शोध छात्रा, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग।

विश्व में आज तक जितने युद्ध हुए हैं, उनके दुष्प्रभाव से कोई अछूता नहीं रहा है।सबसे ज्यादा महिलाएं, युवा और बच्चे इसके शिकार हुए हैं।आज  युद्ध का निहितार्थ केवल सत्ता और पूंजी पर अपना अधिकार बढ़ाते जाना है।सदियों से युद्ध ने मानव जीवन को तहस-नहस कर अमानवीय दौर कायम करने के अलावा कुछ नहीं किया है।आज दुनिया को क्या चाहिए? किसी गरीब बच्चे की क्या जरूरतें हो सकती हैं? गांव की एक अनपढ़ स्त्री अपने लिए क्या चाहती है? ये सभी युद्ध नहीं चाहते।

क्या कारण है कि इन दिनों दुनिया के कई देशों में गृह युद्ध की स्थितियां बन रही हैं।क्या दुनिया को युद्धों और गृह युद्धों की जरूरत है?

हम अभी-अभी एक वैश्विक महामारी कोरोना से गुजरे हैं।इसके बाद अगर युद्ध का सिलसिला चल पड़ा है, तो यह पूरी दुनिया के लिए चिंतनीय है।युद्ध के कारणों में जाएं तो यह पूरा खेल केवल पूंजी हथियाने और अपने आप को सबसे शक्तिशाली घोषित करने के अलावा कुछ भी नहीं जान पड़ता।

24 फरवरी 2022 से रूस और यूक्रेन के मध्य युद्ध जारी है।इन पंक्तियों के लिखे जाने तक संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक युद्ध में यूक्रेन के करीब 2 हजार आम नागरिकों के मारे जाने की बात कही जा रही है।युद्ध के कारण 46.56 लाख लोगों ने यूक्रेन छोड़ दिया है।इसके अलावा, हमलों के कारण दोनों देशों के आस-पास के शहर पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं।यूक्रेन के कई शहर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं।अब आलम यह है कि इस देश के बहुसंख्यक नागरिक पड़ोसी देशों में शरणार्थियों की तरह जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं।चिंता की बात तो यह है कि जितने लोगों ने यूक्रेन छोड़ा है, उनमें 90 फीसदी महिलाएं और बच्चे हैं।

सोवियत संघ की स्थापना 1917 में रूसी क्रांति के साथ हुई थी।ब्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने उस समय रूसी साम्राज्य के जार (सम्राट) को सत्ता से हटा दिया था।इसके बाद, दिसंबर 1922 में बोल्शेविकों की पूर्ण जीत हुई।उस समय रूस, यूक्रेन, बेलारूस और काकस क्षेत्र को मिलाकर सोवियत संघ बनने का ऐलान किया गया था।1990-1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया।विघटन के कारण रूस के 15 गणतंत्र टूटकर स्वतंत्र देश के रूप में उभरे, जिनमें से एक यूक्रेन था।

आज यूक्रेन एक स्वतंत्र देश है।यूक्रेन-रूस  युद्ध के कई कारण हैं।दुनिया दो पक्षों में बंट गई है।इस युद्ध ने यह जरूर जता दिया है कि अपने देश के नागरिकों से बढ़कर सैन्य शक्ति हासिल करना पहली प्राथमिकता है।कोई देश यह नहीं समझना चाहता कि सैन्य शक्ति-प्रदर्शन की होड़ में अगर देश के नागरिक ही नहीं बचेंगे तो फिर सैन्य शक्ति हासिल करने के बाद वे किसकी रक्षा करेंगे।दो देशों की लड़ाई में जो सैनिक मारे जाते हैं वे किसी के पिता, बेटा, पति, भाई और मित्र होते हैं।आज तक वे लोग कभी नहीं मारे गए, जिनके कारण युद्ध की स्थितियां बनती हैं।

आने वाली पीढ़ियां, खासकर दूसरे देशों में शरणार्थी के रूप में जीवन-यापन कर रही महिलाएं और बच्चे इस युद्ध को कभी नहीं भूल पाएंगे? उनका बसा-बसाया आशियाना शक्ति हासिल करने की होड़ में उजड़ चुका है।वह फिर दोबारा वैसा नहीं बस पाएगा।उन लोगों के जीवन में जो आंधी आई है।वह उनकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा तबाह कर चुकी है।

इन युद्धों से तबाह हुए मानव जीवन को देखने-समझने के बाद लगता है कि इस समय दुनिया को सबसे ज्यादा करुणा और संवेदना की जरूरत है, ताकि ऐसे युद्धों से मानव जीवन बचा रहे।पृथ्वी पर शांति की उम्मीद बची रहे।इसलिए ‘युद्ध और आज का विश्व’ जैसे विषय पर परिचर्चा प्रस्तुत करते हुए मुझे भगवत रावत की कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं:

पता नहीं/आने वाले लोगों को दुनिया/कैसी चाहिए/कैसी हवा कैसा पानी चाहिए/पर इतना तो तय है/कि इस समय दुनिया को/ढेर सारी करुणा चाहिए।

सवाल

1 उदारीकरण के बाद उम्मीद की जा रही थी कि जब हर देश में दूसरे देश के व्यापारिक प्रतिष्ठान होंगे तो युद्ध की संभावना समाप्त हो जाएगी।नए विश्व में युद्ध की घटनाएं क्यों हैं?

2 रूस-यूक्रेन युद्ध का निहितार्थ क्या है?

3 सौ साल पहले पहला विश्व युद्ध हुआ था, उसके मूल में अंध-राष्ट्रवाद था।नए विश्व में अंध-राष्ट्रवाद के खतरे किन रूपों में हैं?

4 युद्ध देश की संस्कृतियों को किस तरह प्रभावित करते हैं?

5 यद्ध पर भारत में कोई बड़ी साहित्य रचना पिछले 75 वर्षों में लिखी गई हो तो उसके बारे में बताएं?

6 कई दूसरे देशों की तरह हिंदी में युद्ध और शांति पर कोई बड़ी रचना क्यों नहीं आ सकी, जबकि यह देश भी युद्धों से गुजरा है?

 

इतिहास में शब्द कम होते हैं हत्याएं ज्यादा

  नरेश सक्सेना
(जन्म-16 जनवरी 1939) हिंदी कविता के लिए विलक्षण कवि।पेशे से इंजीनियर रहे।चर्चित कविता संग्रह समुद्र पर हो रही है बारिश।कविता के अलावा टेलीविज़न और रंगमंच के लिए लेखन।साहित्य के लिए उन्हें 2000 का पहलसम्मान तथा निर्देशन के लिए 1992 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार।

रूस का कहना है कि यूक्रेन ने युद्ध उस पर थोपा है।रूसी महासंघ का विघटन एक बार हो चुका है।अपनी सीमा से सटे देशों का एक-एक कर नाटो में शामिल होते चले जाने, यानी नाटो सेनाओं का रूस के छाती पर सवार होने और इस तरह दूसरे विघटन का जोखिम वह नहीं उठा सकता।

इसमें कुछ न कुछ सचाई तो है कि रूस ने शायद यह आक्रमण भयग्रस्त होकर किया।क्योंकि यह सभी जानते हैं कि अमेरिका कोई साधु संत देश नहीं है।धूमिल की पंक्तियां याद आती हैं-

मुझ में समूह का भय
चिल्लाता है दिग्विजय

भारत रूस के विरुद्ध वोट नहीं दे रहा।तटस्थ रहने में ही अपनी खैरियत समझता है।इसकी एक दिक्कत यह है कि चीन हर हाल में रूस का साथ देगा।जबकि चीन भारत का दुश्मन है।किसी विषम युद्ध या शीत युद्ध की स्थिति में भारत का रूस के साथ होना, चीन के साथ होना भी होगा।जबकि चीन भारत के भरोसे के लायक नहीं है।

24 मई के इंडियन एक्सप्रेस की ताजा खबर के अनुसार, भारत, अमेरिका के नेतृत्व वाले इंडो-पेसिफिक इकोनॉमिक ब्लॉग में शामिल हो गया।जो घोषित रूप से चीन के विरुद्ध है।

पहले ऐसा लगता था कि रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण करके यह सिद्ध किया कि दुनिया की शक्ति संरचना एकध्रुवीय नहीं है।लेकिन यूक्रेन ने रूसी सैनिकों को कीव और दूसरे शहरों से खदेड़ दिया है और अब युद्ध रूस की सीमा पर हो रहा है।

निश्चय ही यूक्रेन को नाटो की मदद मिल रही है, लेकिन यूक्रेन की जनता तबाह हो रही है और खतरा अब रूस की जनता पर भी मंडरा रहा है।

यूक्रेन की एकजुटता से भारत का हिंदुत्व भी कुछ सीख सकता है।यूक्रेन के राष्ट्रपति जलेंस्की एक यहूदी है।यूक्रेन की अस्सी प्रतिशत जनता ईसाई है और यूक्रेन के मुस्लिम सैनिक रूसी सैनिकों पर गोले दागते हुए अल्लाह-हू-अकबर के नारों से आकाश गुंजा रहे हैं।

अपने अंध-राष्ट्रवाद और हिंदुत्व प्रेम में यह भी याद कर लेना चाहिए कि 1947 में कश्मीर में पाकिस्तानियों को खदेड़ते हुए ब्रिगेडियर उस्मान ने अपनी कुर्बानी दी थी।भारत के विभाजन के समय उन्होंने कई अन्य मुस्लिम अधिकारियों के साथ पाकिस्तान सेना में जाने से इनकार कर दिया था और भारतीय सेना के साथ सेवा जारी रखी थी।जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी सैनिकों से लड़ते हुए 3 जुलाई 1948 को वे शहीद हो गए।तदोपरांत उन्हें दुश्मन के सामने बहादुरी के लिए भारत के दूसरे सबसे बड़े सैन्य पदक महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

और दुनिया का सबसे बड़ा सैनिक आत्मसमर्पण, जिसमें पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने हथियार डाले थे, वह आत्मसमर्पण भारत के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने करवाया था, जो सिख थे।सेना के शीर्ष पर फील्ड मार्शल मानिक शा थे; जो पारसी थे।

हर सैनिक युद्ध के अगले मोर्चे से पहले एक बार अपने घर जाना चाहता है।उसकी वर्दी पर शौर्य के कितने ही बिल्ले लगे हों, उनके नीचे एक धड़कता हुआ दिल होता है।उसकी जेब में अपने बच्चे की, अपनी मां की या अपनी प्रेमिका की तस्वीर होती है जिसे वह खून में नहीं डुबोना चाहता।

जो युद्ध लड़वाते हैं, वे कभी खुद लड़ने नहीं जाते।युद्ध के उन्माद से ग्रस्त लोगों से पूछो कि वे युद्ध में अपने कितने बच्चों की कुर्बानी देने को तैयार हैं? क्या वे जानते हैं कि जहाज, टैंक और मशीनगनें युद्ध नहीं लड़तीं… उन्हें चलाने वाले लड़ते हैं।बहुत सी मशीनें युद्ध से वापस लौट आती हैं; बहुत से सैनिक नहीं लौट पाते।

इतिहास में शब्द कम होते हैं हत्याएं ज्यादा
अशोक अपने सौ भाइयों की हत्या करके
सम्राट बना था
इस पंक्ति में शब्द आठ हैं और हत्याएं सौ
द्वितीय विश्व युद्ध में
सिर्फ रूस के ही
एक लाख से अधिक सैनिक मारे गए थे
सत्ता का उन्माद, अहंकार और असीमित लालच
एक मानसिक बीमारी है
इस बीमारी के अलावा भी
एक बहुत बड़ा बाजार है युद्ध का
जिसमें गोला, बारूद, टैंक
मिसाइलें, लड़ाकू जहाज, पनडुब्बियां, वर्दियां,
बूट, बेल्ट, कैप, बंदूकें, बिल्ले, टेन्ट,
दवाइयां, शराब और
अश्लील फ़िल्मों की असमाप्त सूची है
युद्ध की घोषणा से पहले ही
ताबूतों का निर्माण होने लगता है
राष्ट्रीय झंडों की मांग बढ़ जाती है
जिनमें लपेट कर
शहीदों को सलामी दी जा सके…
अचानक वीरगाथा काल के कवियों का
पुनर्जन्म हो जाता है
वे मंचों पर जयघोष से आकाश गुंजाने लगते हैं
जिन्हें सुनकर सैनिकों के घरों पर
मातम की छाया मंडराने लगती है
युद्ध से नरक पैदा होता है
और नरक से युद्ध
हमारे ईश्वरों ने तो अवतार लेकर स्वयं युद्ध लड़े
युधिष्ठिर द्वारा नरो वा कुंजरो में वा के उच्चारण को
शंख ध्वनि में डुबो दिया गया
इस तरह पशु और मनुष्य का
फर्क ही मिटा दिया
गांधारी ने यह कहते हुए कृष्ण को शाप दिया
तुम चाहते तो रुक सकता था युद्ध
तुम भी पशु की तरह ही मारे जाओगे
श्राप फलित हुआ और
कृष्ण बहेलिए के द्वारा
पशु के धोखे में ही मारे गए
रामायण के अनुसार भी
रावण ब्राह्मण था
तो यह प्रश्न उठता है
कि क्या ब्राह्मण राक्षस भी होते हैं
या राक्षसों के समाज में मनुस्मृति लागू है…
कुछ मदमत्त दुनिया को जंगल समझते हैं
और खुद को शेर
उनको यह नहीं पता कि उनकी नियति
ज़ू में, सर्कस में
या बुढ़ापे में
भूखों मरकर होती है
धर्म गोया हिंसा और घृणा से बना कुंभीपाक
धर्म का ऐसा विकट बोध कि
इतिहास बोध तो सिर के बल और
काल बोध शून्य
सुनो घास की आवाज
कार्ल सैंडबर्ग के शब्दों में-
लाशों के ऊंचे ढेर लगा दो
ऑस्टर्लिट्ज1 और वाटर लू में
और उन्हें मिट्टी में दबा दो
मैं हूँ घास
मैं ढक लेती हूँ सब कुछ
और लाशों के ऊंचे ढेर गेटिसबर्ग में और
वाईप्रेस२ और वरदुन३ में भी
मिट्टी में उन्हें दबा दो
और मुझे काम करने दो
दो साल
दस साल
और मुसाफिर बस कंडक्टर से पूछेंगे
यह जगह कौन सी है
हम कहां पहुंचे हैं
यह तो सिर्फ घास का एक मैदान है
मैं घास हूँ
मुझे अपना काम करने दो।

पाश ने इसी कविता से प्रेरित होकर लिखा था-
मैं तुम्हारे हर किए धरे पर उग आऊंगा
मैं घास हूँ…

1.ऑस्टर्लिट्ज (चेक रिपब्लिक) नगर में 1805 में नेपोलियन ने रूसी और ऑस्ट्रीय सेना को पराजित किया था।
2. वाइप्रेस (बेल्जियम) युद्ध क्षेत्रों से भरा हुआ।
3. वरदुन (फ्रांस) – यहां एक लाख सैनिकों के अवशेष हैं।

विवेक खंड, 25-गोमती नगर, लखनऊ-226010  मो.9450390241

 

 

युद्ध जीवन की सामान्य लय को समाप्त कर देता है

 

अरुण कमल

प्रसिद्ध हिंदी कवि।प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित।अद्यतन कविता संग्रहयोगफल

(1) जिसे कुछ लोग उदारीकरण कहते हैं वह वास्तव में ठीक उल्टा है, यानी अनुदार, खूंखार और पूंजीपति-पक्षी।इसलिए युद्ध कम होने या खत्म होने का सवाल ही नहीं है।युद्ध कभी रुका ही नहीं।आज यूरोप में लड़ाई हो रही है तो सब परेशान हैं।लेकिन यमन, इराक, अफगानिस्तान, बोस्निया, सर्बिया, युगांडा, कांगो, हैती, बोलिविया, कोलंबिया, वेनेजुएला और पूरी दुनिया में लगातार अमेरिकी हमले होते रहे हैं।साम्राज्यवाद और पूंजीवाद युद्ध के बिना चल ही नहीं सकते।पूंजीवादी शक्तियों के बीच भी आपस में ज्यादा लूटने की होड़ रहती है।यह भी वैसा ही एक युद्ध है जिसमें नुकसान दोनों देशों के गरीबों का ही अधिक होगा।

(2) यह लड़ाई रूस और यूक्रेन का नहीं, बल्कि रूस और अमेरिका यानी नाटो के बीच है जिसका रण-क्षेत्र यूक्रेन है।नाटो, सीटो, सेन्टो, क्वाड क्यों चाहिए? हर देश संप्रभुतासंपन्न क्यों न रहे? हर देश शिक्षा पर कम और हथियार पर ज्यादा खर्च क्यों करे? हर युद्ध, चाहे जहां भी हो, वह साधारण लोगों का ही संहार करता है।अगर पटना में दूध का दाम बढ़ता है तो सरकार कहती है, यूक्रेन!

(3) पहला, दूसरा, विश्व युद्ध भी लूट के बँटवारे का युद्ध था।दूसरे विश्व युद्ध में मुख्य लक्ष्य था सोवियत संघ।लेकिन सोवियत संघ जीता।

(4) पोलिश लेखक चेस्वा मिवोश बताते हैं कि युद्ध के कारण हर थोड़े दिन पर उनके गांव का देश बदल जाता था! युद्ध जीवन की सामान्य लय को नष्ट कर देता है।जन्म, मरण, जीना सब तहस-नहस हो जाता है।फिर संस्कृति का क्या सवाल है।

(5) हमने वैसा युद्ध नहीं भोगा जैसा बाकियों ने।शायद अमेरिका ने भी नहीं भोगा।लेकिन हेमिंग्वे, स्टेनबेक जैसे लेखकों ने युद्ध को करीब से देखा और लिखा।हमारे लेखकों ने देश के अंदर के युद्ध भोगे, जैसे विभाजन, दंगे, खून-खराबा और इनपर लिखा।

(6) दुनिया की महानतम कृतियां महाभारत और रामायण यहीं तो रची गईं।जैसा मैंने कहा, हमने विश्व युद्ध जैसे युद्ध नहीं देखे।चेखव कहानी कला पर बात करते हुए, हर ब्योरे की प्रासंगिकता पर जोर देते हुए कहते हैं: अगर कमरे के वर्णन में लेखक बताता है कि दीवार पर बंदूक टंगी थी, तो कहानी खत्म होते-होते यह बंदूक चलनी भी चाहिए।तो बात यही है, अगर बंदूक है, और कहीं भी है, तो चलेगी जरूर।और उस पर चलेगी जिसके पास बंदूक नहीं

7 मैत्री शांति भवन, बी एम दास रोड, पटना-800004 मो.9931443866

 

 

कोई भी महान रचना युद्ध समर्थक नहीं हो सकती

 

कुमार प्रशांत

प्रसिद्ध गांधीवादी।गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली के अध्यक्ष।

(1) ऐसी उम्मीद किन्हें थी? उनको ही न जिन्हें इस खेल की समझ नहीं थी, या जो इस खेल में शामिल थे।उदारीकरण की योजना कोई आौर बनाए और हम पर उसे थोप दे कि आपको उदारीकरण करना है, यह कैसा उदारीकरण है? यह कुछ वैसा ही नहीं है कि हम सब नारी सशक्तिकरण के हामी हैं, लेकिन वहीं तक जहां तक हम उन्हें सशक्त करना चाहते हैं! न नारी सशक्तिकरण अच्छा शब्द है, न उससे जुड़ा भाव स्वस्थ है, न उदारीकरण शब्द अच्छा है, न उससे जुड़ा भाव अच्छा है।हमें समझना चाहिए कि आज की तारीख में व्यापार सबसे बड़ा युद्धास्त्र है।सभी आका मुल्क चाहते हैं कि उनका अस्त्र का व्यापार सारी दुनिया में फैला रहे।उदारीकरण के नाम पर हम छुटभैये भी वही खेल खेलने उतरे, लेकिन यह भूल गए कि इस खेल में साधनसंपन्न व क्रूर व काइयां ताकतें ही टिक सकती हैं।कोई यूक्रेन किसी रूस का मुकाबला नहीं कर सकता और कोई नाटो देश उसकी रक्षा में अपनी धरती पर युद्ध आमंत्रित नहीं करेगा।इस कारण न उदारीकरण से संपन्नता आई, न समता, न युद्ध का अंत हुआ।हम साम्राज्यवाद के नए-नए रूपों को पहचानना सीखेंगे तो ऐसे छलावों से बच सकेंगे।

(2) बड़े मुल्क अपने स्वार्थ के संरक्षण के लिए जो चाहें वह करें, छोटे मुल्कों को यह आजादी न है, न दी जा सकती है।सभी छोटे मुल्कों को, ‘फैज’ के शब्दों में कहा जा सकता है- चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले/जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले/वजर झुका के चले/जिस्म-ओ-जां बचा के चले।

(3) अगर अंधा नहीं है तो वह राष्ट्रवाद नहीं है।राष्ट्रवाद का अर्थ ही है अंधता! इसलिए राष्ट्रवाद खतरनाक है।राष्ट्रप्रेम इसका सकारात्मक भाव है क्योंकि प्रेम में किसी का नकार नहीं है।मैं अपने देश से प्रेम करता हूँ, इसलिए सभी की इस आजादी का सम्मान करता हूँ कि वे भी अपने देश से प्रेम करें।इसी में से यह राह भी निकलती है कि मैं दूसरे देश से भी प्रेम करता हूँ, क्योंकि मैं यह रहस्य जान चुका हूँ कि प्रेम सबकी थाती है।सभी अपने देश से प्रेम करें तो सभी इंसानों से प्रेम करना सीख जाएंगे।यह राष्ट्रवाद का विलोम भी है, और 21वीं सदी की परिभाषा भी।

(4) युद्ध संस्कृति में से नहीं, विकृति में से पैदा होते हैं।इसलिए वे संस्कृतियों को प्रभावित नहीं करते, उन्हें विकृत करते हैं।युद्ध हमेशा ही मानव के भीतर छिपे पशु को उन्मुक्त करते हैं और उसपर चढ़ी संस्कृति की चमक को खुरच-खुरच कर छील डालते हैं।इसलिए किसी भी कारण से युद्ध समर्थनीय नहीं होते।कई बार युद्ध लाद दिए जाते हैं, क्योंकि विकृत मानसिकता शांति की संस्कृति को बर्दाश्त नहीं कर पाती है।वैसे में युद्ध की मानसिकता से बचते हुए, आपद धर्म की तरह युद्ध को निभा देना पड़ता है।इतिहास में ऐसे युद्ध के उदाहरण मिलेंगे।

(5) वे सभी रचनाएं, जो मनुष्य को संस्कृति की याद दिलाती हैं, युद्धविरोधी होती हैं।मुक्तिबोध का ‘अंधेरे में’ मुझे युद्धविरोधी रचना लगती है।वह मन का अंधेरा काटने की पुकार है।युद्ध भारत की जीवन-शैली नहीं रही है।राजधर्म रहा भी हो, जनधर्म कभी नहीं रहा।इसलिए पश्चिम में युद्ध साहित्य जितना है, हमारे यहां उतना नहीं है, उस तरह का नहीं है।और यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि न हमारे यहां, न पश्चिम में कोई भी रचना युद्ध समर्थक नहीं रची गई है।हर बड़ी या महान कृति मानव-मात्र को अंतत: समझाती यही है कि युद्ध अधर्म है जिससे बचो! जो साहित्य या कला युद्ध के लिए, संहार के लिए, बर्बरता के लिए उकसाती हो वह कला का पतन है, कला का निषेध है।कला का मतलब ही है जीने की कला! 

(6) कई दूसरे देशों की तरह हिंदी में युद्ध और शांति पर कोई बड़ी रचना क्यों नहीं आ सकी, जबकि यह देश भी युद्धों से गुजरा है? यदि हम ऐसा कहते हैं तो ‘महाभारत’ को भूल जाते हैं क्या? रामायण का आधा युद्ध ही तो है।रश्मिरथी के बारे में क्या कहेंगे हम? ‘तमस’ भी युद्ध की ही बात करता है, भले उस युद्ध ने सांप्रदायिकता का चोला पहन रखा है। ‘झूठा-सच’ भी है हमारे यहां और ‘दक्षिण आफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ भी! सत्याग्रह क्या है? युद्ध ही तो है! लेकिन हम युद्ध की आड़ में जीने वाली संस्कृति के वाहक नहीं है।हम शांति की खोज करने वाली संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं।आज हम एक विकृत दौर से गुजर रहे हैं जहां घृणा को समाज की चालक-शक्ति बनाया जा रहा है।यह प्रयोग विफल होगा- भले बहुत सारा नुकसान करने के बाद! हमारा सारा साहित्य इस विकृति का निषेध करता है।

गांधी शांति प्रतिष्ठान, 221-23, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली-110001 फोन-011 23237491

 

 

 युद्ध का अर्थ मनुष्य के सह-जीवन को उजाड़ना है

 

रविभूषण

रांची विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर।वरिष्ठ आलोचक और टिप्पणीकार।प्रमुख कृतियां रामविलास शर्मा का महत्व’, ‘वैकल्पिक भारत की तलाश

(1) बीसवीं सदी के अंतिम दशक से जिस निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण का जन्म और विकास हुआ, वह ‘वाशिंगटन आमराय’ से संबंधित है।इससे कुछ देशों का ही भला होना था।उदारीकरण आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए हुआ था।किसी भी देश के आर्थिक विकास में जो आर्थिक नीतियां, नियम-कानून, प्रशासनिक नियंत्रण, प्रक्रियाएं आदि बाधा पहुंचाती थीं, उन्हें उदारीकरण के जरिए समाप्त किया गया।विश्व के साथ व्यापारिक शर्तें उदार की गईं।इसका केवल व्यापारिक पक्ष नहीं था, राजनीतिक-आर्थिक पक्ष भी था।

इसी दौर में भारत सहित दुनिया के अनके देशों में आर्थिक असमानता बढ़ी।भारत में अरबपति बढ़ते गए।जनता गरीबी में और अधिक फंसती गई।किसानों ने आत्महत्या की, बेरोजगारों की संख्या बढ़ी और लाखों की संख्या में नौकरियां खत्म हुईं।भूमंडलीकरण या भूमंडीकरण अमेरिकीकरण के अलावा और कुछ नहीं है, जबकि अमेरिकी हित और विश्वहित या जनहित में अंतर है।निश्चय ही उदारीकृत अर्थव्यवस्था से दुनिया के लगभग सभी देश कमोबेश प्रभावित हैं।प्रत्येक देश में दूसरे देशों के व्यापारिक संस्थान होने से युद्ध की संभावना समाप्त हो जाएगी, यह मात्र एक आशावाद था।

कुछ व्यापारिक प्रतिष्ठान ऐसे हैं जो कई छोटे देशों के सभी व्यापारिक प्रतिष्ठानों को निगल सकते हैं।बड़े व्यापारिक संस्थान अमेरिका के हैं या यूरोपीय देशों के।कई देशों के भीतर गृह युद्ध की स्थिति बन रही है।भारत सहित कई देशों ने लगभग इसी समय अपने सैन्य-बजट में वृद्धि की।एक ओर व्यापार का युद्ध है तो दूसरी ओर युद्ध का व्यापार है।अब अंतरराष्ट्रीय उदारवादी अर्थव्यवस्था स्वयं संकटग्रस्त है।भूमंडलीकरण और उदारीकरण को आज आर्थिक राष्ट्रवाद से चुनौतियां मिल रही हैं।नई स्थिति यह है कि पूंजीवादी देश अमेरिका एवं यूरोपीय देशों की जनता इस समय उदारीकरण के विरुद्ध हैं, क्योंकि उदारीकरण से लाभ कुछ को प्राप्त है।अंबानी-अडानी की संपत्ति इस दौर में जिस तेज रफ्तार से बढ़ी है, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती।उदारीकरण ने जिस नए विश्व का निर्माण किया है, वह कल्याणकारी न होकर ध्वसंकारी है।व्यापार के जरिए शक्तिशाली देशों ने अपने आर्थिक और राजनीतिक हित भी साधे हैं।निश्चय ही उदारीकरण के दौर में युद्ध की संभावनाएं समाप्त होने के बजाय बढ़ी हैं।यह युद्ध फिलवक्त देशों के बीच उतना न होकर, देश के भीतर उत्पन्न होगा और विविध रूपों में होगा, जिनकी पहचान हम कर सकते हैं।

(2) द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के लगभग चार वर्ष बाद चार अप्रैल 1949 को वाशिंगटन डी.सी. में नाटो (उत्तरी अटलांटिक संगठन) का गठन हुआ था।नाटो के संस्थापक देश 12 थे- संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, डेनमार्क, बेल्जियम, आइसलैंड, इटली, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, नार्वे, पुर्तगाल और युनाइटेड किंगडम (यूके)।यह दुनिया का सर्वाधिक शक्तिशाली सैन्य-संगठन है।नाटो देशों का संयुक्त सैन्य-खर्च दुनिया के कुल रक्षा-व्यय के 70 प्रतिशत से अधिक है।इसका आधा हिस्सा अमेरिका वहन करता है।इस संगठन पर नाटो के पहले महासचिव लार्ड इश्मे ने अपनी टिप्पणी में रूसियों को बाहर रखने, अमेरिकियों को अंदर रखने और जर्मनी को नीचे रखने की बात कही थी।नाटो का गठन सोवियत रूस के विरुद्ध किया गया था।सोवियत संघ को अमेरिका सहित सभी पूंजीवादी यूरोपीय देशों ने अपना शत्रु माना था।

मामला पूंजीवाद बनाम समाजवाद का था।26 दिसंबर 1951 को सोवियत संघ के विघटन की घोषणा के बाद ‘नाटो’ के कायम रहने का कोई औचित्य नहीं था।सोवियत संघ के जो पंद्रह गणराज्य अलग हुए उनमें एक यूके्रन भी है।नाटो की स्थापना कम्युनिज्म के प्रसार को रोकने के लिए हुई थी।सोवियत संघ के विघटन के पहले नाटो के कुल 16 सदस्य-देश थे, वे अब बढ़कर 30 हो चुके हैं।नाटो के 30 सदस्य देशों में 27 यूरोपीय, 2 उत्तरी अमेरिकी और 1 एशियाई देश है।

नाटो के जरिए अमेरिका ने रूस को घेरने की लगातार कोशिश की है।नाटो में पूर्वी यूरोपीय देशों के शामिल होने से रूस को खतरा है।सोवियत रूस के विघटन के पहले रूसी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव को तत्कालीन अमेरिकी राज्य सचिव जेम्स बेकर ने कहा था कि नाटो पूरब में एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगा।जर्मनी के एकीकरण के पहले गोर्बाचोव ने अमेरिकी, फ्रेंच, ब्रिटिश और जर्मन नेतृत्व को साफ शब्दों में यह कहा था कि उन्हें नाटो का विस्तार अस्वीकार्य है।सोवियत रूस ने अपना सैन्य-संगठन ‘वारसा पैक्ट’ समाप्त किया, पर नाटो को भंग करने की बात दूर रही, उसका विस्तार होता रहा।यूके्रन की सीमा से रूस की सीमा नजदीक है।

नाटो के विस्तार के पक्ष में कई अमेरिकी अधिकारी नहीं थे।रूस में अमेरिका के पूर्व राजदूत जार्ज. एफ. केनन ने अपनी सरकार को सावधान किया था कि वे एक नए शीत-युद्ध का आरंभ देख रहे हैं और नाटो का विस्तार ‘भयंकर भूल’ है।अब वादाखिलाफी के बाद रूस का अमेरिका और यूरोपीय देशों पर कोई भरोसा नहीं है।यूके्रन के चौथे राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच रूस के समर्थक थे।2014 में उनकी सरकार के बाद यूके्रन की नई सरकार का रूस के प्रति रवैया भिन्न था।जेलेंस्की रूस-विरोधी है।रूस ने अपनी रक्षा के लिए यूक्रेन में ‘सैन्य हस्तक्षेप’ किया है।अमेरिका का वहां अपना हित है।वह रूस-यूके्रन युद्ध को समाप्त नहीं होने देना चाहता।पुतिन ने अपने ऊपर बनी एक डाक्यूमेंट्री में कहा है- अगर कोई रूस का सफाया करने का फैसला करता है, तो हमें जवाब देने का कानूनी अधिकार है।हमें ऐसी दुनिया की जरूरत क्यों है, जिसमें रूस न हो।

(3) 19वीं सदी के यूरोप में राष्ट्र-राज्य और राष्ट्रवाद का उदय हुआ था।इस सदी के आरंभ में राष्ट्रवाद का जो आदर्शवादी-उदारवादी स्वभाव था, वह सदी के अंत में एक संकीर्ण सिद्धांत बन गया।निश्चय ही केवल अंध-राष्ट्रवाद प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) का मुख्य कारण नहीं था।इतिहासकारों ने इस युद्ध के प्रमुख कारणों में सैन्यवाद, गठबंधन व्यवस्था और साम्राज्यवाद को भी माना है।अंध-राष्ट्रवाद एक प्रमुख कारण था।मानव इतिहास में राष्ट्रवाद सर्वाधिक विनाशकारी युद्धों से जुड़ा है।युद्ध और राष्ट्रवाद के बीच एक अनौपचारिक ‘लिंक’ है।प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध को अंध-राष्ट्रवाद के खतरनाक प्रतीक के रूप में देखा गया है।राष्ट्रीय श्रेष्ठता, उच्चता बोध या सांस्कृतिक अस्मिता युद्ध से जुड़ जाती है।

इस परिदृश्य में एक राष्ट्र-विशेष की तुलना में दूसरा राष्ट्र गौण समझा जाता है।मैकगिल यूनिवर्सिटी में तुलनात्मक ऐतिहासिक समाजशास्त्र के प्रो. जॉन ए. हॉल और यूनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन में समाजशास्त्र के प्रो. सिमिसा मैलेसेविक ने अपनी संपादित पुस्तक ‘नेशनलिज्म एंड वार’ में राष्ट्रवाद के जन्मने के हजारों वर्ष पहले युद्ध होने की बात कही है, पर आधुनिक युग में दो विश्व युद्धों का एक प्रमुख कारण निश्चित रूप से अंध-राष्ट्रवाद था।इन दिनों 21वीं सदी में, मुख्यत: 2010 के बाद भारत सहित अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों में जिस प्रकार राष्ट्रवाद का नए सिरे से उभार हुआ है, उससे युद्ध की आशंकाएं अधिक बढ़ गई हैं।एकधु्रवीय विश्व में अंध-राष्ट्रवाद द्विधु्रवीय अथवा बहुधु्रवीय विश्व में उत्पन्न राष्ट्रवाद से भिन्न है।भारत में जिस अंध-राष्ट्रवाद का उभार है, उससे गृह-युद्ध की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

(4) युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है।उससे केवल अर्थ-व्यवस्था और राजनीति ही प्रभावित नहीं होती, संस्कृति भी प्रभावित होती है।युद्ध का संस्कृति पर प्रभाव कई रूपों में होता है।युद्ध का प्रभाव अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों होता है।महिलाएं और बच्चे युद्ध से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं।शहर नष्ट होते हैं, ऐतिहासिक इमारतें और प्रतिमाएं ध्वस्त होती हैं।इन्हें तोड़ने का मकसद किसी खास सांस्कृतिक अस्मिता या पहचान को नष्ट करना है।आखिरकार ऐतिहासिक स्थलों, कला-कृतियों, संग्रहालयों, अभिलेखागारों, पुस्तकालयों, स्मारकों को क्षतिग्रस्त या ध्वस्त करना संस्कृति को ही नष्ट करना है।सांस्कृतिक पहचानों को नष्ट करना उस देश के इतिहास और स्मृति प्रतीकों को नष्ट करना है।संस्कृति के अंतर्गत मनुष्य का जीवन, सहजीवन है, युद्ध इसे भी उजाड़ देता है।अफगानिस्तान में तालिबान ने पश्चिमी संस्कृति का त्याग न करने पर मारे जाने की बात कही थी।

सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करना इंसानियत के अतीत और वर्तमान पर आक्रमण है।युद्ध के बीच विस्थापन सामान्य बात है।रूस-यूक्रेन युद्ध में 1 करोड़ 40 लाख यूक्रेनी अपना घर छोड़कर बाहर जा चुके हैं।विस्थापन केवल बाह्य ही नहीं होता।आंतरिक विस्थापन लंबे समय तक का मामला होता है।

कार्ल वॉन हैब्सबर्ग ने सांस्कृतिक वस्तुओं के विनाश को मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा माना है।एक ओर सांस्कृतिक वस्तुओं का विनाश होता है, दूसरी ओर, आंतरिक विस्थापन का मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है।विस्थापित लोग अपने साथ दूसरे देशों में अपनी संस्कृति ले जाते हैं।वहां उनका अपना सांस्कृतिक माहौल नहीं मिलता।यह अपने खान-पान, वेश-भूषा, भाषा और सांस्कृतिक परिवेश से वंचित होना है।

(5) भारत की विविध भाषाओं में, स्वाधीन भारत में भले कम, लेकिन युद्ध पर लिखी गई रचनाएं हैं।संभवत: व्यवस्थित ढंग से इसपर कोई गंभीर शोध-कार्य नहीं हुआ है।हिंदी में गरिमा श्रीवास्तव ने अंग्रेजी विद्वानों के इस आरोप का जवाब दिया है कि हिंदी में ‘उसने कहा था’ को छोड़कर युद्ध पर आधारित कोई रचना नहीं है।उनका संकलन है ’जख्म, फूल और नमक’।इसकी भूमिका में उन्होंने कई कहानियों की चर्चा की है।युद्ध पर भारतीय भाषाओं में बड़ी साहित्य-रचना के अभाव का एक मुख्य कारण भारत में बड़े युद्धों का नहीं होना है।भारत-चीन युद्ध ने लेखकों को वैसा प्रभावित नहीं किया, जैसा सांप्रदायिक दंगों ने।गरिमा श्रीवास्तव ने ‘युद्ध और हिंदी कहानी’ लेख में अप्रैल 1909 की ‘जमाना’ पत्रिका में प्रेमचंद द्वारा छद्म नाम से लिखी गई जीवनी ‘जोन ऑफ आर्क’ को युद्ध पर लिखी हिंदी की पहली कहानी माना है।इसमें युद्ध की पृष्ठभूमि का सजीव चित्रण है।प्रसाद की ‘शरणागत’, प्रेमचंद की ‘फातिहा’, गुलेरी की ‘उसने कहा था’ और ‘हीरे का हीरा’, उग्र की ‘अवतार और देशद्रोह’ और ‘पंजाब की महारानी’, जैनेंद्र की ‘स्पर्धा’, कौशिक की ‘पेरिस की नर्तकी’, ‘प्रतिहिंसा’, अश्क की ‘खटक’, ‘कैप्टन रशीद’, रामप्रसाद घिल्डियाल पहाड़ी की ‘चीन के आंचल’ और ‘अतिथि’ जैसे अनेक लेखकों की सूची गरिमा श्रीवास्तव ने प्रस्तुत की है।पर जो प्रभाव और महत्व ‘उसने कहा था’ कहानी का है, वैसा किसी अन्य कहानी का नहीं है।युद्ध पर भारतीय भाषा में किसी बड़ी साहित्य-रचना की प्रतीक्षा है।

(6) युद्ध और शांति पर आज भी विश्व का महानतम उपन्यास टालस्टाय का ‘वार एंड पीस’ है।इस उपन्यास के प्रकाशन (1869) के तीस वर्ष पहले 1839 में फ्रांसीसी लेखक स्टेंढल का उपन्यास ‘द चार्टर हाउस ऑफ पर्म’ प्रकाशित हुआ था, जिसका आरंभ फ्रांसीसी सेना के मिलान में घुसने से होता है।प्रथम विश्वयुद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध, अमेरिकी गृह युद्ध, स्पैनिश गृह युद्ध, श्रीलंका के गृह युद्ध आदि पर अनेक उपन्यास लिखे गए हैं।प्रथम विश्व युद्ध पर फे्रंच उपन्यासकार और सैनिक हेनरी बारबुसे के उपन्यास ‘लेफ्यू’ (अंडर फायर, 1916) से साहित्य में युद्ध विरोधी आंदोलन की शुरुआत भी हुई थी।

ब्रिटिश इतिहासकार लौरा आशे और ब्रिटिश कवि इयान पैटर्सन की पुस्तक ‘वार लिटरेचर’ (2014) है, पर हिंदी में युद्ध और शांति पर कोई विशेष उल्लेखनीय रचना नहीं है।निश्चय ही जगदीश चंद्र के उपन्यास ‘टुंडा लाट’ और ‘लाट की वापसी’ और विवेकी राय का ‘मंगल भवन’ युद्ध आधारित उपन्यास हैं।महुआ माजी का पहला उपन्यास ‘मैं बोरिशाइल्ला’ बांग्ला देश के युद्ध पर है।भारत अन्य देशों, विशेषत: यूरोपीय देशों की तरह युद्ध के भयावह परिणामों से नहीं गुजरा है।भारतीय जीवन और समाज की अपनी भिन्न समस्याएं हैं।इसलिए  युद्ध पर कथाकारों का विशेष ध्यान नहीं गया और कोई बड़ी रचना नहीं आ पाई।

204, रामेश्वरम साउथ ऑफिस पाड़ा, डोरंडा, रांची-834002 (झारखंड) मो.9431103960

 

 

 युद्ध के मैदान में जो नहीं होते, वे भी अपने भीतर एक मृत्यु मरते हैं

 

विजय कुमार

कविआलोचकनिबंधकारअनुवादक।कविता व आलोचना की अब तक नौ पुस्तकें प्रकाशित।अद्यतन पुस्तक एडवर्ड सईद : जनबौद्धिक की भूमिका’ (विचार)

(1) रूस और यूक्रेन के बीच छिड़े युद्ध ने फिर से इस बात को रेखांकित कर दिया है कि ‘जियो पॉलिटिक्स‘ हमारी २१वीं सदी की फिजा में सबसे ज्यादा गूंजता हुआ शब्द है।पिछली सदी के अंतिम दशक में ग्लोबलाइजेशन प्रक्रिया और आर्थिक उदारीकरण की तमाम बातों ने एक मिथक रचा था।यह धारणा बनाई गई थी कि दूसरे महायुद्ध के बाद से जारी शीत युद्ध का वह दौर खत्म हुआ, जब राष्ट्रों के निजी हित ही प्रमुख थे।कहा जा रहा था कि सोवियत संघ के विघटन के बाद अब इस एकध्रुवीय बनती नई दुनिया में खुली अर्थव्यवस्था, बहुराष्ट्रीय निगम, विश्व मुद्रा कोष, विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन, उत्पादन और निवेश का विश्वस्तर का पैमाना, पूंजी के निर्बाध संचरण, फैलता हुआ बाजार, उन्नत टेक्नोलॉजी और संचार क्रांति जैसी चीजों ने हमारी इस धरती को एक ग्लोबल विलेज में बदल दिया है।

यह भी दावे किए जा रहे थे कि स्वायत्तताओं के अर्थ बदल रहे हैं और संस्कृतियों के परस्पर संवाद, एकसूत्रता और जीवन शैलियों के सम्मिश्रण विकास के एक नए युग को रचेंगे।साथ ही २१वीं सदी का नया समय और उसका फलसफा विश्व राजनीति के शतरंजी बिसात पर क्षेत्रीय  असंतुलनों, राष्ट्रों के आपसी टकराव, पुराने झगड़ों, शिविरबंदियों, युद्ध, कलह जैसी सब चीजों को अप्रासंगिक बना देगा।लेकिन यह एक मोहक सपना था।वह बहुत जल्दी बिखर गया।

यह कैसी विश्व चेतना थी कि इसमें शीतयुद्ध के समय के वे आपसी मतभेद, खेमेबाजी, अविश्वास, घृणा, नियंत्रण और विस्तारवाद की राजनीति, मीडिया की व्यूह रचनाएं, गढ़े गए सच और उग्र राष्ट्रवाद के  पुराने अहंकार नए-नए भेस धारण कर लौटते रहे! साथ ही आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया से इस धरती का एक बड़ा हिस्सा अभी तक अछूता ही रहा।पूरब और पश्चिम के बीच टकराव बने रहे।विकास की अवस्थाओं के आधार पर इस दुनिया को उत्तर और दक्षिण की भौगोलिक स्थितियों में विभाजित करने वाली वे पुरानी परिभाषाएं और पूर्वग्रह भी यथावत बने रहे।आय की असमानता, अतिक्रमण, कबीलाई हिंसा, सूखा, बाढ़, भुखमरी और बलात थोपे गए युद्धों ने लाखों लोगों को खानाबदोश बना दिया।यतीम, विस्थापित और बेदखल किए गए लोगों की संख्या बढ़ती गई।उन्नत देशों में जेनोफोबिया चरम पर था और अपने से भिन्न ‘अन्य’ की यह धारणा नए-नए रूप लेती रही।सीरिया, लेबनान, इराक, अफगानिस्तान, ग्वाटेमाला, वेनेजुएला, होंडुरस आदि  इलाकों से उखड़े हुए लाखों लोग शरणार्थियों के रूप में विकसित देशों के दरवाजों पर पहुंच रहे थे।उनका कोई देश, कोई घर नहीं रह गया था।इन्हें अपने यहां घुसने से रोकने के लिए विकसित देशों ने अपनी सीमाओं की बाड़ेबंदी कर ली।आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में वैश्विक संस्थाएं और तमाम एनजीओ संगठन, राष्ट्र-राज्य की व्यवस्थाओं पर दबाव डालते हुए, अपनी गतिविधियों में लगे हुए हैं।उसी के समानांतर ग्लोबल दुनिया में आधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस आतंकवाद भी एक बड़े ‘नॉन स्टेट प्लेयर’ के रूप में उभरा है।

दुनिया के एक ग्लोबल विलेज बनने और पृथ्वी पर सबके समान हितों की अवधारणाएं वस्तुतः बाजार अर्थव्यवस्था के आगमन के एक दशक बाद ही तब धराशायी हो गई थीं, जब अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला हुआ था।उसके बाद 2003 में अमेरिका द्वारा यह बहाना बनाकर इराक पर आक्रमण करना कि सद्दाम हुसैन के पास भयानक जनसंहार के हथियार हैं और इस आधार पर वहां लाखों लोगों को मार डालना टेक्नोलॉजी और वित्तीय हितों की दुनिया में एक नए समय के आगमन के संकेत थे।संस्कृतियों, जातियों, नस्लों, धर्मों के बीच अंतर्संबंध की वे बातें हवा हो गईं।समय और ज्यादा आक्रामक, अनिश्चित, क्रूर और जटिल होता गया।

अब यूक्रेन पर रूस के भीषण आक्रमण और वहां हुए भारी विनाश ने ग्लोबलाइजेशन के बाद के हमारे समय में एक सर्वथा नए किस्म की रिक्तता को निर्मित किया है।इसकी छाप न जाने अगले कितने दशकों तक बनी रहेगी।यह एक तथाकथित एकधु्रवीय दुनिया है, जिसमें यूक्रेन पर रूसी बम गिर रहे हैं।नगर उजड़ रहे हैं।लाखों बेकसूर जिंदगियां तबाह हो रही हैं।अनगिनत संख्या में लोग दर बदर हो रहे हैं, यतीम बन रहे हैं।लेकिन इस आपदा के मूल कारणों पर कोई बहस नहीं है।

महाशक्तियों के भले और निर्दोष होने के अपने-अपने दावे हैं।इनके बीच न आक्रांता की पैशाचिक हरकत के पीछे के मूल कारणों पर कोई बुनियादी विमर्श है और न अतिक्रमित के विनाश से जुड़े सवालों पर कोई नैतिक कचोट है।कोई जवाबदेही भी नहीं है।अलगाववादी क्षेत्रीयताओं के अलग-अलग आधारों पर बंटे हुए देशों के बीच एक नष्ट होते देश का प्रमुख अपनी संप्रभुता को बचाए रखने के लिए बदहवास होकर अपने आकाओं से कह रहा है कि वे इस भयावह विनाश को रोकने में अपना सार्थक हस्तक्षेप करें।लेकिन उन्नत देशों की कारोबारी दुनिया इस युद्ध की आग में सिर्फ घी डालने का काम कर रही है।न सामरिक हितों से जुड़े उनके स्वार्थ गौण हो रहे हैं, और न युद्ध विराम को लेकर सीधे कोई हस्तक्षेप, कारगर पहल या सुलह वार्ता!

इस युद्ध ने ‘नाटो‘ को एक ‘वित्तीय नाटो’ में बदल दिया।रूस में बाहरी निवेश को रोकने, वित्तीय कारोबार को स्थगित कर देने, मुद्रा करेंसी, बैंकीय लेन-देन पर पाबंदी लगा देने, हवाई जहाजों की उड़ानों को स्थगित कर देने या रूस से होने वाले तेल और गैस के आयात पर रोक लगाकर वे इस युद्ध में अनुपस्थित रहकर भी हावी रहना चाहते हैं।इन पाबंदियों और प्रतिबंधों ने आक्रांता को और भी ढीठ और वहशी बना दिया।उन्नत पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन को हथियारों की सप्लाई ने फिर इस बात को प्रमाणित किया है कि इस भूमंडलीय अर्थव्यवस्था में विकास के तार सैन्यीकरण की प्रक्रिया और विशाल पैमाने पर हथियारों के उत्पादन से जुड़े हुए हैं।इस तरह सारा प्रतिरोध एक आभासी नाटकीयता में बदल जाता है।

उदारवाद, मुक्ति, गणतंत्र, जनाधिकार, स्वायत्तता के मुहावरों से टेलीविजन शो, ट्विटर, वीडियो, साइबर सेल, इंस्टाग्राम, टिकटॉक और इमोजी भर जाते हैं।लेकिन इन चीजों से न आक्रांता के टैंक सीमाओं से वापस लौटते हैं और न आहत देश के अभिशप्त जन साधारण का त्रास कहीं भी कम होता है।संचार टेक्नोलॉजी की क्रांति ने एक ऐसा तकनीकी-व्यावसायिक ‘इको सिस्टम’ तैयार किया है जो मन मुताबिक ‘सच’ को गढ़ता है, झूठ को फैलाता है और यहां बंधुत्व का स्थानापन्न एक ‘अन्य’ की उपस्थिति है।इस ‘अन्य’ को हिकारत से देखा जाता है।

निवेश वित्त, शेयर मार्केट, इंटरनेट, मनोरंजन और उपभोग की चमकीली दुनिया की सतह के  नीचे धार्मिक और जातीय दुराग्रहों, नस्ल भेद, क्षेत्रीय असंतुलनों, अलगाववाद, दमन चक्र, नरसंहार से जुड़े नृशंस समय की ये वे जटिल अंतर्धाराएं हैं जो हमारे वर्तमान को रच रही हैं।अभी कुछ दशक पहले फ्रांसिस फूकोयामा इतिहास के अंत की घोषणा कर रहा था।कहां है आज उसका यह तर्क कि विश्व भर में उदारपंथी जनतांत्रिक सरंचनाओं के विस्तार का युग आ गया है।बर्लिन की दीवार के गिरने और सोवियत के विघटन पर उसने कहा था कि इतिहास की गति सरल रैखिक है और अब मनुष्यता अपने सामाजिक सांस्कृतिक विकास की चरम स्थिति को प्राप्त कर लेगी।वह आशावाद कहां चला गया?

(2) वर्तमान संकट के मूल में यूक्रेन, रूस और सोवियत संघ का पुराना इतिहास है।इसी के साथ  यूरोप के देशों में दूसरे महायुद्ध के बाद बने उत्तर एटलांटिक संधि संगठन (‘नाटो’) का विस्तारवाद   और अमेरिका द्वारा अपनी ताकत के वर्चस्व से जुड़ी रणनीतियां इस संकट की बुनियाद में हैं।रूस ने यूक्रेन पर हमला कर ‘नाटो’ संगठन से जुड़े पश्चिमी मुल्कों के सामने एक नए शक्ति संतुलन को रचने और यूरेशिया में एक महाशक्ति के रूप में सोवियत संघ वाली अपनी उस पुरानी छवि को दोबारा प्राप्त करना चाहा है।इससे पहले कि ‘नाटो’ संगठन से जुड़े देश रूस के लिए कोई चुनौती पैदा करते, रूस ने पड़ोसी देश यूक्रेन के सैन्य ढांचे को नष्ट कर यूक्रेन के पूर्वी हिस्से को अपनी सुरक्षा के लिए ‘बफर’ बनाने का प्रयास किया है।दोनेत्स्क, लुहानस्क और क्रीमिया, जहां रूसी मूल के बहुसंख्यक हैं, के इलाके रूस को काला सागर पर अपना सामरिक नियंत्रण स्थापित करने की सुविधा देते हैं।

दिलचस्प है कि यूक्रेन पर हमला करते हुए पुतिन ने कहा था कि इस आक्रमण का उद्देश्य  यूक्रेन में वहां की जनता को वर्तमान शासन की सैन्य शक्ति, नरसंहार और नाजी प्रभावों से मुक्ति दिलाना है।लेकिन इतिहासकार कहते हैं कि पुतिन के द्वारा यूक्रेन को नाजीकरण से मुक्ति दिलाने की बात एक नितांत गैर-ऐतिहासिक संदर्भ है।यह सच है कि दूसरे महायुद्ध के समय यूक्रेन के कुछ लोग नाजियों के सहयोगी रहे थे।लेकिन उसी दौरान वहां लगभग १५ लाख यूक्रेनी यहूदी गैस चैम्बरों में मार भी तो डाले गए थे।८० वर्ष बाद वर्तमान यूक्रेनी सरकार को नाजीवाद से जोड़ना एक गढ़े गए प्रोपेगेंडा सच के अलावा कुछ नहीं।एक इतिहासकार ने अभी ‘टाइम’ पत्रिका में कहा कि पुतिन को यूक्रेन के नाजियों से डर नहीं, वास्तविक डर अपने पड़ोस में यूक्रेन की जनतांत्रिक व्यवस्था से लगता है कि कल रूस में भी कहीं जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवाज न उठने लगे।

सच यह है कि प्रोपेगेंडा आधारित सच को गढ़ने की ये तमाम कोशिशें दोनों तरफ के सत्ता शिविरों से होती हैं।स्थितियों में कहीं कोई बदलाव नहीं आया है।मानव-अधिकारों की रक्षा की दोमुंहा बात करना और उसी समय महाशक्तियों द्वारा छोटे मुल्कों पर चुने हुए तरीके से युद्ध लाद देना हमारे वर्तमान समय में बहुराष्ट्रीय संस्थाओं के औचित्य और वैश्विक संस्कृति के समूचे तर्क को ही निरस्त करने लगता है।

(3) अंध-राष्ट्रवाद और सत्ताओं के निजी स्वार्थ इस ग्लोबल समय में कभी खत्म नहीं हुए।इस युद्ध ने साम्राज्यवादी ताकतों, श्रेणियों में विभक्त शक्ति सरंचनाओं, प्रोपेगेंडा मशीनरी, वर्चस्व के सूक्ष्म खेल और संविधान प्रदत्त राजनीतिक आत्मपरकताओं के उस नए समय पर से पर्दा उठा दिया है जो अपने खेल भी खेलता रहता है और नई-नई शक्लों में नैतिक होने के दावे भी करता रहता है।यही हमारा समय है जिसमें सुविधानुसार कभी ग्लोबल की बात और कभी भौगोलिक प्राथमिकताओं, कभी राष्ट्रीय संप्रभुताओं की बात, तो कभी छुपे हुए आपसी वैर और घृणा का राग और कभी तथाकथित नियमबद्ध वैश्विक व्यवस्थाओं की बात एक पश्चिमी परिप्रेक्ष्य को शेष दुनिया के लिए अनिवार्य बना देने की रणनीतियां बनी हुई हैं।इनमें सारे अंतर्विरोधों को ढक देने के प्रयास किए जाते हैं।

(4) युद्ध केवल किसी देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति को ही नहीं बदल देते, वे गहरे स्तर पर जाकर सामाजिक संरचना, जीवन मूल्यों, जीने के तरीकों और जनसाधारण के सामूहिक अवचेतन के भीतर विशाल क्रम-भंगताओं और निर्वात को पैदा करते हैं।कहा जाता है कि युद्ध के मैदान में जो नहीं होते, वे भी अपने भीतर एक मृत्यु मरते हैं।

युद्ध के अकाल मृत्यु, शारीरिक अंग-भंग, यौन हिंसा, कुपोषण, बीमारियां और अशक्तता- बहुत सारे सीधे दिखने वाले प्रभाव हैं, लेकिन युद्धों ने जनमानस के भीतर जो एक विस्थापन, विच्छिन्नता, आघात, अकेलेपन और हताशा की स्थितियों को जन्म दिया है, वे एक नए परिवेश को रचती रही हैं।दूसरे महायुद्ध में ६ करोड़ लोग मारे गए।यूरोप में समर्थ पुरुष कम हो गए।स्त्रियां घर और बाहर दोनों की सारी जिम्मेदारी संभालने के लिए विवश हो गईं।पीढ़ियों के बीच चेतना और मूल्यबोध के विशाल अंतराल पैदा हुए।एक तीव्र मोहभंग के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव पड़े।पारिवारिक ढांचों  में बहुत बड़ा बदलाव आया।आतंक, असुरक्षा, आर्थिक विपन्नता, संबंधहीनता, अकेलेपन, दुश्चिंताओं, अपराधबोध, अवसाद और इस तरह की दूसरी तमाम स्थितियों तथा आस्था के विघटन ने सामुदायिक जीवन की लय को ही बदल दिया।देखा जा सकता है कि युद्धोत्तर काल के यूरोप का समयबोध युद्ध पूर्व के समय बोध से एकदम भिन्न था।

सारी मृत्यु कभी दर्ज नहीं होती।बस उसके घटने की कुछ गवाहियां कला, साहित्य, संस्कृति, दर्शन के भीतर बची रह जाती हैं।युद्धोत्तर यूरोपीय कला और साहित्य में समय की जो छवियां उभरीं, वे जैसे किसी क्षणभंगुरता के बीच किसी नैतिक विकलता और सांस्कृतिक प्रतिरोध की गवाहियां बन गईं।

आधुनिक कला का जन्म ही एक गहरे मोहभंग से हुआ है।पहले महायुद्ध के बाद साहित्य में पुरानी विक्टोरियन सजावटी भाषा अप्रासंगिक हो गई थी।कला में अतियथार्थवाद और अभिव्यंजनावाद ने  एक विरूपित परिप्रेक्ष्य में खंडित मनुष्य-देहों, विश्रृंखलित समाजों और नैतिक उथल-पुथल को रचा था।इस कला में निहिलिज्म और जीवन-इच्छा के मार्मिक द्वंद्व हैं।ये कलाकृतियां व्यक्ति के आत्मजगत और समुदाय के बीच के संबंधों को नए तरीके से देखती हैं।वे एक नए समय में कला में यथार्थ के प्रतिनिधित्व के सवालों को उठाती हैं।दूसरे महायुद्ध की विनाशलीला, यातना शिविरों में उत्पीड़न और आश्तवित्ज के गैस चैंबरों में योजनाबद्ध ढंग से ६ लाख यहूदियों के नरसंहार के बाद यह प्रश्न उठा कि क्या अब भी कविता लिखना संभव है?

कहा गया कि यह त्रास शब्दों से परे है, इतना व्यापक कि उसे समेटना संभव नहीं, इतना भीषण कि उसकी अभिव्यक्ति हो नहीं सकती।

कहा गया कि युद्ध के यथार्थ को कविता में वर्णित नहीं किया जा सकता, क्योंकि कविता तो बहुत कोमल विधा है।उसमें संगीत है और वह सौंदर्य की अभिव्यक्ति है।लेकिन कविता ने उस स्तब्धता को तोड़ा।वह एक नए ढंग से अपने समय की गवाह बनी।त्रासदियों के बाद जो कवि बचे रहे, उन्होंने मनुष्य के जीने की व्यवस्था का एक संपूर्ण विखंडीकरण देखा था।उनकी कविताओं ने अनुभव को संजोया, स्मृति को बचाया, शोक को रचा।कविता संस्कृति और सत्ता के शक्ति-तंत्र के बीच एक नई भाषा में किसी विकल चीत्कार, किसी जिजीविषा के अर्थों की सृष्टि और उसकी अनुगूंज बन कर उभरी।सामूहिक अवचेतन में बैठे असुरक्षा, नैराश्य, हताशा, अस्थिरता और अवसाद के मनोभावों के बीच बचे रहने और रचने का यह फलसफा एक नया सांस्कृतिक बोध बन गया।

(5-6) साहित्य में युद्ध को कई तरह से देखा गया है।लेकिन सबसे महत्वपूर्ण रचनाएं वे हैं जो युद्ध के कारण सभ्यता के विघटन से जुड़े सवालों और मनुष्य के भीतर की किसी नैतिक विकलता के परिप्रेक्ष्य को रचती हैं।विश्वस्तर पर रूसी टॉल्स्टॉय के ‘वार एंड पीस’, अमरीकी हेमिंग्वे के ‘फॉर हूम दि बेल टॉल्स’ से लेकर अफगानिस्तानी खालिद हुसैनी के ‘दि काइट रनर’ तक पचासों क्लासिकल कृतियों के नाम गिनाए जा सकते हैं।हिंदी और भारतीय भाषाओं में ऐसी रचनाएं अधिक नहीं हैं।शायद एक कारण यह हो कि हमारा युद्ध का वैसा प्रत्यक्ष अनुभव नहीं रहा है।लेकिन हिंदी में धर्मवीर भारती के काव्य-नाटक ‘अंधायुग’, नरेश मेहता के ‘संशय की एक रात’ और ‘महाप्रस्थान’ जैसी रचनाएं युद्ध से जुड़े नैतिक प्रश्नों और एक निर्वात की चर्चित रचनाएं हैं, भले इनका कथानक मिथकीय हो।युद्ध में शामिल होने के अपराध बोध को व्यक्त करती मुक्तिबोध की कहानी ‘क्लाथ इडरली’ एक कालजयी रचना है।दूसरे महायुद्ध की पृष्ठभूमि पर सत्तर के दशक में लिखा गया गिरीश अस्थाना का उपन्यास ‘धूप छांही रंग’ खासा चर्चित रहा है।

इधर के समय में सुंदर चंद ठाकुर का उपन्यास ‘पत्थर पर दूब’ सैन्य जीवन के अनुभवों को रचता एक महत्वपूर्ण उपन्यास है।कथाकार मधु कांकरिया ने अपनी चर्चित कहानी ‘युद्ध और बुद्ध’ में एक सैनिक के व्यक्तित्व में समाहित किए जाने वाले हिंसा, अमानवीयता और क्रूरता के तत्वों को रेखांकित करते हुए मनुष्य के भीतर के अपराधबोध को सशक्त अभिव्यक्ति दी है।युद्ध कभी खत्म नहीं होता।उसके दूरगामी असर परोक्ष तरीके से व्यक्ति के जीवन को बदल देते हैं।

इधर प्रकाशित ओमा शर्मा की चर्चित कहानी ‘दूसरा विश्वयुद्ध’ उस आतताई और निरंकुश सत्ता की शिनाख्त करती है जिसकी ‘माइक्रोरियलिटी’  बड़े निजी स्तर पर भी घटित होती रहती है।एक परिवार की अंदरूनी दुनिया की झांकी, व्यक्तिगत त्रासदियों के अनकहे सच, क्रूरताओं के गोपनीय इतिहास, दमित व्यक्तित्व, लाचारियां और इतिहास के एक भयावह कालखंड की सार्वजनिकता को यहां एक-दूसरे के बगल में रख दिया गया है।

क्या किसी तानाशाह की भयावह पाशविकता, दमन, वर्चस्ववाद का उसका नंगा रूप, उसके संहारक व्यक्तित्व की जटिलताएं – इन सबकी यहां-वहां उभरती कुछ झांकियां- क्या वस्तुतः इतिहास के किसी कालखंड की गाथाएं हैं? सामाजिक, पारिवारिक संबंधों के विकृत होते जाने का यह इतिहास, यह समूचा बेतुकापन तो जैसे आज भी पास-पड़ोस में घटित हो रहा है।अहं के विस्फोट, जीने की अनिश्चितताएं, इस्तेमाल की राजनीति, षड्यंत्र, विश्वासघात, झूठ को सच में बदल देने की तरतीबें, यानी छह साल चलने वाले दूसरे विश्व युद्ध की वह बड़ी लड़ाई क्या सन १९४५ में समाप्त हो गई थी? नहीं, वह अब घरों में, परिवारों में घुस आई।वह निजी स्तरों पर व्यक्ति के जीने, और उसकी स्वतंत्रता का स्पेस निर्धारित करने लगी। ‘दूसरा विश्वयुद्ध’ कहानी में यह सब अनुपस्थित होकर भी हर जगह उपस्थित है।

उर्दू में अहमद नदीम कासमी की ‘सिपाही बेटा’, ‘बूढ़ा सिपाही’ और ‘हीरा’ जैसी कहानियां युद्ध के मनोविज्ञान की महत्वपूर्ण कहानियां हैं।और मंटो की कहानी ‘आखिरी सेल्यूट’ को कैसे भुलाया जा सकता है, जिसमें दूसरे विश्वयुद्ध में लड़ने वाले उन दो हिंदुस्तानी सिपाहियों की कथा है जो साथ में लड़े थे।एक ही गांव और एक ही तहजीब में रचे-बसे हिंदू-मुस्लिम सिपाहियों को कश्मीर की लड़ाई ने एक दूसरे के आमने-सामने खड़ा कर दिया था।

समय बीतता है।विनाश के चिह्न बचे रह जाते हैं।वह विनाश जो बाहर ही नहीं, आदमी के भीतर भी घटा है।साहित्य उसी की एक अमिट गवाही रचता है।वह संस्कृति का एक दस्तावेज बन जाता है।

-302, महावीर रचना, सेक्टर-15 सीबीडी बेलापुर, नवी मुबंई-400614  मो. 9820370825

 

 

 युद्ध के पीछे काम करते हैं आर्थिक स्वार्थ

 

वैभव सिंह

चर्चित रचनाकार और आलोचक।अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में अध्यापन।अद्यतन पुस्तककहानी:  विचारधारा और यथार्थ

(1) उदारीकरण के दो पक्ष हैं, जिनका ध्यान रखना चाहिए।पहला पक्ष वह है जिसमें विशाल उपभोक्ता-वर्ग को तैयार किया जाता है और बाजार, मेगास्टोर्स, साइबर गतिविधि तथा शापिंग आदि की संस्कृति को प्रत्यक्ष रूप में बढ़ावा दिया जाता है।दूसरा पक्ष वह है जिसमें धन व प्राकृतिक संसाधनों को चंद लोगों के हाथों में संकेंद्रित कर दिया जाता है तथा निजीकरण-एकाधिकार को बढ़ावा दिया जाता है।यही निजीकरण-एकाधिकार संसार में अशांति व युद्ध को पैदा करता है।परिणामस्वरूप उदारीकरण के पश्चात संसार में हिंसा कम नहीं हुई, बल्कि बढ़ी है।

कई छोटे-बड़े युद्ध पूरे विश्व में जारी हैं तथा बाजारों व प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए कई बड़े देश लगातार अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं।करोना जैसी विश्वव्यापी महामारी के समय भी, जब संसार भर में अर्थव्यवस्थाएं सिकुड़ने लगीं, बड़ी हथियार कंपनियों के हथियार बिकने बंद नहीं हुए।उलटे अस्त्र-शस्त्र उद्योग अधिक बढ़ गया।उदारीकरण ने प्राइवेट कंपनियों के लिए असीमित लाभ की संभावना को भी पैदा किया है।जिसे असीमित लाभ कमाने का अवसर मिलेगा, वह अपने अनुसार भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग को तैयार कर लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट कर देगा।संसार के कई देशों में नव-नाजीवाद तथा अधिनायकवाद इसी की देन है।बाजार तथा ऊर्जा संबंधी संसाधनों पर एकाधिकार के लिए पूंजीवाद लगातार युद्ध की स्थितियां बनाए रखता है, जो उदारीकरण के दौर में भी नजर आ रहा है।इटली के प्रसिद्ध मार्क्सवादी चिंतक एंटोनियो ग्राम्शी ने एक स्थान पर लिखा है- ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्पन्न होने वाला फासीवाद क्या है? यह वास्तव में उत्पादन और विनिमय की समस्या को मशीनगनों तथा पिस्तौल के बल पर हल करने का ही एक प्रयास होता है।इतिहास हमारा शिक्षक होता है, पर दुर्भाग्य से कई बार उसका कोई छात्र नहीं होता है।’   

(2) इस सवाल का जवाब थोड़ा विस्तार से देना होगा, क्योंकि यह जटिल मामला है।रूस-यूक्रेन के युद्ध में मीडिया की सनसनीखेज खबरों में वास्तविकता को दबाया जा रहा है।इस युद्ध के पीछे प्रकट वजह यह बताई जाती है कि यूक्रेन को अमेरिका और यूरोप के देश नाटो में शामिल कर रहे हैं और रूस ने अपनी असुरक्षा के कारण यूक्रेन पर हमला किया है।या यह कि रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने रूस को बहुत लड़ाकू तथा विस्तारवादी देश बना दिया है।यह सब आधा सच है।इस युद्ध के मूल में रूस के पास एकत्र प्राकृतिक गैस और बायोफ्यूल के भंडार तथा उसके लिए यूरोपीय देशों में अपने बाजार को तलाशने की समस्या है।

सोवियत संघ के विखंडन के बाद से रूस को अपनी आर्थिक शक्ति के लिए नए आधारों की खोज करनी थी।इसके लिए उसने ऊर्जा के स्रोतों पर ध्यान दिया तथा प्राकृतिक गैस और तेल में बड़ा निवेश किया।इस कारण आज रूस संसार का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस का उत्पादक देश बन गया है।इसी ऊर्जा भंडारण के बल पर उसने रिकार्ड स्तर पर विदेशी मुद्रा एकत्र कर ली है।यूरोप तथा रूस दोनों परस्परनिर्भर हैं।रूस तेल-गैस देता है और बदले में उसे भारी धन मिलता है।जर्मनी तो अपने लिए आधी नेचुरल गैस तथा तीस फीसदी कच्चा तेल रूस से लेता है।सोवियत संघ के समय से साइबेरिया से लेकर पश्चिमी यूरोप तक गैस व तेल पाइपलाइन बनाने की कोशिशें चल रही थीं, जिसे अमेरिका रोकता था और प्रतिबंध लगाता था।पहले रूस के तेल और गैस का निर्यात यूक्रेन के रास्ते होता था और यूक्रेन को ‘ट्रांजिट देश’ के तौर पर भारी मुआवजा तथा सस्ता ईंधन मिलता था।

2004 में रूस समर्थित सरकार के स्थान पर यूक्रेन में पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित सरकार बनी तो यह करार खतरे में पड़ गया।इसके बाद रूस ने 2011 में प्राकृतिक गैस को सीधे रूस से जर्मनी भेजने के लिए नार्ड स्ट्रीम नामक पाइपलाइन बनानी आरंभ कर दी।यूक्रेन को ट्रांजिट फीस देनी बंद कर दी।इसके बाद 2018 में अगले चरण में नार्ड स्ट्रीम-2 भी तैयार होने पर रूस-जर्मनी में सहमति बन गई।यह पाइपलाइन सितंबर 2021 में बन भी गई।इससे अमेरिका की परेशानी बढ़ी तथा प्राकृतिक गैस और तेल के मामले में रूस पर पश्चिमी देशों, खासतौर पर जर्मनी की बढ़ती निर्भरता से वह चिंतित हो गया।इस पाइपलाइन के निर्माण से यूक्रेन को बहुत घाटा था, क्योंकि ट्रांजिट देश के तौर पर उसे अरबों डालर मिलने बंद हो जाते।उधर, अमेरिका को डर सता रहा था कि इससे रूस धीरे-धीरे यूरोपीय यूनियन को दो हिस्सों में बांट देगा, क्योंकि वह यूरोपीय देशों की ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा।

यूक्रेन की हैसियत अमेरिका के लिए ट्रंप कार्ड जैसी थी।उसी ने 2014 में वहां बुरी तरह से बेईमानी के शिकार चुनाव के माध्यम से एक घोर दक्षिणपंथी सरकार बनवाई।यूरोप को तेल-गैस की आपूर्ति के लिए यूक्रेन की जमीन का इस्तेमाल करने पर रूस की निर्भरता समाप्त होने से अमेरिका के लिए यूक्रेन जैसा ट्रंप कार्ड बेकार हो जाता, क्योंकि वह रूस को यूक्रेन के जरिये ही ब्लैकमेल कर सकता था।इसलिए उसने यूक्रेन को नाटो से जोड़ने, सैन्य स्तर पर मदद देने तथा रूसी सीमा पर शस्त्र जमा करने के नाम पर रूस के खिलाफ खड़ा किया।

मकसद था नार्ड स्ट्रीम-2 जैसे गैस पाइपलाइन के प्रोजेक्ट को ठप कराना, ताकि यूरोप पूरी तरह रूस पर गैस व तेल की आपूर्ति के लिए निर्भर न हो सके।रूस को यूक्रेन का सैन्यवादी उकसावा पसंद न आया।उसने हमला कर दिया।इससे अमेरिका को लाभ मिला, क्योंकि इस हमले के बाद खुद जर्मनी ने नार्ड स्ट्रीम-2 को चालू करने से मना कर दिया।इस प्रकार रूस-यूक्रेन युद्ध के पीछे असल कारण अमेरिका द्वारा रूस के प्राकृतिक गैस के भंडार को यूरोप में, खासतौर पर जर्मनी, हंगरी व आस्ट्रिया में खपाने से रोकना है।

(3) अंध-राष्ट्रवाद ऐसी चीज है जिससे राष्ट्रवाद को बहुत क्षति पहुंचती है तथा उसका विकृत रूप प्रकट होता है।उसके माध्यम से विस्तारवाद, सैन्यवाद तथा उग्र दक्षिणपंथ को बढ़ावा मिलता है।यह विश्वशांति के लिए अकसर खतरे के रूप में होता है।वर्तमान में दुनिया में तीन प्रकार की शक्तियां हैं जो विश्वशांति के लिए खतरा हैं।पहला बेलगाम पूंजीवाद, दूसरा धार्मिक कट्टरता और तीसरा अंध-राष्ट्रवाद।कहने की आवश्यकता नहीं कि ये तीनों परस्पर जुड़े होते हैं।विभिन्न समुदायों, क्षेत्रों, देशों में आपस में स्पर्धा तथा पारस्परिक शत्रुता पैदा करते हैं।भारत में इस समय जिस प्रकार से राष्ट्रवाद को हिंदुत्व की अवधारणा से जोड़कर पेश किया जा रहा है, वह भी अंधराष्ट्रवादी प्रवृत्तियों का परिचायक है।इसमें राष्ट्र तो शक्तिशाली नहीं होता, वह अराजक और दिशाहीन हो जाता है, लेकिन राष्ट्र को नियंत्रित करने वाला शासक वर्ग जरूर असीमित ताकतों का स्वामी बन जाता है।वह गैर-जवाबदेही को ही शासन-संस्कृति बना देता है।नागरिक सत्ता के ऊपर राजसत्ता स्थापित हो जाती है।सेना तथा पुलिस की महानता तथा वीरता पर अत्यधिक बल दरअसल नागरिक की सत्ता को कमजोर करता है।अंधराष्ट्रवाद सबसे अधिक राष्ट्रद्रोह की बात कहता है तथा उसी की आड़ में असहमति और बहस की गुंजाइश को खत्म करता है।

यथार्थ तो यह है कि राष्ट्रवाद के लिए असली चुनौती कथित देशद्रोही नहीं होते, बल्कि हर जगह देशद्रोहियों की खोज करने वाली मानसिकता होती है।इसमें राष्ट्र की पूजा, उसके प्रति श्रद्धा, उसके दैवीकरण का भी प्रयास होता है तथा राष्ट्र की महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने पर बल होता है।राष्ट्रवाद का अर्थ राष्ट्र से प्रेम करना है, जबकि अंध-राष्ट्रवाद का जोर राष्ट्र से प्रेम करने के स्थान पर ‘अन्य’ से नफरत करना होता है।

(4) युद्ध पर भारत में कई रचनाएं लिखी गई हैं।हिंदी की पहली आधुनिक प्रेमकथा ‘उसने कहा था’ में भी युद्ध के प्रसंग हैं।उसमें अंग्रेज सेना के सिपाही के रूप में लहना सिंह जर्मनी से युद्ध करने गया है।वह देशभक्ति व उपनिवेशवाद के बीच के जटिल अंतर्विरोध का प्रतीक पात्र है।वह जर्मनी-फ्रांस की सीमा पर तैनात है।निबंध भी एक अनिवार्य साहित्यिक विधा है और महादेवी वर्मा ने युद्ध की समस्या पर लैंगिक विमर्श के दृष्टिकोण से विचार करते हुए ‘युद्ध और नारी’ नामक प्रसिद्ध निबंध 1933 में लिखा था।इसमें उन्होंने हर प्रकार के युद्ध को स्त्री-विरोधी बताते हुए लिखा था- ‘वास्तव में स्त्री के गुणों का चरम विकास समाज के शांतिमय वातावरण में ही है, चाहे समय के अनुसार हम इसे न मानने पर बाध्य हों।’

भारतीय महाकाव्य भी युद्ध संबंधी साहित्य की कुछ कसौटियों पर खरे उतरते हैं।लगभग सभी महाकाव्यों के केंद्र में युद्ध है।लेकिन कुल मिलाकर भारत में लिखी युद्ध संबंधी रचनाएं अंग्रेजी या यूरोपीय भाषाओं में लिखे उपन्यासों-कहानियों से अलग हैं।भारतीय साहित्य में युद्ध संबंधी साहित्य की भिन्नता के ऐतिहासिक कारण हैं।

इसका प्रधान कारण है कि भारत में जब आधुनिक साहित्य का आरंभ हुआ, तब दोनों बड़े महायुद्ध भारत की जमीन से दूर लड़े गए, हालांकि उनमें हजारों भारतीय जवान अकारण मारे गए।इसके पश्चात स्वतंत्र भारत को जब चीन तथा पाकिस्तान से युद्ध लड़ने पड़े, तब वे अपेक्षाकृत छोटी अवधि के थे।जैसे 1962 ई में भारत-चीन के बीच गंभीर युद्ध हुआ, पर एक महीने में समाप्त हो गया।भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 व 1971 के बीच लड़े गए युद्ध भी छोटी अवधि के ही थे।कोई एक महीने चला तो कोई दो हफ्ते।सबसे लंबा युद्ध कारगिल युद्ध था जो दो महीने और तीन हफ्ते तक चला।इसका यह अर्थ नहीं कि ये गंभीर युद्ध न थे।इनमें सैकड़ों लोग मरे तथा राष्ट्र की अस्मिता को आघात लगा।पर युद्ध संबंधी गंभीर गद्य-रचनाएं तभी पैदा हुई हैं, जब कोई राष्ट्र लंबे समय के लिए युद्ध की छाया में जी रहा हो जिससे व्यापक मानसिक संत्रास उत्पन्न होता हो।या युद्ध का प्रभाव व्यापक स्तर पर सामान्य आबादी पर पड़ा हो।

स्वतंत्रता के बाद लड़े युद्धों में सेना तो शामिल हुई, पर सीमाओं पर बसे लोगों के अलावा सामान्य जनता को जान-माल की अधिक क्षति नहीं उठानी पड़ी।इसकी तुलना में भारत में अंग्रेजों से युद्ध पर कई रचनाएं लिखी गईं।1857 के अंग्रेजों और भारतीयों के बीच छिड़े भयावह युद्ध पर लिखे गए उपन्यासों, कहानियों, कविताओं को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।इसका कारण यह है कि वह युद्ध लंबे समय तक चला तथा सामान्य जनता को भी गहरी क्षति उठानी पड़ी।

(5) इस प्रश्न का उत्तर इससे पूर्व वाले उत्तर में निहित है।हम सब जानते हैं कि भारत लगभग दो सौ साल तक ब्रिटिश उपनिवेशवाद से ग्रस्त था।उसका मुख्य संघर्ष औपनिवेशिक सत्ता की गुलामी से लड़ना था।उस संदर्भ में बड़े पैमाने पर साहित्य का सृजन हुआ।युद्ध संबंधी साहित्य प्रायः अतीत को आधार बनाकर रचा जाता है, यानी वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का साहित्य होता है।इस संदर्भ में रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, तिलक, गांधी, कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों पर उपन्यास लिखे गए हैं।हिंदी ही नहीं, कई भारतीय भाषाओं में।भारतीय जनमानस उपनिवेशवाद से लड़ते लोगों को भी अपना ऐसा राष्ट्रीय नायक मानता था जो विदेशी प्रभुत्व से हर प्रकार जूझ रहे हैं और उनके आधार पर रचित साहित्य को उपनिवेशवाद-विरोधी साहित्य कहा गया है।यह युद्ध संबंधी साहित्य से सीधा न जुड़ते हुए भी उसके कई लक्षणों का वाहक है।लंबे समय तक भारत के लिए युद्ध का मतलब अंग्रेजों की सत्ता से युद्ध करना ही रहा है।

403, सुमित टॉवर, ओेक्स हाइट्स, सेक्टर86, फरीदाबाद, हरियाणा121002 मो.9711312374

 

संपर्क जीतेश्वरी:​ द्वारा रमेश अनुपम, 204, कंचन विहार, डूमर तालाब (टाटीबंध) रायपुर,छत्तीसगढ़-492009 मो.9340791806

सभी चित्र साभार : Heather Felder Art