गुजराती की प्रसिद्ध कथाकार और कवयित्री। हिंदी में भी लेखन। कई कहानी संग्रह। हिंदी कविता संग्रह ‘खामोश बातें’, ‘पंख में बारिश’, ‘ढाई इंच का चांद’, ‘धूप के हस्ताक्षर’ आदि। दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर।

राजा राममोहन राय से
एक सवाल

गीली लकड़ी की तरह
जल रही है वह लड़की

चीख का कोई रंग नहीं होता
काली चमड़ी की चीख भी काली

गोरी चमड़ी की चीख भी काली
जल रही है जो लड़की
वह लड़की नहीं है विवाहित
न उसका कोई अपना मर गया है
चिता पर चढ़ाई भी नहीं गई है उसकी देह
फिर भी वह जल रही है
चीख रही है

बताओ
किस लकड़ी से बनाई है उसकी चिता
तुम्हारे समाज ने?
सतीत्व का कौन-सा नया रिवाज गढ़ा है
तुम्हारे समय ने?
ढोल-नगाड़ों का कौन-सा नया ताल
सीख लिया है उन्मादी समूह ने?
जो उसका प्रतिरोध नहीं पहुंचने देता
तुम्हारे कानों तक
जो उसे केवल विधि बनाता है, स्त्री नहीं
जो उसे देवी तो बनाता है, मनुष्य नहीं!

राजा राममोहन राय, कहां हो तुम?
उस धुएं से तुम्हारी आंखें नहीं जलतीं क्या?
उसकी चीख पुकार
तुम्हारे कानों को विचलित नहीं करती क्या?

इस बार
चिता पर नहीं चढ़ाई गई है उसकी देह
इस बार
देह पर चढ़ाई गई है कई सदियों की आग
यह नए समय का नया सतीत्व है…

देवता की तलाश

उसने
स्त्री को आग में झोंका
स्त्री ने उसमें अग्निदेवता को ढूंढ़ा

उसने
स्त्री के अस्तित्व को फूंका
स्त्री ने उसमें वायुदेवता को ढूंढ़ा

उसने
स्त्री को कभी नहीं समझा
संसार की रीढ़ की हड्डी
अपने खाली बर्तन में पानी की तरह बहाया
स्त्री ने उसमें जलदेवता को ढूंढ़ा

वह
आदिकाल से क्रोधित होकर भेजता रहा लानत
स्त्री ने उसमें एक ऋषि को देखा

देवता की तलाश करते-करते
एक दिन
स्त्री स्वयं देवी बन गई
और
जब स्त्री ने खुद में खुद को ढूंढ़ना चाहा
तो वह इस मृत्युलोक के देवताओं के लिए
राक्षसी बन गई..!

प्रतीक्षा

कोई नहीं है मेरे साथ
मैं भी नहीं हूँ मेरे पास
हर चीज है ठंडी
जिंदगी से घातक दूसरी
और कोई चीज ही नहीं!

मैंने नहीं किया है गृहत्याग
नहीं किया है कर्मत्याग
नहीं त्यागे हैं परिजन
शाश्वत ज्ञान की खोज में
कहीं नहीं चली हूँ नंगे पांव
आंख बंद कर
नहीं बैठी किसी पवित्र वृक्ष नीचे

फिर भी
प्राप्त कर लिया है मैंने बोधिज्ञान
कुछ नहीं है शाश्वत यहां
प्रतीक्षा के सिवा
बैठी हूँ पर चल रही हूँ
अनंत-अनंत युगों से
चलती रहूंगी
अनंत-अनंत युगों तक
किसी प्रतीक्षा की तलाश में
करती रहूंगी प्रतीक्षा…!

क्योंकि

मैं
हाड़-मांस का ढांचा मात्र नहीं हूँ
इस ब्रह्मांड का सूक्ष्म अणु भी नहीं
मेरी आंखों में बहते हैं संसार के समुद्र
उसके खारे पानी में बचाए रखी है मैंने
सभ्यता की न जाने कितनी नदियां…

मेरे हृदय के एक कोने में
चुपचाप पड़ा रहता है आकाश
और इस दुनिया के सारे रास्ते
दौड़ते रहते हैं मेरी नसों में
जो तुम्हें पहुंचाते हैं मनुष्यता के शिखर पर

मैं रोज तुम्हारी थाली में परोसती हूँ
सूरज का एक निवाला
मेरे हिस्से के सूरज के उपले जलाकर

मैंने बनाया है निवाला तुम्हारे लिए
मेरे अंधरों की आंच से
मैंने दिन को जागना
और रात को सोना सिखाया है
और सिखाया है
संसार को संसार होने का अर्थ

मुझे कभी नहीं लगा मैं केवल अणु हूँ
क्योंकि
मैं स्त्री भी हूँ…

उदासी

बहुत उदास थी मैं
उदासी से भी कहीं ज्यादा उदास
सोचा
मेरी सारी उदासी दे आऊं उस पहाड़ को
जो सदियों से खड़ा है निर्जन एकांत में
एक आहट की प्रतीक्षा में

लेकिन
मैंने देखा उस पहाड़ को
जिसने सिर पर रखी थी आकाश की टोकरी
जिसमें थी सदियों की उदासी इकट्ठी
और मैंने अपने मन की
छोटी-सी गठरी की गांठ खोलकर
उसकी थोड़ी उदासी बांधकर
चल पड़ी चुपचाप

मेरी गठरी पहले से अधिक भारी थी
फिर भी
प्रसन्नता से भर गया समूचा अस्तित्व
क्योंकि
मेरे पास एक रास्ता था
और चलने के लिए थे पांव…

पंख होने का दर्द

केवल वे जानते हैं
पंख होने का दर्द
जिनके होते हैं पंख

दरअसल
उड़ान जोखिम का दूसरा नाम है
आकाश के नीचे खड़ा समूह
करता रहता है प्रतीक्षा
कि कब उड़ान भरता वह पंछी
जमीन पर उतरे
और काट दिए जाएं उसके पैर
और एक दिन
वह
पंख होने की कीमत चुकाता है
अपने पैर देकर…

संपर्क :सहायक प्रोफेसर, गुजराती विभाग, वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय, उधना मगदल्ला रोड,  सुरत-395007 गुजरात  मो. 9409565005