
कवि, समीक्षक और संस्कृति कर्मी। विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर में सहायक प्रोफेसर।

हर युग में साहित्य के जरिए उस युग के सत्य को देखने, समझने और जानने का प्रयास होता रहा है। साहित्य ने हमेशा अपने युग को परिष्कृत करने का महत्वपूर्ण काम किया। एक समय राज दरबार में कवि और विद्वान आते-जाते थे। उनकी राय राजा के लिए महत्वपूर्ण होती थी। राज्य पर आए संकट, कूटनीति और कला-संस्कृति के मुद्दों पर ऐसे कवियों, विद्वानों और लेखकों की राय महत्व रखती थी। कवि और विद्वान सत्ता की चमक में भी अपनी स्वायत्तता और विवेक से ही कुछ कहते और लिखते थे। राजा रचनाकारों और विद्वानों का सम्मान करते थे। नए दौर में राजनेताओं और साहित्यकारों के संबंध में भारी परिवर्तन आया है और कई वजहों से आया है।
कुंभनदास ने कहा था- ‘संतन को कहा सीकरी सो काम’। माना जाता है कि लेखक-कवि का धर्म सही मार्ग पर चलना है और दूसरों को चलने के लिए प्रेरित करना है। उसका काम राजनीति के आगे आत्मविसर्जन है।
स्वाधीनता संग्राम के दौर में कई बार यह भेद कर पाना मुश्किल था कि कौन राजनीति से जुड़ा है और कौन साहित्य से। हर बड़ा राजनीतिज्ञ अध्ययनशील था और उनमें कई लेखक थे। लेखक, क्रांतिकारी, सुधारक, राजनेता सब अलग-अलग होते हुए भी भावात्मक एकता के साथ एक समावेशी सांस्कृतिक बोध रच रहे थे। सभी लोग नए सामाजिक प्रश्नों और चिंताओं के बीच सांस ले रहे थे। स्वाधीनता आंदोलन का कालखंड ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जिनसे पता चलता है कि लेखक, पत्रकार, संपादक और सुधारक सभी मिलकर सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में हैं। उनकी सक्रियता और प्रतिबद्धता को लोगों ने विश्वास और उम्मीद से देखा था। उनके लिखे का असर था।
भारतेंदु ने बलिया के मेले में नाटक का मंचन किया ताकि लोग साहित्य से जुड़ें और पारस्परिकता बढ़े। वे सत्ता से अपनी सीमा में टकराने का नैतिक साहस रखने वाले लेखक थे। इस सक्रियता से आमलोगों का भरोसा बढ़ता था। क्या वैसा महादृश्य अब है?
प्रेमचंद साहित्य और राजनीति के संबंध पर कहते हैं- ‘साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं है, बल्कि राजनीति में आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली सच्चाई है।’ रवींद्रनाथ गांधी की कई बातों से असहमत होने के बावजूद उनका आदर करते थे। ‘असहमति का आदर’ उस दौर का एक बड़ा मूल्य था। आज असहमति को शत्रुता में ‘रिड्यूस’ किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। बांग्ला कथाकार शरतचंद्र ने गांधी के चरखे को महत्व नहीं दिया था। इसके बावजूद वे गांधी की महत्ता की अनदेखी नहीं कर पाए थे।
गांधी के अलावा बाल गंगाधर तिलक, नेहरू, अब्दुल कलाम आजाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सहजानंद सरस्वती, अंबेडकर, नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, सरोजिनी नायडू, राम मनोहर लोहिया आदि राजनीतिक व्यक्तियों ने साहित्यकारों से संवाद रखा था। उस समय की पत्रकारिता को भी साहित्य में शामिल कर लिया जाए। यह तय कर पाना मुश्किल था कि राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम में साहित्य की कितनी भूमिका थी और राजनीति की कितनी भूमिका थी! पत्रकारिता का स्वतंत्र अस्तित्व था, वह राष्ट्रीय आंदोलन का मुकुट थी।
आजादी के बाद साहित्यकारों और राजनेताओं के संपर्क में दरारें पड़ने लगीं। राजनेताओं के आगे साहित्यकारों का महत्व कम होता गया। राजनेताओं के पास बिखरे हुए भारत को समेटने की चुनौती थी। उन्होंने इस चुनौती से टकराने के लिए लेखकों को शामिल करना जरूरी नहीं समझा। वे सत्ता की मलाई काटने लगे, भाई-भतीजावाद का उभार होने लगा। एकमात्र राजनेताओं को ही तारनहार समझा जाने लगा। सत्ताधारी साहित्य को अपना सिरदर्द समझने लगे। साहित्य की नई भूमिका वंचित भारत की आवाज बनने की थी। वह यह आवाज तरह-तरह से बनी, पर लेखकों में विभाजन होता गया और वे कमजोर होते गए।
एक दिन संसद की सीढ़ियां उतरते हुए नेहरू के पैर लड़खड़ा गए थे। नेहरू को थामते हुए दिनकर ने कहा था ‘राजनीति जब-जब लड़खड़ाएगी साहित्य उसे सहारा देगा’। ऐसा संबंध और संवाद आगे चलकर आपातकाल की कोठरी में बदल गया। लेखक चुप कर दिए गए या सत्ता के पृष्ठपोषक बन गए।
आज राजनीतिज्ञों और साहित्यकारों का संबंध ज्यादा तनावपूर्ण और त्रासद स्थिति में पहुंच गया है। ऐसे जाल में काफी लेखक और कलाकार फंसते जा रहे हैं जहां उनकी विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ चुकी है।
राजनेताओं और साहित्यकारों का संवाद किसी भी समाज की प्रगति के लिए जरूरी है। इसके लिए पहली जरूरत है कि राजनेताओं में सुनने की क्षमता हो और लेखकों को बोलने की स्वतंत्रता हो।
पहले कई अवसरों पर संसद में कविताओं, शेरो-शायरी के जरिए नेता अपनी बात रखते थे। वे लेखकों का उद्धरण देकर अपना पक्ष रखते थे। धीरे-धीरे ऐसे साहित्यिक उद्धरणों और प्रसंगों का उल्लेख कम होता गया।
यह भी चिंता का एक विषय है कि लेखकों का समाज से जुड़ाव घटा है। आज के कवि-लेखक-कलाकार छोटे शहरों में जाना पसंद नहीं करते। वे महानगरों में लिट-फेस्ट की शोभा बढ़ा सकते हैं, पर आम लोगों की समस्याओं को जानने और छोटे नगरों के साहित्यिक आयोजनों में जाने के लिए उनके पास समय नहीं है। ऐसे साहित्यकारों ने खुद को एक वर्ग विशेष तक सीमित कर लिया है। यह विशेष वर्ग पुस्तक लोकार्पण, अपने ऊपर चर्चा और संगोष्ठियों तक सिमटकर रह गया है।
दूसरी तरफ, यह भी देखने को मिलता है कि विभिन्न दलों के नेता स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय की मैनेजिंग कमेटियों में सर्वेसर्वा बनकर शिक्षकों को अपने सामने परेड करवाते हैं। हाल में छत्तीगसढ़ के एक विश्वविद्यालय के कुलपति के अभद्र आचरण के प्रति लेखकों ने सामूहिक विक्षोभ व्यक्त किया है। दूसरी तरफ, कुछ लेखक-बुद्धिजीवी इधर निरीह हुए हैं। कइयों का लक्ष्य अपने-अपने प्रांत में सत्ताधारियों को खुश करने तक सीमित है। ऐसी कई चुनौतियां साहित्य के सामने हैं जिनपर चर्चा की आवश्यकता है।यहां ऐसे प्रश्नों पर साहित्यकारों के विचार प्रस्तुत हैं।
सवाल
(1) राजनेताओं और साहित्यकारों के बीच संबंध खासकर स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में और बाद में भी लंबे समय तक संवाद का रहा है। उन युगों के ऐसे संपर्क, सौहार्द और परस्पर आदर भाव के बारे में आप क्या बताना चाहते हैं?
(2) राजनेताओं और साहित्यकारों के बीच संपर्क सामान्यतः क्यों टूट गया? यहां तक कि जो राजनेता जनतांत्रिक विचारों के हैं वे भी न साहित्यकारों को कुछ समझते हैं और न साहित्य पढ़ते हैं! यह परिवर्तन क्यों आया?
(3) आमतौर पर आजकल के राजनेताओं का ज्ञान क्यों सीमित है और उनका साहित्य पढ़ने से क्यों न्यूनतम संबंध है? किसी भी वजह से खुद कम पढ़ने का उनके सोच और व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ा है?
(4) खुद साहित्यकारों की ऐसी कौन-सी कमियां हैं कि वे प्रायः उपेक्षित और अकेले होते जा रहे हैं?
(5) इन दिनों साहित्यकार प्रायः राजनीति में डूबा रहता है, जबकि राजनीति सामान्यतः साहित्य-संस्कृतिविहीन होती जा रही है। इसपर आपकी क्या टिप्पणी है?
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विजय बहादुर सिंह
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राजनेताओं और साहित्यकारों के यथार्थबोध में ही नहीं स्वप्न दर्शन में भी अंतर आता गया
(1) वह समय और था, लोग और थे। उन्हें कैरियर की कीमत पर भी आजादी की उत्कट चाह थी। स्वाधीनता उनके जीवन की केंद्रीय मांग थी, यानी वे सब जिस समान घरातल पर यात्रारत थे, उसके बीच इतनी फांक नहीं थी जितनी आजादी मिलते ही हो गई। तब भी विचारभेद, दृष्टिभेद रहता था। वह गांधी और रवींद्रनाथ के बीच भी था। शरतचंद्र को भी गांधी के चरखे से बहुत उम्मीद नहीं थी। जातियों, वर्णों, स्त्री-पुरुष के बीच कई-कई प्रकार के अंतराल थे। बस एक बात अच्छी थी कि संवाद और शास्त्रार्थ के माध्यम से लोकसत्य तक पहुंचने की चाह सबको थी।
यह उस सामाजिक समय की खासियत है कि लेखक हो या कवि, नाटककार, चित्रकार हो या संगीतकार वे परस्पर एका अनुभव करते थे।
बीसवीं सदी के आठवें दशक में बिहार के आंदोलन में जे.पी. के साथ रेणु तो थे ही, भवानी प्रसाद मिश्र और नागार्जुन भी थे। जे.पी. भी इन सबको खूब जानते थे। कुछेक कवि और लेखक- जैसे अज्ञेय, यशपाल आदि क्रांतिकारियों के साथ थे।
सच यह है कि वह समाज इतना टूटा-बिखरा नहीं था। परस्पर संदेह और अपरिचय में भरा नहीं था। राजनीतिज्ञों और साहित्यकारों के जीवन-मूल्यों और सपनों में इतना आधारभूत अंतर नहीं आया था। दिनकर की महत्वपूर्ण पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की भूमिका पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखी है। पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रसाद सिंह स्वयं भी कवि और चित्रकार थे। उनका हिंदी के अनेक कवियों, लेखकों से संवाद था।
(2) असल बात यह कि आजादी के बाद जो दूसरी पीढ़ी आई वह उस मध्यवर्गीय चरित्र और चेहरे वाली थी जिसे अज्ञेय ने ‘नदी के द्वीप’ कहा था। यह भी कहा था- ‘हम नदी के द्वीप हैं, धारा नहीं हैं।’ समाज विज्ञानियों की दृष्टि से देखें तो आज एक ऐसी बौद्धिक पीढ़ी है जिसकी पहचान केवल एक शब्द से की जा सकती है- भोगवादी पीढ़ी! संघर्ष-विमुख पीढ़ी। समाज विज्ञानी पूरनचंद्र जोशी के शब्दों में कहें तो- ‘एक ऐसे देश में जहां का अधिकांश जन-समूह अभाव, दरिद्रता और गरीबी से ग्रस्त हो, भोग की ओर अनिर्बंध रूप से उन्मुख कोई भी वर्ग नेतृत्व की भूमिका निभाने में असमर्थ रहेगा, क्योंकि नैतिक रूप से जन-साधारण से उसका अलगाव बना रहेगा।’ स्पष्ट है जब समाज की नेतृत्वकारी शक्तियां ऐसी ही होंगी, लेखक आखिर किस आकर्षण से उसके पास जाएगा या किसी स्तर पर उससे जुड़ना चाहेगा! हां, ऐसी नेतृत्वकारी शक्तियों को लेकर उसके संवेदनशील मन में अनेक प्रकार के असंतोष जन्म लेते रहेंगे। याद करें तो आजादी के आस-पास ‘अंधायुग’ (धर्मवीर भारती) जैसी कृति लिखी गई। अनेक व्यंग्य-लेखक सामने आ गए। गोपालसिंह नेपाली की एक मार्मिक और खूब गहरी करुणा में डूबी कविता ‘धर्मयुग’ के साठ-इकसठ के किसी अंक में छपी थी- ‘बदनाम रहे बटमार मगर घर तो रखवालों ने लूटा।’
सेकुलर राष्ट्रीयतावादी लोग अलग-अलग राहों पर चलने लगे। सत्ता और समाज के सपनों में काफी फर्क महसूस किया जाने लगा। गांधी-नेहरू युग के एक बड़े आलोचक आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’(1961) में लिखा- ‘स्वराज्य मिलने के पश्चात देश में सहसा राजनीतिक शक्ति का इतना प्राधान्य हो गया है कि उसने सामाजिक जीवन के अन्य उदीयमान पक्षों को स्वतंत्र रीति से बढ़ने नहीं दिया।’ वे भारी असंतोष के साथ आगे लिखते हैं- ‘सामाजिक जीवन का विविध दिशाओं में जो कुछ कार्य हो, वह राजनीति का ‘स्टैंप’ लगकर ही हो और उसका श्रेय राजनीतिज्ञों को ही मिले- इस सर्वग्रासी वृत्ति ने राष्ट्रीय जीवन को एकांगी बना दिया है।… हमारी नई राजनीतिक सत्ता देश के सर्वतोमुखी जीवन को पूरी आजादी के साथ बढ़ने का अवसर नहीं दे रही है।’
ऐसी स्थिति में फिराक हों या निराला, नागार्जुन हों या कोई अन्य, वे लेखक कौन-सा ऐसा पुल खोजेंगे जहां यह संवाद संभव हो। परिणामतः जो घटित हुआ वह वही अलगाव और अपरिचय था जहां राजनेताओं और साहित्यकार दोनों एक दूसरे को भय और संदेह से देखने लगे। दोनों के यथार्थबोध में ही नहीं, स्वप्न-दर्शन में भी बड़ा अंतर आ गया।
उपन्यासों में मन्नू भंडारी का ‘महाभोज’ और श्रीलाल शुक्ल का ‘राग-दरबारी’, मुक्तिबोध की कविता ‘भूल-गलती’, ‘अंधेरे में’, नागार्जुन की राजनेताओं पर लिखी गई कविताएं आखिर कैसे वह राह बना पाएंगी जो किसी समय गांधी को रवींद्रनाथ तक ले जाती थीं। फिर नेहरू, लोहिया के बाद वैसे सुपठ राजनेता भी कहां रहे? श्रीकांत वर्मा को भी ‘मगध’ जैसी कविताएं लिखनी पड़ीं।
(3) अब जो पौध राजनेताओं की आई है उसे केवल चुनाव लड़कर सत्ता पर काबिज होने की भूख है। और ऐसे व्यक्ति सत्ता में पहुंचकर क्या करेंगे, इसे अधिक समझने और समझाने की जरूरत नहीं है। दुर्भाग्य या सौभाग्य से हमारे देश के लेखकों की प्रजाति में इतनी गिरावट नहीं आई है। वे अपने ईमानदार अनुभवों और उनसे जन्म लेती संवेदनाओं को झुठला नहीं पाते हैं।
(4) मेरी दृष्टि में राजनीतिक क्षेत्र की पहली कमी यह है कि समाज और उसके परतदार जीवन से उसका वैसा परिचय और संबंध नहीं बन पा रहा है जैसा आजादी से पहले के लखकों/कवियों का था। दुर्भाग्य राजनेता अपने उच्च वर्ग और उच्च-मध्यवर्ग के दायरे का आतिक्रमण नहीं कर पा रहा है। उसके अनुभवों का संसार बहुत सीमित और बहुधा एकांगी है। फिर उसे अपनी भाषा और समाज के सामूहिक सांस्कृतिक अवचेतन की ठीक-ठाक खबर नहीं है जो प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद-निराला आदि को थी।
मैं अपने अनुभव से यह भी बता सकता हूँ कि कई बार उभरती हुई प्रतिभाओं को किसी तयशुदा वैचारिक माहौल में घेरकर उन्हें जरूरत से ज्यादा वाहवाही देकर उनके सहज स्वाभाविक और स्वर्जित अभिव्यक्ति-पथ से इधर-उधर कर दिया जाता है। परिणामतः उनका अपना सहज व्यक्तित्व आम फार्मूला व्यक्तित्व में ढल जाता है।
याद करें, महान छायावादियों में से कविवर पंत की प्रतिभा किन-किन भटकावों का शिकार होकर बिखरती और प्रभाहीन होती चली गई। इस तुलना में प्रसाद, निराला स्वयं को बचा ले गए और सिद्धता अर्जित की।
इससे जो मुझे समझ में आया वह यह है कि प्रत्येक कवि या लेखक का अपना स्वतंत्र स्वभाव होता है। मुक्तिबोध विपरीत माहौल के बावजूद अपने इस स्वभाव को बचा ले गए फार्मूला होने से बचा गए। वे कह सके ः जहां भी स्नेह या …. वहां पर एक मेरा पक्ष निसंदेह… निसंदेह…
लेखक या कवि को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके आगे-पीछे एक विशाल समाज है जिसके सपने हैं, जिसके अपने सुख-दुख और संघर्ष हैं। मुख्य बात यह है कि उसे इन चीजों की कोई खबर है या नहीं? लेखक तो वह बाद में है, पहले उसकी अपनी सांस्कृतिक-साहित्यिक नागरिकता है। इसे लेकर वह कितना बाखबर है?
(5) लेखक का राजनीति में रहना मेरी दृष्टि में कोई अपराध नहीं है। नागार्जुन, परसाई, भवानी प्रसाद मिश्र या फिर मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, दिनकर, हमारे बिलकुल निकट के अदम गोंडवी और एकदम आदि में जाएं तो वाल्मीकि और वेदव्यास, ये सब उसी मूलभूत संवेदना से परिचालित हैं जिसे राजनीति कहते हैं।
अपनी बात साफ करने के लिए एक उदाहरण ले रहा हूँ गांधी का। किसी पत्रकार ने उनसे यह जानना चाहा था कि अगर उनका व्यवसाय कोई जानना चाहे तो वे क्या जवाब देंगे। गांधी ने जो जवाब दिया था, उसे सुनते ही पत्रकार चकरा गया था। गांधी ने कहा था- मेरा काम राजनीति करना है। उसके प्रति-प्रश्न पर गांधी ने होठों पर मुस्कान बिखेरते हुए कहा था- ‘अरे भाई। लोक के कल्याण के लिए जो काम किए जाते हैं, उन्हें ही राजनीति कहते हैं!’
गीता के कृष्ण भी अपनी राजनीति का खुलासा करते हुए कह रहे हैं- ‘..तदात्मानं सृजाम्यहम्।’ (अध्याय 3, 7वां श्लोक) लेखक वही है जिसे अपने जमाने की पीड़ाओं, लोकविपत्तियों की खबर हो। तभी वह राम या कृष्ण जैसे नायकों की सर्जना कर सकेगा।
चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में ‘रघुवंश’ वाले कालिदास और क्या कर रहे थे!
फिर रही बात सत्ता-पोषित और सत्ताकामी राजनीति की तो यह एक प्रकार का आत्मघात है। कुछ चुस्त चालाक लोग इसमें माहिर होते हैं। यह उनका अपना चयन है और उनका अपना हाथ है।
29 निराला नगर, दुष्यंत कुमार मार्ग, भोपाल-462003 (मध्य प्रदेश) मो. 9425030392
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नरेश सक्सेना
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अधिकांश नेताओं को पढ़ाई-लिखाई से मतलब नहीं
(1) आजादी के बाद से नैतिक मूल्यों के पतन की एक निरंतरता बनी हुई है। नैतिकता, जिसके मूल में मनुष्य को मनुष्य समझना था। राष्ट्रवाद के नाम पर हिंसा और घृणा के उन्माद के संदर्भ में याद करिए कि गांधी और रवींद्रनाथ दोनों राष्ट्रवाद के विरोधी थे।
सन 1947 में जनता के बीच घोर निरक्षरता के बावजूद, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिकता का स्तर वर्तमान से बहुत ऊंचा था। उन्हें अपने महाकाव्यों- महाभारत, रामायण और उपनिषदों के प्रसंगों से लेकर कबीर, रहीम, रसखान और रैदास के असंख्य पद याद होते थे। ईमान की या गंगा की कसम खाकर लोग झूठ नहीं बोल पाते थे। राजघराने अपने बच्चों यानी भावी शासकों को उनके समय के श्रेष्ठ चिंतकों और शिक्षकों से शिक्षा दिलाते थे।
(2) आजादी के दौरान सारे नेता पढ़े-लिखे थे। जिस बिहार से भारत की प्रशासनिक सेवा में शायद सबसे अधिक बच्चे चुने जाते हों; वहां के युवा राजनेता दसवीं फेल हैं। और सर्वोच्च शिखर पर विराजमान राजनेता सिर्फ झूठ बोलने के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी पढ़ाई का श्रेय लेने वाला न कोई स्कूल है, न कॉलेज है, न सहपाठी। पार्टी के योग्य व्यक्ति की जगह संतति काबिज होने लगी।
(3) ज्ञान की जगह अंधविश्वास फैलाना हो और परंपरा की जगह रूढ़ियों का पालन करना हो और जातिवाद के आधार पर प्रतिनिधि चुना जाना हो; तो अधिकांश नेताओं को पढ़ाई-लिखाई का क्या मतलब? बल्कि इसके उलट ज्ञान को कुंठित करना और अंधविश्वास मिटाने का आंदोलन करने वालों की हत्या करना; जैसे प्रसंगों के संदर्भ में दाभोलकर, पानसरे जैसे व्यक्तियों की हत्या और रोहित वैमुला की याद करिए।
एक साथ हजारों प्राइमरी स्कूलों को बंद कराने के आदेश, रेलवे स्टेशनों पर अखबारों और पत्रिकाओं की बिक्री पर रोक, जेएनयू जैसे संस्थानों को बदहाल करने की साजिश के साथ ही साहित्य अकादमी जैसी संस्थाओं की फंडिंग रोकने की नीति के पीछे की मंशा जगजाहिर है।
(4) मंदिर पर ध्वजा फहराने, छठ मैया का कीर्तन करने और दूसरे धर्मों के प्रति घृणा फैलाने से चुनाव जीतने की गारंटी हो तो फिर दूसरा काम क्यों करना?
पत्रिकाओं की प्रसार संख्या घट रही है। साहित्य के पाठक घट रहे हैं। पाठकों के घटने की चिंता, साहित्यकारों को ही नहीं है। तो क्या किया जाए। दरअसल साहित्यकारों की दुश्मनी, फासिस्टों के बजाय साथी लेखकों से है। ऐसे भयानक संकट के समय, लेखक संगठनों में एक हो जाने की बेचैनी क्यों नहीं है? जबकि निकट भविष्य में ही मुझे उनके अस्तित्व पर संकट मंडराता दिख रहा है।
(5) ऐसे साहित्यकार जरूर सामने आ गए हैं जो राजनीतिक सवालों पर चुप रहकर या सत्ता का सीधा समर्थन करके शिक्षण और साहित्यिक संस्थानों के शीर्ष पदों पर काबिज हो रहे हैं। भले ही साहित्य में उपेक्षित हों।
ऐसे समय में साहित्यकारों की ये अकर्मण्यता रेत में मुंह छिपा लेने जैसी है। परिवर्तन कभी भी कविता, कहानी आदि के पाठ से नहीं आएगा। उसके लिए जनता का मन बदलना होगा, उसके भ्रम तोड़ने होंगे। इसके लिए अलग तरह की लेखन की जरूरत है जिसे लेकर जनता के बीच जाना होगा। ऐसी कोई योजना संगठनों के बीच दिखाई नहीं दे रही है।
सच्ची बात ये है की वे डरे हुए हैं। सच्ची बात यह भी है कि यह डर झूठा नहीं है। डर इतना ज्यादा है कि वे अखिल भारतीय स्तर पर जनता से मदद लेकर कोई साझा मंच बनाने को तैयार नहीं दिखाई दे रहे। इस बुरे समय में भी साहित्य के पाठक इतने कम नहीं हैं कि उनकी अनदेखी की जा सके।
नमूने के लिए देखिए कि गीत चतुर्वेदी के इंस्टाग्राम पर तिहत्तर हजार और फेसबुक पर एक लाख दस हजार फॉलोअर्स हैं। विनय मिश्रा के साहित्य से संबंधित चैनल ’लगभग यूटोपिया’ के फॉलोअर्स की संख्या भी एक लाख से ऊपर है। ’हिंदवी’ और अंकुश के ’हिंदीनामा’ के फॉलोअर्स भी तीन लाख के आस-पास हैं।
और एक छोटा-सा आश्चर्य यह भी कि मेरी अपनी कुछ खास कविताओं के व्यूज मिलियंस में हैं। जैसे कि मछलियों को लगता था वाली कविता के व्यूज इंस्टाग्राम पर एक जगह 4.5 मिलियन, दूसरी जगह 3 मिलियन और तीसरी जगह 2.8 मिलियन हैं। इन्हें यदि जोड़ दें तो संख्या एक करोड़ की बैठती है। इसमें से 90% घटा देने पर भी ये संख्या 10 लाख बैठती है।
ये तो रही किसी ख़ास कविता की बात। विनोद कुमार शुक्ल की सौरभ द्विवेदी द्वारा प्रस्तुत ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के मात्र एक जगह के व्यूज 35 लाख हैं।
ये रचनाएं भले ही साधारण हों, घटिया नहीं हैं।
जनता की इस ताकत की उपेक्षा करना मुझे ठीक नहीं लगता। ऐसे कई मामले हैं जिनसे पाठकों की कमी की सुरंग के पार जैसे तेज रोशनी दिखाई देती है।
हम सब अपने-अपने शहर में कोई कोशिश क्यों नहीं कर सकते?
विवेक खंड, 25-गोमती नगर, लखनऊ-226010 मो.9450390241
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गोपेश्वर सिंह
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स्वाधीनता आंदोलन के दौरान मतभेदों के बावजूद राजनेताओं और साहित्यकारों के बीच संवाद था
(1) स्वाधीनता आंदोलन के दौरान राजनेताओं और साहित्यकारों के बीच गहरे संबंध थे। दोनों का लक्ष्य एक था। साम्राज्यवाद से संघर्ष दोनों के एजेंडे पर था। कवियों को राज्याश्रय देने की प्रथा आधुनिक काल के पहले थी। लेकिन वहां राजा और कवि का संबंध दूसरी तरह का था। स्वाधीनता संग्राम काल में राजनेता और साहित्यकार के बीच जैसा संबंध था, उसकी तुलना दूसरे किसी काल से नहीं हो सकती। रवींद्रनाथ ठाकुर और महात्मा गांधी के बीच अनेक मुद्दों पर गहरे मतभेद थे। इसके बावजूद, दोनों एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। नोवाखाली दंगों के दौरान शांति स्थापना हेतु महात्मा गांधी अपने कुछ साथियों के साथ जब पूर्वी बंगाल घूम रहे थे, तब वे रवींद्रनाथ का गीत गाते हुए लोगों को अभय बना रहे थे – ‘एकला चलो रे’।
रवींद्रनाथ ही नहीं हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं के लेखकों का गांधी और स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं से गहरा जुड़ाव था। वे एक-दूसरे के साथ थे और एक-दूसरे को शक्ति देते थे। हिंदी में ही मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, राहुल सांकृत्यायन, जैनेंद्र कुमार आदि सैकड़ों लेखक गांधी और अन्य नेताओं से जुड़े थे। वे सभी अपने शब्द और कर्म के जरिए समाज और देश को मुक्ति का संदेश दे रहे थे। जो सादगी और ईमानदारी राजनेताओं में थी, वही सादगी और ईमानदारी कवियों और लेखकों में थी। इस कारण जनता का राजनेताओं और साहित्यकारों की बातों पर भरोसा था। साहित्यकारों का सम्मान राजनेता तो करते ही थे, जनता भी करती थी।
जवाहरलाल नेहरू का फिराक गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, हरिवंशराय ‘बच्चन’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, फैज अहमद फैज आदि कवियों से मित्रवत संबंध थे। वह समय ऐसा था जब कवियों और लेखकों की सार्वजनिक उपस्थिति समाज में दिखाई देती थी। स्वतंत्रता आंदोलन के हमारे जितने बड़े नेता थे, वे सभी खूब पढ़े-लिखे और देश-दुनिया देखे हुए थे। वे जानते थे कि राष्ट्र निर्माण में साहित्यकारों-कलाकारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। बिना सांस्कृतिक विकास के किसी भी राष्ट्र का विकास पूर्ण नहीं माना जाता। इसलिए राजनेताओं और साहित्यकारों के बीच सौहार्द भी था और एक-दूसरे से सीखने का संस्कार भी।
(2) आजादी मिलने तक राजनीति मुनाफा कमाने और हैसियत बढाने का माध्यम नहीं थी। आजादी के पूर्व राजनेताओं का जीवन अपूर्व त्याग का अनुपम उदाहरण है। आजादी के बाद राजनीति कुछ पाने और व्यक्तित्व चमकाने की चीज हो गई। नेहरू युग तक राजनेताओं के बीच साहित्यकारों का मान-सम्मान बहुत हद तक बना रहा। साहित्य अकादेमी समेत अनेक संस्थाओं का निर्माण हुआ, राजनीति की नजर से साहित्य ओझल नहीं हुआ। राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के व्यक्तिगत संबंध शिवपूजन सहाय, मैथिलीशरण गुप्त और महादेवी वर्मा समेत अनेक लेखकों से थे। विपक्ष में जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया जैसे नेता थे जिनका प्रभाव साहित्यकारों के बीच खूब था।
जेपी और फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के बीच हुए पत्राचारों को देखने से पता चलता है कि दोनों में कितना आत्मीय संबंध था। 5 जून 1975 को जब जेपी ने पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में ‘संपूर्ण क्रांति’ की घोषणा की, तब उन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी और दिनकर को याद किया। गांधी मैदान में उपस्थित विशाल जनसमूह को देखकर जेपी भावुक हो गए और उनके मुख से बच्चन की एक काव्य पंक्ति अनायास फूट पड़ी- ‘तीर पर कैसे रुकूं मैं आज लहरों में निमंत्रण’! बच्चन की कविता की यह नई व्याख्या थी जो हमने जन आंदोलन के दौरान सुनी। इसी तरह एक पत्रकार वार्ता में जेपी ने भगवतीचरण वर्मा की कविता सुनाई- ‘हम दीवानों की क्या हस्ती…’ 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी के नेतृत्व में जो विशाल रैली हुई, उसका नारा था- ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’! यह दिनकर की काव्य पंक्ति थी।
राममनोहर लोहिया का साहित्यकारों से संबंध जगजाहिर है। उनकी प्रेरणा से ‘कल्पना’ जैसी अपने समय की सबसे प्राणवान पत्रिका निकली। लोहिया जिस शहर में जाते वहां के लेखकों से भी मिलते। इलाहाबाद के कॉफी हाउस में वहां के साहित्यकारों के साथ उनकी बैठकी मशहूर है। गांधी के बाद भारतीय साहित्य को प्रभावित करने वाले राजनेताओं में राममनोहर लोहिया दूसरे राजनेता हैं। विजयदेवनारायण साही का व्याख्यान सुनते हुए एक छोटी-सी सभा में मैंने कर्पूरी ठाकुर को देखा है। कर्पूरी जी बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके थे और उस समय भी नेता प्रतिपक्ष थे। मैंने देखा है कि वे जब भी मुजफ्फरपुर जाते कवि जानकीवल्लभ शास्त्री से जरूर मिलते और उनका हालचाल पूछते। शास्त्री जी के संस्मरणों में कर्पूरी ठाकुर की भी चर्चा है। राजनेताओं और साहित्यकारों के संबंध के ऐसे उदाहरण अब शायद ही मिलें!
इधर के दशक में देखे हुए दो प्रसंग मुझे याद आ रहे हैं। नामवर सिंह की 80 वीं जयंती दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में मनाई जा रही थी। उन्हें शुभकामना देने कैंसर का मरीज होने के बावजूद पूर्व-प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह उपस्थित थे। थोड़ी देर बाद सीपीआई के महासचिव ए. वी. वर्धन भी डी राजा के साथ आए। कोई कुर्सी खाली नहीं थी। वे अन्य लोगों के साथ पालथी मारकर जमीन पर बैठ गए और अंत तक बैठे रहे।
2011-12 की बात होगी। दिनकर जयंती के अवसर पर दिल्ली के मावलंकर हाल में एक आयोजन था। जब मैं दो बजे अपराह्न पहुंचा तो हॉल के बाहर नामवर सिंह, सत्यकाम तथा अन्य कई लोग खड़े थे। मालूम हुआ कि पहला सत्र राजनेताओं का था और अभी वे बोल रहे हैं। नामवर सिंह समेत सभी पहले सत्र की समाप्ति की प्रतीक्षा में खड़े थे। मैं भी उनके साथ गपशप में शामिल हो गया। 15-20 मिनट बाद सत्र समाप्त हुआ और विभिन्न दलों के नेता बाहर निकले। हमने देखा कि भाजपा नेता डॉ. मुरलीमनोहर जोशी कुछ लोगों के साथ बाहर गेट की ओर जा रहे हैं। अचानक उनकी नजर कुछ दूरी पर खड़े नामवर सिंह पर पड़ी। वे मुड़े और नामवर सिंह के पास आए। घुटने तक झुककर प्रणाम किया और नामवर जी का हालचाल पूछा। नामवर जी ने भी उनका हालचाल पूछा। तीन दलों के तीन शीर्ष नेताओं का व्यवहार आज के समय में चकित करता है। दलगत भिन्नता के बावजूद राजनेताओं और साहित्यकारों के बीच ऐसे सद्भाव पूर्ण संबंध अब शायद ही मिलें!
राजनीति अब राष्ट्रसेवा और समाज सेवा का मंच न होकर निजी लाभ-हानि का जरिया है। वह जनसेवा का आधार न होकर राजनेताओं के लिए धंधा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जो राजनेता थे वे खूब पढ़े-लिखे लोग थे। उन्होंने राष्ट्र निर्माण और समाज निर्माण के लिए जैसा संघर्ष किया और त्याग का जैसा अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया वह अब दुर्लभ है। उन नेताओं को पता था कि भारत का निर्माण सांस्कृतिक विकास के बिना संभव नहीं है। इसलिए वे लेखकों-कलाकारों के संपर्क में रहते थे।
कलाकारों ने राजनेताओं से किस तरह कुछ सीखा और उनका समर्थन किया, इसके भी उदाहरण हैं। 1930 में दांडी मार्च को समर्थन देने के लिए प्रसिद्ध चित्रकार नंदलाल बोस ने बड़ी संख्या में चित्र बनाए और कांग्रेस दफ्तरों में भेजे।
अब राजनीति में प्रायः अपढ़ और धंधेबाज नेताओं का आधिक्य है। जातिवाद, सांप्रदायिकता और हर तरह का अनैतिक काम करके चुनावी सफलता प्राप्त करना राजनेताओं का पहला उद्देश्य है। ऐसे राजनेता साहित्य, संस्कृति और कला का महत्व नहीं जानते। अब राजनेता और साहित्यकार-कलाकारों के बीच कोई संवाद नहीं है। राजनेताओं को लगता है कि साहित्य और कला जगत के लोग चुनाव जीतने में हमारी कोई मदद नहीं कर सकते। इसलिए उनके जीवन में साहित्य और कला के लिए कोई जगह नहीं है।
राजनीति संस्कृतिविहीन हो चुकी है, इसलिए उसे अच्छे और बुरे का फर्क भी नहीं मालूम। आज के ज्यादातर राजनेताओं के लिए कुमार विश्वास जैसे कवि ही वास्तविक कवि हैं। अटल बिहारी वाजपेयी 1977-78 में विदेश मंत्री के तौर पर पाकिस्तान गए थे तो प्रोटोकॉल तोड़कर बीमार फैज अहमद फैज से मिलने गए। इसी तरह 1981 में फैज जब दिल्ली आए तो वाजपेयी से भी मिले। फैज पाकिस्तानी थे, कम्युनिस्ट थे और मुसलमान थे, इसके बावजूद वाजपेयी ने उनके साथ जो व्यवहार किया वह राजनीति और साहित्य के बीच संबंध का एक दुर्लभ उदाहरण है। आज वाजपेयी की राजनीतिक लाइन के किसी नेता से इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती।
राजनेताओं और साहित्यकारों के बीच जब तक सौहार्द और संवाद था, तब तक राजनीति नैतिक थी और राजनेताओं के जीवन में शुचिता थी। जब से राजनेताओं की साहित्य-संस्कृति से दूरी बढ़ी है, तब से राजनीतिक दुनिया अनैतिक होती गई है। राजनेताओं के क्रियाकलापों और बयानों में संवेदनहीनता, नफरत और झूठ का बोलबाला बढ़ा है। इसका मुख्य कारण साहित्य और संस्कृति से उनकी दूरी है।
(3) चुनावी सफलता के लिए जातिवाद और संप्रदायवाद आज सबसे बड़ा आधार बन गया है। चुनाव में काले धन का उपयोग जिस तरह बढ़ा है और चुनाव लड़ना जिस तरह महंगा हुआ है उसे देखते हुए कोई भला आदमी चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता। अपराधियों के चुनावी राजनीति में उतरने से पढ़े-लिखे लोगों के लिए वहां कोई जगह नहीं है। फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ जैसे कई लेखक चुनाव लड़ चुके हैं और हार चुके हैं।
एक समय था जब मैथिलीशरण गुप्त, बनारसी दास चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, हरिवंशराय ‘बच्चन’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, पृथ्वीराज कपूर, नरगिस दत्त, दिलीप कुमार आदि लेखकों-कलाकारों को सरकार ने संसद में भेजा था। यह साहित्य और कला का राजनीति में सम्मान था। वे पढ़े-लिखे राजनेताओं का दौर था। वे समाज निर्माण में साहित्य और कला का महत्त्व समझते थे। अब पढाई-लिखाई और समाज सेवा के आधार पर कोई चुनाव नहीं जीत सकता। आज देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि राजनीतिज्ञों और सच्चे बुद्धिजीवियों के बीच कोई संवाद नहीं है।
(4) साहित्यकार की आज कोई सामाजिक हैसियत नहीं है। वह अपने मुहल्ले में ही अजनबी है। उसकी पहचान, उसके पद और उसकी आर्थिक हैसियत से तय होती है। साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान को लेकर वह खुद सजग नहीं है। नए संचार माध्यमों का उपयोग करके अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने की जहमत बहुत कम लेखक उठाते हैं। लोकप्रियता को हिंदी में पाप माना जाता है। अपनी और अपनी पीढ़ी के कवियों के आत्मसंघर्ष की चर्चा करते हुए दिनकर ने लिखा है- ‘हम रिल्के के सपने को तुलसीदास की सफाई से लिखना चाहते हैं।’ इस कोशिश का ही नतीजा था कि छायावाद के बाद के कवियों- बच्चन, दिनकर आदि को व्यापक लोकप्रियता मिली। इसी के साथ यह भी कहना जरूरी है कि उपभोक्तावादी समय में सारा दोष साहित्यकारों का ही नहीं है। जनता की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। साहित्य उसकी प्राथमिक जरूरत में नहीं है। उसके लिए साहित्य का अधिक से अधिक मतलब मनोरंजन है।
(5) राजनीति संस्कृतिविहीन होती जा रही है इसकी चर्चा ऊपर हुई है। जो साहित्यकार राजनीति में डूबा रहता है उसका मुख्य कारण दलीय राजनीति से होने वाले नफा-नुकसान के गणित को साधना है। राजनेताओं के संपर्क में रहकर पद-प्रतिष्ठा प्राप्त करने का काम पहले भी लोग करते थे, लेकिन आज यह प्रवृत्ति अधिक बढ़ गयी है। लोग आत्मसम्मान खोकर राजनेताओं को साधते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि आत्मसम्मान खोकर और जो कुछ प्राप्त कर लिया जाय, श्रेष्ठ रचना नहीं हो सकती।
ए- 408, अरुणिमा पैलेस, सेक्टर-4, वसुंधरा, गाजियाबाद-201012 (यूपी) मो. 8826723389
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कर्मेंदु शिशिर
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इतिहास में रचनाकार अंततः राजनीतिज्ञों से अधिक याद रखा जाता है
(1) भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की परिस्थितियां भिन्न थीं। हम प्रत्यक्ष साम्राज्यवादी शासन में थे। उनके साथ हमारा संघर्ष था और हम अंदरूनी स्तर पर भी अनेक मोर्चों पर लड़ रहे थे। हर समाज और युग में जब संघर्ष होता है तो हर क्षेत्र में नायकत्व और बड़े व्यक्तित्व उभरते हैं। सबकी भूमिकाएं अलग होती हैं, लेकिन एक ही केंद्रीय लक्ष्य होता है। संघर्ष की मांग के कारण इसमें सबको एक-दूसरे से जुड़ना होता है।
ऐसे में आजादी के लिए विचार भी काफी हद तक केंद्रीय होता है। सबको एक-दूसरे से बल मिलता है। आप देखिएगा, उस दौर में लेखक-पत्रकार में कोई भेद न था। सब लेखक पत्रकार भी थे और आजादी आंदोलन के कार्यकर्त्ता भी थे। सबका व्यक्तित्व संघर्ष की आंच में तपा हुआ था। सब एक-दूसरे की भूमिका के महत्व को समझते थे और इसकी जरूरत महसूस करते थे। इसलिए उनके बीच एक मैत्री, सार्थक संवाद और परस्पर सम्मान का भाव था।
लेकिन तब भी राजनेताओं और साहित्यकारों में एक फर्क था। नेहरू और गांधी से निराला जी के विवाद प्रसंग को देखिए। जिस गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर की आपने बात की है, सव्यसाची भट्टाचार्य वाली किताब देखिए। दोनों के बीच बहस जब समाचारपत्र में छप रही थी तो लोग गांधी के कमजोर पक्ष के बावजूद उनकी ओर से रवींद्रनाथ टैगोर की आलोचना कर रहे थे।
राजनेता के पीछे एक प्रत्यक्ष जनसमूह होता है। रचनाकार अकेला होता है। उसके पाठक होते हैं, पर वे बिखरे हुए होते हैं। राजनेताओं की तरह संगठित नहीं होते। दोनों की प्रकृति और भूमिका अलग है। राजनेता के पास सत्ता के बिना भी सत्ता होती है। सत्ता उसे अहंकार और वर्चस्व कायम करने वाला बना देती है और उसके स्वभाव में सामंतीपन पैदा कर देती है। लेखक सबका सामना अपने लेखन और स्वाभिमान से करता है और इतिहास में रचनाकार ऊंचा हो जाता है और आधिक याद रखा जाता है। आज गांधी से रवींद्रनाथ टैगोर ज्यादा ऊंचे हैं, उनका निषेध असंभव है, जबकि गांधी के साथ ऐसा नहीं है। तोल्स्तोय और गोर्की की जगह लेनिन से ऊंची हो गई। विरले राजनेताओं को यह समझ होती है कि साहित्य के बिना समाज का शीराजा बेनूर लगेगा, उसमें संवेदन का अभाव होगा। वह समाज अंदर से रुग्ण होगा। इसका अहसास उस दौर में था।
(2) समय के साथ राजनीति और समाज में बहुत गिरावट आई। राजनीति का विचार और जन से सरोकार घटता गया। पूंजी धीरे-धीरे ताकतवर बनती गई। राष्ट्रीय पूंजी जब तक स्वाधीनता से जुड़ी रही, तब तक ठीक चला। फिर दलाल, देशी पूंजी और विदेशी पूंजी का प्रवेश हुआ। बाद में पूंजी ने विश्व को एक गांव में बदल दिया। पूंजी का राष्ट्रीय सरोकार और पूंजी पर देश का दबाव एकदम खत्म हो गया।
इस आलोक में आप आए बदलाव को देखिए। पूंजी को ऐसे विचार चाहिए जो उत्पादन, उपभोग और वितरण को बढ़ाए। उसने कॉमर्स के साथ प्रबंधन को लाया। विज्ञान में शोध की दिशा बदल दी। उसे ऐसा विज्ञान चाहिए जो नई-नई उपभोक्ता चीजों का निर्माण करे। दुनिया के सर्वोत्तम दिमाग को उसने ऊंची कीमत पर अपने अधीन कर लिया। वे वही करते हैं जो चाहते हैं और उनके हित में हो। मसलन ज्ञान उसके अधीन आ गया। अन्वेषण की दिशा बदल गई। अब उसे विशाल जनता पर प्रत्यक्ष शासक चाहिए। आप सोचिए, वह आजाद ख्याल राजनेता और आजाद ख्याल लेखक को क्यों रखेगा? उसे इनकी जरूरत ही नहीं है। इसलिए उसने आज्ञाकारी, चापलूस, अनैतिक, अय्याश और बिके लोगों को बड़ी संख्या में राजनीतिक प्रवेश करा दिया। क्या अब पढ़ा-लिखा, स्वतंत्र सोच वाला, जनहित में सोचने वाला कोई आदमी राजनीति में उतर सकता है? पार पा सकता है? वह किसी नेता को प्रतीक की तरह खड़ा कर देता है। उसको क्या बोलना है, उसे लिखकर थमा दिया जाता है। जनता के लिए उसने धर्म और जाति का विपुल जंजाल खड़ा कर दिया है। इनमें उलझे रहिए। उनके लिए राजनीतिक वर्चस्व, सत्ता, सामंती अहंकार, धन-लूट और लूटे धन की सुरक्षा करने वाले लोग चाहिए कि लेखक?
लेखक क्या करेंगे? बहुत हुआ तो घोषणापत्र, पर्चा-पंपलेट और भाषण लिखें। ऐसे ही लेखकों से वे जुड़े हैं। ऐसे ही लेखक भी उनसे जुड़े हैं। इनके लिए राजनीति एक व्यापार है। सुप्रीमो राजनीति एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है। इसलिए उनकी संतान को ही या परिवार को ही बागडोर मिलती है।
अब आप वामपंथियों की बात करते हैं। वामपंथी नेता अपने सरवाइवल को तरस रहे हैं। वे सुप्रीमो राजनीति की शरण-स्थली तलाश करें कि लेखकों से संपर्क करें? अगर परिदृश्य में वामपंथ का नाम चल रहा है और अंधेरे में दीप टिमटिमा रहा है तो यह वामपंथी बुद्धिजीवियों के चलते। आप पुराने रोमान को भूल जाइए।
लेकिन वामपंथ कभी निराश नहीं होता। ऐसा वक्त आएगा, जब बाहरी और भीतरी हलचल तेज होगी। जनता उठ खड़ी होगी और परिवर्तन की आंधी आएगी। विश्व को अपनी गिरफ्त में लेकर क्या विश्व पूंजी निश्चिंत है? अंदर भीषण अंतर्विरोध है। वह धीरे-धीरे तेज होगा। 1857 की राजक्रांति 1947 में सुफल देती है। समाज और देश के बदलाव का अपना समय होता है। ऐसे राजनीतिक लोग जो संघर्ष में हैं, वे आज भी अपने अनुकूल लेखन और लेखक से जुड़े हुए हैं। समाज का एक छोटा ही सही, लेकिन हमारे-आपके जैसा एक वर्ग तो है जो तमाम प्रतिकूलता के बावजूद डटा है। वही असल ताकत है। उसे जीवित, जीवंत रहना चाहिए।
(3) आप पॉवर पालिटिक्स में शामिल नेताओं को ही राजनीतिज्ञ क्यों मानते हैं? आप विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष कर रहे, जनता को संगठित कर रहे, लड़ाई लड़ रहे और अपनी जान दे रहे सक्रिय राजनीतिक लोगों को देखिए। उनसे मिलिए। उनकी सोच, चिंतन और उनके विचार से परिचित होइए। कोई भी समाज पूरी तरह पराजित और हताश नहीं होता। चिंगारी अंदर सुलगती रहती है। वह अंदर से कसमसाता रहता है। समय से फूट पड़ेगा। 1857 एक ऐसा ही विस्फोट था।
(4) इसमें लेखकों की ओर से कोई कमी नहीं है। कोई ऐसा सांस्कृतिक और साहित्यिक संगठन ही सक्रिय नहीं है जहां लेखक जनहित में भाग ले सके। हम सबके जीवन में एक लंबा समय ऐसा रहा है जब हम व्यवस्था के विरुद्ध खूब सक्रिय रहे। लेखक संगठन बहुत सचेत और जागरूक थे। इसमें हम दूर-दूर तक खुद के पैसे से जाते थे और बहुत सक्रिय रहते थे। देखते-देखते समय बदल गया। हमारे सांस्कृतिक नेता दिवंगत हो गए अथवा उम्र के कारण शिथिल हो गए। हम सब भी थक गए। संगठनों में अब वह बात न रही। फिर भी हमारी पीढ़ी के लोगों में आज भी बेचैनी है और हम सब जितना हो सकते है सक्रिय रहते हैं।
हम न निराश हैं, न निष्क्रिय! दरअसल असल समस्या नए लोगों के कारण है। ज्यादातर नए लोग अवसरवाद के शिकार होते गए। वे सामाजिक जागरूकता और सक्रियता से परहेज करने लगे। कई नए लेखक तुनकमिजाज और असहिष्णु भी हैं। उनमें आत्ममुग्धता आ गई है और असमय ही वे अहंकार पालने लगते हैं। जो पढ़ने-लिखने वाले हैं वे और ज्यादा ऐंठ प्रदर्शित करते हैं। उनमें सीखने की और खुद को समृद्ध करने की कोई तड़प दिखती ही नहीं। जिनमें क्षमता है उनमें बहुत कम लोग ऐसे हैं जिनकी लंबी सांस है या नहीं, कहना मुश्किल है।
(5) आपने वही सवाल पूछा है जो मेरे भीतर भी है और मुझे बहुत हैरानी होती है। आप गौर कीजिए सत्ताओं के पास एक विकासवादी नैरेटिव है, नेतृत्व है और संगठन भी। आप सोचकर देखिए क्या प्रतिपक्ष के पास समानांतर नैरेटिव है? नेतृत्व के नाम पर उधार के दिमाग पर चलने वाले ऐसे नेता हैं, जिन्हें आप बिगड़ैल अमीरजादा कह सकते हैं। उनके पास न देश की समझ है और न राजनीति की। जिस दिशा की हवा भरकर चाबी घुमा दीजिए, वे उसी दिशा में घिरनी तक नाचते हैं।
अब साहित्यिक लोगों पर आइए। किसी के पास इसका रत्ती भर ज्ञान नहीं है कि जनता क्या और कुछ भी क्यों सोचती है। वे अपनी आकांक्षा और इच्छा के अनुरूप राजनीतिक टिप्पणी किए जाते हैं।
जो साहित्यिक या बुद्धिजीवी किसी राजनीतिक सत्ता से नाभि-नाल रिश्ता रखते हैं उनके विरोध का पैटर्न उनकी पार्टी के अनुरूप है। कुछ ऐसे हैं जो हाथ भी उठा रहे हैं और कांख भी न दिखे की मुद्रा में हैं। मोटा-मोटी यही परिदृश्य है। मौजूदा सत्ताएं देश की दिशा को, भविष्य को, इसकी शिक्षा और संस्कृति को, सामाजिक स्वभाव, परंपरा और आपसी ताने-बाने को किस तरह छिन्न-भिन्न कर रही हैं, वे इसको गहराई से समझ ही नहीं रहे हैं। तनिक भी लीक से हटकर बात शुरू कीजिए तो आप पर एक टैग लग जाता है- आप ये हैं, आप वो हैं। मगर एक समय बाद वैचारिक गतिशीलता आएगी। जड़ता खत्म होगी। यथार्थ सामने आएगा। कुछ प्रबुद्ध लोगों के लेखन में यह प्रबोधन है भी। बस उसी रोशनी में आगे की बौद्धिक राह मिलेगी। बिना नैतिक दृढ़ता के बौद्धिक विचारों का कोई मतलब नहीं है।
बी-301 किंग्सउड कोर्ट अपार्टमेंट, गैलेरिया मार्केट के पीछे, क्रॉसिंग रिपब्लिक, गाजियाबाद-201016 मो. 9431221073
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गरिमा श्रीवास्तव
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राजनीतिज्ञों द्वारा नजरअंदाज किए जाने के कई कारण लेखकों के भीतर भी हैं
(1) राजनेताओं और साहित्यकारों के बीच बढ़ती दूरी आज केवल भारत की नहीं बल्कि एक वैश्विक परिघटना है। इसे तथाकथित आधुनिक समाज में मनुष्य और मनुष्य के बीच बढ़ती जा रही दूरी से काटकर नहीं देखा जा सकता। बीसवीं सदी के अधिकांश समय तक लेखक राजनीतिक आंदोलनों के केंद्र में होते थे, लेकिन इक्कीसवीं सदी में दोनों एक-दूसरे से तेजी से दूर होते जा रहे हैं।
भारत में यह बदलाव बहुत साफ दिखता है। स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में प्रेमचंद, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, सरोजिनी नायडू जैसे लेखक राजनीतिक सरोकारों में डूबे हुए थे। गांधी, नेहरू, सुभाष, राजगोपालाचारी, बी.आर.आंबेडकर, लोहिया, नरेंद्रदेव, जयप्रकाश नारायण, जे.बी.कृपलानी, नंबूदरीपाद, श्रीपाद अमृत डांगे आदि खुद बहुत बड़े साहित्य प्रेमी थे और लेखकों से नियमित संवाद रखते थे।
यही स्थिति दुनिया के अन्य देशों में भी थी। फ्रांस में कभी सार्त्र ने छात्र आंदोलन की अगुआई की थी और आंद्रे मालरो संस्कृति मंत्री बने थे। आज मिशेल उएलबेक या एदुआर लुई जैसे बड़े लेखक हैं, पर मैक्रों या मारी ले पेन के भाषणों में उनका कोई जिक्र नहीं होता। रूस में सोवियत काल में मायाकोव्स्की, गोर्की, पुश्किन और पास्तरनाक सत्ता के साथ जीवंत रिश्ते में थे; पुतिन के रूस में बड़े लेखक या तो देश छोड़ चुके हैं या चुप हैं। चीन में लूशुन का माओत्से तुंग से सीधा संवाद था। यह भी सच है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की दमनकारी नीतियों के कारण नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक मो यान को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
भारत में भी नेहरू के शासन काल में मजरूह सुल्तानपुरी का लगभग दो साल तक कैद में रहना लोकतंत्र के दामन पर दाग ही कहा जाएगा। 1949 में मुंबई (तब बंबई) में मिल मजदूरों की हड़ताल के दौरान एक सभा में मजरूह ने एक कविता सुनाई। वे प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट के सदस्य थे और कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े हुए थे। कविता में उन्होंने नेहरू सरकार की विदेश नीति (विशेष रूप से भारत को कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस में शामिल करने के निर्णय) की कटु आलोचना की। इसमें नेहरू को हिटलर का चेला और कॉमनवेल्थ का दास कहा गया, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की गुलामी को दर्शाता था।
‘मन में जहर डॉलर के बसा के, फिरती है भारत की अहिंसा।’ कविता सुनाने के बाद पुलिस ने उन्हें मंच से उतरते ही गिरफ्तार कर लिया।
ऐसी एकाध गलतियों के बावजूद नेहरू-युग में लेखकों की इज्जत थी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा पर कोई खास प्रतिबंध नहीं था।
अमेरिका में साठ-सत्तर के दशक में नॉर्मन मेलर चुनाव लड़ते थे, एलन गिन्सबर्ग सीआईए के खिलाफ कविताएं पढ़ते थे। आज ट्रंप अभिजात लेखकों के लिए अपशब्द का प्रयोग करते हैं। लातिन अमेरिका में गाब्रिएल गार्सिया मार्केज फिदेल कास्त्रो के दोस्त थे, पॉब्लो नेरुदा सांसद और राजदूत थे। लेकिन आज बोल्सोनारो या मिलेई जैसे नेताओं की दुनिया में साहित्यकार कहीं नहीं दिखते।
इस दूरी के पीछे कुछ साझा वैश्विक कारण हैं। मीडिया पूरी तरह बदल गया है – अखबार और रेडियो की जगह ट्विटर, टीवी और रील्स ने ले ली है, जहां 280 अक्षरों से ज्यादा गहराई की जरूरत ही नहीं पड़ती। साहित्य अब जन-माध्यम नहीं रहा; उसकी जगह ओटीटी और इंस्टाग्राम ने ले ली है। आज के ज्यादातर नेता प्रोफेशनल राजनेता हैं जिन्होंने जीवन में शायद ही कोई उपन्यास पढ़ा हो। सबसे बड़ा कारण ध्रुवीकरण है – दुनिया भर में साहित्यकार ज्यादातर उदारवादी या वामपंथी झुकाव वाले हैं, जबकि सत्ता पर दक्षिणपंथी या लोक-लुभावन नेताओं का बोलबाला बढ़ रहा है। दोनों की भाषा ही अलग हो गई है।
भारत में यह दूरी इसलिए ज्यादा चुभती है क्योंकि हमारी सांस्कृतिक स्मृति में अभी भी नेहरू-प्रेमचंद, गांधी-टैगोर वाला दौर जिंदा है। पश्चिम में वह दौर साठ-सत्तर साल पुराना हो चुका है, इसलिए वहां यह अलगाव स्वाभाविक लगने लगा है। मगर सच्चाई यही है कि आधुनिक लोकतंत्र में सत्ता और साहित्य एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं- और यह प्रक्रिया हर हालत में रुकनी चाहिए।
प्रेमचंद ने लिखा है कि साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि राजनीति के आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली सच्चाई है। इसलिए राजनेताओं को अपने से ऊपर उठकर सामाजिक यथार्थ को जानने-समझने के लिए साहित्य और इसके रचयिताओं से लगातार संवाद बनाए रखना चाहिए।
भारत में राजा या राजनेता एवं साहित्यकार सदियों से एक-दूसरे के सहचर और पूरक रहे हैं। प्राचीन काल में राजा समझते थे कि सत्ता को दीर्घजीवी और समाज को सुसंस्कृत बनाने के लिए कवियों-दार्शनिकों का संरक्षण अनिवार्य है। चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को गढ़ा, हरिसेन ने समुद्रगुप्त को कविराज कहा, बाणभट्ट ने हर्षवर्धन के जीवन को अमर किया और कालिदास को विक्रमादित्य ने वह स्थान दिया जो आज भी आदर्श माना जाता है।
अकबर के दरबार में रहीम, फैजी और अबुल फजल जैसे कवि-लेखक थे, वहीं विजयनगर के कृष्णदेवराय स्वयं विद्वान थे और अपने ‘अष्टदिग्गज’ कवियों को सर्वोच्च सम्मान देते थे।
दरभंगा नरेश के राजकवि विद्यापति की ‘कीर्तिलता’ (1404-05 ई. के आसपास रचित) उनकी सबसे प्रारंभिक ज्ञात रचना है। इसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से अपने काव्य-रचना के एकमात्र उद्देश्य को राजा शिवसिंह की कीर्ति का विस्तार बताया है। यही बात विद्यापति ने बाद की रचना ‘कीर्तिपताका’ में दोहराई है, पर ‘कीर्तिलता’ में यह घोषणा सबसे प्रत्यक्ष और बार-बार की गई है।
यह परंपरा केवल यशोगान और संरक्षण तक सीमित नहीं थी, यह एक गहरा बौद्धिक संवाद था जिसमें राजा भी एक हद तक लिखते-पढ़ते थे और कवि राज्य-नीति को दिशा देते थे।
स्वाधीनता आंदोलन के दौरान यह संवाद अपने सबसे जीवंत और सघन रूप में सामने आया था। महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर का रिश्ता इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। शांतिनिकेतन में उनकी पहली मुलाकात से लेकर अंतिम दिनों तक दोनों ने एक-दूसरे को महात्मा और गुरुदेव कहा तथा कुछ मुद्दे पर मतभेद के बावजूद कभी परस्पर सम्मान में कमी नहीं आने दी। उदाहरण के लिए चरखा और शिक्षा के मुद्दे पर गहरी असहमति के बावजूद रवींद्रनाथ ने अपने पत्रों में एक-दूसरे को बौद्धिक चुनौती दी और समृद्ध किया।
प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से धर्मनिरपेक्षता, समता और सामाजिक न्याय को जन-जन तक पहुंचाया और अनेक राजनेताओं ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से सम्मान दिया।
जवाहरलाल नेहरू स्वयं उच्च कोटि के साहित्यकार थे। उन्होंने लिखा है कि राजनीति बिना साहित्य और कला के रीढ़हीन हो जाती है, और साहित्य बिना राजनीतिक चेतना के अंधा हो जाता है। उन्होंने टैगोर, सरोजिनी नायडू, मैथिलीशरण गुप्त, निराला, राहुल जी, दिनकर, महादेवी और बच्चन को थोड़ा-बहुत न केवल पढ़ा था, बल्कि राज्य की सर्वोच्च संस्थाओं में उन्हें स्थान भी दिया था। दिनकर के महाग्रंथ ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की भूमिका नेहरू जी ने ही लिखी। इंदिरा जी, राजीव गांधी एवं अटलबिहारी वाजपेयी के शुरुआती दौर तक यह परंपरा जीवित रही। मैथिलीशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा नवीन, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, बच्चन, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, श्रीकांत वर्मा जैसे साहित्यकारों में से कुछ साहित्य अकादमी और कुछ पद्म पुरस्कारों से सम्मानित हुए और कुछ राज्यसभा सदस्य के रूप में नामित किए गए। गांधी और नेहरू ने स्वयं कई साहित्य सम्मेलनों में शिरकत की और अनेक साहित्यकारों ने देश की नीतियों-आंदोलनों को दिशा दी। यह वह दौर था जब साहित्य और सत्ता के बीच न तो डर था, न दूरी थी।
दुर्भाग्यवश धीरे-धीरे यह निकटता कम होती चली गई और आज महुआ माजी को छोड़कर शायद ही कोई रचनाकार संसद के किसी सदन का सदस्य है। राजनीतिज्ञों और साहित्यकारों के बीच निकटता में कमी की एक बड़ी वजह राजनेताओं में अपनी आलोचना को लेकर सहिष्णुता का अभाव है। कहा जाता है कि छठी सदी में राजा पर व्यंग्य करने के कारण भर्तृहरि की हत्या करवा दी गई थी।
नीतिशतक-शृंगारशतक-वैराग्यशतक के रचयिता भर्तृहरि के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने सौतेले भाई राजा विक्रमादित्य (या कुछ कथाओं में कोई अन्य राजा) पर एक अत्यंत कटु व्यंग्य-छंद रचा था, जिससे राजा इतना क्रुद्ध हुआ कि उसने भर्तृहरि को मृत्युदंड दे दिया (या उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया)।
यः कोपि कोपि कुलजो नृपः प्रीणयित्वा
राज्येन तेन सह राज्यं प्रशासति स्म।
तस्यापि तस्य च वधः कृतः स भ्राता
किं दुष्करं खलु नरेंद्रकृते नरेण॥
(कोई-न-कोई कुलीन राजा किसी को प्रसन्न करके उसके साथ राज्य करता रहा। फिर उसी ने उसी भाई का वध कर दिया। राज्य के लिए मनुष्य क्या नहीं कर सकता! (अर्थात् कुछ भी कर सकता है)।
इस छंद में सीधे-सीधे विक्रमादित्य पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपने सगे भाई को पहले राज्य देकर प्रसन्न किया, फिर छल से उनका राज्य छीना और अंत में उनकी हत्या कर दी (या करवा दी)। यह उस समय के लिए इतना तीखा और अपमानजनक व्यंग्य था कि राजसिंहासन पर बैठा व्यक्ति इसे बर्दाश्त न कर सका और कहा जाता है इसी छंद के कारण विक्रमादित्य ने भर्तृहरि को जहर देकर या तलवार से मरवा दिया।
किंवदंती यह भी चलती है कि भर्तृहरि को यह छंद लिखते ही पता चल गया कि अब उनकी मृत्यु निश्चित है, इसलिए उन्होंने स्वयं वैराग्यशतक की रचना पूरी की और विष पीकर देह त्याग दिया।
इसी प्रकार ‘मृच्छकटिकम्’ में शूद्रक का आर्या छंद में रचित वह श्लोक बहुत मशहूर है जिसमें कलात्मकता के साथ स्वनाम का उपयोग करते हुए नाटककार ने राजा पालक के चरित्र को बेनक़ाब करते हुए लिखा है कि जो न गुणों को पहचानता है और न खुद में कोई गुण है, राज्य का भार ढोने वाला ऐसा राजा ‘शूद्रक’ कहलाता है : अनभिज्ञो गुणानां यो हीनश्चापि गुणैः परम्। राज्यभारहरः सोऽयं राजा शूद्रक इति स्मृतः॥
(2) राजनेताओं और साहित्यकारों के बीच संपर्क के लगभग टूट जाने के परस्पर जुड़े कई कारण हैं। यह घटना कुछ दशकों में तेजी से बढ़ी है। एक बड़ा कारण अपनी आलोचना को लेकर राजनेताओं में बढ़ती असहिष्णुता है, पर मामला केवल व्यक्तिगत स्वभाव से संबद्ध नहीं है, बल्कि यह संरचनात्मक और सांस्कृतिक बदलाव का दुष्परिणाम हैं :
(i) राजनीति का ‘तकनीकी-प्रबंधन’ बन जाना इसका एक बड़ा कारण है। भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद से राजनीति धीरे-धीरे ‘गवर्नेंस’, ‘पॉलिसी मेकिंग’, ‘डाटा-ड्रिवन डिसीजन’ और ‘मीडिया मैनेजमेंट’ का खेल बनती चली गई है। हाल के वर्षों में कृत्रिम मेधा (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का अभूतपूर्व विकास करेले पर नीम की तरह है। अब नेता को ‘विजनरी विचारक’ या ‘संस्कृति-प्रेमी’ होने की जरूरत नहीं रह गई है; उसे ‘डिलिवरी’ ज्यादा दिखानी होती है। साहित्य, कविता, दर्शन- ये सब ‘सॉफ्ट’ और ‘अनुत्पादक’ क्षेत्र समझे जाने लगते हैं।
(ii) शिक्षा पद्धति का पूरी तरह विज्ञान-व्यवसाय-प्रौद्योगिकी की ओर उन्मुख हो जाना भी इसका एक बड़ा कारण है। उदारीकरण के बाद अभियांत्रिकी, मेडिकल, प्रबंधन और अब कोडिंग-डाटा साइंस ही ‘सफलता’ का पर्याय बन गए हैं। जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, वे आम तौर पर टेक्नोक्रेट और चुनाव प्रबंधन से जुड़े लोगों को महत्व देते हैं।
संपूर्णानंद, आचार्य नरेंद्रदेव, आचार्य जे. बी. कृपलानी, डॉ. लोहिया, विजयदेव नारायण साही, विष्णुकांत शास्त्री, प्रेमकुमार मणि, देवीप्रसाद त्रिपाठी आदि की तरह साहित्य, इतिहास या दर्शन से राजनीति में आने वालों या उनसे वास्ता रखनेवाले राजनेताओं की संख्या अब नगण्य है। नतीजतन हमारे समय में राजनेता साहित्य से कोई खास जुड़ाव महसूस नहीं करते।
(iii) मीडिया और कम्युनिकेशन में बदलाव आया है। पहले अखबार के संपादकीय, आकाशवाणी के वार्ता कार्यक्रम, दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम और साहित्यिक पत्रिकाएं (धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान, सारिका) ही सार्वजनिक विमर्श बनाती थीं। इन सबमें साहित्यकारों की बड़ी भूमिका होती थी। हिंदी के अनेक रचनाकार पत्रकार थे। अज्ञेय, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल आदि मूलत: साहित्यकार थे जो पत्रकारिता से भी जुड़े थे।
अब चौबीसों घंटे के न्यूज चैनल, सोशल मीडिया और 15 से 30 सेकंड का रील-कल्चर है। यहां कविता या गद्य की कोई जगह नहीं है। नेता को अब कवि-लेखक के बजाय जनसंपर्क एजेंसी, पॉलिटिकल कंसल्टेंट और बेरोजगार नौजवानों की ‘ट्रोल आर्मी’ ज्यादा उपयोगी लगती है।
डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने लिखा है कि राजनीतिक सुधार के लिए सामाजिक सुधार आवश्यक है और कहना न होगा कि श्रेष्ठ साहित्य जनता की भावभूमि को सामाजिक सुधार के लिए तैयार करने में सहायक होता है।
(iv) साहित्य का स्वयं हाशिए पर चला जाना भी एक बड़ा कारण है। विगत कुछ दशकों में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य धीरे-धीरे पाठकों से कटता गया है। बाजार ने समाजशास्त्रीय अर्थ में लोकप्रिय अंग्रेजी उपन्यास, सेल्फ-हेल्प बुक्स और अब ऑडियो-वीडियो कंटेंट को आगे कर दिया। साहित्यकार भी अब मुख्यधारा की राजनीतिक बहस से दूर ‘अपने सीमित पाठक वर्ग’ तक सिमट गए हैं। जब साहित्य जन-विमर्श का हिस्सा नहीं रहेगा, तो आज के भीड़तंत्र में राजनेता उसके रचनाकार से जुड़ेगा, यह कल्पना से परे है।
(v) प्रगतिशील राजनीति का भी ‘प्रोजेक्ट-मोड’ में बदल जाना एक वजह है। साहित्य से जुड़े जो बुद्धिजीवी आज खुद को ‘लेफ्ट-लिबरल’ या ‘प्रगतिशील’ कहते हैं, उनका शब्द और कर्म भी अब एनजीओ-फंडिंग, कोर्ट-कचहरी, इंटरनेशनल सेमिनार, डाटा जुटाने और ‘अकादमिक’ पेपर की भाषा में सिमट गया है। वे साहित्य को ‘बुर्जुआ भावुकता’ या ‘अनुत्पादक’ मानने लगे हैं। भारतीय राजनीति में सक्रिय किसी राजनेता, संसद सदस्य आदि को किसी कवि-लेखक से सार्वजनिक संवाद करते शायद ही देखा गया हो। ऐसे में लोकसभा में एक विपक्षी सांसद दवारा ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘ठाकुर का कुआं’ कविता का पाठ करते देखना-सुनना या महुआ मोइत्रा दवारा संसद में अपने संबोधन के दौरान दिनकर जी का नाम लिए बगैर ‘जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है’ उद्धृत करते देखना-सुनना एक हद तक आश्वस्तिदायक है।
(vi) अब सत्ता और सम्मान के नए स्रोत बन गए हैं। पहले राज्यसभा की सदस्यता, पद्म पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, विश्वविद्यालयों के कुलपति आदि के पद – ये सब साहित्यकारों को भी मिलते थे, जिससे नेता और साहित्यकार एक-दूसरे के संपर्क में रहा करते थे। अब ये सारे सम्मान ज्यादातर ‘पार्टी-निष्ठ’ या ‘सोशल मीडिया प्रभाव’ वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों या न्यायविदों को दिए जाते हैं। साहित्यकार अब सत्ता के लिए अनुपयोगी समझे जाते हैं।
(vii) भाषाई दीवार एक कारण है। भारत का अभिजन अंग्रेजी में सोचता-बोलता है, जबकि कुछेक अपवादों को छोड़कर श्रेष्ठ भारतीय साहित्य अभी भी हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में रचा जा रहा है। दोनों के बीच भाषा की दीवार इतनी ऊंची हो गई है कि संवाद लगभग असंभव-सा हो गया है।
कुल मिलाकर राजनेताओं से साहित्यकारों का संबंध टूटना केवल व्यक्तिगत अरुचि का मामला नहीं है। यह पूरे समाज के सांस्कृतिक-आर्थिक ढांचे में बदलाव का परिणाम है। फलतः राजनीति के क्षेत्र में साहित्य को लगभग ‘अनावश्यक’ मान लिया है। जब तक साहित्य फिर से जन-आंदोलन नहीं बनेगा और राजनीति फिर से ‘सांस्कृतिक प्रोजेक्ट’ नहीं बनेगी, यह दूरी लगातार बढ़ती जाएगी।
(3) आज के अधिकांश भारतीय राजनेताओं का ज्ञान और पठन-पाठन जिस कदर सिकुड़ गया है, वह कोई व्यक्तिगत आलस्य नहीं, बल्कि पिछले चार दशकों के पूरे सामाजिक-राजनीतिक ढांचे का परिणाम है। राजनीति अब विचारों का नहीं, कैरियर का मैदान बन गई है जिसमें प्रवेश के लिए पारिवारिक पृष्ठभूमि, अनाप-शनाप पैसा या संगठन की सीढ़ी चाहिए। किताबें पढ़ना इसमें आगे बढ़ने के लिए बेकार का काम माना जाता है। जो नेता पहले गांधीवादी, समाजवादी, वामपंथी या राष्ट्रवादी पृष्ठभूमि से निकलते थे वे कम से कम मार्क्स, गांधी, लोहिया या हेडगेवार की किताबें पढ़ लेते थे। अब युवा मोर्चा से पार्षद, पार्षद से विधायक और विधायक से मंत्री बनने की दौड़ में रहने के लिए पढ़ने की कोई जरूरत नहीं है।
नेताओं को अब सौ पृष्ठों की किताब के बजाय दो पृष्ठों का ‘ब्रीफ’ चाहिए होता है। इतिहास, अर्थशास्त्र, साहित्य सब ‘बुलेट पॉइंट्स’ में आ जाएं तो ठीक, वरना फालतू! उसका अपना ध्यान-काल भी पंद्रह सेकंड का हो गया है, क्योंकि वह खुद रील बनाता और देखता है। जो नेता अंग्रेजी माध्यम से आते हैं, वे विदेशी थिंक-टैंक की रिपोर्ट्स या सेल्फ-हेल्प किताबें ही पढ़ते हैं। हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं का गहरा साहित्य और दर्शन उनके लिए पराया है। और सबसे बड़ी बात, वोट किताब पढ़ने से नहीं, जाति-धर्म-नकद-शराब से आता है। इस सच ने पढ़ने को पूरी तरह अनुपयोगी बना दिया।
इसकी कीमत सोच और व्यवहार में साफ दिखती है। बिना गहरे पठन के दीर्घकालिक विजन नहीं बनता। इसलिए हर नीति अगले चुनाव तक की होती है, अगले पचास साल तक की नहीं!
संसद में भाषण पहले घंटों पढ़कर दिए जाते थे और छपने पर वे पढ़े जा सकते थे। अब नेताओं के लिए पांच मिनट से ज्यादा संयत और तर्कपूर्ण बोलना दुर्लभ है।
इस तरह बचती है केवल गाली, नारा और भावुक अपील। संकट में जल्दबाजी में फैसले होते हैं और फिर यू-टर्न लिए जाते हैं, क्योंकि जटिलता समझने और संयम रखने की बौद्धिक ताकत ही नहीं रहती।
उपन्यास, कहानी या कविता न पढ़ने से नेताओं में दूसरों का दर्द अनुभव करने की कल्पनाशीलता मर गई है। वे अब सिर्फ आंकड़ों में सोचते हैं- सकल घरेलू उत्पाद बढ़ा तो सब अच्छा है। पर वे यह नहीं सोचते कि उस बढ़ोतरी की प्रक्रिया में कितने लोग कुचले गए।
नैतिकता अब किताबों से नहीं, पार्टी लाइन, जाति हित, समुदाय का हित या ‘ट्रेंडिंग नैरेटिव’ से तय होती है। नतीजतन विचारधारा की जगह व्यक्ति-पूजा ले लेती है, क्योंकि विचार से परहेज करनेवालों के पास विचारधारा का अभाव स्वाभाविक है।
संक्षेप में, आज के अनेक राजनेता तकनीकी रूप से स्मार्ट अवश्य हैं, पर बौद्धिकता और संवेदनशीलता दोनों स्तरों पर वे खोखला हो गए-से लगते हैं। यह खोखलापन केवल उनका अपना नहीं, हम सबकी सांस्कृतिक गिरावट का आईना है। जब तक समाज फिर से पढ़ने को शक्ति और प्रतिष्ठा का स्रोत नहीं मानेगा, तब तक उसके नेता भी नहीं बदलेंगे – क्योंकि राजनेता अंततः समाज की ही निर्मिति होते हैं।
उल्लेखनीय है कि राजकवि होने के बावजूद कालिदास ने मेघदूत में चापलूसों से घिरे राजा पर व्यंग्य करते हुए लिखा है कि देवराज इंद्र और मानव-राजा दोनों के पास तो बहुत से प्रियदर्शन (चापलूस) रहते हैं, उनके पास मेघ जैसे सच्चे प्रेमी नहीं होते जो मन को भिगो दें:
भवंति नूनं त्रिदशेश्वरस्य नृपस्य चापि प्रियदर्शनानि।
तथापि तेषां न भवंतिमेघाः स्नेहार्द्रतां यांति न चापिचेतः॥
इसी प्रकार ‘रघुवंश’ में अग्निवर्ण के प्रसंग में निकम्मे उत्तराधिकारी की विलासिता पर व्यंग्य करते हुए कहा गया है : स भूत्वा नृपतिर्नृपः कथमपि प्राप्य स्थितिं तां पराम्/नृपाणां कुलजं वपुर्युवतिषु प्रेम प्रियं चेदृशम्। (वह किसी तरह राजा बन गया, पर राजाओं के कुल में जन्मा शरीर और युवतियों में प्रेम- बस यही उसका गुण रहा)। यह कथन आज के ‘नेता-पुत्र/पुत्री’ और ‘वंशवाद’ पर भी लागू होती है।
जाहिर है, हमारे समय में भी राजनेताओं के इर्दगिर्द चापलूसों की भरमार है। इसका कच्चा चिट्ठा दिनकर, नागार्जुन, रघुवीर सहाय सरीखे कवियों ने खोला है। दिनकर ने लिखा है-
‘जो सत्य जानकर भी न सत्य कहता है
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है
उस कुटिल राजतंत्री कदर्य धिक् है
वह मूक सत्यहंता कम नहीं वधिक है।’
इसी प्रकार नागार्जुन ने अपनी अनेक कविताओं में संसदीय लोकतंत्र के अंतर्विरोधों को जमकर उजागर किया है: ‘सुखी हैं चाटुकार /मगन मस्त हैं लबार/जिनके हित दिल्लीगत त्रिविध तापहारी/…स्वर्ग है पार्लमेंट/महक रहा इत्र सेंट/करता है बहुमत जनहित की चांदमारी।’
आज राजनेताओं को पढ़ने-लिखने और बौद्धिक गहराई के पैमाने से देखने पर शशि थरूर, सुधांशु त्रिवेदी सरीखे चंद राजनेताओं को छोड़कर ज्यादातर भारतीय राजनेता संभवत: मध्य-निचली श्रेणी में आते हैं। दुनिया में अब ही कुछ राजनेता अपवाद के रूप में मौजूद हैं जो नियमित रूप से साहित्य, दर्शन और इतिहास आदि पढ़ते हैं।
भारत समेत दुनिया के विभिन्न देशों में अनेक राजनेता हुए हैं जो खुद लेखक भी थे। भारत के राजनेता-लेखकों में गांधी और नेहरू के अलावा लोहिया, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, बी.आर. आंबेडकर, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। चीनी राष्ट्राध्यक्ष माओत्से तुंग और वियतनामी राष्ट्रपति हो.ची.मिन्ह क्रांतिकारी होने के साथ ही कवि भी थे। माओ द्वारा क्लासिकी चीनी शैली में रचित कविताएँ और हो.ची.मिन्ह द्वारा कैद के दौरान रचित कविताएं साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। चेक गणराज्य के राष्ट्रपति वात्स्लाव हावेल नाटककार थे। ‘द गार्डन पार्टी’, ‘द मेमोरेंडम’ आदि उनके विश्वप्रसिद्ध नाटक हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने बीस से अधिक पुस्तकें लिखी हैं जिनमें कविताएं भी हैं। मारियो वार्गास योस नोबेल साहित्य विजेता उपन्यासकार होने के साथ ही राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी भी थे। तंजानिया के राष्ट्रपति जूलियस नियेरेरे ने स्वाहिली भाषा में कविताएं रची हैं और शेक्सपियर के अनुवाद किए हैं। सेनेगल के राष्ट्रपति सेदार सेंघोर (सेनेगल) फ्रेंच भाषा के महान कवि और फ्रेंच अकादमी के सदस्य थे।
हमारे समय में फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों दर्शनशास्त्र के छात्र रहे हैं। वे आज भी हर साल दर्जनों किताबें पढ़ते हैं। चिली के युवा राष्ट्रपति गेब्रियल बोरिक साहित्यकार नेरुदा और बोलान्यो की किताबें हाथ में लेकर प्रचार करते हैं। पूर्व न्यूजीलैंड प्रधानमंत्री जसिंडा आर्डर्न के भाषणों में कविताएं और उपन्यासों के संदर्भ सहज रूप से आते थे। फिनलैंड, डेनमार्क, कनाडा जैसे छोटे-बड़े कई पश्चिमी लोकतंत्रों में पढ़ना अभी भी नेतृत्व की पहचान माना जाता है।
हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार खुलकर कहा था कि वे किताबें नहीं पढ़ते। ब्राजील के बोल्सोनारो ने पढ़ने को समय की बर्बादी बताया। हंगरी के ओरबान और तुर्की के एर्दोआन सिर्फ अपनी विचारधारा की किताबों या कविताओं तक सीमित हैं। जर्मनी के शॉल्त्स, ब्रिटेन के स्टार्मर, जैसे नेता किताबें पढ़ते जरूर हैं, पर सार्वजनिक जीवन और नीति-निर्माण में उसका कोई खास प्रभाव नहीं दिखता। परिणामत: सबकुछ ‘ब्रीफिंग नोट्स’ और मीडिया सलाहकारों के हाथ में होता है।
भारतीय राजनेता कभी-कभार कबीर, तुलसी, नरसी मेहता, विवेकानंद, गांधी, दिनकर आदि का जिक्र करते हैं। पर प्रधानमंत्री जी द्वारा जनसभा में दिनकर की ‘कलम आज उनकी जय बोल’ कविता को उद्धृत करने के बावजूद सरकार द्वारा साहित्य-संस्कृति को लेकर कोई ठोस कार्यक्रम लागू होता दिखाई नहीं पड़ता। राजनीति में सक्रिय शशि थरूर, रामबचन राय, प्रेमकुमार मणि जैसे चंद लोगों को अपवादस्वरूप छोड़कर प्राय: राजनेताओं को पिछले डेढ़-दो दशक में किसी साहित्यिक या दार्शनिक किताब पर कुछ लिखते-पढ़ते-बोलते सार्वजनिक रूप से देखा जाना दुर्लभ है।
हम राष्ट्रपति ट्रंप या बोल्सोनारो की श्रेणी से थोड़े ऊपर इसलिए हैं क्योंकि हमारे यहां अभी भी कबीर-विवेकानंद-गांधी आदि का राजनीति में भावनात्मक उपयोग होता रहता है।
दुनिया के अधिकांश बड़े लोकतंत्र में अब किताबें पढ़ना नेतृत्व की अनिवार्य शर्त नहीं रहा। भारत भी उसी वैश्विक औसत में शामिल हो चुका है जहां पढ़ना अपवाद है और न पढ़ना सामान्य। वह भारतीय सभ्यता जो कभी अपने राजाओं को ‘कविराज’ और ‘विद्वान’ कहती थी, आज आम वैश्विक गिरावट का हिस्सा बन गई है। आजकल न नेता पढ़ता है, न समाज उसकी अपेक्षा करता है। यह कमी केवल नेताओं की नहीं संपूर्ण पठन-संस्कृति की क्षति है। ऐसे में डब्लू.बी.यीट्स की ‘द सेकंड कमिंग’ कविता में आए उस बेहद लोकप्रिय मारक व्यंग्य की याद न आए,यह मुमकिन नहीं : सबसे अच्छे लोग विश्वास से सर्वथा शून्य हैं/ सबसे निकृष्ट लोग उत्साह की प्रचंड तीव्रता से भरे हैं।
(4) आज का साहित्यकार स्वयं भी एक हद तक अपनी उपेक्षा के लिए जिम्मेदार है। उसकी कुछ ऐसी कमियां और आदतें बन गई हैं जो उसे जन-सामान्य से, और इसीलिए शासन की नजरों से भी दूर ले जा रही हैं। उसकी सबसे बड़ी कमी है आम आदमी की भाषा और उसके रोजमर्रा के दुख-दर्द से कट जाना। केवल हिंदी साहित्य का ही उदाहरण लें तो प्रेमचंद, यशपाल, मैथिलीशरण गुप्त, निराला, दिनकर, नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु आदि लेखक किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी, ग्रामीण जनता- सबकी जबान में लिखते थे; जबकि आज का बड़ा साहित्यकार या तो अत्यधिक जटिल प्रतीकात्मकता में लिखता है या इतनी निजी पीड़ा में डूबा रहता है कि साहित्य केवल साहित्यकारों के लिए बनकर रह गया है!
दूसरी कमी है- सार्वजनिक विमर्श से भागना। पहले साहित्यकार अखबारों में नियमित कॉलम लिखते थे, रेडियो-टेलिविजन आदि पर आते थे, साहित्य सम्मेलनों में उन्हें हजारों लोग सुनने आते थे। आज अधिकांश अच्छे लेखक सोशल मीडिया पर भी या तो चुप रहते हैं या एक-दूसरे को नीचा दिखाकर आपस में ही लड़ते रहते हैं। जो लोग थोड़ा-बहुत लिखते हैं, उनकी भाषा इतनी कटु और गुटबाजी वाली हो जाती है कि आम पाठक दूर भागता है।
कुछेक अपवादों को छोड़कर अब साहित्यकार ने जनता के साथ खड़ा होना लगभग छोड़ दिया। वह या तो ‘पुरस्कार-ज्यूरी’ को खुश करने के लिए लिखता है या अपने जैसे सीमित पाठक वर्ग के लिए रचना करता है।
तीसरी कमी है- नई पीढ़ी को अपने साथ जोड़ने में लगभग असफल हो जाना। आज का युवा सोशल साइट्स पर ज्यादा रहता है। साहित्यकार न तो कहानी को दस मिनट की ऑडियो कहानी बना पाया, न शॉर्ट वीडियो में कविता सुना पाया, न मीम्स के जरिए अपनी बात पहुचा पाया। वह आज भी ‘किताब छपेगी तो लोग पढ़ लेंगे’ के भ्रम में जीता है, जबकि दुर्भाग्यवश किताब छपने के बाद भी घरों में कई बार पड़ी रहती है।
चौथी कमी है- एक-दूसरे के प्रति असहिष्णुता और गुटबाजी। एक गुट का लेखक दूसरे को पढ़ता ही नहीं, सम्मान की बात तो दूर। पुरस्कार, सेमिनार, अनुवाद सब गुटों में बंट गए। इस अंतर्कलह ने साहित्य की सामाजिक ताकत को खोखला कर दिया।
पांचवीं कमी है- सत्ता से जानबूझकर दूरी और फिर उसकी शिकायत करना। बहुत से साहित्यकार सत्ता को ‘अशुद्ध’ मानकर उससे दूर रहते हैं, कोई संवाद नहीं करते, कोई सुझाव नहीं देते, फिर जब उन्हें नजरअंदाज किया जाता है तो दुखी होते हैं। सत्ता हमेशा उसी को सुनती है जो उसकी भाषा में, उसके मंच पर बात करता है।
छठी और सबसे गहरी कमी है- नैतिक और वैचारिक सुस्पष्टता का अभाव। पहले साहित्यकार चाहे गांधीवादी हों या मार्क्सवादी, उनकी पक्षधरता साफ होती थी। आज अधिकांश लेखक मौन रहते हैं या अवसरवाद का शिकार हो जाते हैं- कभी सत्ता की जय-जयकार, कभी उसकी निंदा करने वाले लेखकों की विश्वसनीयता लगभग खत्म हो गई और जनता को उनसे कोई दिशा नहीं मिल पा रही है।
ज्यां पॉल सार्त्र ने सही लिखा है: लेखक होना एक राजनीतिक कर्म है। चुप रहना भी एक राजनीतिक बयान है।
(5) यह स्थिति वास्तव में एक विचित्र परस्पर-विरोध को दर्शाती है। आज भारतीय ही नहीं, बल्कि और काफी हद तक वैश्विक सांस्कृतिक परिदृश्य का सबसे सटीक चित्र है। दोनों पक्ष एक-दूसरे को आईना दिखा रहे हैं, पर दोनों ही उसमें खुद को देखने को तैयार नहीं। गालिब ने लिखा है : उम्र भर ‘गालिब’ यही भूल करता रहा/धूल चेहरे पे थी आइना साफ़ करता रहा।
एक तरफ आज के अधिकांश छुटभैये साहित्यकार राजनीति में इस कदर डूबे हुए हैं कि उनकी लगभग सारी रचनात्मक ऊर्जा अब प्रत्यक्ष या परोक्ष राजनीतिक टिप्पणी, बयानबाजी, सोशल-मीडिया युद्ध, खेमेबाजी और तथाकथित ‘सही पक्ष’ की पहरेदारी में खर्च हो रही है। कविता, कहानी, उपन्यास से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि आज किस मुद्दे पर बयान देना है, कौन सा पुरस्कार लौटाना है, कौन-से लेखक को बहिष्कृत करना है। रचना अब राजनीतिक हथियार बन गई है, स्वतंत्र सौंदर्य-बोध नहीं रही। नतीजा यह कि साहित्य की व्यापक जनता तक पहुंच ही बंद हो गई – जो पहले उसकी ताकत थी।
दूसरी तरफ, राजनीति सचमुच संस्कृतिविहीन होती जा रही है। भाषा, संवाद, नीति, यहां तक कि चुनावी नारे भी अब केवल नफरत, भय, लालच और तात्कालिक लाभ के सूत्रों पर टिके हैं। जॉर्ज ऑरवेल ने लिखा है कि राजनीतिक भाषा का उद्देश्य यह होता है कि झूठ सच्चाई जैसा लगने लगे, हत्या सम्मानजनक प्रतीत होने लगे और हवा भी ठोस वस्तु जैसा रूप दिखाई देने लगे।
सत्ता के केंद्र में अब कविता, उपन्यास, दर्शन या इतिहास के लिए बहुत कम जगह बची है। नेताओं को न साहित्य पढ़ने की जरूरत महसूस होती है, न साहित्यकारों से संवाद की। उसकी सारी बौद्धिक जरूरतें पी.आर.एजेंसी, पोलस्टर और सोशल-मीडिया मैनेजर पूरी कर देते हैं। अंग्रेजी कवि शेली ने सुप्रसिद्ध ‘इंग्लैंड इन 1819’ कविता में लिखा है: शासक जो न देखते हैं, न अनुभव करते हैं, न जानते कुछ भी/जोंक की तरह मरणासन्न देश से चिपके रहते हैं।
सबसे कड़वा सच यह है कि ऐसे दृष्टिविहीन राजनेताओं और अवसरवादी साहित्यकारों के बीच कई बार गुप्त लेन-देन चल रहा होता है। कुछ साहित्यकार खूब बयानबाजी करते हुए अनेक उच्चाधिकारप्राप्त समिति के सदस्य के रूप में सत्ता-प्रतिष्ठान के बहुत करीब रहे हैं। वे पद्म पुरस्कार, राज्यसभा की सदस्यता, कुलपति पद, विदेश यात्राएं, सरकारी अनुवाद-योजनाएं, साहित्य अकादमी की प्रवर समितियों की सदस्यता आदि पाने के लिए सत्ता से अनौपचारिक या कभी-कभी औपचारिक समझौते करते हैं। बाहर वे सत्ता-विरोध का सबसे तेज स्वर होते हैं और भीतर वे उसी सत्ता के सबसे सुरक्षित लाभार्थी।
यह दोहरा खेल दशकों से चल रहा है और जो लोग इसमें शामिल रहे हैं वे सब के सब जाने-पहचाने चेहरे हैं, जिनका नाम लेना जरूरी नहीं है। यही कारण है कि सत्ता को वास्तव में साहित्यकारों से कोई खतरा महसूस नहीं होता; वह जानती है कि ज्यादा शोर मचाने वाले भी अंततः सेट हो जाते हैं।
इसलिए आज साहित्यकार का राजनीति में डूबना भी आधा-अधूरा और दिखावटी है, और राजनीति का संस्कृतिविहीन होना भी पूरी तरह सच नहीं।
राजनीति अपने तात्कालिक हित में संस्कृतिकर्मियों को खरीदना और इस्तेमाल करना भली-भांति जानती है, उसे स्वतंत्र और आलोचनात्मक संस्कृति पसंद नहीं। बड़ी त्रासदी यह है कि इस सतही युद्ध और गुप्त सांठ-गांठ के बीच साहित्य और राजनीति दोनों का नाश हो रहा है, जो कभी एक-दूसरे को जीवंत और नैतिक बनाते थे। गुरुदेव रवींद्रनाथ ने सही लिखा है- जहां राजनीति साहित्य को दबाती है, वहां सभ्यता मर जाती है।
इसलिए जब तक साहित्यकार राजनीति से सचमुच स्वतंत्र होकर सिर्फ रचना कर्म की ओर उन्मुख नहीं होगा और जब तक राजनीति साहित्य को डराने-खरीदने के बजाय उससे संवाद करना नहीं सीखेगी, तब तक यह खाई और गहरी होती जाएगी। अभी तो दोनों एक-दूसरे के बिना जीने का नाटक कर रहे हैं, जबकि दोनों जानते हैं कि वे एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
इन सबके चलते साहित्यकार आज न तो जनता का प्रतिनिधि रह गया, न सत्ता का वार्ताकार। वह एकाकी इसलिए हो गया, क्योंकि उसने स्वयं ही अपने दरवाजे-खिड़कियां बंद कर लीं हैं। जब तक वह फिर से आम आदमी की भाषा में, उसके मंच पर, उसके दुख-सुख को अपना दुख-सुख बनाकर नहीं बोलेगा, तब तक न तो समाज उसे अपनाएगा और न सत्ता उसे गंभीरता से लेगी। ऐसे में इकबाल की नसीहत-‘अपने मन में डूब कर पा जा सुराग-ए-जिंदगी’ के हवाले से कहना चाहूंगी कि सियासतदानों द्वारा नजरअंदाज किए जाने के कई कारण सिर्फ बाहर नहीं, लेखकों के भीतर भी हैं।
प्रोफेसर, सेंटर ऑफ इंडियन लैंग्विजेज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067 मो.7678380738
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अनुज लुगुन
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आजादी के बाद साहित्यकारों तथा राजनेताओं के आदर्श में काफी अंतर आता गया
(1) प्राचीन काल में कवियों का संबंध राजा से आश्रयजनित होता था। कवि प्रशस्ति या चरित रचते थे। वहां काव्य लेखन या काव्य चिंतन में जनहित, सरोकार या जनता के प्रति प्रतिबद्धता जैसे विचार मुख्यतया नहीं होते थे। प्राचीन काल में जो कवि या विद्वान जन सरोकार या जनहित के पक्षधर होते थे या मौलिक चिंतन करते थे, वे सत्ता से टकराते थे। सत्ता की आलोचना को किसी भी तरह की राजनीति ने स्वीकार नहीं किया।
प्राचीन समय में लेखन की वजह से लेखक या कवि की प्रसिद्धि राजा के समानांतर खड़ी होती थी, या सत्ता के विचार से बड़ा कोई नया विचार निर्मित होता था, शासन को दिक्कत होती थी। उदाहरण के लिए संस्कृत के महाकवि कालिदास के रचनात्मक संघर्ष को देखा जा सकता है। सुरेंद्र वर्मा ने अपने नाटक ‘आठवां सर्ग’ में इसे विस्तार से दिखाया है। जब धर्म की सत्ता को कालिदास की लेखनी से दिक्कत होती है ता्रे राजा चंद्रगुप्त कालिदास के प्रति अगाध सम्मान रखते हुए भी उसका साथ देने में अपनी असमर्थता जाहिर कर देते हैं। कालिदास अकेले ही सत्ता की चुनौतियों का सामना करते हैं। सूफी मत के शायर और दार्शनिक मंसूर अल हल्लाज को शासकों ने फांसी पर लटका दिया था। उन्होंने ‘अन अल हक’ का विचार दिया था। यह विचार तत्कालीन धर्म और राजनीतिक सत्ता का विकल्प बन रहा था। सोलहवीं सदी के इतालवी दार्शनिक, खगोलविद और गणितज्ञ जियोदारनो ब्रुनो को रोम में जिंदा जला दिया गया था। उन्होंने निकोलस कॉपरनिकस के उस सिद्धांत का न केवल समर्थन किया था बल्कि उसके चिंतन को विस्तार दिया, जिसमें कॉपरनिकस ने कहा था कि ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी नहीं सूर्य है। यह मत उस समय तक स्थापित ईसाई धर्म के मत के विपरीत था।
इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां कवि, दार्शनिक या वैज्ञानिक अपने समय की सत्ताओं द्वारा स्थापित मतों से मुठभेड़ करते हुए जब भी मौलिक विचार प्रस्तुत करते हैं उनका सत्ता से टकराव होता है। राजनीति या सत्ता उन्हें स्वीकार नहीं करती। तेलुगु भाषा के सशक्त कवि और संस्कृतिकर्मी वरवर राव इसे अपनी एक कविता में इस तरह दर्ज करते हैं-
कब डरता है दुश्मन कवि से ?
जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हैं
वह कैद कर लेता है कवि को।
फांसी पर चढ़ाता है
फांसी के तख्ते के एक ओर होती है सरकार
दूसरी ओर अमरता
कवि जीता है अपने गीतों में
और गीत जीता है जनता के हृदय में।
रचना की दुनिया संवेदनाओं और स्मृतियों से बनती है। एक स्मृति वह होती है जो शासक वर्ग निर्मित करता है। दूसरी स्मृति वह होती है जो जनता निर्मित करती है। जनता की स्मृतियां जनता से जुड़े बिना बन ही नहीं सकतीं। कवि, लेखक, दार्शनिक या विचारक जब जनता के साथ होते हैं तो वे शासकीय स्मृतियों के हिस्से नहीं होते। शासकीय स्मृतियां कभी स्थायी रूप से जनता की स्मृति नहीं बन सकती। बड़ी संख्या में ऐसे कवि, लेखक और विचारक हुए हैं जो प्रशस्ति या चरित गान के लिए लोकप्रिय हैं। उनका अपने समकालीन शासकों के साथ संवाद तो है लेकिन वह संवाद जन सरोकार का संवाद नहीं है। उनकी चिंता में आम जनता नहीं है। उनकी संवेदनाएं और स्मृतियां जनता की नहीं हैं। मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि जब रचनाकार या कलाकार मौलिक चिंतन और वैकल्पिक सोच के साथ आगे बढ़ता है तो सत्ता के लोगों को समस्या होती है।
राजनीति और रचनाकार में संवाद की स्थिति तभी बनती है जब वैचारिक परिस्थितियां एक हों। जैसे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और गांधीजी का उदाहरण है। दोनों के बीच संवाद इसलिए है क्योंकि दोनों की वैचारिक परिस्थितियां एक हैं। दोनों की चिंता अंग्रेजी साम्राज्यवाद से मुक्ति और जनता को सांस्कृतिक-राजनैतिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। रूस में टॉलस्टॉय और मैक्सिम गोर्की के लेखन के साथ बोलशेविक क्रांति के लोग इसलिए जुड़े क्योंकि इनकी परिस्थितियां एक जैसी थीं और दोनों उनके (साम्राज्यवाद और सामंतशाही) खिलाफ मुक्ति का सपना देखते थे। चीन के राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के दौरान माओ त्से तुंग ने लू शुन को सांस्कृतिक मोर्चे का कमांडर कहा था। कहने का आशय यह है कि जब रचनाकार या कलाकार और राजनीतिज्ञों की वैचारिक परिस्थितियां एक होती हैं तो संवाद होता है। उपनिवेशवाद के विरुद्ध हुए राष्ट्रीय आंदोलनों में अमूमन ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। क्योंकि इस दौरान संघर्ष का केंद्र बाहरी शक्तियों के खिलाफ होता है। लोकतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया में भी ऐसे उदाहरण बनते हैं। लेकिन जब कोई बाहरी शक्ति नहीं होती है तो वहां संघर्ष का वैचारिक स्वरूप अलग हो जाता है।
(2) मेरी समझ में स्वाधीनता के बाद जब औपनिवेशिक परिस्थितियां बदलीं तो वैचारिक स्थितियां भी बदलीं। आजादी के बाद की राजनीति को उपनिवेश मुक्त परिवेश में नई व्यवस्था का संचालन करना था। उसके लिए नीतियां बनानी थीं, तो राजनीति ने उसके अनुसार अपना आदर्श बनाया। जबकि साहित्यकारों ने अपने आदर्श को उतने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने आजादी के बाद उपनिवेश-मुक्त समाज की आलोचना तक अपने आदर्श का विस्तार किया। धूमिल अपनी कविताओं में जब कहते हैं – ‘क्या आजादी तीन थके हुए रंगों का नाम है/ जिन्हें एक पहिया ढोता है/या इसका कोई खास मतलब होता है?’ या, रघुवीर सहाय जब कहते हैं –
राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।
मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है॥
क्या उस समय की राजनीति भी ठीक यही महसूस कर रही थी जो एक कवि महसूस कर रहा था? क्या उस समय के राजनीतिज्ञ अपने मुंह से यह कह सकते थे? राजनीतिज्ञ यह नहीं कह सकते थे, क्योंकि वे वह नहीं देख पाएंगे जो एक कवि-कलाकार या दार्शनिक देख पाता है। यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि एक राजनीतिज्ञ के आदर्श और एक साहित्यकार के आदर्श कभी एक जैसे हो नहीं सकते। साहित्यकार या कवि कलाकार के आदर्श हमेशा राजनीतिज्ञों के आदर्श से उच्चतर होंगे। अगर वे ऐसा आदर्श नहीं बना पाते हैं तो वे भले ही कवि, कलाकार हो जाएं लेकिन उनकी उम्र और उनकी रचनाओं की उम्र में बहुत अंतर नहीं होगा।
कहा जाना चाहिए कि आजादी के बाद साहित्यकारों और राजनेताओं के आदर्श में भारी अंतर आया। यह एक वजह हो सकती है जिसने दोनों को एक-दूसरे से अलग किया।
(3) आज की राजनीति लीक पर चलने वाली राजनीति है। यह विकल्प की राजनीति नहीं है। जहां विकल्प की राजनीति होगी वहां अध्ययन स्वाभाविक होगा। वहां सिद्धांतों का अध्ययन होगा, मतों का अध्ययन होगा। इसके साथ ही साहित्य और कलाओं का भी अध्ययन होगा। ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद, बाबा साहेब अंबेडकर, बी. डी. सावरकर आदि सभी अध्ययनशील थे। राष्ट्रीय आंदोलन के नेता न सिर्फ अध्ययन करते थे बल्कि वे लेखन करते थे और पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी करते थे। शहीद-ए-आजम भगत सिंह तो फांसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले तक किताब पढ़ रहे थे। ऐसा क्यों? क्योंकि ये सारे लोग विदेशी साम्राज्यवादी और सामंतशाही व्यवस्था का विकल्प खोज रहे थे। हमारा पूरा राष्ट्रीय आंदोलन साम्राज्यवादी-सामंतशाही शासन व्यवस्था की जगह वैकल्पिक शासन-व्यवस्था की खोज का आंदोलन रहा है। इसी खोज का परिणाम हमारा संविधान है। लेकिन संविधान बनने के बाद राजनीतिज्ञों ने मान लिया कि अब उन्हें केवल बने-बनाए रास्ते पर चलना है और राह बनाने के लिए मानसिक ऊर्जा खर्च नहीं करनी है। वे अपने जेहन में यह बात लाते ही नहीं कि बनी-बनाई राह को भी मरम्मत की जरूरत पड़ सकती है। उस राह को सुंदर और सुगम बनाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। राह बनी है तो उसकी मंजिल भी है। राजनीतिज्ञों ने अपनी राह की मंजिल ‘सत्ता’ बना ली और जनता को उसका माध्यम। इससे इतर जो बनी-बनाई राह पर चलने की चुनौतियों को समझते हैं वे आज भी अध्ययन शील हैं और जनता के लिए संघर्षरत हैं। लेकिन ऐसे लोग राजनीति में कम हैं और अलग-थलग हैं।
दूसरे, आजादी के कुछ वर्षों बाद हमारी राजनीति ने खुद अपनी सत्ता स्थापित करनी शुरू की। वैकल्पिक राजनीति की बात तो दूर, जो संवैधानिक व्यवस्था बनी है उसके अनुकूल राजनीति कर रहे विरोधियों को अत्याचार का दंश झेलना पड़ा। हमारे देश की तत्कालीन राजनीति को अपने वर्चस्व के लिए आपातकाल का सहारा लेना पड़ा। उस समय की राजनीतिक सत्ता ने जो चाल चली, वह चाल अब भी है। ऐसे में भला कैसे नई राह की प्रेरणा मिलेगी? राजनीतिक क्षेत्र में नवोन्मेष कैसे होगा? हमारी राजनीति खुद अपने अंदर अध्ययन की संभावनाओं को खत्म कर रही है। हमारे देश की राजनीति में आंतरिक लोकतंत्र का घनघोर अभाव है। पढ़ाकू होगा तो लड़ाकू होगा। लड़ाकू लोगों के लिए हमारे देश की राजनीति में स्थान इसलिए नहीं है क्योंकि वे सवाल उठाते हैं। अपने ही राजनीतिक दलों के अंदर सवाल उठाते हैं। कोई दल अपने अंदर सवाल नहीं चाहता। कोई नेता या कार्यकर्ता अपनी पार्टी के सुप्रीमो की आलोचना नहीं कर सकता। जिस दिन वह आलोचना करता है, उसी दिन उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। आपको हैरानी होगी कि बड़े-बड़े राष्ट्रीय दलों के मुख्यालय में एक पुस्तकालय तक नहीं है। अपनी ही विचारधारा को समझने और समझाने का अभ्यास नहीं है। ऐसे लोग क्या नई साहित्यिक अभिव्यक्तियों का स्वागत करेंगे? परिणाम यही है कि हम कथित तौर पर शिक्षित लेकिन वस्तुतः अपढ़ राजनीतिज्ञों को झेल रहे हैं।
(4) आधुनिक भारतीय साहित्य का इतिहास उपनिवेशवाद के विरोध में उपजा साहित्य है। साम्राज्यवाद और सामंतशाही व्यवस्था के विरोध ने साहित्यकारों को स्वभाविक रूप से जनता से जोड़ा है और जनता भी स्वभाविक रूप से उनसे जुड़ी है। इस बात से इनकार नहीं किया जाना चाहिए कि उन दिनों जन संघर्षों की कोख से साहित्यिक अभिव्यक्ति हुई। आधुनिक हिंदी साहित्य भी उसी का परिणाम है। लेकिन कालांतर में साहित्यिक समाज जन संघर्षों से निरपेक्ष होता गया। इसे केवल व्यक्तिगत कमजोरी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लिए पूरा परिवेश जिम्मेदार है। मेरी समझ में हिंदी समाज में आजादी के बाद कोई बड़ा प्रगतिशील जन संघर्ष नहीं हुआ। कई अन्य राज्यों में चले जन आंदोलनों ने अपनी कोख से रचनाकारों और कलाकारों को जन्म दिया। इससे यहां की भाषाओं का साहित्यकार आज भी उपेक्षित और एकाकी नहीं है। इसके हमें हालिया दो उदाहरण देखने को मिलते हैं- पहला, असम के लोकप्रिय गायक जुबिन गर्ग की मौत के बाद उनके प्रति उमड़ा जन सैलाब। दूसरा, झारखंड आंदोलन से जुड़ी संस्कृतिकर्मी और खड़िया एवं हिंदी भाषा की लेखिका रोज केरकेट्टा के निधन पर उनके सम्मान में उपस्थित लोगों का हुजूम। इन दोनों ही मामलों में दोनों प्रदेशों के मुख्यमंत्री ने दिवंगत रचनाकारों को विशेष श्रद्धांजलि अर्पित की। ये दोनों उदाहरण इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि दोनों कलाकार और रचनाकार जन संघर्षों के साथ रहे। वे कभी अपने समाज में उपेक्षित और एकाकी नहीं रहे। उनके व्यक्तित्व और रचनाओं की आभा राजनीति को भी स्वीकार करनी पड़ी।
साहित्यिक कर्म और उस कर्म के फल की अपेक्षा जितनी आत्मकेंद्रित होती जाएगी, साहित्यकार उतनी ही उपेक्षा का शिकार होगा और एकाकी रहेगा। आत्म-केंद्रीकता में कोई जोखिम नहीं है लेकिन एकाकीपन है। जन पक्षधर होने में जोखिम है, लेकिन एकाकीपन नहीं है। कहना न होगा कि साहित्य के क्षेत्र में आत्म-केंद्रीयता बढ़ती जा रही है।
(5) कुछ अपवादों को छोड़कर कोई साहित्यकार राजनीति में नहीं डूबा है। मेरी समझ में ‘पॉलिटिक्स’ के वास्तविक अर्थ में राजनीति का जो बड़ा अभिप्राय है उससे हिंदी के साहित्यकारों का सरोकार नहीं है। आप जिसे राजनीति कह रहे हैं वह या तो खेमेबंदी है, या अपने-अपने ‘कॉमफर्ट’ के हिसाब से बना समूह है। ज्यादा से ज्यादा वे कथित मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से प्रशंसा चाहते हैं या उनका कृपापात्र होना चाहते हैं। उनकी राजनीति जनता की राजनीति नहीं है। जनता की राजनीति का मतलब है उन सत्ता-संरचनाओं से जूझना जो जनता के हितों का दमन करती है, लोगों के बीच वैमनस्य पैदा करती है। लिंग, जाति, क्षेत्र, धर्म, सांप्रदयिकता और पूंजी की जकड़न में फंसी जनता के लिए, उससे संवाद करती राजनीति कुछेक अपवादों को छोड़कर मुझे साहित्य में दिखाई नहीं देती। हमें साहित्य की दुनिया की खेमेबंदी को राजनीति नहीं कहना चाहिए। अगर वह राजनीति है तो उसका कोई सामाजिक अभिप्राय नहीं है। राजनीति चाहे वामपंथ की हो, या दक्षिणपंथ की उसका सामाजिक अभिप्राय होता है। आज विचारधारा वैयक्तिक या अपने खेमे की महत्वाकांक्षा की पूर्ति का साधन ज्यादा है। हाथ भी उठा रहे और कांख भी दबी रहे, इसे राजनीति कैसे कहेंगे?
अंतिम बात यह कि अब साहित्यकारों में भी ‘सुनने का धैर्य’ खत्म होता जा रहा है। अब असहमतियों से संवाद करने के बजाय ‘फतवा’ जारी किया जाता है। सोशल मीडिया में असहमतियों पर संवाद करने के बजाय लोग एक-दूसरे को ‘ट्रोल’ करते हैं।
एसएच – 7, पंचानपुर रोड, पी.ओ.-फतेहपुर, पोस्ट – टिकारी, गया-824236 मो.7677570764
संपर्क प्रस्तुतिकर्ता :1, राम कमल रोड, पोस्ट-गरीफा, पिन-743166, उत्तर 24 परगना (प.बं.) मो.9331075884






