चर्चित कथाकार। उपन्यास- ‘ये वो सहर तो नहीं’, ‘अकाल में उत्सव’, ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज था’, ‘रूदादे-सफर’। कहानी संग्रह- ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’, ‘महुआ घटवारिन और अन्य कहानियां’, कसाब डॉट गांधी एट यरवदा डॉट इन’ सहित व्यंग्य संग्रह, यात्रा वृत्तांत, कविता संग्रह’ आदि की पुस्तकें भी प्रकाशित। संप्रति ‘विभोम स्वर’ और ‘शिवना साहित्यिकी’ का संपादन।

 

यह बाईस-तेईस साल पुरानी बात है, जब ऑफिस के काम से मध्य प्रदेश जाने को कहा गया था मुझे। मध्य प्रदेश जाने का मेरा पहला ही अवसर था वह। वह भी सुदूर आदिवासी अंचल में जाना था। वहां के आदिवासी बहुल जिले झाबुआ में केंद्र सरकार की किसी परियोजना के लिए सर्वे करने जाना था। पहली बार मुझे किसी आदिवासी इलाके में जाने का मौका मिल रहा था। आदिवासियों के बारे में तब तक मैंने बस या तो किताबों में पढ़ा था, या फिर फिल्मों में देखा था। फिल्मों में जहां रंग-बिरंगे अजीब-से परिधान पहनकर ‘झींगालाला’ जैसी हास्यास्पद आवाजें निकालते हुए आदिवासी दिखाए जाते थे। किताबों में ही भगोरिया के बारे में भी पढ़ा था कि आदिवासी इलाकों में होली के सप्ताह भर या यूं कहें कि आठ-दस दिन पहले भगोरिया हाट लगता है। जिसमें विवाह योग्य आदिवासी लड़के तथा लड़कियां सज-धज कर आते हैं। ढोल-मांदल तथा बांसुरी की संगीत-लहरियों पर खूब नाचते हैं। इसके बाद लड़का किसी लड़की को पसंद कर उसे पान देता है तथा उसके गाल पर रंग लगा देता है, लड़की यदि पान को स्वीकार कर बदले में लड़के को भी रंग लगा दे, तो इसका मतलब उसकी स्वीकृति होती है। तब वह लड़का उस लड़की को भगा ले जाता है। दोनों भाग जाते हैं, इसीलिए इसे भगोरिया पर्व कहा जाता है। लगभग स्वयंवर की तरह होता है यह पर्व। हां यह अलग बात है कि भगा ले जाने के बदले उस लड़के को दहेज में लड़की के पिता को दो-ढाई किलो चांदी और लाख-पचास हजार रुपए देने पड़ते हैं।

इस तरह की सूचनाओं के कारण इस अंचल में जाने की इच्छा हमेशा अंदर रहती थी। तब जवानी थी, इसलिए लगता था जो समाज इस तरह के विवाह के लिए उदार है, वहां तो देह-संबंधों को लेकर हमारे सभ्य समाज की तरह बहुत टैबू नहीं होते होंगे। ऐसा लगता था कि ये आदिवासी युवतियां तो हर किसी के लिए आसानी से उपलब्ध होती होंगी।

जब मुझे सूचना मिली कि मुझे वहां जाना है, तो मुझे लगा कि जैसे मुझे कारूं का खजाना हाथ लग गया है। उस समय जवानी के जीवन के लिए तीनों आवश्यक वस्तुएं वहां उपलब्ध थीं- सामिष, सुरा और सुंदरी। झाबुआ इन तीनों के लिए ही मशहूर था- महुआ के फूलों से बनी हुई आदिवासियों की कच्ची शराब- ‘ठर्रा’ और ताड़ के पेड़ से बनने वाली ‘ताड़ी’, झाबुआ में पाया जाने वाला ‘कड़कनाथ मुर्गा’, जो अपने स्वाद के लिए दुनिया भर में मशहूर है और आदिवासी युवतियां… जिनके बारे में कहा-सुना था कि वे ठर्रे और कड़कनाथ की ही तरह आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं।

नौजवानी में जीने के लिए यह तीन चीजें ही सबसे जरूरी लगती हैं। उसके बाद जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे पता चलता है- और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा। ये तीनें चीजें असल में जवानी नाम के पड़ाव पर होने वाली मोहब्बत ही तो हैं। मुझे ऐसा लगा था जैसे मुझे झाबुआ-अलीराजपुर नहीं बल्कि बहिश्त जाने का आदेश मिला है।

मैं सर्वेयर का काम करता था, केंद्र सरकार की अच्छी-खासी नौकरी थी मेरी। इस नौकरी के कारण देश भर में घूमने को मिलता था। शादी उस समय तक नहीं हुई थी। हालांकि जबसे तीस साल का हुआ था, तब से ही घर की तरफ से दबाव आ रहा था शादी का, मगर मैं एक-दो साल और टालना चाहता था। ऐसा नहीं था कि टूरिंग जॉब के कारण उस समय शादी के बारे में सोच भी नहीं रहा था, नहीं… बल्कि इसलिए कि मेरा काम वैसे भी चल ही जाता था, और बहुत अच्छे से चल जाता था।

चूंकि मैं केंद्र सरकार में बड़े ओहदे वाला सर्वेयर था, इसलिए देश भर में जहां भी जाता था, वहां मेरी सारी व्यवस्थाएं वहां का प्रशासन, उस जगह के राज्य सरकार के अधिकारी करते थे। सर्वे में उनके बारे में अच्छी रिपोर्ट देने के बदले में वे अपने क्षेत्र में मुझे पलकों पर बिठाए-बिठाए घुमाते थे। क्योंकि, यह बात भी सच ही होती थी कि केंद्र सरकार की बड़ी-बड़ी योजनाओं का लगभग पूरा हिस्सा ये अधिकारी लोग विभिन्न स्तरों पर खा जाते थे। कई बार तो ग्राउंड पर योजना का कोई काम दिखाई ही नहीं देता था।

लेकिन केंद्र सरकार को तो मेरी रिपोर्ट की आंखों से ही योजना को देखना होता था, इसीलिए ये अधिकारी मेरी इतनी खातिरदारी करते थे। इनको आगे भी योजनाओं का पैसा चाहिए होता था, जो मेरी रिपोर्ट की एक भी गलत टिप्प्णी से रुक जाना था। मेरी खातिर-तवाजो में ये अधिकारी सब कुछ शामिल रखते थे- अच्छे से अच्छी सुरा, वहां का स्पेशल सामिष भोजन और वहाँ की स्त्रियां। जवान था, पॉवरफुल पद पर था और कुंवारा भी था, इसलिए ये तीनों चीजें मेरी कमजोरी बन चुकी थीं। यह बिलकुल नहीं कहूंगा कि मैं बस ये तीन चीजें लेकर ही रिपोर्ट अच्छी बना देता था, हां रिश्वत भी लेता था, और अच्छी-खासी लेता था। लेकिन वह कोई हराम की नहीं लेता था, उन अधिकारियों ने योजना का जो पैसा खाया होता था, उसका बस पांच प्रतिशत लेकर संतुष्ट हो जाता था।

खैर, तो अब मुझे किसी आदिवासी विकास परियोजना के बारे में सर्वे करने के लिए मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में जाना था। काफी बड़ा जिला था उस समय यह, अब तो इसमें से एक जिला और बन गया है- अलीराजपुर। तब दोनों को मिलाकर एक ही जिला था।

देश भर में मैं कई जगहों पर घूम चुका था और भांति-भांति की सुरा, सुंदरी तथा सामिष चख चुका था। यह जैसे मेरे लिए एक शौक-सा होता जा रहा था कि जहां जाऊं वहां की इन तीन चीजों को अवश्य चखूं। सरकारी रेस्ट हाउस में मेरे कहे बगैर ही इनका इंतजाम हो जाता था।

मैंने जानबूझ कर झाबुआ के सर्वे के लिए दस दिन का समय तय किया था। उच्च अधिकारियों को लिख दिया था कि बहुत बड़ा जिला है, जंगल का इलाका है इसलिए सर्वे में समय लगेगा। यह भी सुना था कि वहां के भील रात के समय में लूट-पाट करते हैं, इसलिए सर्वे शाम तक करके जिला मुख्यालय पर लौटना भी होगा। दस दिन तक शाल और सागवान के जंगलों से भरे हुए झाबुआ में रह कर मैं बहिश्त का सुख लेना चाहता था।

जब मुझे सूचना मिली कि मुझे झाबुआ जाना है सर्वे के लिए, तब मैं किसी सर्वे के लिए फैजाबाद में था। मेरा मुख्यालय तो वैसे दिल्ली में था, मगर मेरा पांव वहां टिकता नहीं था। दिल्ली में मेरे मकान पर लगभग हर समय ताला ही होता था। फैजाबाद में जब मुझे सूचना मिली कि मुझे झाबुआ जाना है, तो मुझे लगा कि जैसे मेरी लॉटरी ही लग गयी है।

वह मार्च का पहला सप्ताह था और मुझे मार्च के दूसरे सप्ताह में झाबुआ पहुंचना था। उसी वित्तीय वर्ष में अपनी रिपोर्ट मुझे 31 मार्च के पहले सबमिट करनी थी। मुझे अब भी याद है कि उस साल होली मार्च के अंतिम सप्ताह में थी, इस पूरे संयोग ने मेरे अंदर एक उत्साह की लहर भर दी थी, कि मैं जब वहां रहूंगा तब वहां भगोरिया भी चल रहा होगा- उन्मुक्त प्रेम का पर्व। यही वह समय होगा जब वहां ताड़ के पेड़ों से ताड़ी उतारी जा रही होगी। सबकुछ मेरे अनुकूल ही हो रहा था।

यात्राएं मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं हुआ करती थीं। मुझे हवाई यात्रा या प्रथम श्रेणी की रेल यात्रा की पात्रता थी। रेल रिजर्वेशन भी कोई मुश्किल काम नहीं था, सरकारी कोटे से मुझे तुरंत टिकट मिल जाया करते थे। जब मैंने फैजाबाद स्टेशन (अब का अयोध्या कैंट) से झाबुआ जाने के लिए जानकारी प्राप्त की तो पता चला कि एक ट्रेन ‘साबरमती एक्सप्रेस’ यहां से सीधे झाबुआ जाती है।

मुझे बताया गया कि मैं चाहूं तो झाबुआ जिले में आने वाले स्टेशन ‘मेघनगर’ में उतर सकता हूँ, और अगर मुझे जिले के निचले हिस्से में जाना है तो मैं अगले स्टेशन ‘गोधरा’ पर उतरकर वहां से सड़क मार्ग से भी झाबुआ जा सकता हूँ। ‘गोधरा’ और ‘साबरमती एक्सप्रेस’ ये दोनों नाम पिछले साल की ही किसी घटना के कारण मेरे दिमाग में एकदम लहरा गए थे, और वह भी अयोध्या में रहते हुए।

मैंने गोधरा के बजाय मेघनगर तक का ही प्रथम श्रेणी का टिकट अपने कोटे से करवा लिया था। अक्सर तो मैं एक सर्वे से दूसरे सर्वे के लिए जाने के लिए दिल्ली अपने घर लौटता भी नहीं था। जहां होता था आवश्यक सामग्री वहीं से खरीद कर अगले पड़ाव के लिए निकल लेता था। ऐसा ही मैंने वहां भी किया आगे के लिए आवश्यक खरीदारी वहीं अयोध्या से ही कर ली थी। झाबुआ के जिला प्रशासन को मैंने अपने आने की सूचना भी वहीं से कर दी थी। उनको एक सूचना मेरे कार्यालय द्वारा भी भेजी जा चुकी थी।

लगभग चौबीस घंटे की यात्रा करते हुए मुझे फैजाबाद से मेघनगर पहुंचना था। रेल की प्रथम श्रेणी में यात्रा करने को मैं हवाई यात्रा की जगह प्राथमिकता देता था। अपना केबिन या कूपा लॉक करो और अंदर अपनी दुनिया बसा लो। सुरा मेरे साथ रहती ही थी और बंद केबिन में किस्मत से सहयात्री बन गयी सुंदरी को ताड़ते हुए मैं यात्रा का आनंद लेता था। किस्मत से एकाध बार प्रथम श्रेणी के अपने कूपे में सुंदरी-सुख भी प्राप्त कर चुका था… कैसे…? यह मत पूछिए, राज की बात है। अच्छी भाषा में मैं रसिया था और खराब भाषा में लंपट था।

शायद इसी तलाश में मैं हवाई यात्रा की जगह रेल की प्रथम श्रेणी को चुनता था। और एक सच बताऊं आपको मुझे लगता था कि जब शादी होगी तो उसके बाद तो फिर यह सब छूट ही जाना है, तब तक जीवन को भरपूर क्यों न जी लिया जाए। मैंने जानबूझ कर यह टूरिंग जॉब अपने लिए लिया था, जबकि इससे बाकी सब बचते थे क्योंकि वे घर-गृहस्थी वाले थे। आप यह कह सकते हैं कि मैं जवान भी था और ऐयाश भी, मैं उस समय दुनिया की हर स्त्री को बस एक ही नजर से देखता था।

जब मैं फैजाबाद से रेल में बैठा तब शाम के सात बज रहे थे, अब अगले दिन की शाम सात बजे तक मुझे रेल में ही सवार रहना था। मुझे केबिन में सीट मिली थी मगर चार यात्रियों के केबिन में मैं अकेला ही था। उस पर टिकट कलेक्टर ने मेरी टिकट चेक करते समय यह बता दिया था कि केबिन की सारी सीटें बीना जंक्शन तक तो खाली ही हैं, तथा उसके बाद भी शायद खाली ही रहेंगी, आप अपना केबिन अंदर से बंद कर आराम कीजिए, रात को कोई नहीं आएगा अब।

आईडी के रूप में मैंने अपना भारत सरकार का कार्ड उसे दिखाया था, कार्ड देखने के बाद उसने मुझे कहा था- मैं कोच के अटेंडर को कह देता हूँ कि साहब को कोई भी जरूरत हो तो पूरी कर देना। उसका कहना था कि प्रथम श्रेणी में आज अधिकांश कूपे तथा केबिन खाली पड़े हैं। मुझे क्या जरूरत पड़नी थी, रात का खाना मैं अपने साथ लेकर ही चला था, और अगले दिन की सारी व्यवस्था झाबुआ के जिला प्रशासन पर छोड़ दी थी। जो जरूरत थी उसे तो रेलवे का अटेंडर पूरा नहीं कर सकता था… काश… विमानों की तरह यहां भी महिला अटेंडर्स रखे जाने का प्रावधान होता… कम से प्रथम श्रेणी में तो ऐसा करना ही चाहिए… आदमी इतना पैसा खर्च कर रहा है।

झाबुआ प्रशासन ने सूचना दी थी कि सुबह बीना जंक्शन पर मेरे लिए ब्रेकफास्ट मेरी सीट पर ही कोई लेकर आ जाएगा तथा दोपहर का खाना मेरे लिए सारंगपुर स्टेशन पर कोई अर्दली लेकर आएगा, जो आगे की यात्रा उसी ट्रेन में जनरल कोच में करेगा, रास्ते में चाय-कॉफी की व्यवस्था वही करेगा और मेघनगर स्टेशन पर मुझे उतार कर रेस्ट हाउस ले जायेगा। इतनी व्यवस्था तो उनको करनी ही थी, आखिर को कई बड़ी योजनाओं का सर्वे मुझे वहां करना था।

जैसा कि तय था उस तरह ही सुबह बीना जंक्शन पर मेरे लिए नाश्ता आ गया था। बीना जंक्शन से भी मेरे केबिन में कोई यात्री नहीं आया था। ट्रेन का प्रथम श्रेणी का वह पूरा डिब्बा लगभग खाली पड़ा हुआ था। पिछले साल गोधरा स्टेशन पर इसी ट्रेन के एक कोच में अग्निकांड हुआ था, शायद तब से इस ट्रेन में बैठने में लोग डरने लगे हैं।

प्रथम श्रेणी के उस कोच में इतना सन्नाटा था कि शरीर तो बहुत दूर की बात है, वहां तो आंखों की संतुष्टि के लिए भी कोई नहीं था। इस बार रेल की यात्रा ऐसी होगी यह मैंने सोचा भी नहीं था, इससे तो हवाई यात्रा का ही विकल्प देख लेता तो बेहतर होता। इसी बीच एक बार और टीसी आया था, मुझसे पूछताछ करने कि कोई आवश्यकता तो नहीं है। मेरे पास जो नाश्ता आया था, वह ही आवश्यकता से अधिक था, तो उल्टा उसे मैंने ही ऑफर कर दिया था नाश्ता। थोड़े नानुकुर के बाद वह मेरे साथ नाश्ता करने बैठ गया था।

मैंने उसे बताया था कि सारंगपुर में एक अर्दली मेरे लिए खाना लेकर आने वाला है, वह मेघनगर तक जनरल कोच में साथ ही जाएगा, क्या मैं उसे अपने साथ यहां बिठा सकता हूँ। यहां से मेघनगर तक उससे इलाके के बारे में थोड़ी दरियाफ्त कर लूंगा। मेरा तो काम ही सर्वे करना है। इस पर टीसी ने तुरंत स्वीकृति प्रदान कर दी थी, कि पूरा कोच खाली पड़ा है, निश्चिंत होकर बिठा लीजिएगा, मैं रतलाम जंक्शन तक तो रहूंगा ही, वहां दूसरे टीसी आ जाएंगे, मैं उनको भी बोल दूंगा।

वैसे भी रतलाम से मेघनगर बस घंटे भर का ही रन है। टीसी के जाने के बाद मैं सोच रहा था कि जिस प्रकार झाबुआ जिला प्रशासन को मैंने सारंगपुर में खाने की व्यवस्था का बोला है उसी प्रकार दूसरी व्यवस्था का भी बोल देना था। तब मुझे कहां पता था कि यह प्रथम श्रेणी का कोच इस प्रकार सुनसान हालत में मिलेगा। हालांकि जब व्यवस्थाओं की बात मैंने दो दिन पहले की थी, तब इशारों में इस तरफ एक संकेत तो दे दिया था उन लोगों को। वैसे भी मेरे बारे में जानकारी तो दूसरी जगहों से ले ही ली होगी उन्होंने। उनको क्या दिक्कत होनी थी, जो व्यवस्था वहां करने वाले हैं, वही तो रेल में करनी थी।

सारंगपुर आते ही मेरे लिए खाना लेकर एक नौजवान आ गया था। मुझे देखते ही उसने पूरे अदब के साथ झुक कर नमस्कार किया था और एक बड़ी-सी बांस की डोलची को सीट पर रख दिया था। जाहिर-सी बात है उसमें मेरा खाना था। वह एक पच्चीस-छब्बीस साल का आदिवासी युवक था। मेरे पूछने पर उसने अपना नाम सामा बताया था। वह भील था। झाबुआ में भील आदिवासियों की ही संख्या अधिक है।

ये धनुर्धर जाति होती है जिसने अर्जुन को परास्त कर गोपियों को लूट लिया था- ‘भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वही बाण’। ये भील आज भी धनुष-बाण अपने साथ लेकर चलते हैं। सामा के पास धनुष-बाण नहीं थे, वह गहरे सांवले रंग का मगर बहुत आकर्षक और तीखे नैन-नक्श का युवक था। मैं मान कर चल रहा था कि आदिवासी होंगे तो नाक थोड़ी मोटी और फैली हुई होगी, आंखें भी गोल होंगी, होंठ मोटे होंगे। मगर इस युवक में तो ऐसा कुछ भी नहीं था। वह तो बहुत बाद में मुझे पता चला था कि झाबुआ के भील आदिवासी भारत के आदिवासियों में सबसे सुंदर होते हैं। थोड़ा गहरा सांवला रंग होता है, लेकिन नाक-नक्श तीखे होते हैं।

सामा भी वैसा ही था- गले में एक मोटा-सा काला धागा बंधा था, जिसमें कोई ताबीज जैसी चीज लटकी थी। एक हाथ में कड़ा पहने था और दोनों कानों में चांदी की मुरकियां डाले हुए था। डोलची रख कर वह जाने को मुड़ा ही था कि मैंने उससे मेरे साथ ही बैठ जाने को कहा था।

इस पर उसने उत्तर दिया था कि उसके साथ उसकी पत्नी भी है जो नीचे प्लेटफॉर्म पर खड़ी है, वह उसके साथ पीछे जनरल डब्बे में बैठ जाएगा। ‘पत्नी…’ मेरे दिमाग में हलचल हो गई थी। मैंने तुरंत कहा उसे- ‘अरे तो उसे भी यहीं ले आओ, पूरा केबिन खाली पड़ा है, कहां पीछे बैठोगे।’ मेरी बात सुन कर वह असमंजस में खड़ा रहा था, फिर मैंने लगभग डांटते हुए कहा था- ‘कह रहा हूँ न जल्दी जाओ और ले आओ अपनी पत्नी को, यहां ट्रेन बस पांच मिनट ही रुकती है।’

डांट सुनकर वह केबिन से बाहर चला गया था। उसे बताया गया होगा कि मैं बहुत-बहुत बड़ा अफसर हूँ और मेरी हर आज्ञा का पालन करना है। वैसे यह आदिवासी अपनी पत्नी को लेकर क्यों आया है…? कौन जाने मेरे लिए ही कुछ व्यवस्था… वरना कहा तो मुझे यह गया था कि एक अर्दली ही आएगा, तो फिर यह पत्नी… यहां से सात-आठ घंटे की यात्रा और है, वह भी दिन ही दिन की, कोई यात्री आने वाला नहीं है।

टिकट कलेक्टर तो वैसे ही स्वीकृति दे गया है। कम से कम यहां से मेघनगर तक की यात्रा तो सुखद हो। यह सामा जवान है तो जाहिर-सी बात है कि इसकी पत्नी भी जवान ही होगी। आदिवासी स्त्री को देखने और जी भर कर देखने की व्यग्रता मेरे अंदर बढ़ चुकी थी।

कुछ ही देर में सामा वापस मेरे पास आ गया था, अकेला। उसे अकेला आया देख कर मैंने पूछा था- ‘क्यों, पत्नी को नहीं लेकर आए?’

‘ले आया हूँ साहब जी, उसे वहां बाहर दरवाजे के पास बिठा दिया है।’ उसने कुछ अदब के साथ उत्तर दिया था। वह बनते कोशिश ठीक-ठीक हिंदी बोल रहा था, मगर उसके बोलने में उसकी बोली का पुट आ रहा था। थोड़ा गाने की तरह लग रहा था उसका बोलना।

‘अरे… वहां क्यों बिठा दिया? मैंने कहा था न यहां ले आओ, पूरा केबिन खाली पड़ा है। चलो लेकर आओ यहां।’ मैंने कुछ गुस्से में डांटते हुए कहा था। मेरा गुस्सा दूसरे कारण से था, जिस कारण से इसको प्रथम श्रेणी में बिठा रहा हूँ, यह उस कारण को ही बाहर छोड़ कर आ गया है।

मेरे डांटने पर वह सकुचाता हुआ बाहर चला गया था। थोड़ी देर बाद अपनी पत्नी को साथ लिए लौटा था। पत्नी की गोद में एक बच्चा था और सामा के हाथ में एक बैग था।

उफ्फ… मेरी तो जैसे सांसें ही रुक गई थीं। सांवले रंग में इतनी सुंदरता हो सकती है, यह मैं सोच भी नहीं सकता था। वह लगभग बीस-बाईस साल की युवती थी। थोड़ी छोटी आस्तीन का सुनहरा ब्लाउज, नीचे एक बड़े घेर का, बड़े फूलों की डिजाइन वाला टखनों से कुछ ऊंचा और घुटनों से कुछ नीचा घाघरा और ऊपर एक साड़ी से बहुत छोटी छींटदार चुनरी या ओढ़नी जैसा कपड़ा, जिसका एक सिरा कमर में खुंसा हुआ था और दूसरा कंधे पर साड़ी की तरह डाला हुआ था। जिसके बारे में मुझे बाद में सामा ने बताया था कि यह घाघरा-लुगड़ी है, भील औरतों की पारंपरिक पोशाक। कमर में, बाजुओं में, कलाइयों में, कानों में, नाक में, पैरों में सब जगह चांदी के गहने उसने पहने हुए थे। उन्हीं स्थानों पर कहीं-कहीं गोदने भी गुदे हुए थे। काजल की रेख वाली तीखी आंखें, सुतवां नाक और भरे हुए होंठ जिन पर कोई सस्ती-सी लिपिस्टिक लगी हुई थी।

ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी जीवित युवती को नहीं बल्कि काले पत्थर से बनी कोई खूबसूरती से तराशी हुई प्रतिमा को देख रहा हूँ। शरीर के सारे कटाव और उभार एकदम प्रतिमा की ही तरह थे। उसे देख कर मुझे मध्य प्रदेश की ही एक प्रसिद्ध प्रस्तर प्रतिमा ‘शालभंजिका’ की याद आ रही थी। गोद के बच्चे को उसने अपने आंचल से ढांप रखा था। अंदर आते ही उसने मुझे झुककर अभिवादन किया था। उसके झुकने ने मेरे अंदर किसी तूफान को हवा दे दी थी।

‘आओ-आओ… बैठ जाओ।’ मैंने सामने की सीट की तरफ इशारा करते हुए कहा था। मेरे इशारा करने पर वह जमीन पर बैठने को उद्यत हुई थी।

‘अरे… नीचे नहीं, ऊपर बैठो।’ मैंने आदेश के स्वर में कहा था। मेरे कहने पर उसने अपने पति की तरफ देखा था, पति ने आंखों से इशारा किया था, तो वह सकुचाती हुई सीट के एक कोने में बैठ गई थी। मेरे अंदर जैसे बगूले उठ रहे थे। सिर पर कोई जुनून-सा चढ़कर नाच रहा था। मैं चाहता था कि धृतराष्ट्र की तरह इस प्रतिमा को भुजाओं में भर कर चूर-चूर कर डालूं।

‘क्या नाम है बच्चे का…? लड़का है या लड़की…?’ मैंने उसको सहज करने के उद्देश्य से पूछा था। मेरी निगाहें उसका सरापा एक्सरे कर रही थीं। ऐसे अवसर पर मैं अपने को रोक नहीं पाता था। मेरे अंदर का पशु तुरंत बाहर आकर मेरी आंखों में बैठ जाता था।

‘लीला… लड़की है।’ उसकी तरफ से सामा ने उत्तर दिया था। उत्तर सुनकर भी मैंने सामा की तरफ नहीं देखा था, बल्कि बच्चे के बहाने उसकी मां के शरीर की ही पड़ताल करता रहा था।

‘लीला… वाह सुंदर नाम है। और तुम्हारा नाम…?’ मैंने मां की तारीफ में बोले जाने वाले शब्दों को बेटी को समर्पित कर दिया था।

‘इसका नाम कस्तूरी है साहब जी।’ इस बार फिर सामा ने ही उत्तर दिया था।

‘कस्तूरी… यह भी अच्छा नाम है। सामा, तुम खड़े क्यों हो, केबिन का दरवाजा बंद कर चिटकनी लगा दो और आराम से बैठ जाओ।’ मैंने सामा की तरफ देखते हुए कहा था। सामा ने यंत्रवत केबिन का दरवाजा बंद कर चिटकनी चढ़ाई और बैग को नीचे रखकर अपनी पत्नी वाली सीट पर खिड़की के पास बैठ गया था। कस्तूरी ने भी सीट पर दोनों के बीच अपने गोद की बच्ची को सुला दिया था। ठंड का समय था, इसलिए बच्ची को बहुत सारे कपड़ों में ढंका हुआ था।

‘मुझको तो यह बताया गया था कि तुम अकेले आओगे… फिर… ये कस्तूरी…’ मैंने बात को प्रश्न बनाते हुए बीच में ही छोड़ दिया था। यह जो भी उत्तर देगा उससे मुझे समझ में आ जाएगा कि यह जो कुछ हो रहा है क्या इसमें मेरे लिए की गई कोई व्यवस्था है। उसी हिसाब से मैंने आगे का प्लान करने का सोचा था।

‘जी साहब जी, आणा तो मुझे अकेले ही था, इसको नी आणा था। पर फिर इसको भी ले आया कि घूम लेगी मेरे साथ ये भी।’ सामा के उत्तर से मैं और उलझ गया था… क्या मतलब है इसका… लग तो रहा है कि कुछ न कुछ है। सामा की बात में इस बार उसकी बोली पूरी तरह से झलक गई थी।

‘चलो खाना खा लेते हैं… भूख लग रही है। तुम लोग भी खा लो।’ मैंने बात को बदलते हुए कहा था।

‘नी साहब जी आप खाओ, हमारे पास अपणा खाना है, मैं आपके लिए लगा देता हूँ।’ कहते हुए सामा बर्थ पर एक प्लास्टिक की शीट बिछा कर उस पर खाना लगाने लगा था।

‘अरे तुम लोग भी ले लो, इतना खाना मैं अकेले थोड़े ही खाऊंगा। चलो लो तुम दोनों भी।’ मैंने कुछ तेज स्वर में आदेश देते हुए कहा।

‘खा लेंगे साहब जी, पहले आप खा लो फिर हम दोनों खा लेंगे।’ सामा ने हाथ जोड़ते हुए कहा था।

मैंने एक प्लेट में अपने खाने लायक खाना रख लिया था और खाने लगा था। खाना सच में स्वादिष्ट था। मेरे लिए सच में वह खाना खाने का पहला अवसर था। मैं तो मुख्य सामग्रियों को पहचान भी नहीं पा रहा था। कुछ पिसे हुए हरे चने की मसाले वाली सब्जी थी, जैसा बिहार में मटर का निमोना बनता है लगभग वैसा ही।  उसके साथ किसी मोटे आटे के बने हुए छोटे-छोटे मगर मोटे-मोटे रोट जैसे थे, जो घी में डुबोए हुए थे। मेरे पूछने पर सामा ने बताया था कि ये ‘लिलुआ-पानिया’ है, झाबुआ के आदिवासियों का एक प्रमुख भोजन। वह पिसे हुए हरे चने की सब्जी ‘लिलुआ’ थी और उसके साथ जो मोटे रोट थे, वो ‘पानिया’ थे, मक्के के आटे को दूध में गूंथकर फिर पलाश के पत्तों में लपेट कर आग पर सेंक कर बनाए गए थे वो। साथ में तीखी हरी चटनी थी। कटे हुए प्याज थे। मैंने अपने हिस्से का खाना लेकर सामा को इशारा कर दिया था, वे दोनों भी दूसरी बर्थ पर बैठकर खाना खाने लगे थे।

खाना खाते समय मैंने पहली बार कस्तूरी की दंतपंक्ति देखी थी, जैसे किसी बिजली की तरह चमक रही थी वह। खाना खाते हुए मैं सामा से झाबुआ के बारे में जानकारी लेता रहा था। भगोरिया के बारे में, कड़कनाथ के बारे में, ताड़ी और ठर्रे के बारे में। वहां की परंपराओं के बारे में। यह सब पूछना मेरे सर्वे का हिस्सा नहीं था मगर इस बहाने मैं थोड़ा खोलना चाहता था उन दोनों को। कस्तूरी तो कुछ नहीं बोल रही थी, मगर जब सामा कोई बात कहता था तो वह मुस्कुरा कर उसकी तस्दीक करती थी। उनकी शादी की चर्चा आने पर मैंने कस्तूरी के सांवले गालों पर गुलाबों को खिलते और उसकी चंचल आंखों में एक शरारत को तैरते हुए देखा था। खाना खाते हुए मैंने दोनों को बहुत सामान्य कर लिया था। मेरे पास समय भी कम था, ट्रेन तो अपनी गति से भाग ही रही थी। मेरे अंदर शालभंजिका को पाने की उत्कंठा बढ़ती ही जा रही थी। मुझे लग रहा था जैसे आज की सारी परिस्थितियां मेरे लिए ही निर्मित हुई हैं, ट्रेन का सूना कोच… मैं और शालभंजिका। मैं खाना खाते हुए भी शालभंजिका को नजरों से तौल रहा था। इस क्रम में कई बार मेरी उससे नजरें भी मिल जाती थीं और वह असहज हो जाती थी। लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, मुझे तो उसे बताना ही था कि मेरे दिल में क्या है, मुंह से नहीं तो नजरों से ही सही।

खाना खाने के बाद जब मैं हाथ धोने के लिए कोच के वॉशरूम में गया, उस समय तक सामा ने केबिन में साफ-सफाई कर दी थी। सारा सामान वापस बांस की डोलची में रख दिया था। कस्तूरी भी इस बीच अपने पांव ऊपर सीट पर रखकर आलथी-पालथी बना कर बैठ गई थी। मैं आकर अपनी सीट पर खिड़की के पास बैठ गया था। कस्तूरी सामने वाली सीट पर दरवाजे के पास बैठी थी। बैठने के बाद मैंने कस्तूरी की तरफ देखा था, आलथी-पालथी बनाकर बैठने के कारण दोनों पैरों की पिंडलियां घाघरे की कैद से बाहर आ गई थीं। सांवली सुडोल पिंडलियां, जैसे काले पत्थर को तराश कर बड़े जतन से बना दी गई हों। मेरे अंदर पिंडलियों को देखकर फिर बगूले से उठने लगे थे। दिल कर रहा था कि पास जाकर इन पिंडलियों को… इस बीच कस्तूरी की नजर मेरी नजर पर पड़ गई थी। कुछ असहज होते हुए उसने अपने घाघरे को थोड़ा नीचे की तरफ खींच कर पिंडलियों को ढंक लिया था।

इस बीच बहुत देर से सोई हुई बच्ची कुनमुना कर उठ गई थी। कस्तूरी ने तुरंत बच्ची को सीट पर से उठाकर गोद में ले लिया था। बच्ची के चेहरे का कपड़ा हटा, तो मैंने बच्ची को पहली बार देखा था। बच्ची सांवली न होकर गोरी थी। मेरे लिए हैरत की बात थी वह, सामा और कस्तूरी में कोई भी गोरा नहीं था, फिर यह बच्ची इतनी गोरी…? यह तो इनकी हो ही नहीं सकती। मेरे दिमाग के जहरीले सांप अब फन उठाए पूरे शरीर में घूमने लगे थे। यकीनन इस बच्ची का बाप कोई और है, इसका मतलब कस्तूरी… क्या यही व्यवस्था भेजी गई है मेरे लिए। बिलकुल… रास्ते से ही सर्वे अधिकारी का मूड ठीक करना कौन नहीं चाहेगा? वहां जब पहुंचूं तो एकदम अच्छे मूड में उतरूं।

इस बीच कस्तूरी ने सामा से धीमे स्वर में कुछ कहा था। शायद अपनी भीली बोली में बोला था, इसलिए मुझे कुछ समझ नहीं आया था। उसकी बात सुनकर सामा ने दरवाजे की तरफ इशारा किया था और खुद भी उठकर खड़ा हो गया था।

‘क्या हुआ…?’ मैंने सामा से पूछा था।

‘बच्ची भूखी है, दूध पिलाणा है, बाहर पिला देगी।’ सामा ने उत्तर दिया था।

‘अरे… उसमें बाहर जाने की क्या बात है, यहीं पिला दो।’ मैंने कहा था, मेरी बात सुनकर कस्तूरी के चेहरे पर कुछ हैरत के भाव आ गए थे और उसने सामा की तरफ देखा था।

‘मुझे खाना खाने के बाद थोड़ा टहलने की आदत है, मैं बाहर गलियारे में घूमता हूँ, तब तक बच्ची को दूध पिला दो।’ मैंने बात को संभालते हुए कहा और उन दोनों को बैठे रहने का इशारा कर के खुद सीट से उठकर दरवाजे से बाहर चला गया था।

बाहर जाते समय मैंने केबिन का दरवाजा और परदा जानबूझ कर पूरा बंद नहीं किया था। उसमें एक सन जैसी छोड़ दी थी, एक दरार, जहां से केबिन के अंदर का दृश्य देखा जा सके। मैं कोच में केबिन्स के बाहर के गलियारे में घूमने लगा था। आते-जाते अपने केबिन के पास ठिठक जाता था, परदे की दरार में से मुझे वह दिख रहा था, जो मैं देखना चाहता था। चूंकि केबिन में अब कस्तूरी के साथ केवल सामा ही था, इसलिए कस्तूरी कुछ लापरवाही से बैठकर बच्चे को दूध पिला रही थी। अपने ही पति से क्या छिपाया जाए? बहुत देर तक ठिठककर जब मैं केबिन के अंदर देखता रहा था, तो मेरे सिर पर जैसे कोई जुनून, कोई वहशत-सी तारी होने लगी थी। जो कुछ अंदर दिख रहा था वह जैसे किसी जलती हुई आग में घी की तरह पड़ रहा था। सारे शरीर में एक आग-सी भड़क रही थी। लोग कहते हैं कि इस आग के भड़कने से आदमी की सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो जाती है, सच में मेरा भी मन कर रहा था कि मैं सामा को किसी काम से कोच के दरवाजे के पास बुलाऊं और उसे ट्रेन से नीचे धक्का दे दूँ। और वापस लौट कर इस शालभंजिका को… दिमाग जो अभी भी थोड़ा-बहुत काम कर रहा था, वह कह रहा था कि मैं ऐसा नहीं कर सकता, मगर शरीर कह रहा था कर सकता है, तू सब कुछ कर सकता है। मैं अपने काबू में नहीं था उस समय।

कुछ देर बाद जब मैं वापस केबिन में पहुंचा था, तो कस्तूरी बच्चे को दूध पिला चुकी थी। अब वह बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। कुछ देर पहले जो बिना बांहों वाली जैकेट सामा ने पहन रखी थी वह अब कस्तूरी ने दोनों कंधों पर डाल रखी थी।

‘ठंड लग रही है…?’ मैंने मुस्कुरा कर बैठते हुए पूछा था।

‘ठंडे डिब्बे में पहली बार बैठी है ये…।’ सामा ने कुछ मुस्कुराते हुए उत्तर दिया था।

‘और तुम…?’ मैंने सामा से पूछा था।

‘साहब लोग के साथ एक-दो बार बैठा हूँ साहब जी, पर ऐसे कमरे वाले ठंडे डिब्बे में तो मैं भी पहली बार ही बैठा हूँ।’ सामा ने उत्तर दिया था।

‘कमरे वाला ठंडा डिब्बा…?’ मैंने प्रश्न पूछा था, पर तुरंत समझ में आ गया था कि वह केबिन को कमरा कह रहा है।

ट्रेन अपनी रफ्तार से भाग रही थी, मेरे पास जो समय था, वह रेत की तरह फिसल रहा था। यह सच है कि वहां झाबुआ में मेरे लिए यह व्यवस्था की ही गई होगी मगर जो व्यवस्था होगी क्या वह कस्तूरी की तरह होगी? ऐसी शालभंजिका दूसरी थोड़े ही हो सकती है। ठीक है जो मिलेगी उससे काम तो चलाना ही होगा, मगर इस शालभंजिका को देख लेने के बाद उसे बस काम चलाना ही कहा जाएगा। उसमें फिर कोई आनंद थोड़े ही रहेगा। इसमें तो कहीं कोई रत्ती भर भी कमी-बेसी नहीं है, जहां जितना कटाव चाहिए वहां ठीक उतना ही है और जहां जितना भराव चाहिए वहां सूत भर भी कम नहीं है। पेड़ की शाख को पकड़ कर लटकती हुई शालभंजिका की तरह सबकुछ एकदम परफेक्ट है। फिर एक बात और भी है यदि कस्तूरी को ही मेरी व्यवस्था के लिए भेजा गया है तो…? वे लोग कहेंगे तो सही कि आपके लिए इतनी स्पेशल व्यवस्था की और आपने कुछ भी नहीं…

‘कोई स्टेशन आएगा तो चाय पीयेंगे सामा।’ मैंने सामा की तरफ देखते हुए कहा था।

‘अब तो उज्जैन आएगा साहब जी, वहां दस-पंद्रह मिनट रुकती है गाड़ी, साहब ने भी कहा था उज्जैन में आपको अच्छी चाय पिलाने को। उज्जैन महाकाल बाबा का धाम है साहब जी, इसलिए गाड़ी इत्ती देर रुकती है वहां। आप भी एक दिन आना साहब जी यहां महाकाल बाबा के दर्शन करने। भोत महिमा है महाकाल बाबा की।’ उसने कुछ अदब से कहा था।

मैं खिड़की से टिक कर अधमुंदी आंखों से एक बार फिर शालभंजिका का गहन निरीक्षण करने के अपने कार्य पर लग गया था। मेरी अधमुंदी आंखें बार-बार शालभंजिका की नजरों से टकराती थीं। मगर अब मैं बेशरम की तरह यह कार्य किए जा रहा था। मुझे विश्वास हो गया था कि शालभंजिका ही मेरी व्यवस्था है। इसी बीच सामा केबिन से बाहर चला गया था, शायद वॉशरूम गया था। मगर मुझे तो यही अवसर सबसे ठीक लगा था। मगर शुरुआत कैसे करूं? मैंने देखा कि कस्तूरी सामा की जैकेट से बच्ची को भी ढंकने का प्रयास कर रही है। वातानुकूलन के कारण केबिन बहुत ठंडा हो रहा था। मैंने अपने बैग से अपना शॉल निकाला और उसे कस्तूरी की तरफ बढ़ाते हुए बोला था- ‘बच्ची को ठंड लग रही होगी, लो यह शॉल तुम भी ओढ़ लो और बच्ची को भी उढ़ा दो।’ कस्तूरी ने कोई उत्तर नहीं दिया था, बस हाथ के इशारे से मना कर दिया था।

‘अरे बच्ची को ठंड लग जाएगी तो बीमार पड़ जाएगी। लो… ले लो यह शॉल।’ मैंने आदेश के स्वर में कहा था। मगर उसने फिर इशारे से मना कर दिया था और दरवाजे की तरफ देखने लगी थी। दरवाजा… वह दरवाजे की तरफ क्यों देख रही है… क्या दरवाजा बंद करवाना चाहती है वह? क्या सामा जान-बूझ कर हम दोनों को अकेले छोड़ कर बाहर चला गया है? मेरे दिमाग में कई सवाल उठ रहे थे।

मैं सीट से उठ कर उसके पास आ गया था, शॉल को फैला कर कस्तूरी को ओढ़ा दिया था। ओढ़ाते समय मेरे सीधे हाथ की उंगलियां कस्तूरी की बांहों पर उसके भुजबंद से ठीक ऊपर अच्छा-खासा स्पर्श करते हुए गुजर गई थीं। कुछ छोटी आस्तीनों वाले उसके ब्लाउज की आस्तीनें ऊपर ही ऊपर दो छोटे गुब्बारों की शक्ल में थीं और कोहनी से थोड़ा ऊपर भुजबंद बंधा हुआ था। मेरी उंगलियों ने आस्तीनों और भुजबंद के बीच में अपनी करामात दिखा दी थी। बाद में लौटते समय वे उंगलियां शालभंजिका की पीठ पर से लहराती हुई आई थीं। बल्कि कुछ पलों के लिए उंगलियां पीठ पर ठिठक भी गई थीं। शालभंजिका की बांहों और पीठ के स्पर्श ने मेरी देह में जैसे कोई तरंग-सी दौड़ी दी थी। यह मेरा परीक्षण था, मैं देखना चाहता था कि मेरे इस स्पर्श से उसके चेहरे पर क्या प्रतिक्रिया होती है। मुझे अपना अगला कदम उस प्रतिक्रिया के बाद ही उठाना था। सांवले मां-बाप की गोरी बच्ची को देखते हुए मैं मुतमईन था कि प्रतिक्रिया क्या आनी है, बस एक औपचारिकता ही शेष लग रही थी मुझे। मेरा मन अगले कार्यक्रम के लिए अपने आप को तैयार करने में लगा हुआ था।  लेकिन मैं प्रतिक्रिया देखता उसके पहले ही दरवाजे पर सामा आ चुका था। वह गौर से मुझे कस्तूरी के पास खड़ा हुआ देख रहा था।

‘बच्ची को ठंड लग रही थी, मैंने कहा मेरी शॉल उढ़ा दो, पर कस्तूरी मान ही नहीं रही थी।’ मैंने सामा के देखने को देखा तो तुरंत सफाई देते हुए कहा था। ‘केबिन बहुत ठंडा हो रहा है, उस पर ठंड का मौसम भी है, बच्ची को ठंड लग गई तो बीमार पड़ जाएगी।’ मेरी बात से भी सामा के चेहरे का तनाव कम नहीं हुआ था। मैं अपने आप को असहज महसूस कर रहा था इसलिए वॉशरूम चला गया था। सामा अचानक नहीं आता, तो शायद मैं कुछ और आगे बढ़ता, मगर…

जब मैं वॉशरूम से लौटा तो मैंने देखा कि मेरी शॉल तह की हुई मेरी सीट पर रखी है, कस्तूरी ने सामा की जैकेट को अपने पर से उतारकर बच्ची को ओढ़ा दिया है। एक पुरानी-सी चादर उसने खुद ओढ़ रखी है। नीचे रखा हुआ बैग सीट पर रखा हुआ था।

‘अरे क्या हुआ…? क्यों उतार दी शॉल…?’ मैंने बैठते हुए कहा था।

‘नहीं साहब जी… हम छोटे लोग हैं, आपकी शॉल नहीं ओढ़ सकते। साहब लोगों को पता चलेगा तो गुस्सा करेंगे वे भी। इसके पास रखी थी बैग में अपनी चादर। पहले भी मैंने बोला था कि बैग से निकालकर ओढ़ ले चादर, पर इसको तो मेरी जाकिट पहनना ही पसंद है, कहती है उसमें से तेरी खुसबू आती है। आप अपनी शॉल रख लीजिए साहब जी।’ जाने क्यों मुझे ऐसा लगा था कि यह बात कहते समय सामा का स्वर कुछ रूखा था। एकदम सपाट।

‘उज्जैन आने में कितना समय और लगेगा अब?’ मैंने बात को बदलते हुए पूछा था।

‘घंटा भर तो लगेगा अभी और।’ सामा के स्वर में मुझे पहले वाला अदब अब गायब लग रहा था। और एक प्रकार की लापरवाही आ गई थी। या शायद मेरे अंदर का अपराध बोध ही यह भ्रम पैदा कर रहा था।

‘एक बात बताओ सामा… तुम दोनों तो सांवले हो और तुम्हारी बच्ची इतनी गोरी…?’ इस बार मैंने ठीक जगह पर प्रहार किया था। मेरे प्रश्न पर सामा ने कस्तूरी की तरफ देखा था। कुछ देर को केबिन में एकदम खामोशी छा गई थी।

‘बाप पर गई है बच्ची…।’ सामा ने बहुत ठहरे हुए स्वर में उत्तर दिया था।

‘तुम्हारे पिताजी पर…? तुम्हारे पिताजी गोरे हैं?’ मैंने प्रश्न में प्रश्न जोड़ दिया था।

‘नहीं साहब जी मेरे बाप पर नहीं अपने बाप पर गई है बच्ची।’ इस बार सामा ने सच में ही बहुत ठंडे और गहरे स्वर में उत्तर दिया था।

‘इसका मतलब तुम दोनों इसके मां-बाप नहीं हो?’ मैं भी अपनी जिद पर था, सबकुछ सामा के मुंह से ही कहलवाना चाह रहा था।

‘नहीं साहब जी, कस्तूरी तो इसकी मां है, पर मैं इसका बाप नहीं हूँ।’ सामा ने उसी तरह ठंडे स्वर में उत्तर दिया था।

‘मतलब…?’ बात ठीक उस जगह पर आ गई थी, जहां मैं उसको लाना चाहता था।

‘मतलब ये साहब जी कि इस बच्ची का बाप कोई और है, मैं नहीं हूँ।’ सामा की आवाज हर बार गहरी होती जा रही थी।

‘पर यह तो तुम्हारी पत्नी है न?’ मैंने अंतिम चोट की थी।

‘हां साहब जी ये मेरी घरवाली ही है, पण पेले से मेरी घरवाली नी थी।’ सामा की बात में फिर उसकी बोली आ गई थी। मैं कुछ देर को चुप हो गया था। सामा चुपचाप बैठा कस्तूरी को देख रहा था। कस्तूरी के चेहरे पर बहुत मद्धम-सी मुस्कुराहट थी, जो मेरे लिए हैरत का विषय थी।

‘साहब जी मैं इसको बचपन से ही अपनी घरवाली बणाना चाहता था, पर ये किसी दूसरे की घरवाली बण गई थी। इसको हमारे ही गांव का एक गोरा भील पसंद आ गया था। ये लीला उसी गोरे की बेटी है। गोरे रंग के भील मुश्किल से मिलते हैं साहब जी.. इसे मिल गया था।’ सामा ने कस्तूरी की तरफ देखते हुए कहा था। इस पर कस्तूरी ने अपनी भाषा में कुछ कहा था, जो मुझे समझ नहीं आया था। बदले में सामा ने भी अपनी तरफ से कुछ ऐसा कहा था जो मुझे समझ नहीं पड़ा था। बस इतना समझ आया था कि वह सामा की बात का विरोध कर रही है।

‘मुझे कुछ समझ नहीं आया…।’ मैंने कुछ उलझन भरे स्वर में पूछा था।

‘ये कह रही है कि मैंने थोड़े ही पसंद किया था, मेरे बाप ने किया था पसंद उस गोरे को।’ सामा ने कस्तूरी की तरफ शरारत से देख कर मुस्कुराते हुए कहा था।

‘पर इस बच्ची का यह गोरा रंग…?’ मैं बात को ट्रेक पर ही रखना चाहता था।

‘उस गोरे के बाप को पुलिस वाले ने किसी झूठे केस में फंसा दिया था। पुलिस वाले की नजर उसकी मां पर थी। उसकी मां को ही उसके बाप को छुड़ाने थाने जाना पड़ा था। गई तो उस गोरे-चिट्टे पुलिस वाले का बीज ले आई थी अपनी कोख में, उसी से वह गोरा पैदा हुआ था। आपको तो पता ही होगा साहब जी हमारी औरतें, हमारी ताड़ी और हमारे कड़कनाथ मुर्गे, इन तीनों को पुलिस वाले अपने बाप की बपौती मानते हैं। लूट-पाट तो हमारा समाज करता ही है, पर जो नहीं करते वे ही फंसते हैं पुलिस के चंगुल में। हमें लुटेरा भी पुलिस ही बनाती है और फिर फँसाती भी वही है।’ सामा की आवाज में थोड़ा आक्रोश-सा भर गया था।

‘लेकिन तुम इसको पत्नी क्यों नहीं बना पाए थे उस समय…?’ सामा की आंखों में आक्रोश की चिंगारियां देखकर मैंने बात बदलते हुए कहा था।

‘इसको मैं बचपन से ही पसंद करता था साहब जी। मैंने ठान रखी थी कि इसको भगोरिया में भगा ले जाऊंगा। मैं पागल था इसके लिए, पर इसके बाप को इसके एवज में तीन किलो चांदी और पचास हजार रुपए चाहिए थे। भगोरिया में भगाता तो भी इतने तो देने ही पड़ते इसके बाप को। जात-बिरादरी की पंचायत जो तय कर देती है वह सबको माननी पड़ती है, नहीं तो जात-बाहर कर देते हैं। बस पैसों की व्यवस्था करने में लग गया था मैं। इसी काम से बाहर चला गया था।’ सामा की आवाज एकदम ठहरी हुई थी।

‘इतने पैसों की व्यवस्था कैसे करने की सोची थी तुमने?’ मैंने प्रश्न किया था।

‘व्यवस्था का क्या है साहब जी, दिन भर कहीं मेहनत-मजूरी का काम करो। और रात को… रात के लिए तो हम भील तीर-कमान लेकर ही पैदा हुए हैं। रात को तीर-कमान से काम करो…। मैंने भी वही सब किया… गांव छोड़ कर चला गया था पैसे कमाने। दिन में काम करता था और रात को लूटपाट… इस भीलनी ने मुझे लुटेरा बना दिया था। पर मैं अपनी खुशी से बना था साहब जी। और मैं कोई अकेला तो था नहीं, और भी थे मेरे जैसे। लड़कों को दहेज का पैसा इकट्ठा करने के लिए सब कुछ करना पड़ता था। लूट-पाट, मार-पीट, झगड़ा-टंटा हमारे लिए कोई बड़ी बात थोड़े ही है साहब जी।’ सामा ने जैसे यह बात मुझे सुनाने के लिए ही कही थी।

‘कितने दिन लगे थे तुमको पैसा जमा करने में?’ मैंने प्रश्न किया था।

‘साल-डेढ़ साल में हो गए थे पैसे, मगर तब तक ये किसी दूसरे की हो गई थी। इसके बाप को उस गोरे ने चार किलो चांदी और लाख रुपए दे दिए थे, तो इसके बाप ने इसका ब्याह उसके साथ कर दिया था। मैं जब पैसे लेकर आया तब तक तो इसके पेट में लीला भी आ गई थी। इसकी भी कोई गलती नहीं थी साहब जी, मैं कोई इसको कह कर थोड़े ही गया था कि मैं तेरे को प्यार करता हूँ, तेरे बाप को देने के लिए पैसों की व्यवस्था करने जा रहा हूँ। गलती तो मेरी ही थी, मैंने ही जाने के बाद गांव की खबर नहीं रखी, किसी को कुछ बताया भी नहीं था कि मैं कहां जा रहा हूँ। मैं जब वापस आया तो जैसे पांव नीचे से धरती हट गई थी साहब जी। कस्तूरी के लिए ही तो रात-रात भर जंगल में छिप-छिप कर, जाने किस-किस से लूट-पाट कर पैसे जमा किए थे।’ सामा की आवाज अब वह पहले वाले सामा की आवाज नहीं रही थी। ऐसा लग रहा था मुझे कि वह जान-बूझ कर मुझे लूट-पाट, मार-पीट की बात सुना रहा है। जैसे वह मुझे डराना चाहता था। हालांकि मुझे पता था कि झाबुआ के भील उस समय इस तरह के अपराधों में शामिल रहते थे, मगर मेरे सामने ही कोई ऐसा बैठा होगा, यह मैंने कब सोचा था। मेरे अंदर शाल वन की शालभंजिका को पाने के लिए उत्कंठित सारे सांप अपने फन सहित नीचे बैठ चुके थे। वहशत की जगह एक प्रकार की दहशत ने ले ली थी। मैं सीट पर रखे बैग को देख रहा था, कौन जाने इसमें कौन-कौन से हथियार रखे हों।

‘मैं पागल हो गया था साहब जी। रात-रात भर मेरे सामने इसकी सूरत नाचती थी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं। एक मन करता था कि तीर-कमान उठा कर फिर से जंगल चला जाऊं… पर अब किसके लिए लूट-पाट करूंगा, जो कमा के लाया था वो पैसा ही घर में पड़ा था, किसी काम का नहीं था मेरे लिए। सोच के आया था कि जित्ता पैसा इसका बाप मांग रहा है उससे थोड़ा ज्यादा ही दूंगा। और पूरी बिरादरी को खाना भी दूंगा, पर ये तो पहले ही गोरे की हो गई थी। वह गोरा मेरी भीलनी को ले उड़ा था… मेरा जी करता था कि मैं उसको… इसके लिए तो मैं कुछ भी…’ सामा ने कुछ बातों को मेरे समझने के लिए बीच में ही छोड़ दिया था। सामा की आंखों में अब वहशत दिखाई दे रही थी और मेरे अंदर की दहशत बढ़ती जा रही थी।

‘पर साहब जी ऊपर वाला भोत बड़ा मालिक है, वह सबकी सुनता है। उसने मेरी भी सुन ली थी। लीला के पैदा होने के थोड़े दिन बाद ही इसका गोरा मर गया। वैसे कायदे में तो विधवा होने के बाद इसकी शादी इसके देवर से होनी चाहिए थी, पर इसका कोई देवर था ही नहीं। और मेरे पास तो पैसे रखे ही थे। थोड़े इसके ससुराल वालों को दिए, बाकी इसके बाप को, और छोरी समेत ब्याह के ले आया इसको। बस तब से ये मेरे ही पास है।’ सामा की आवाज में मुझे अभी भी वहशत महसूस हो रही थी। हां उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी और उसकी आंखें कस्तूरी के चेहरे पर जमी हुई थीं।

‘बहुत बड़ा दिल है तुम्हारा, तुमने किसी दूसरे के बच्चे को भी अपना लिया।’ मैंने प्रशंसा के स्वर में कहा था।

‘साहब जी जो बेटा होता तो नहीं रखता, पर ये तो बेटी थी। कस्तूरी के बाप ने मुझसे पैसे लिए थे, ये भी मुझे किसी न किसी से पैसे दिलवाएगी, और यह तो गोरी भी है, इसके तो मुंहमांगे पैसे देगा इसका मरद। फिर कस्तूरी भी लीला को छोड़ने को तैयार नहीं थी, मैंने सोचा साहब जी कि चलो अपना क्या है, अपने को तो कमाई ही होनी है इस बेटी से।’ सामा का उपहास मिश्रित स्वर कुछ जहरीला हो चुका था। मुझे लग रहा था जैसे वह ये सबकुछ मुझे ही सुना रहा है, जो सुनाने लायक नहीं है, वह भी सुना रहा है।

‘तुमने ये नहीं बताया कि कस्तूरी का पति कैसे मरा?’ मैंने कुछ रुक-रुक कर प्रश्न किया था।

‘वह… वह तो साहब जी अपने रंग के कारण ही मर गया था। उसका रंग और सूरत-शकल अपने बाप पर गई थी, वह हम भीलों जैसा लगता ही नहीं था, बाहर वाला लगता था। रहता भी बाहर वालों जैसा ही था, गोरा था तो सोचता था कि मैं भील थोड़े ही हूँ। पर साहब जी जंगल में लूट-पाट अपने लोगों के साथ नहीं होती, बाहर वालों के साथ होती है। माल-मत्ता भी खूब ले के चलता था वह अपने साथ। कहीं रिश्तेदारी में शादी में गया था, वहां से लौट रहा था। जंगल में मरा हुआ मिला था, सीने में तीर आर-पार हो गया था उसके।’ सामा की आवाज एकदम ठंडी और क्रूर हो गई थी।

‘पता नहीं चला किसने मारा उसे?’ मैंने जानते-बूझते भी प्रश्न किया था।

‘जंगल के मरे का कहां पता चलता है साहब जी कि किसने मारा। तीर पर नाम थोड़े ही लिखा होता है मारने वाले का। मार दिया होगा किसी ने माल लूटने के लिए। जंगल में पेड़ की आड़ से निशाना धर के दिया होगा और भचाक से हो गया होगा तीर सीने के आर-पार…।’ अंतिम बात कहते हुए सामा ने एकदम मेरी आंखों में आंखें डाल कर देखा था, उसकी आंखों में जैसे आग-सी लगी हुई थी। उसकी आवाज भी बहुत जहरीली हो गई थी। मेरी आंखों में उसकी आंखों के तीर से उतरते हुए चले गए थे। उसके बाद मेरे पूछने के लिए कोई प्रश्न नहीं था। हां यह अच्छे से याद है मुझे कि ठंड के उस मौसम में उस वातानुकूलित केबिन में भी मेरे शरीर के बहुत से हिस्सों ने पसीना छोड़ दिया था। सीट और मेरे कूल्हों के बीच पसीना सरसरा रहा था। सारे अंगों में शिथिलता महसूस हो रही थी, जैसे फालिज गिर गया हो शरीर पर। मेरी आवाज जैसे गले में ही फंस गई थी।

गाड़ी किसी शहर में प्रवेश कर गई थी। खिड़की से बाहर शहर दौड़ने लगा था। गाड़ी की गति भी कम हो रही थी, स्टेशन धीरे-धीरे खिड़की से दिखाई देने लगा था।

‘साहब जी, उज्जैन आ गया… चल कस्तूरी तू भी चल… अपन वहीं पी लेंगे चाय और साहब के लिए यहीं ले आएंगे। चल यहां तो भोत बखत के लिए रुकती है गाड़ी। लीला को भी ले ले साथ में।’ कहते हुए सामा ने सीट पर रखा अपना बैग उठा कर सीट के नीचे रख दिया था। नीचे रखते ही उसमें से टन-टन की आवाज आई थी, जैसे धातुएं आपस में टकराईं हों। वह आवाज मेरे कानों में पिघले हुए सीसे-सी उतरती चली गई।

वे दोनों दरवाजा खोल कर केबिन से बाहर चले गए थे। मैं स्तब्ध-सा अपनी सीट पर ही बैठा हुआ था। मेरी खुली आंखों के सामने एक दृश्य तैर रहा था, जिसमें मैं प्रथम श्रेणी के केबिन में आधा सीट पर हूँ और आधा नीचे झूल रहा हूँ। एक छींट वाली चुनरी का टुकड़ा मेरी मुट्ठी में दबा हुआ है, और एक तीर मेरे सीने के आर-पार उतरा हुआ है। पूरे केबिन में मेरा खून बिखरा हुआ है। उस समय मैं चाह रहा था कि ट्रेन जल्दी से जल्दी बिना कहीं रुके उज्जैन से मेघनगर पहुंच जाए।

संपर्क सूत्र : पी.सी. लैब, शॉप नं. 3-4-5-6, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेण्ट, बस स्टैंड के सामने, सीहोर मध्य प्रदेश 466001 मो. 9977855399

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