं, परंतु दस्तावेजीकरण के साथ ही भारतीय साहित्य की इस धनी परंपरा का संरक्षण भी आवश्यक है।इस दिशा में भी काम किया जाना चाहिए।

(4) वर्ष 2000 के पूर्व पृथक आदिवासी विमर्श की स्पष्ट अवधारणा ही विकसित नहीं हो सकी थी।आदिवासी साहित्य को भी मोटे तौर पर दलित साहित्य के साथ ही नत्थी कर कोष्ठबद्ध कर दिया जाता था।अब स्थिति स्पष्ट होने लगी है।आदिवासी साहित्य ने अपनी पहचान और इयत्ता स्थापित कर ली है।भारतीय साहित्य में अपनी जगह सुरक्षित कर ली है।

साहित्य सर्वप्रथम कविता के माध्यम से ही सामने आता है।दलित साहित्य के साथ भी तो यही हुआ।आदिवासी कविता ने हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप दर्ज कर लिया है।साहित्य को पकने में समय चाहिए होता है।जैसे-जैसे आदिवासी साहित्य और विमर्श परिपक्व होता जाएगा, विभिन्न विधाओं में लेखन भी सामने आएगा।हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी चाहिए।

देश के दूसरे हिस्सों में, उदाहरण के लिए पूर्वोत्तर भारत को ही लें तो उस क्षेत्र से भी आदिवासी साहित्य फिलहाल मुख्यत: कविता की शक्ल में ही सामने आ रहा है।गद्य में भी लेखन हो रहा है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है।

(5) आदिवासी जनजीवन से संबंधित साहित्य का स्वर एक समान नहीं है।बहसतलब सवाल है आदिवासी साहित्य की मान्यता का।दो विचारधाराएं चल रही हैं। ‘अनुभव की प्रामाणिकता’ और ‘भोगे हुए यथार्थ’ की बहस फिलहाल किसी आखिरी निर्णय पर नहीं पहुंची है।यदि आदिवासी लेखकों द्वारा रचित साहित्य ही आदिवासी साहित्य के रूप में मान्य है तो मैं इस पर कुछ कहने के लिए उपयुक्त पात्र नहीं हूँ।जहां तक गैर-आदिवासी लेखकों द्वारा लिखित आदिवासी साहित्य की बात है तो इस दिशा में निश्चय ही कुछ महत्वपूर्ण काम हुए हैं।इधर शोध, अध्ययन और प्रस्तुति की गहरी बेचैनी रही है।देवेंद्र सत्यार्थी से लेकर रणेंद्र तक लेखकों की एक लंबी पांत है।तथाकथित शिष्ट साहित्य और इतिहास में जिन आदिवासी संघर्षों, बलिदानों और समस्याओं को ओझल रखा गया था, उनका उत्खनन और प्रस्तुतीकरण हो रहा है।आदिवासी संघर्ष के इतिहास, आदिवासी समस्याओं और स्वप्न को लेकर कई महत्वपूर्ण कृतियां इधर सामने हैं। ‘जंगल जहां शुरू होता है’ और ‘ग्लोबल गांव के देवता’ से लेकर ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’ और ’माटी माटी अरकाटी’ तक।

(6) पिछले दो दशकों में आदिवासी स्वर ज्यादा मुखर है।निर्मला पुतुल से अनुज लुगुन तक ने साहित्य में महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है।

उल्लेखनीय है कि आदिवासी समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है।नगरों-महानगरों-राजमार्गों के आजू-बाजू के आदिवासी इलाकों में नई चेतना आई है, परंतु सुदूर देहात में अभी भी डोरी के तेल वाली ढिबरी जल रही है।इन इलाकों में बहुत सुधार नहीं हो सके हैं।

आदिवासी साहित्य अब पहचान का मुंहताज नहीं रहा है।वह दलित साहित्य के कोष्टक को तोड़कर अपनी स्वायत्त पहचान स्थापित कर चुका है।यह उत्तरोत्तर विकसित और समृद्ध होता जा रहा है।यह आश्वासन देता है।

फ्लैट संख्या 101, गंगासागर अपार्टमेंट, स्प्रिंगडेल्स स्कूल के निकट, किलबर्न कॉलोनी,हीनू, रांची-834002 (झारखंड) मो.9431852844

कविताओं में कवि के आत्मपक्ष के साथ आदिवासियत व्यक्त हो रही है

संतोष गिरहे

शिक्षाविद।अद्यतन पुस्तक भारतीय साहित्य की चिंतन भूमि।नागपुर में सहायक प्रोफेसर।

जब हम दलित, स्त्री या आदिवासी साहित्य को देखते हैं, तब हमें इस साहित्य में आत्म पक्ष का भाव प्रबल दिखाई पड़ता है।दलित और स्त्री साहित्य तो आत्मपीड़ा की ही अभिव्यक्ति है।आदिवासी काव्य भी इससे भिन्न कैसे रह सकता है।आदिवासी कवि अपने प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति के साथ अपने अस्तित्व की भी तलाश करते हैं।वे जल-जंगल-जमीन जैसे मुद्दों को दर्ज करते हैं।यह कहना गलत नहीं होगा कि उपर्युक्त सभी प्रसंग आदिवासी कविता के केंद्र में हैं।आदिवासी चिंतक भी इन बिंदुओं की ओर संकेत करते हैं।

वंदना टेटे का कहना है, ‘प्रकृति प्रेम, श्रम की महत्ता, जो उनके दर्शन और सहजीवी जीवन का मूल तत्व है, इस बिखराव, लूट और चौतरफा सांस्कृतिक-आर्थिक हमले से गहरे संकट में है, जिससे उनके समकालीन गीत-कविता व ‘कहन’ शैली और स्वर दोनों में बदलाव का पौष्टिक आहार दिखाई पड़ता है।’ शायद यही कारण है कि आज का आदिवासी कवि एक दो मामलों में अपने विचार प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि विस्तार से अपनी योजनाओं को व्यक्त करता है।उसकी आत्माभिव्यक्ति समष्टि का स्वरूप धारण कर लेती है, अर्थात कवि स्वयं के बहाने समग्र आदिवासी समुदाय की चिंता को सामने ले आता है।

आज आदिवासी कवि जो कुछ देख रहा है, समझ रहा है, अनुभव कर रहा है, उसकी सही-सही अभिव्यक्ति कर रहा है।कवि साथ में अपने आत्म पक्ष को भी प्रस्तुत कर रहा है।आदिवासी चिंतक गंगा सहाय मीणा लिखते हैं, ‘आदिवासी दर्शन में व्यक्ति या आत्म के बजाय सामूहिकता और सामाजिकता महत्वपूर्ण है और उसे अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम कविता ही हो सकती है।’ यह सही है कि आदिवासी कविता में व्यक्ति की जगह समूह को या सामाजिकता को अधिक महत्व दिया गया है।लेकिन जब बात अभिव्यक्ति की आती है तब कोई भी कलाकार ‘स्व’ को भी दर्ज करता है।इसके साथ उसकी आत्मचेतना सामाजिकता को समाहित कर लेती है।इस तरह कवि अपनी भावना द्वारा संपूर्ण समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है।

समकालीन आदिवासी कविता के आत्म पक्ष के प्रमुख बिंदु कौन-से हैं? इनकी अभिव्यक्ति किस रूप में हुई हैं और फलित क्या है? निश्चय ही आत्म पक्ष को रेखांकित करने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि कवि अपनी पीड़ा, दुख-दर्द आदि की ही अभिव्यक्ति करे, अपनी दीन-हीन स्थिति एवं बुराइयों को ही दर्ज करे, समष्टि से उसका कोई संबंध न हो।आत्मपक्ष को हमें एक व्यापक और सकारात्मक अर्थ में लेना होगा, तभी उसकी वास्तविक पहचान होगी।आदिवासी कवि ‘आदिवासियत’ को केंद्र में रखकर समग्र आदिवासी जीवनादर्श प्रस्तुत करता है।वह विकास की बाढ़ में हो रहे विनाश के अट्टहास, नष्ट होती सांस्कृतिक धरोहर और उसके अपने अस्तित्व की चिंता उसे सताती है।कवि पूछता है, ‘चुप क्यों हो संगी? कुछ तो कहो?’ यानी आदिवासी कवि प्रश्न करता है, सचेत करता है।वह अपनी अवस्था से परिचित है।वह अपनी संपूर्ण आपबीती और आदिवासी समाज के शोषण को केवल व्यक्त ही नहीं करता, बल्कि प्रतिरोध के लिए भी प्रेरित करता है।

महादेव टोप्पो की ‘प्रजातंत्र में’ कविता की कुछ पंक्तियां हैं जिसमें कवि आदिवासी अधिकारों, अस्तित्व एवं संस्कृति को बचाने की चिंता में व्यवस्था को सीधे चुनौती देता है, ‘रोटी तो हम मांगेंगे ही/कटते वृक्षों के साथ चिपकेंगे भी/छिनती जमीन की खातिर देंगे जान भी/मरती अपनी भाषा की खातिर/मांगेंगे तुम्हारे अखबार में दो कॉलम भी/रेडियो, टीवी में कुछ घंटे का प्रसारण समय भी।’

ग्रेस कुजूर भी अपनी कविता में आत्म पीड़ा को व्यक्त करती हैं और आदिवासी संस्कृति के अस्तित्व का सवाल उठाती हैं।वे जानती हैं कि प्रश्नों का हल पंडितों के हाथों नहीं होगा।पेट भरने के लिए अस्मिता और अस्तित्व को बचाने के लिए जल, जंगल, जमीन की आवश्यकता है।अपनी जड़ों से जुड़ना चाहती हैं-  ‘जल, जंगल, जमीन के बिना/साल वन के जीवन का व्याकरण/किन पंडितों के हाथों/तुमने गिरवी रखा है संगी?/कोटरो से निकल अपने/साल वन के सुग्गे भी/पूछ रहे हैं/अपने होने का पता।/तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा में/संगी/अब भी खड़ी हूँ मैं/चट्टान में खड़े/इकलौते-साल-वृक्ष की तरह/जो चुपचाप सींच लेता है/अपने हिस्से का पानी।’

आदिवासी जीवन की सारी संवेदना तथा संभावनाएं आदिवासियों के अस्तित्व और अस्मिता से जुड़ी हुई हैं।उन्हें आदिवासी कवि कविताओं के माध्यम से स्पष्ट करता है, क्योंकि उसे मंच प्रदान नहीं किया गया है।उसको वे अवसर प्रदान नहीं किए गए जो उसे मिलने चाहिए थे-

‘हम मंच पर गए ही नहीं/और हमें बुलाया भी नहीं गया/उंगली के इशारे से/हमें अपनी जगह दिखाई गई/हम वहीं बैठ गए/हमें शाबाशी मिली/और ‘वे’ मंच पर खड़े होकर/हमारा दुख हमसे ही कहते रहे/‘हमारा दुख हमारा ही रहा/कभी उनका नहीं हो पाया’।’

हम जानते हैं कि शिष्ट कहे जानेवाले साहित्य में समग्रता का भाव तो है, लेकिन वह कथित शिष्ट लोगों की ही मुक्ति की बात करता है।इस साहित्य से ‘आदिवासियत’ का भाव कोसों दूर है।आदिवासी कविता में प्रकृति प्रेम, प्रकृति का मानवीकरण और श्रम का सौंदर्य जिस दृढ़ता के साथ व्यक्त हुआ है, वह अन्य साहित्य में कम ही देखने को मिलता है।कहा जा सकता है कि आदिवासी कवि अपनी भावनाओं और विचारों का काल्पनिक जाल नहीं बुनता है, बल्कि नैसर्गिक मूल्यों और आत्म पक्ष को यथार्थ के साथ प्रस्तुत करता है।देखा जा सकता है कि आदिवासी काव्य में संपूर्ण विश्वास के साथ सृष्टि के सौंदर्य एवं जीवन के विभिन्न रंग आए हैं।कवि अपनी अस्मिता के साथ अपने ‘होने’ के अर्थ को स्पष्ट करता है।वह ‘आदिवासियत’ को केंद्र में रखकर आदिवासी जीवन दर्शन प्रस्तुत करता है।

राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर440033 मो.9421971832

संपर्क:​ सी 1, डी ब्लॉक, सत्यभामा ग्रैंड, कुसई, डोरंडा, रांची, झारखंड-834002

सभी चित्र साभार : Jimford