संपादकीय अप्रैल 2022 : आदिवासियों पर बाज

संपादकीय अप्रैल 2022 : आदिवासियों पर बाज

शंभुनाथ भारत में आदिवासी 2011 की जनगणना के अनुसार कुल आबादी के 8.6 प्रतिशत हैं, अर्थात आज के समय में करीब 11 करोड़।ये नई शब्दावली में ‘जनजाति’, ‘देशज लोग’ (इंडिजिनस पीपल) कहे जाते हैं।देश की सबसे अधिक प्राकृतिक विविधता आदिवासी इलाकों में है और उतना ही विविध है उनका...
संपादकीय मार्च 2022 : स्त्रीवाद को एक मोड़ की जरूरत है

संपादकीय मार्च 2022 : स्त्रीवाद को एक मोड़ की जरूरत है

शंभुनाथ ये कुछ समाचार हैं जिनसे स्त्री की दशाओं का बोध होता हैः – कोरोना महामारी के दौर में स्त्रियां सबसे ज्यादा बेरोजगारी और घरेलू हिंसा की शिकार हुईं।- स्त्रियां मर्यादा न लांघें।मर्यादा का उल्लंघन होता है तो सीताहरण हो जाता है।अगर कोई स्त्री मर्यादा लांघती...
संपादकीय फ़रवरी 2022 : नया मीडिया और हम

संपादकीय फ़रवरी 2022 : नया मीडिया और हम

शंभुनाथ 21वीं सदी में मीडिया के स्वरूप में ऐसा परिवर्तन आया है, जिसकी कभी कल्पना नहीं की गई थी। अब इसे ‘नया मीडिया’ तथा मुद्रित माध्यमों को ‘परंपरागत मीडिया’ कहा जाता है। नया मीडिया के दो रूप हैं- कारपोरेट टीवी और सोशल मीडिया। कहा जा सकता है कि मल्टीनेशनल के लिए...
संपादकीय जनवरी 2022 : भविष्य की कविता

संपादकीय जनवरी 2022 : भविष्य की कविता

शंभुनाथ प्रेमचंद कवि नहीं थे, लेकिन उन्होंने कवि के बारे में जो लिखा है वह अनोखा है :‘जिसे संसार दुख कहता है, वह कवि के लिए सुख है।धन और ऐश्वर्य, रूप और बल, विद्या और बुद्धि- ये विभूतियां संसार को चाहे कितना ही मोहित कर लें, कवि के लिए यहां जरा भी आकर्षण नहीं है।उसके...
संपादकीय दिसंबर 2021 : सूफी प्रेम के मायने

संपादकीय दिसंबर 2021 : सूफी प्रेम के मायने

शंभुनाथ सूफी दरवेश होते थे, एक प्रांत से दूसरे प्रांत और एक देश से दूसरे देश में आने-जाने वाले| वे प्रेम से भरे और लोभहीन लोग थे| इसलिए भ्रमणशील और निरंतर यात्री थे| यह विचित्र लग सकता है कि एक समय धर्म प्रचारकों और व्यापारियों ने ही उन बड़े भूमि-मार्गों और जल-मार्गों...