युवा कवि। कटिहार में रेल कर्मचारी।

 

राँची

यह शहर बिलकुल अल्हड़ है
यहां लोगों की ही तरह
अब भी बचा है गांव
बचा है पानी स्वर्ण रेखा की आंखों में

यह बिलकुल शांत है
कभी भागता नहीं
न कभी हलकान होता
बल्कि हमेशा खुश रहता है
एक मासूम बच्चे की तरह
शहर का शहर की तरह न होना
कितना खटकता है

लोग समझते हैं
यह शहर या तो पागल है
या इसके सीने में कोई राज दफन है
जिसे एएसआई खोद कर निकालना चाहता है

इस खूबसूरत शहर में
तुम अगर कभी आओ, प्रिये
एकबार बैठ कर जरूर देखना
राँची झील के समीप
यह तुम्हारी ही तरह चंचल है
उतर कर देखना हूंडरू के ठंडे पानी में।
महसूस करना हवा की रूमानियत को
यदि तुम्हें मेरी याद न दिला दे तो कहना…।

मोची

फुटपाथ पर बैठा मोची
रोज इंतजार करता
किसी कीमती और अच्छे जूतों का
जिनमें जरा सी सिलाई करने पर
मिल जाएं अच्छे पैसे

उसकी किस्मत को यह मंजूर नहीं था
दुकान पर बार-बार वे ही जूते आते
जिन्हें देखकर फेंक देने का मन करता
तलवे घिसे हुए
अगल-बगल से फटे हुए

फिर सोचता
इनके बगैर चलने वाले पांवों के बारे में
उनमें पड़ने वाले छालों के बारे में
और दिल लहूलुहान हो जाता
वह मायूस हो जाता

और अपना औजार निकाल कर
बड़े प्यार से उनकी मरम्मत कर देता
मानो मेहनती हाथों से
किन्हीं मेहनती पांवों में मरहम लगा दिया हो।

संपर्क : वरिष्ठ अनुभाग अभियंता का कार्यालय, दालकोला रेलवे स्टेशन के बगल में, पोस्ट+थानादालकोला  जिलाउत्तर दिनाजपुर, पश्चिम बंगाल733201 मो.7909062224