युवा कवि।केंद्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली में एक परियोजना से जुड़े।

जब खेलते हैं शब्द हमारे पास
नहीं मालूम क्यों चले आते हैं पास
उनके होने से क्यों कुछ फर्क नहीं पड़ता
मुझे शब्दों के बारे में कुछ नहीं जानना होता
मैं जानना चाहता था केवल वह सब
जिससे लोग गढ़ते थे एक नई आशा
जिसमें होते थे विचार
जिससे बन जाती थी इस दुनिया में
एक सुंदर दुनिया
मैं ढूढ़ता हूँ शब्दों को
जिसमें हो सभ्यता का दर्द
लोगों के आंसू-हर्ष
पर अब शब्दों से खेल नहीं पाता
शायद नहीं बची है अब वह संवेदना
नहीं बचा है शब्दों का मूल्य
जिसे दे सकूं एक रूप
अब खेलने के लिए नहीं पास आते हैं शब्द
ताकि बन सके कोई कविता।

संपर्क : द्वारा केंद्रीय हिंदी संस्थान,बी -26ए क़ुतुब इंस्टिट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली-110016  मो.9039121891