संपादकीय अक्टूबर 2025 – अनिश्चितता के दौर में

संपादकीय अक्टूबर 2025 – अनिश्चितता के दौर में

शंभुनाथ   इसपर दृष्टि जानी चाहिए कि हम एक गहन अनिश्चितता के संग जी रहे हैं। हमारे जीवन के तानेबाने में अनिश्चितता जितनी अधिक पसरती जा रही है, असुरक्षा का बोध उतना बढ़ता जा रहा है। पता नहीं व्यापार युद्ध में दोस्तियां कब कहां से खिसक कर कहां चली जाएं, पता नहीं...
संपादकीय सितंबर 2025 –हिंदी संस्कृति की जमीन

संपादकीय सितंबर 2025 –हिंदी संस्कृति की जमीन

शंभुनाथ   शायद हम सपने में भी नहीं सोच पाते हैं कि हमारी एक इंद्रधनुषीय हिंदी संस्कृति है और हिंदी लोगों की लगभग 1300 साल से विकसित जो जीवंत विरासत है उसे जानने तथा अपने जीवन में जगह देने की बहुत जरूरत है। हम बंगालियों, मराठियों, तमिलों आदि को अपनी-अपनी संस्कृति...
संपादकीय अगस्त 2025 –हम भारतीय क्यों हैं

संपादकीय अगस्त 2025 –हम भारतीय क्यों हैं

शंभुनाथ   क्या भारतीयता में कोई आकर्षण नहीं है, क्या यह 20वीं सदी का एक फ्यूज्ड बल्ब है? देश में स्वार्थ कभी इस तरह सर्वोपरि नहीं हुआ था। इसलिए अब धर्म, जाति और प्रांत-आधारित धारणाओं में ज्यादा आकर्षण है। लोगों की भारतीय पहचान धूमिल होती जा रही है। भारतीय राष्ट्र...
संपादकीय जुलाई 2025 –क्या भक्ति एक अधूरी रह गई क्रांति है

संपादकीय जुलाई 2025 –क्या भक्ति एक अधूरी रह गई क्रांति है

शंभुनाथ भक्त कवियों ने धर्म को बाह्याडंबर की जगह ईश्वरानुभूति और लोकहित का विषय बनाना चाहा था। लगभग 1200 सालों तक हमारे देश में भक्ति आंदोलन चला। इसका उदय तमिलनाडु में हुआ, तभी कहते हैं- ‘भक्ति द्राविड़ उपजी’! भक्त कवि अपने अनुभव की रोशनी में धर्म को कहीं...
संपादकीय जून 2025 – देशप्रेम क्या है

संपादकीय जून 2025 – देशप्रेम क्या है

शंभुनाथ   भारत जैसे एक बड़े बहुभाषिक देश के लिए देशप्रेम की जितनी अधिक जरूरत है, उतना ही आज यह एक कठिन मामला है। कम आबादी वाले छोटे देशों में देशप्रेम का रूप सहज है, क्योंकि एक भाषा- एक जाति वाले देश में साझी भावना आसानी से पैदा होती है। जिस देश की आबादी बड़ी है,...