मैथिली एवं हिंदी के उदीयमान युवा कवि और समीक्षक। कविताएं विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित।

अनकहे रागों की भाषा

वह जो हर सुबह
जगहों को नजर से पोंछता है
जो चुपचाप
छायाओं के कोनों को व्यवस्थित करता है
उसे कोई नहीं देखता

वह दीवारों के पीछे
शब्दों की गंध छानता है
भाषा की खामोश सिलवटों में
अर्थ के रंध्र खोजता है
न उसका कोई संवाद होता है
न ही कोई काव्यात्मक प्रस्तावना
केवल सांसों के बीच
एक अज्ञात ताप चलता है
कभी-कभी
वह अपना सारा श्रम
एक टिन की छत पर रख देता है
जहां धूप
कभी कविता नहीं बन पाई

लोग कहते हैं
वह अनुचित है
क्योंकि वह चुप्पियों में
अनुवाद खोजता है
और आवाजों को
सीढ़ियों पर नहीं
बिलकुल अंतिम सीढ़ी के नीचे से उठाता है

पर मैं जानता हूँ
उसे व्याकरण की चिंता नहीं
वह केवल अनुभव की ध्वनि बचाना चाहता है

उसकी आंखों में
कोई मुहावरा नहीं ठहरता
कोई उद्घोषणा नहीं जलती
फिर भी वह
हर चौराहे पर
कुछ अनकहे निशान छोड़ आता है

वह
जो दिन भर की थकावट में
किसी पुरानी घड़ी की टिक-टिक
जैसा धड़कता है
एक दिन
उन्हीं अनसुने रागों से
नई भाषा गढ़ देगा।

स्त्री ने उच्चारित नहीं किया अपना नाम

एक दिन
स्त्री ने छोड़ दिए
अपने सभी उच्चारण
होंठों पर ताला नहीं
बस एक अनकहा मौन था
जो समूचे व्याकरण को निर्वासित कर गया
वह खड़ी रही
पृष्ठभूमि में
ध्वनि और अर्थ के बीच
एक महीन, अनभिज्ञ बिंदु पर
जहां से शब्द शुरू होते हैं

उसने नहीं कहा ‘मैं’
उसने नहीं लिखा ‘होना’
उसने नहीं पूछा ‘क्यों?’
फिर भी
उसकी आंखों की झील में
सारे विलोम डूब गए

उस दिन
नहीं हुईं उद्घोषणाएं
मंच पर कोई नहीं था
सिवाय एक रिक्तता के
जो स्त्री की अनुपस्थिति से भरी थी

और जो कविता
हर बार
उसके होने से जन्मी थी
आज बिना कहे
संपूर्ण हो उठी

वह भाषा नहीं बनी
पर भाषा ने
पहली बार किसी को
पूरी तरह नहीं समझा।

समय की पटरी पर छूटा प्रेम

तुम्हारे शहर की घड़ियां
हमेशा तीन मिनट तेज चलती थीं
शायद इसलिए
हमारा मिलना
हर बार कुछ सेकंड पीछे रह जाता

मैंने
रेलवे की छतों पर उगे
जंग लगे सिग्नलों में
प्रेम की भाषा पढ़नी सीखी है
जहां हरी बत्ती
अधूरी आशाओं की
नीली छांव में बदल जाती है

तुम्हारी आंखों में
अक्सर कोई पुरानी गाड़ी
बिना घोषणा के
छूट जाती थी
जैसे रिश्ते
बिना विदा के मरते हैं

मैंने तुम्हारे लिए
एक मानसिक मानचित्र बनाया था
जिसमें ‘दिल्ली’ एक स्थगित स्पर्श था
‘दरभंगा’ एक अस्थायी समझौता,
और ‘हम’ एक बिन-पढ़ी कविता
जो नींद के नीचे रखी गई थी

तुमने कहा था
प्रेम कोई नियत समय नहीं होता
यह तो स्टेशन मास्टर की
खाली कुर्सी पर रखा
एक ठंडी दोपहर है
जिसे कोई न पुकारे तो भी
वह अपनी जगह पर बना रहता है

शब्दों में तुम्हारी उपस्थिति
कभी खयालसर की टिकट-सी होती
एक कोना आरक्षित
पर कभी प्रयोग न हुआ

अब जब कोई ट्रेन गुजरती है
मैं उसकी आवाज में
तुम्हारी खामोशियों को
लिफाफे में सील करता हूँ
और भेज देता हूँ किसी ऐसे पते पर
जो नक्शे में नहीं है
पर हृदय के अंतर्गृह में
अब भी जल रहा है।