युवा लेखिका और संस्कृतिकर्मी। विद्यासागर विश्वविद्यालय से हाल में डॉक्टरेट की उपाधि। कोलकाता के खुदीराम बोस कॉलेज में शिक्षण।

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आधुनिक काल के मूल्यों से भिन्न उत्तर-आधुनिकता एक सांस्कृतिक और बौद्धिक आंदोलन है जो 20वीं शताब्दी के मध्य में शुरू हुआ था। यह आंदोलन आधुनिकता के विचारों और मूल्यों की प्रतिक्रिया के रूप में उभरा या उसका विकास था, इसपर बहस है। इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए कि यदि इसका संबंध मुख्यतः पश्चिमी सभ्यता से है तो भारत में इसे किस दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। उत्तर-आधुनिकता ने विविधता, बहुलता, और अनिश्चितता को महत्व दिया और आधुनिकता के विचारों को एक हद तक खारिज किया।

उत्तर-आधुनिकता के अनुसार, सत्य और वास्तविकता की कोई निश्चित और स्थिर परिभाषा नहीं है। सब कुछ अनिश्चित और परिवर्तनशील है। उत्तर-आधुनिकता आधुनिकता के विचारों और मूल्यों की आलोचना करती है, जैसे कि प्रगति, विज्ञान और तर्कवाद से संबंधित धारणाओं की। साथ ही यह संस्कृति और भाषा को महत्वपूर्ण मानती है। हम देखते हैं कि आधुनिकता ने एक औद्योगिक नगर-सभ्यता को जन्म दिया और इस सभ्यता ने एक ऐसी भीड़ को जन्म दिया जो क्षुद्र बाजार और रुचियों से युक्त था। इस परिवेश में सुख-सुविधाओं के बीच भी मनुष्य अकेला था। इस अपर्याप्तता से उत्तर-आधुनिकता का जन्म होता है। दरअसल आधुनिकता अपने साथ स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के सामाजिक न्याय का सपना लेकर चली थी, लेकिन दो-दो महायुद्धों ने इन सपनों को विखंडित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि ज्ञान और लोकतंत्र से जुड़ी कई अपेक्षाएं अधूरी रह गईं। इन कमियों को पूरा करने के लिए कालांतर में आधुनिकता ही धीरे-धीरे उत्तर-आधुनिकता में रूपांतरित हो जाती है।

उत्तर-आधुनिकता और सामुदायिक विमर्शों के बीच एक गहरा संबंध है। उत्तर-आधुनिकता ने सामुदायिक विमर्शों को महत्व दिया है। सामुदायिक विमर्श से तात्पर्य है स्त्री, दलित, आदिवासी जैसे विभिन्न समुदाय और इनके अपने अनुभव, दृष्टिकोण और मूल्य।

उत्तर-आधुनिकता को अतीत के पुनरुत्थान के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि वह अतीत के अनुभवों और दृष्टिकोणों को महत्व देती है और उन्हें वर्तमान में लागू करने का प्रयास करती है। इस प्रकार उत्तर-आधुनिकता अतीत का विखंडन और पुनरुत्थान दोनों है। यह आधुनिकता के विचारों और मूल्यों को चुनौती देती है, साथ ही अतीत के सामुदायिक विमर्शों और संस्कृतियों का पुनरुत्थान चाहती है। यह पुरानी चीजों और प्रतीकों के जरिए वर्तमान समाज को विभाजित भी करती है।

हमें इस सवाल के सामने खड़ा होना चाहिए कि क्या उत्तर-आधुनिकता ने अस्थिरता और अनिश्चितता को बढ़ावा दिया? उत्तर-आधुनिकता की सीमाएं और कमियां अब सामने आ चुकी हैं।

उत्तर-आधुनिकता चीजों को खंड-खंड में देखने के लिए प्रेरित करती है। इसके अलावा उत्तर-आधुनिक समय में मनुष्य समाज से ज्यादा यंत्रों के साथ अपना समय बिताता है। फलस्वरूप मानवीय मूल्य तेजी से घट रहे हैं।  नकल इतनी तेजी से बढ़ रही है कि कुछ भी मौलिक नहीं रह गया है।

उत्तर-आधुनिकता के युग का अंत होना चाहिए या नहीं, यह एक जटिल प्रश्न है। इस परिचर्चा से हमें इसके महत्व सहित समाज में हो रहे विभिन्न परिवर्तनों के बारे में जानकारी प्राप्त हो सकती है।

सवाल
(1)उत्तर- आधुनिकता का आधुनिकता से टकराव के प्रमुख मुद्दे क्या थे और इसे किन स्थितियों की उपज माना जाना चाहिए? क्या समाज में आधुनिकता की कोई जरूरत नहीं रह गई?
(2)उत्तर-आधुनिकता और सामुदायिक विमर्शों के बीच क्या संबंध है?
(3)उत्तर आधुनिकता क्या है-अतीत का विखंडन या पुनरुत्थान?
(4)उत्तर-आधुनिकता की साहित्यिक उपलब्धियां क्या हैं, यह अंततः सोच में कैसे परिवर्तन ले आई और इनके नतीजे क्या हैं?
(5)क्या हम कह सकते हैं कि अब उत्तर-आधुनिकता की सीमाएं और कमियां सामने आ चुकी हैं? किन उत्तर-आधुनिक दशाओं को बदलने और किन दशाओं के संरक्षण की जरूरत है?
(6)क्या उत्तर-आधुनिकता ने बहुत कुछ जो मूल्यवान है उसे उजाड़ कर खंड-खंडवाद का महिमामंडन किया है, लोगों के बीच भिन्नता बढ़ाई है और क्या इस युग का अंत होना चाहिए?

 

उत्तर-आधुनिकता उस परंपरा की बहाली है जिसे पिछड़ा कहकर खारिज किया गया था

सुधीश पचौरी
सुपरिचित लेखक, मीडिया विश्लेषक और स्तंभकार। चर्चित पुस्तकें ‘तीसरी परंपरा की खोज’, ‘मिस काउ : ए लव स्टोरी’।

 

‘उत्तर आधुनिकता’ आधुनिकता का ‘विस्तार’ भी है और ‘विच्छेद’ भी। जिस बिंदु पर आकर आधुनिकता की योजना ‘पस्त’ हो जाती है, उसी बिंदु पर ‘उत्तर आधुनिकता’ प्रवेश करती है।

आधुनिकता पश्चिम के ‘रेनेसां’ और ‘ज्ञानोदय’ (एनलाइटिनमेंट) की ऐसी ‘बौद्धिक सांस्कृतिक’ परिणति है जिसने आधुनिक जीवन स्थितियों तथा मनुष्य को एक ‘आत्म-सचेत’ प्राणी बनाया, उसे ‘स्वायत्त व्यक्तित्व’ दिया और ‘कर्ता’ के भाव से युक्त किया, उसे ‘प्रतिनिधन’ का अधिकार (एजेंसी) और ‘एडवोकेसी’ (पक्षधरता) दी और सभी मनुष्यों को ‘समानता’, ‘बिरादरीपन’ और ‘आजादी’- तीन बड़े ‘आदर्श और ‘सार्वभौमिक मूल्य’ दिए जो बिना किसी रंग, नस्ल, जाति, धर्म के ‘भेदभाव’ के सभी मनुष्यों को एक समान ‘मानने’ वाले और ‘बनाने’ वाले रहे।

साहित्यिक सांस्कृतिक स्तर पर आधुनिकता ने ‘नए’ और ‘नएपन’ पर बल दिया। साहित्य-संस्कृति की ‘सामाजिक उपयोगिता’ पर बल दिया।

आधुनिकता ने एक ‘औद्योगीकृत, साक्षर तथा शिक्षित समाज को ‘मेनस्ट्रीम’ किया। प्रकृति की जगह मानव तथा मानवतावाद केंद्र में आया। जो इस मुख्यधारा के रास्ते में आए, उनको ‘उपनिवेश’ बना लिया गया या ‘हाशियों’ पर धकेल दिया गया या ‘अपराधी’ बना दिया गया।

औद्योगीकरण, शहरीकरण तथा पूंजीवाद के शोषण, उत्पीड़न, दमन और प्रत्यक्ष या परोक्ष िंहंसा को ‘नरम’ बनाने के लिए ‘आधुनिकता’ अपने साथ ‘मानव मुक्ति’ का ‘महा वृत्तांत’ (मेटा नेरेटिव), यानी ‘क्रांतिकारी सपना’ लेेकर आई।

इस मामले में ‘सबसे मुकम्मल’ महा वृत्तांत ‘मार्क्सवाद’ रहा जो पहले महा वृत्तांत ‘पूंजीवाद’ के ‘प्रति उत्तर’ में आया और लेकिन जो अपने ही ‘अंतर्विरोधों’ के भार से अचानक ‘ध्वस्त’ हो गया। इस तरह ‘आधुनिकता’ ने दुनिया को बहुत कुछ दिया लेकिन दो-दो महायुद्ध भी दिए, नाश, हिंसा और बर्बरता भी दी।

केंद्रीकृत राज्य सत्ता ने ‘महा वृत्तांतों’ के नाम पर ‘तानाशाहियां’ दीं, ‘फासिज्म’ दिया और ‘नरसंहार’ दिए। इस तरह आधुनिकता ने जिन महान सपनों का वादा किया था वे शुरू से ही विकृत, टूटे-फूटे, संदेहास्पद और ‘वायदे के विपरीत’ निकले।

दूसरे महायुद्ध के बाद ‘नई पूंजी’ ने ‘सेवा क्षेत्र’ (सर्विस सेक्टर) तथा ‘मनोरंजन क्षेत्र’ में निवेश किया। इंटरनेट, कंप्यूटर तकनीक, सूचना तकनीक, हॉस्पिटेलिटी, टूरिज्म आदि उपभोक्ता क्षेत्रों को बढ़ावा दिया। इससे दुनिया के ‘उत्पादन संबंध’ और ‘सामाजिक संबंध’ बदल गए। कोयला भाप चालित मशीनों की जगह इलेक्ट्रिक चालित इलेक्ट्रॉनिक मशीनें आ गईं। पुराने उद्योग बेकार हो गए, देशकाल की अवधारणा बदल गई। ‘मजदूर वर्ग’ की जगह ‘सर्विस सेक्टर’ के ‘मिडिल क्लास’ ने ले ली। साइबर तकनीक क्रांति, इंटरनेट, कंप्यूटर, गूगल, सोशल मीडिया, चिप क्रांति, स्मार्ट फोन, ऐप्पक्रांति, फाइव जी, सिक्स जी, ह्वाट्सऐप्प, फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, ऑनलाइन गेमिंग,  ब्रॉडकास्टिंग, पॉडकास्टिंग,  यूट्यूब, ओटीटी और अब ‘कृत्रिम बुद्धि’ (आर्टीफिसियल इंटेलीजेंस) इस ‘नई पूंजी’ के ही ‘बाई प्रोडक्ट’ हैं जो मनुष्य के सामाजिक संबंधों व उसके ‘भाव’ तथा ‘बौद्धिकजगत’ को निर्णायक रूप से प्रभावित कर रहे हैं। उसे ‘स्मरण और कल्पना रहित’, ‘तकनीक निर्भर’ तथा ‘डाटा निर्भर’ एकायामी मनुष्य बना रहे हैं। इससे मनुष्य ‘एक आयामी’ बनता जा रहा है, और उसकी जगह भी ‘रोबोट’ लेता जा रहा है

बहरहाल, यह सब ‘नए पूंजीवाद’, ‘वृद्ध पूंजीवाद’ का प्रतिपफल है। अर्थशास्त्री अर्नेस्ट मेंडेल ने अपनी पुस्तक में इस ‘नए पूंजीवाद’ को ‘लेट केपिटलिज्म’ (1975) का नाम दिया था जिसे ‘उत्तर आधुनिक चिंतक’ फे्रडरिक जेमेसन ने अपनी पुस्तक ‘पोस्ट मॉडर्निज्म  ऑर द कल्चरल लॉजिक ऑफ लेट केपिटलिज्म’ (1989/1991) में उद्धृत करते हुए सिद्ध किया है कि ‘उत्तर आधुनिकता’ इस ‘लेट केपिटलिज्म’ का ही ‘सांस्कृतिक प्रतिफलन’ है। यानी अन्य साहित्यिक प्रवृत्तियों जैसे ‘छायावाद’ या ‘नई कविता’ की तरह की ‘कोरी साहित्यिक घटना’ नहीं है बल्कि वह एक ‘सकल आर्थिक राजनीतिक सांस्कृतिक दशा’ (कंडीशन) यानी ‘पारिस्थितिकी’ है जिसमेें हम सब रहते हैं।

बहुत से लोगों के लिए उत्तर आधुनिकता का अवसान हो चुका है लेकिन सच यह है कि वह कहीं गई नहीं बल्कि एक स्मार्ट फोन के रूप में हमारी जेब में बैठ गई है। सारी दुनिया हमारी मुट्ठी में रहती है और हम उसकी मुट्ठी में रहते हैं।

उक्त दो पुस्तकों के साथ पहले उत्तर आधुनिक चिंतक ‘ज्यां फ्रांसुआ ल्योतार’ की पुस्तक ‘द पोस्ट मॉडर्न कंडीशन: ए रिपोर्ट ऑन नॉलेज’ (1979) एक अवश्य पठनीय पुस्तक है। ल्योतार कहते हैं कि उत्तर आधुनिकता तमाम महा वृत्तांतों को ‘संदिग्ध’ मानती है, ‘केंद्रवाद’ की जगह ‘हाशियों’ को प्रमुखता देती है, और ‘परिधि’ पर ‘धकेल’ दी गई ‘अस्मिताओं’ की गरिमा वापस करती है। अस्मिताएं जातिगत, धार्मिक,  नस्लीय या भाषिक भी हो सकती हैं।

नब्बे के बाद हिंदी साहित्य में ‘दलित’ या ‘स्त्रीत्ववादी’ या ‘आदिवासी’ विमर्शों ने जो ‘स्वीकृति’, ‘वैधता’ और ‘ताकत’ प्राप्त की, वह इस ‘नई पूंजी’ के बनाए बौद्धिक-सांस्कृतिक वातावरण ने दी! आज के सभी अस्मितामूलक विमर्श इस ‘उत्तर आधुनिकता’ के  प्रतिफल हैं।

उत्तर आधुनिक समीक्षकों ने बताया है कि उत्तर आधुनिकता साहित्य की ‘डैप्थलैसनैस’  यानी ‘सतहीपन’ को, ‘विडंबना’ (आइरनी) तथा ‘कॅामिक’, ‘कटाक्ष’ तथा ‘शब्द क्रीड़ा’ को ‘सेलीबे्रट’ करती है।

इस लेखक ने समय-समय पर हिंदी में ‘उत्तर आधुनिक लेखन’ या ‘समकालीन लेखन’ में ‘उत्तर आधुनिकता’ के ऐसे कुछ लक्षणों को ‘ट्रेस’ किया है। उत्तर आधुनिक ‘आलोचना’  कुछ नए तरह की ‘पदावली से काम लेती है जिसके कुछ संकेत हमने ऊपर दिए हैं।

इतना ही नहीं ‘उत्तर आधुनिकता’ उस परंपरा की ‘बहाली’ भी करती है जिसे कभी आधुनिकता के नशे में ‘पिछड़ा’ या ‘पुराणपंथी’ कहकर साहित्य से खारिज कर दिया गया था।

उत्तर आधुनिकता ‘भारतीय साहित्यशास्त्र’ की भी बहाली करती है जिसे किसी दौर में ‘मार्क्सवाद’ ने एकदम किनारे कर दिया था। ‘उत्तर आधुनिकता’ मानती है कि अपने परंपरागत ‘नाट्यशास्त्र’ तथा ‘साहित्यशास्त्र’ के ‘जातीय मानक’ हमारे उन रचनात्मक अनुभवों के एकदम निकट बैठते हैं जिनके सहारे ‘उत्तर आधुनिक’ समीक्षा के कुछ नए ‘मानकों’ और ‘औजारों’ का ‘पुनर्नियोजन’ किया जा सकता है और कुछ ऐसे ‘आलोचनात्मक मानक’ संभव किए जा सकते हैं जो आज के मनुष्य के उजाड़ दिए गए ‘भाव लोक’ और ‘कल्पनालोक’ को ‘पुनर्जीवित’ व ‘पोषित’ कर सकें।

चलते-चलते कह दें कि ‘उत्तर आधुनिक’ विधाओं में एक है ‘पेश्टीच’ और दूसरा है ‘पेरोडी’। ‘पेश्टीच’ यानी किसी क्लासिकल कृति की नकल जो उस जैसी तो लगे लेकिन वही न हो, दूसरी  है ‘पेरोडी’ यानी असल की ऐसी नकल जो असल का मजाक उड़ाती हो।

अंतिम सवाल का जबाव यही कि उत्तर आधुनिकता अब हमारे वातावरण का अभिन्न हिस्सा है। वही हमारी, हमारे समय की आम पहचान है। हम सब उत्तर आधुनिक समय में जीते-मरते हैं जिसमें एक ही साथ ‘मंदिर’ है और ‘मंगल यान’ भी है। लेकिन यह ‘उत्तर आधुनिकता’ पुरातनवादी-पुनरुत्थानवादी न होकर पुराने का नए तरीके की नई ‘साइबर पेकेजिंग’ और ‘मार्केटिंग’ है और नए तरह का ‘कमोडीफिकेशन’ व ‘कंजंप्शन’ है। यहां पुराने से नए की ‘शत्रुता’ नहीं है। ‘नई पूंजी’ और ‘उत्तर आधुनिकता’ ने उन ‘अंतर्विरोधों को लगभग ‘शमन’ कर दिया है जो तथाकथित ‘क्रांति’ का ‘द्वार’ खोलने वाले माने जाते थे और कुछ ‘नए अंतर्विरोधों’ को जन्म दिया है जो अभी अपरिभाषित हैं!

ऐसे शब्द और भी हैं लेकिन दी गई शब्द सीमा को देखते हुए फिलहाल इतना ही, शेष अन्य कहीं।

17/बी-1, हिंदुस्तान टाइम्स अपार्टमेंट्स, मयूर विहार, फेज-1, दिल्ली-110091 ईमेल -spachauri17@gmail.com

 

 

आधुनिकतावादी साहित्य यथार्थ-विमुख हो गया था

हरीश त्रिवेदी
दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में पूर्व–प्रोफेसर। शिकागो और लंदन विश्वविद्यालयों में अतिथि प्रोफेसर। अंग्रेजी–हिंदी दोनों में लिखते हैं। प्रमुख पुस्तकें :‘द नेशन एक्रास द वर्ल्ड’, ‘पोस्ट–कोलोनियल ट्रांसलेशन’ आदि।

 

पहले तो यही स्पष्ट करना आवश्यक है कि उत्तर-आधुनिकता के एक नहीं दो अर्थ हैं जो एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। इनमें पहला अर्थ सरल और सहज है और दूसरा अर्थ गूढ़ और पेंचीदा, और दोनों का एक-दूसरे से लगभग कोई संबंध नहीं है, तो उनके प्रयोग में भ्रम होना स्वाभाविक है।

उत्तर-आधुनिक का पहला सीधा और सरल अर्थ है: वे परिस्थितियाँ, प्रवृत्तियाँ और नए लक्षण जो आधुनिक युग का अंत होने के बाद, और खास कर उससे हट कर या उसके विरोध में, सामने आए। हिंदी में यह शब्द प्रायः इसी अर्थ में चलता है। अभी हाल में ही मेरे सामने हिंदी साहित्य के एक नए बृहत संग्रह का प्रारूप आया जिसमें आधुनिक काल के बाद वाले काल-खंड को उत्तर-आधुनिक कहा गया था। इस परिचर्चा के लिए भेजी गई प्रश्नावली के अधिकतर प्रश्न भी इसी अर्थ पर आधारित लगते हैं।

इस पहले अर्थ को स्वीकार करने में एक कठिनाई यह है कि आधुनिक युग का अंत कब हो गया यह स्पष्ट नहीं है और भला हो भी सकता है क्या, क्योंकि अधुना शब्द का अर्थ होता है आज, अभी, जिसके आगे हम जा ही नहीं सकते। किसी भी चीज को नया या आधुनिक कहने में एक खतरा लगातार रहता है कि वह जल्दी ही पुराना हो जाता है। ऑक्सफोर्ड में एक कॉलेज है जिसका नाम है न्यू कॉलेज जिसकी स्थापना सन 1379 में हुई थी, तो कॉलेज इतना पुराना हो गया और नाम वही नया बना हुआ है। (वैसे कोल्हापुर में भी एक न्यू कॉलेज है और उसके भी अब पचास साल से ज्यादा हो गए हैं।) और इससे भी बुरा हाल समकालीन का है। मेरे कितने समकालीन तो विदा ही हो गए और बाकी में भी बहुतेरों की हालत खस्ता है- कि कुछ आगे गए हैं और कुछ तैयार बैठे हैं। किंवा, भर्तृहरि के मार्मिक शब्दों में, कालो न यातो वयमेव याताः’, जब किसी भी वस्तु को आधुनिक या समकालीन कहने के इतने खतरे हैं तो उत्तर-आधुनिक की तो बिसात ही क्या!

अब आएं उत्तर-आधुनिक के दूसरे अर्थ पर जो काल-क्रम का संकेत भी करता है पर है मूलतः सैद्धांतिक और किंचित दार्शनिक। पश्चिम में उत्तर-आधुनिकता या उत्तर-आधुनिकतावाद, यानी ‘पोस्ट मॉडर्निज्म’ का प्रयोग जिस अर्थ में होता है उसका कुछ संबंध आधुनिक से तो नहीं पर आधुनिकतावाद से अवश्य है। भेद यह है कि आधुनिक बस एक काल-खंड है/था, जबकि आधुनिकतावाद एक विशेष कलात्मक आंदोलन या शैली का नाम था।

आधुनिकतावाद के दौरान पश्चिम में, और विशेषतः अंग्रेजी में, लिखा जाने वाला साहित्य काफी कुछ अंतर्मुखी, अतः उसी अनुपात में यथार्थ-विमुख हो गया था, और कुछ अधिक प्रयोगवादी और कलात्मक भी हो गया था। उस पर फ्रॉयड का प्रभाव था, पोस्ट इंप्रेशेनिस्ट चित्रकारों का प्रभाव था, और उसका रुझान अति-यथार्थवादी और अंतर्चेतना-केंद्रित हो चला था, जैसे कि स्ट्रीम ऑफ कांशसनेस वाली आख्यान की शैली में। टी. एस. इलियट, जेम्स जॉयस और वर्जिनिया वुल्फ इस युग के प्रमुख अंगेजी लेखक थे, और उन सबका लेखन कुछ अधिक ही गुरु-गंभीर और दुरूह था और सामान्य पाठकों के लिए लगभग अपठनीय (और अपने शहर इलाहाबाद में प्रयुक्त होने वाले एक प्रिय शब्द में कहूं तो ‘अन-झेल-बल’। उत्तर-आधुनिकतावाद ने यह भारी कलात्मक लबादा उतार फेंका और विरोध में इस नए ढंग का लेखन शायद कुछ ज्यादा ही खिलंदड़ा, अनौपचारिक, और उत्-शृंखल (अर्थात शृंखला-मुक्त) और हल्का हो गया। ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है, क्योंकि पेंडुलम इधर से चलता है तो दूर तक उधर भी जाता है।

पर यह तो उत्तर-आधुनिकतावाद का बस एक चेहरा हुआ। उसका दूसरा सघन और सांद्र रूप भाषाविज्ञान, नृतत्वशास्त्र और मनोविज्ञान के तंतुओं से जुड़ा हुआ है। इस संदर्भ में उसका सबसे बड़ा विरोध आधुनिकतावाद से नहीं बल्कि स्ट्रक्चरलिज्म से है जिसे हिंदी में संरचनावाद कहा जाता है जो कुछ भ्रमात्मक है, क्योंकि फिर इसका किसी बड़े ढांचे की पूरी बनावट वाला अभिप्राय ओझल हो जाता है। इस सैद्धांतिकी का सूत्रपात हुआ फर्डीनांड सोस्यूर द्वारा, जिन्होंने 1880 में एक मौलिक शोध-प्रबंध लिखा जिसमें उन्होंने पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ को लेकर उसमें जेनेटिव एब्सोल्यूट नामक क्रिया-रूप (जिसे हम षष्ठी विभक्ति कहते हैं) का विस्तृत विवेचन किया और यह पाया कि किसी भी शब्द का अर्थ अपने आप में निश्चित या अटल नहीं होता बल्कि किसी संदर्भ में उसके आस-पास जो शब्द हैं, और उनको मिला कर जो बड़ा ढांचा बनता है, उससे निर्धारित होता है। उदाहरण स्वरूप ‘राजा के तीन बेटे हैं’ और ‘राजा के देखते मंत्री का वध हो गया’- इन वाक्यों में ‘के’ का अर्थ सर्वथा भिन्न है। यह भेद संस्कृत में और अधिक स्पष्ट है क्योंकि वहां ‘के’ अलग से नहीं लगता, ‘राजा’ में एक ही शब्द में षष्ठी इंगित हो जाती है।

बहरहाल, इस आविष्कार का प्रयोग करते हुए अनेक विषयों के अनेक विद्वानों ने अपने-अपने विषयों में इतने बड़े ढांचे रच डाले जिनमें सभी प्रकार के उदाहरण समा जाए, कुछ-कुछ पाणिनीय पद्धति से सभी कुछ सूत्रबद्ध हो जाए, और सरलीकृत भाषा में कहें तो यही स्ट्रक्चरलिज्म कहलाया। फिर इसी के विरोध में पोस्ट स्ट्रक्चरलिज्म आया और उसी से जुड़ा हुआ डिकंस्ट्रक्शन’ (विखंडनवाद)। इसमें सभी बड़े ढांचों को तो गिराया ही गया, यह भी कहा गया किसी भी शब्द का कोई निश्चित अर्थ है ही नहीं, न संदर्भगत और न संदर्भ के बाहर ही, क्योंकि सभी शब्दों में उनका उल्टा अर्थ भी निहित होता है और उन दोनों का अंतर्विरोध भी। यानी, बात करते जुबान कटती है…। ये दोनों विमर्श और उत्तर-आधुनिकतावाद मिलकर एक त्रिवेणी बने और पुराना बहुत कुछ बहा ले गए।   

अनेक पाठकों को अब तक लगने लगा होगा कि यह पूरा मामला बहुत संगीन है और इस चर्चा में बुरे फंसे। मुझे भी कुछ यही लगता है। ये तो पश्चिम की दार्शनिक और सैद्धांतिक परंपराओं के गृह-युद्ध हैं और उन्हीं के बौद्धिक इतिहास से उपजे हैं। वहां कोई नया हंगामा होता है तो हमारी पुरानी मानसिक दासता का लक्षण है कि हम भी उसके पीछे-पीछे भागने लगते हैं, और जब तक उसकी पूंछ (या लंगोटी) पकड़ में आए तब तक किसी और दिशा में कोई और ही हंगामा शुरू हो जाता है। …तो इस विषय में अब इत्यलम्।

उत्तर-आधुनिकता और विखंडनवाद वगैरह आदि का क्या प्रभाव पड़ा? इन तीनों नई विचारधाराओं के प्रवर्तक फ्रांस के थे, यह निरा संयोग नहीं है। उस देश के बुद्धिजीवियों और चिंतकों की कुछ फितरत ही ऐसी है कि बिलकुल नया सोचते हैं। तो सोस्यूर, फूको, बार्थ और देरिदा इत्यादि तो फ्रांस के थे ही, द पोस्टमॉडर्न कंडिशन (1979) लिख कर इस शब्द का अधिकतम प्रसार करने वाले लियोतार भी वहीं के थे। पर फ्रांस की स्थिति भी कुछ मामलों में हमसे ज्यादा बेहतर नहीं है, तो जब इन लेखकों की फ्रेंच में लिखी पुस्तकें अंग्रेजी में अनूदित होकर अमेरिका से छपीं तभी उनका दुनिया भर में असर होना शुरू हुआ। प्रसंगतः, देरिदा की पहली मुख्य पुस्तक का फ्रेंच से अंग्रेजी अनुवाद हमारे भारत की ही गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक ने किया- ऑफ ग्रामेटोलॉजी (1976)।

जैसा कि मुझे याद आता है, इंग्लैंड में पहला बड़ा हंगामा तब हुआ जब केम्ब्रिज में अंग्रेजी पढ़ा रहे एक युवा अध्यापक कोलिन मैक्केब की 1981 में इस कारण से नौकरी से छुट्टी कर दी गई कि वे इन फ्रेंच सैद्धांतिकों की किताबें पढ़ाते हुए पाए गए। (वे खुद एक साल फ्रांस में पढ़ आए थे)। परिणाम-स्वरूप जो व्यापक मंथन शुरू हुआ उसको द क्राइसिस इन इंग्लिश स्टडीज कहा गया, क्योंकि जितने फ्रेंच विचारक अफलातूनी (यानी प्लेटोे की भांति मौलिक) होते हैं उतने ही अंग्रेज विचारक दकियानूस। इसी केम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने जैसे अपनी भूल-सी मानते हुए बस ग्यारह साल बाद ही जब देरिदा को मानद उपाधि देने का निर्णय किया तो फिर उसका इतना घोर विरोध हुआ कि बाकायदे सभी अध्यापकों का मतदान करवाया गया जिसमें खैरियत हुई कि उपाधि देने के पक्ष में 334 मत पड़े और 204 विरोध में।

यहां भारत में उत्तर-आधुनिकतावाद का जो प्रभाव पड़ा उसके बस दो ही उदाहरण पर्याप्त होंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय में एक विख्यात मार्क्सवादी इतिहासकार पढ़ाते थे जिनसे कुछ बेतकल्लुफी थी, इसलिए कुछ और भी कि उनके और मेरे बेटे भी स्कूल से ही दोस्त थे। उनसे चर्चा होती रहती थी तो एक दिन जब उत्तर-आधुनिकता की बात छिड़ी तो वे बोले कि अरे, ये लोग तो कहते हैं कि किसी भी महा-आख्यान (ग्रांड नैरेटिव) पर विश्वास नहीं करना चाहिए, और इतिहास का सच-सच बतलाने का दावा (ट्रुथ क्लेम) थोथा है! मैंने जोड़ा कि ये यह भी तो कहते हैं कि आख्यान तो आख्यान मात्र होता है, चाहे वह इतिहास हो चाहे उपन्यास! तो वे कुछ पल चुप रहे और फिर बोले- हरीश, यह सब सोच-सोच कर मुझे तो रात में नींद नहीं आती।

उन्हीं दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर के हिंदी विभाग ने उत्तर-आधुनिकता पर एक दिन की गोष्ठी रखी। निर्मला जैन वहीं पढ़ाती थीं और पश्चिमी सैद्धांतिकी उनका अधिकार-क्षेत्र था। आमंत्रित वक्ताओं में मैं भी था तो मैंने अपने वक्तव्य में तभी छपी एक पुस्तक से उत्तर-आधुनिकता की- एबीसी (जिसे हम लोग-एबीसीडी कहते हैं) उद्धृत की। इसमें था कि इस सैद्धांतिकी में – ए से यह होता है, बी से यह, और इसी तरह जेड तक। सूची अपने में ही विनोदात्मक थी और ऊपर से मैं कुछ और नमक-मिर्च लगाता गया तो बड़ा आनंद रहा।

जब मैं बोल चुका तो ठीक बगल में बैठे नामवर जी ने वह सूची धीरे से अपनी ओर खिसका ली, बोले यह तो बड़े काम की चीज है! पन्ने मोड़ कर अपने कुर्ते की जेब में डाल लिए, और अपनी चिर-परिचित पान-रंजित मुस्कान मुस्कराते हुए बोले, यह मैं रख लेता हूँ। आप अपने लिए एक और फोटोकॉपी करा लीजिएगा।

पहले सत्र के अंत में वे बोले, बहुत अच्छा बोले जो बोलते ही थे। फिर भोजन हुआ। मुझे कहीं और जाना था और मैं चलने लगा तो नामवर जी ने साग्रह रोक लिया। बोले, अभी जो मैं बोला हूँ तो आप देखिए तो कि अगले सत्र में अध्यक्षीय भाषण में मैं उसका ठीक उल्टा बोलूंगा! नामवर जी की ख्याति में यह भी शामिल था कि वैसे भी वे अवसर के अनुरूप और अनुकूल बोलते हैं। लेकिन उस दिन उन्होंने जो दोहत्था चलाया उसका मजा अलग था। मैंने बाद में उनसे कहा कि उत्तर-आधुनिकता जैसे विखंडनवादी विमर्श का दोहरा विखंडन करके आपने उसके साथ बिलकुल सही सलूक किया।

डी – 203, विदिशा अपार्टमेंट्स, 79, इंद्रप्रस्थ एक्स्टेंशन, दिल्ली-110092  मो.9818355433

 

उत्तर-आधुनिकता अतीत का विखंडन है और पुरातन का पुनरुत्थान भी

अजय तिवारी
प्रसिद्ध आलोचक।अद्यतन आलोचना पुस्तक ‘इतिहास की रणभूमि और साहित्य’।

 

(1)आधुनिकता जिस रूप में हमें ज्ञात है, वह पूंजीवाद के साथ आई। उसका अगला चरण उत्तर-आधुनिकता है। मार्क्सवादी विचारक फ्रेडेरिक जेमेसन ने उसे ‘वृद्ध पूंजीवाद का सांस्कृतिक तर्क’ कहा है। जो टकराव पीढ़ी संघर्ष के रूप में अक्सर युवाओं और वृद्धों में दिखाई देता है, वही आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता में है। अपने अनुभव को प्राथमिकता देते हुए बहुत-से युवा वृद्ध जनों की उपलब्धियों को झुठलाने की कोशिश करते हैं, जबकि विस्तृत अनुभव से समझ में स्थिरता आती है।

हमने जाना कि आधुनिकता ने एक तरफ सामंतवाद से मानवता को मुक्त किया है, दूसरी तरफ धर्मांधता और अंधविश्वास से छुटकारा दिलाया है। इस प्रयत्न में उसने बहुत-सी कुर्बानियां दी हैं जिन्हें उत्तर-आधुनिकता ने अस्वीकार किया। कहा जाता है, बूढ़े और बच्चे एक समान होते हैं। उत्तर-आधुनिकता ने अपनी प्रतिक्रिया में आधुनिकता की उपलब्धियों का ही निषेध आरंभ कर दिया। इसीलिए हम एक तरफ पूंजीवाद के अनेक विचारों का विखंडन पाते हैं, दूसरी तरफ पुनरुत्थान भी पाते हैं। समाज में अंतर्विरोध हैं, उसी के अनुरूप आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता में भी हैं।

लेकिन बात इतनी सरल नहीं है। पहले भी कहा गया है कि तुलनाएं लंगड़ी होती हैं। युवा और वृद्ध के रूपक में कुछ दोष है। जैसे युवा अपने उत्साह में बहुत-से आश्चर्यजनक कार्य करते हैं लेकिन प्रायः वास्तविकता से दूर चले जाते हैं, दुस्साहस का परिचय देते हैं। वैसे ही आधुनिकता ने अपने प्रसार के साथ दुनिया के अनेक क्षेत्रों को गुलाम बनाया, गुलामों का व्यापार फैलाकर मानवता को क्षत-विक्षत किया और पूरी मनुष्यता में जो एक समरसता थी, उसे विखंडित किया। मतलब यह कि पूंजीवाद ने दुनिया की गति विषम कर दी, विषमता ने समाज के भीतर और समाजों के बीच परस्पर लूट और शोषण का संबंध विकसित किया। इस प्रकार ‘सभ्य’ दुनिया नए अंतर्विरोधों और बर्बरताओं के साथ आई। उत्तर-आधुनिकता ने मार्क्स से दृष्टि लेकर इस सबकी आलोचना की। इस प्रकार वह ‘आधुनिकता’ के या पूंजीवाद के चार सौ साल का अनुभव लेकर आई।

अनुभव आने पर मनुष्य युवा काल की सीमाएं और गलतियां पहचानता है। सभ्यता के विकास ने आज यह दिखाया है कि पूंजी के हित-विस्तार के साथ पूंजीवाद ने जो प्रसार किया, उसने पृथ्वी पर अनेक स्तरों पर विषमता और दासता फैलाई है। अब यह संभव नहीं है कि आधुनिकता की परिस्थितियां वापस आएं और उपनिवेशीकरण की नई प्रक्रिया आरंभ हो। इसलिए अब हम उत्तर-आधुनिकता के बाद की चर्चा करते हैं। अनेक विचारक, खासतौर पर तीसरी दुनिया के या विकासशील देशों के विचारक आधुनिकता की नहीं, आधुनिकताओं की बात करते हैं।

जिस तरह एक तरफ यूरोप और अमेरिका, दूसरी तरफ एशिया और अफ्रीका में विकास की बहुत भिन्नताएं और विषमताएं हैं, उसी प्रकार पहले के गुलाम और पिछड़े हुए देशों में बहुत-सी भिन्नताएं और विषमताएं हैं। पूंजीवाद के चार सौ साल ने दुनिया को इतने अंतर्विरोधों से भर दिया है कि उसकी पूरी समझ नहीं बन सकी है। जैसे उत्तर-आधुनिकता को जेमेसन ने वृद्ध पूंजीवाद कहा है, वैसे ही इस दौर को डैनियल बेल ने ‘उत्तर-औद्योगिक समाज’ कहा है। जाहिर है, औद्योगिक समाज ने जो विषमताएं उत्पन्न की थीं, उसके बाद उत्तर-औद्योगिक समाज में वे बहुत बढ़ गई हैं।

अब शायद ही कोई देश उद्योगविहीन बचा हो लेकिन अब देश के देश भुखमरी का शिकार होते हैं। इथियोपिया, नाइजीरिया इसके उदाहरण हैं। इन देशों की जनता अभी अज्ञान और अशिक्षा के अंधकार में फँसी हुई है। उसे आधुनिकता के जीवन मूल्यों से संपन्न होना है। इसलिए आधुनिकता की आवश्यकता वैश्विक स्तर पर बची हुई है।

(2)उत्तर-आधुनिकता ने पूंजीवादी आधुनिकता का विखंडन करते हुए सिद्धांत रूप में ‘महावृत्तांतों के ध्वंस’ की बात कही है। वह औपनिवेशिक विरासत का ही ध्वंस नहीं था, राष्ट्रीयता/जातीयता और वर्ग के विचारों का भी ध्वंस था। राष्ट्र या जाति को अस्वीकार करके उत्तर-आधुनिकता सभ्यता में पीछे छूट गए लोगों की अस्मिता को, उसी के साथ दूसरे लोगों की भी अस्मिता को, महत्वपूर्ण बनाती है। सामुदायिक विमर्श उसी की अभिव्यक्ति हैं।

स्वभावतः क्षेत्र, भाषा, वर्ण, लिंग इत्यादि उसके ही रूप हैं। आधुनिकता ने इन विभेदकारी अस्मिताओं के ऊपर वर्ग और राष्ट्र को प्रतिष्ठित किया था, पुरानी वर्ण व्यवस्था वाली जातियों को पृष्ठभूमि में कर दिया था। वहीं राष्ट्र ने सामाजिक विभेदों और विभिन्नताओं पर प्रभुत्वशाली जातियों का वर्चस्व स्थापित किया। उत्तर-आधुनिकता ने जब ‘महावृत्तांतों’ का ध्वंस किया, तब दबी और उपेक्षित लोगों की न्याय-चेतना से मिलकर विभिन्न अस्मिताओं ने अग्रसर होने का प्रयास किया। इसलिए ‘वृद्ध’ होने के बाद पूंजीवाद अधिक चालाक और समर्थ हो गया। उसने नई-नई युक्तियां और संस्थाएं विकसित कर लीं, हालांकि उसका विरोध करने वाली शक्तियां अलग-अलग अस्मिताओं के रूप में न्याय और अधिकार का संघर्ष कर रही हैं। इसीलिए लिंडा इचियन ने कहा था कि उत्तर-आधुनिकता की ताकत बाजार है और विरोध भी बाजार में पचाया हुआ है।

बाजार ने मायाजाल फैलाकर परिवर्तन असंभव कर दिया। वह अश्वेतों और दलितों को थोड़े-बहुत अवसर देकर सामंती समाज के उत्पीड़ितों को न्याय का भ्रम प्रदान करता है। लेकिन अधिकांश समुदाय को भाग्यहीनता के दलदल में रहने को बाध्य करता है। वह स्त्रियों को शिक्षा देता है ताकि श्रम की आपूर्ति ज्यादा हो सके, लेकिन उन्हें संपत्ति में हिस्सा नहीं देता ताकि पितृसत्ता को आंच न आए। इस तरह, समाज के भेदभाव को कायम रखकर थोड़े-बहुत संकेतकों के माध्यम से अपने को सुदृढ़ बनाए रखना और पीड़ित जनसमुदाय को भ्रम में रखना बाजार की फितरत है।

एक बात उल्लेखनीय है कि उत्तर-आधुनिकता अमरीका और फ्रांस में शुरू हुई थी। जब इन देशों में जबरदस्त आर्थिक संकट था। समाज भविष्यहीनता में फंसा हुआ था। भारत में उसका प्रवेश हुआ, जब आजादी के बाद स्वीकृत मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता गंभीर संकट में था और पूंजीवादी उदारीकरण शुरू हो रहा था। कह सकते हैं, उत्तर-आधुनिकता सामाजिक संकट की उपज है। इसलिए वह किसी संकट का समाधान नहीं करती, बल्कि नए मायाजाल में लोगों को उलझा कर परिवर्तन का रास्ता रोकती है। जैसे पूंजीवाद-जनित समस्याओं का वृद्ध पूंजीवाद हल नहीं करता, वैसे ही आधुनिकता-जनित समस्याओं का उत्तर-आधुनिकता हल नहीं करती।

(3)हम देख चुके हैं कि उत्तर-आधुनिकता अतीत का विखंडन है और पुरातन का पुनरुत्थान भी। अतीत की हर चीज स्वीकार्य नहीं थी। उसी समय प्रगतिशील विचारकों ने उसकी तीव्र आलोचना की थी। हीगेल के ‘निषेध का निषेध’ से लेकर मार्क्स की ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना’ तक पूंजीवाद की विस्तृत विवेचना है जिसमें हम उसकी असंगतियों का विश्लेषण देखते हैं। उन्हीं असंगतियों के कारण उत्तर-आधुनिकता ने पूंजीवाद का निषेध नहीं किया, उसके शोषक रूप को अधिक आकर्षक, अधिक ग्राह्य बनाकर प्रस्तुत किया। यह अतीत इतना ही नहीं है, पूंजीवाद ने अपने आरंभ काल में जिन प्रवृत्तियों को क्षीण किया था, उत्तर-आधुनिकता ने उन्हें पुनर्जीवित किया।

पूंजीवाद ने लूट, विषमता और शोषण का जो जाल फैलाया, उसका सबसे शानदार विश्लेषण मार्क्स ने किया। इसीलिए जब इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में विश्वव्यापी आर्थिक मंदी आई और अनेक पूंजीवादी देशों की संस्थाएं तबाह हो गईं, तब पश्चिमी संसार में अचानक मार्क्स की पुस्तकों के प्रति दिलचस्पी बढ़ गई। उत्तर-आधुनिकता की एक धारा ने मार्क्सवाद से यह आलोचना ली और उपनिवेशवाद का तथा आधुनिकता के आदर्शों का विखंडन किया। दूसरी तरफ, आधुनिकता और उसकी उपलब्धियों को अस्वीकार करके पुरातन को फिर से स्थापित करने की कोशिशों को वैध ठहराया। इस प्रकार उसने पुनरुत्थानवाद को सैद्धांतिक आधार प्रदान किया। संक्षेप में, उत्तर-आधुनिकता स्वयं एक अंतर्विरोधी प्रक्रिया है। उसका एक स्तर आधुनिकता का विखंडन करता है, दूसरा स्तर पुनरुत्थानवाद को प्रतिष्ठित करता है।

(4)अब तक रचनात्मक साहित्य में उत्तर-आधुनिकता की खास उपलब्धियां दिखाई नहीं देतीं। चाहें तो वैश्विक स्तर पर स्त्री विमर्श और अश्वेत अस्मिता को उत्तर-आधुनिकता से जोड़कर कुछ उपलब्धियां कही जा सकती हैं। भारत के संदर्भ में दलित विमर्श को उत्तर-आधुनिकता की उपलब्धि कह सकते हैं। लेकिन विमर्श के रूप में जो सिद्धांत चर्चा में है, उसने जरूर महत्वपूर्ण योगदान किया है। हालांकि ‘विमर्श’ की न सिर्फ दृष्टिगत सीमाएं हैं, बल्कि पद्धतिगत सीमाएं भी हैं। जिस अस्मिता-विमर्श को उत्तर-आधुनिकता की उपलब्धि माना जाता है, वह मनुष्य की पहचान के प्रति बहुत दोषपूर्ण रवैया अपनाता है। वह आर्थिक प्रश्नों की अवहेलना करके सामुदायिक आधार पर अस्मिता को परिभाषित करते हैं।

दलित विमर्शकार धनी और निर्धन दलित को एक करके सिर्फ जाति को पहचान का स्रोत बनाते हैं। वे निर्धन सवर्ण और धनी सवर्ण को समान रूप में ‘अन्य’ या ‘दूसरा’ घोषित करते हैं। थोड़े से लोगों को लाभ दिलाना और अधिकांश लोगों को अलग छोड़ देना उन्हें तथाकथित ब्राहमणवादी ढांचे के अनुकूल बनता है। इसीलिए दलित विमर्श अंततः उपजातीय विमर्श में परिवर्तित होने लगा और अधिकांश लेखकों के ‘नव-ब्राहमणवादी’ होने की शिकायत होने लगी। आरक्षण से लाभान्वित दलित और खेतिहर मजदूर के रूप में मानवीय-आर्थिक सभी स्थितियों से वंचित दलित का अंतर ‘विमर्श’ के भीतर अनदेखा हो जाता है। गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा से पीड़ित गरीब सवर्ण और दलित का संबंध ओझल हो जाता है।

कमोबेश यही स्थिति स्त्रीवाद की है। न दलित विमर्शवादी बाजारवाद का विरोध करते हैं, न स्त्री विमर्शवादी बाजारवाद का विरोध करती है। हालांकि दलित या स्त्री, दोनों के हित बाजारवाद से बाधित होते हैं, पर विमर्शवादी सिद्धांतकार बाजारवाद का समर्थन करते हैं। दलितवादी यह भूल जाते हैं कि बाजार में आरक्षण नहीं, योग्यता चलती है और स्त्रीवादी यह भूल जाते हैं कि पुरुष-स्त्री संबंध की विषमता का स्रोत संपत्ति के स्वामित्व की विषमता है। जब सिगरेट के कश लेते हुए विज्ञापन की स्त्री ‘पुरुष से कम नहीं’ रहती, तब यह उसकी चेतना से बाहर होता है कि संसार की संपत्ति पर उसका स्वामित्व केवल 1% है। इसलिए सारे विज्ञापनदाता मिलकर दुनिया भर की औरतों की ‘सौंदर्य प्रतियोगिता’ आयोजित करते हैं और उसमें शारीरिक नाप-जोख के आधार पर किसी एक स्त्री-देह को ‘सबसे सुंदर’ बताते हैं। दूसरे दिन से वह स्त्री शरीर उनके माल का विज्ञापन करते हुए दुनिया भर में ‘आजाद’ हो जाती है!

यह बात याद रखने की है कि ऐसी ही असंगतियों के कारण दलित विमर्श के भीतर दलित स्त्रीवाद का उदय हुआ और स्त्रीवाद के भीतर वामपंथी स्त्रीवाद विकसित हुआ। इन उत्तर-आधुनिक विचारधाराओं की सीमा यह है कि वे वस्तुगत सचाइयों पर उतना बल नहीं देते जितना आत्मनिर्मित छवि का सहारा लेते हैं। अकारण नहीं है कि ‘आत्मानुभूति’ को ही तथाकथित स्वतंत्र सौंदर्यशास्त्र का आधार माना जाता है तथा सहानुभूति, समानुभूति और परकायाप्रवेश की मानवीय क्षमताओं को नकारा जाता है।

(5)सामाजिक स्तर पर अब उत्तर-आधुनिकता से आगे की बात की जा रही है। उत्तर-औद्योगिक समाज से आगे अब नई प्रौद्योगिकी ने स्थान ले लिया है। इस स्थिति में उत्तर-आधुनिकता भी विदा हो गई है। जो उत्तर-आधुनिकता इतिहास के अंत का सिद्धांत दे रही थी, वह स्वयं इतिहास के साथ अंतिम सांसें ले रही है। दरअसल दोषपूर्ण पद्धति के कारण ही उत्तर-आधुनिकता का जितना योगदान हो सकता था, वह नहीं हुआ। इतिहास को नकारने में वह पूंजीवादी व्यवस्था का अंग बनकर चली। उसने सत्ता को खंडित करने की जगह प्रतिरोध को खंडित करने पर जोर दिया। इसलिए उसका संबंध दुनिया की आवारा पूंजी से जुड़ गया। जब दुनिया में नई जागरूकता का उदय शुरू हुआ तो उत्तर-आधुनिकता की विदाई तय हो गई। अब खुद पूंजीवादी समाज और बाजार को उत्तर-आधुनिकता की आवश्यकता नहीं है। उसे बचा पाना किसी के लिए संभव नहीं है।

बी-30, श्रीराम अपार्टमेंट्स, 32/4, द्वारका, नई दिल्ली-110078 मो.9717170693

 

उत्तर-आधुनिकता उच्च कला संस्कृति की जगह बहुजन की संस्कृति की पक्षधर है

अच्युतानंद मिश्र
चर्चित युवा कवि तथा लेखक। अद्यतन कविता संग्रह ‘चिड़िया की आंख भर रौशनी में’ और लेखों का संग्रह ‘बाजार के अरण्य में’।

 

(1)बीसवीं शताब्दी अंतर्विरोधों की सदी रही है। आरंभिक दशकों में जहां रूस में समाजवादी क्रांति घटित हुई, रूस के पड़ोसी राष्ट्र जर्मनी में नाजीवाद का आरंभ होता है। प्रबोधन का एक रास्ता समाजवाद की तरफ गया तो दूसरा रास्ता फासीवादी वर्चस्व तक चला गया। इन अंतर्विरोधों को समझने की कोशिश फ्रैंकफर्ट स्कूल के चिंतकों ने की थी।

एडोर्नो ने होर्खाइमर के साथ मिलकर प्रबोधन पर विस्तार से विचार किया है। वे इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि ‘प्रबोधन जरूरी है मगर असंभव’। इस नकारात्मक द्वंद्व की पहचान और विश्लेषण ने उत्तर-आधुनिकता के चिंतन का सूत्रपात किया।

उत्तर-आधुनिकता को आधुनिकता के अंतर्विरोध की पृष्ठभूमि में देखने, समझने और जानने की जरूरत है। वहां आधुनिकता का उतरोत्तर भी है, यानी क्रमिकता है तो साथ ही निषेध भी। दरअसल जिसे हम उत्तर-आधुनिकता कह रहे हैं या कहते हैं वह आधुनिकता के गर्भ से ही निकली है, लेकिन उसमें आधुनिकता का निषेध भी मौजूद रहता है। इसलिए ज्यों ही हम उत्तर-आधुनिकता  को किसी निश्चित फलसफे में समझने की कोशिश करते हैं, असफल रहते हैं। पूंजीवाद से जो संबंध आधुनिकता का था वही संबंध उत्तर-आधुनिकता का उत्तर-पूंजीवाद से है। मगर यह सरल समीकरण नहीं है। इस प्रक्रिया में उत्पादन की प्रक्रिया में आए जटिल परिवर्तनों पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही उत्पादन, उत्पादन संबंधों के साथ-साथ उपभोग की चेतना पर भी विचार किया जाना चाहिए।

उन्नीसवीं शताब्दी तक उत्पादन की प्रक्रिया उत्पादक और उत्पादन संबंधों से निर्णायक रूप में व्यक्त होती थी। लेकिन बीसवीं शताब्दी के उत्पादन की प्रक्रिया को उपभोग की चेतना को समझे बगैर समझा नहीं जा सकता। उत्तर-पूंजीवाद या वृद्ध पूंजीवाद हम जो भी कहें, उसका संबंध जटिल होती उत्पादन प्रक्रिया से है। इस प्रक्रिया ने जो सांस्कृतिक परिवर्तन किए, स्वरूप में जो बदलाव उत्पन्न किए, उसने एक तरफ ज्ञान, ताकत और पूंजी के अंतर्संबंधों को उद्घाटित किया तो दूसरी तरफ उत्पादन और उपभोग को एक असमाप्त प्रक्रिया के रूप में व्याख्यायित किया। उत्तर-आधुनिकता की व्याख्याओं का संबंध नवीन उत्पादन प्रक्रिया से है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यानी पूंजीवादी उत्पादन की पारंपरिक प्रणाली के अंत से होता है।

यह कहना कि समाज में आधुनिकता की कोई जरूरत नहीं है एक तरह का सरलीकरण है। उत्तर-आधुनिकता में आधुनिकता के तमाम संकट मौजूद हैं। साथ ही आधुनिकता की कल्याणकारी भावना का निषेध भी है, उसमें पूंजीवाद का विकास भी है और समाजवाद का निषेध भी।

दरअसल जब हम सरल दृष्टि से आधुनिकता को उत्तर-आधुनिकता के विपरीत में देखते हैं तो चाहे-अनचाहे आधुनिकता की सीमाओं का समस्याओं का निषेध भी कर रहे होते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए की मनुष्य और मनुष्यता आधुनिकता की बस में सफर करके ही उत्तर-आधुनिकता की हवाई जहाज में यात्रा कर रही है। उत्तर-आधुनिकता की आलोचना करते हुए आधुनिकता की आलोचना से गुरेज करने के सरलीकरण से बचना चाहिए।

(2)फ्रैंकफर्ट स्कूल के चिंतकों ने आधार-अधिरचना के एकायामी या सरलीकृत संबंधों के आधार पर व्याख्यायित सामाजिक गति एवं संबंधों की व्याख्या को अपर्याप्त माना था। उनका मानना था कि समाज उस दशा में पहुंच चुका है, जहां अधिरचना भी आधार को प्रभावित कर सकती है। सामाजिक जटिलताओं को आधार-अधिरचना और उसके फलस्वरूप सामान्यीकरणों से प्राप्त वर्गीय धारणा द्वारा समझना पर्याप्त नहीं हैं।

सवाल यह भी था कि आखिर जर्मनी के पड़ोस में समाजवादी क्रांति घटित हो रही थी, सौ वर्ष पहले वहां मार्क्स हुए थे और जर्मनी की जनता नाजीवाद के समर्थन में खड़ी थी- यह कैसे संभव हुआ? इसे सिर्फ वर्गीय दृष्टि से, अर्थशास्त्रीय समीकरणों से नहीं समझा जा सकता। समाज की वर्गीय व्याख्या एक निश्चित महत्व रखती है, लेकिन उसके द्वारा जो सामान्यीकरण होता है, उसके दायरे से बहुत कुछ छूट जाता है और उसे अव्याख्येय छोड़ा नहीं जा सकता।  समुदाय की धारणा का संबंध इसी से है।

सामुदायिक विमर्श और पहचान की राजनीति द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वर्गीय चेतना से समाज को समझने जाने की अपर्याप्तता को इंगित करती है। हमे यह भूलना नहीं चाहिए कि वर्गीय चेतना जिस सामाजिक दृष्टि को इंगित करती है, वह अपेक्षाकृत कम गतिशील समाज से संबद्ध दृष्टि है। ज्यों ही समाज में संचार और आवाजाही की गति का विकास होता है, सामाजिक रूपाकारों में परिवर्तन आरंभ होता है- सांस्कृतिक रूप भी बदलते हैं। इन सबके परिणामस्वरूप 50-60 के दशक में पहचान की राजनीति का उभार होता है। जहां संघर्ष को मात्र आर्थिक संघर्ष के रूप में देखने की प्रवृत्ति को नकार कर सामाजिक सांस्कृतिक संघर्ष को भी प्रमुखता दी गई। मनुष्य की पहचान और उसके सामाजिक स्वरूपों के बीच बदलते संबंधों को रेखांकित किया गया।

हम देखते हैं कि भारतीय परिवेश में भी 60 के दशक में पहचान की राजनीति और सामुदायिक विमर्श का उभार होता है जिसे बड़े पैमाने पर विस्थापन और सामाजिक विकेंद्रण की प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा-समझा जाना चाहिए।  समाज को केंद्रीकरण के विमर्शों से हटकर देखने-समझने की प्रक्रिया का विकास विश्वविद्यालयों, पाठ्यक्रमों तथा अन्य ज्ञानानुशासनों में होने लगा। समाज के विषय में कथाओं और किस्सों को प्रामाणिक स्रोत की तरह देखा जाने लगा। कहना न होगा कि इसने समाज के प्रति धारणाओं को अधिक सूक्ष्म और व्यापक बनाया, साथ ही बहुत से छूट गए हिस्सों को, सूचनाओं को, रिवाजों को सामाजिक दृष्टि में शामिल किया। भविष्य में लोकतांत्रिक राजनीति में भी यह निर्णायक भूमिका अदा करने लगी।

(3)उत्तर-आधुनिकता में आधुनिकता का निषेध भी है और विकास भी। उदाहरण के तौर पर तकनीकी विकास को औद्योगिक विकास की क्रमिकता में ही देखा जा सकता है। उत्तर-आधुनिकता पर विचार करते हुए ‘उत्तर’ पर विचार करना बहुत जरूरी है। यह ‘उत्तर’, आधुनिकता से अलगाव है या विस्तार? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर-आधुनिकता के साथ-साथ उत्तर-पूंजीवाद, उत्तर-मार्क्सवाद, उत्तर-औद्योगिक समाज और उत्तर-औद्योगीकरण आदि की भी चर्चा शुरू हो जाती है।

सवाल यह है कि जिस अर्थ में मार्क्सवाद, आधुनिकता, पूंजीवाद और इतिहास की जड़ें समाज में व्याप्त हैं, क्या उसी अर्थ में ये उत्तरवर्ती विचारधाराएं भी समाज और समय से जुड़ी हुई हैं? अगर इस प्रश्न के जवाब में हम स्पष्ट न भी हों तो भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन सबके मूल में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का एक साझा समय है। कहा जा सकता है कि ये तमाम उत्तरवर्ती विचारधाराएं वस्तुतः द्वितीय विश्व-युद्धोपरांत पूंजीवादी संस्कृति से संबंधित हैं। आम तौर पर उत्तर-आधुनिकता का संबंध ज्ञान-सूचना के बढ़ते प्रभाव के साथ-साथ बृहद उत्पादन या वैश्विक स्तर पर उत्पादन की समरूपित प्रक्रिया के तौर पर देखा जाता है। हम यहां उत्पादन के पुराने रूपों के अंत और तीव्र गति के उत्पादन की प्रक्रिया का आरंभ देखते हैं।

सोवियत विघटन के साथ-साथ अंत की वैचारिकता का दृष्टिकोण भी उभरा। न सिर्फ विचारधारा बल्कि इतिहास के अंत की भी बात कही गई। हालांकि ‘ऑथर’ के अंत की बात रोलां बार्थ 1967 में ही कह चुके थे। कहना न होगा कि दोनों ही संदर्भों में- अर्थात, उत्तर और अंत की अवधारणा एक बदली हुई वैश्विक परिस्थिति, नई सामाजिक चुनौती, नई वैचारिक दृष्टि के आरंभ की बात कहती है जिसे हम अनसुना नहीं कर सकते। यह बदली हुई स्थिति, नई वैचारिक दृष्टि और सामाजिक चुनौती ही उत्तर-आधुनिकता है।

‘अंत’ के संदर्भ में भी इस बात को समझना जरूरी है कि आधुनिकता ने जिस सतत विकास और गति की धारणा को केंद्रीयता दी थी, जहां हर क्षण इतिहास का एक नया क्षण था, जिसके तहत अठारहवीं शताब्दी से आगे का समय उन्नीसवीं शताब्दी प्रतीत होती थी- अब यह क्रम कायम नहीं रह गया था। इस तरह सभी स्थापित और पुराने रूपों -ईश्वर, ‘ऑथर’, मनुष्य से लेकर इतिहास तक के अंत की बात कही गई। उत्तर-आधुनिकता समय के साथ इस तरह के संबंधों को खारिज करती है और इतिहास की रैखिकीय गति के स्थान पर चक्रीय गति की बात करती है। इसका एक अर्थ यह भी है कि उत्तर-आधुनिकता, आधुनिकता-पूर्व स्थितियों और आधुनिकता पश्चात की स्थितियों को एक ही दायरे में ला देती है।

इस प्रश्न को समझना चाहिए कि पुरानी व्यवस्था अंत की ओर क्यों गई, दूसरी तरफ नई व्यवस्था का मनुष्य से, मनुष्य के भविष्य से, समाज से, कला से और रोजमर्रा के जीवन व्यापार से क्या संबंध है?

60 के दशक में चिंतकों का एक दल उभरा, जिसने यह स्वीकार किया कि समाज और संस्कृति में मूलभूत परिवर्तन हो रहे हैं। इन सिद्धांतकारों का मानना था कि नए सामाजिक आंदोलनों ने जो वियतनाम युद्ध, साम्राज्यवाद, नस्लवाद, यौनिकता के बंधे बंधाएं नियम और पूंजीवाद के विरोध से उत्पन्न हुए हैं, इतिहास की धारणा में मूलभूत परिवर्तनों को रेखांकित कर दिया है। समग्र रूप में कह सकते हैं कि राजनीति, अर्थशास्त्र, संस्कृति और रोजमर्रा के जीवन में आए बदलाव अतीत से अलगाव की ओर इशारा करते हैं। यह अलगाव, यह विखंडन ही उत्तर-आधुनिक संस्कृति का प्रसार और फैलाव है।

(4)बीसवीं शताब्दी को समझने के क्रम में हमें 60 के दशक को निर्णायक बिंदु बनाना होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक संक्रमण का दौर चलता है। वह निर्णायक तौर पर सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के रूप में 60 के दशक में दिखाई देता है। इससे पूर्व साहित्य जीवन-यथार्थ को व्यक्त करने का एक संवेदनशील माध्यम था। 60 के बाद भी यह रहा, मगर जीवन यथार्थ के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगा।

जीवन में गति, घटनाएं और आक्रामक क्षणों की भरमार हो गई। इस सबके फलस्वरूप अब साहित्य को सिर्फ यथार्थ की पुनर्रचना कहकर संकुचित या सीमित नहीं किया जा सकता था। साहित्य में लेखक की भूमिका केंद्रीय नहीं रह गई। पाठ के साथ पाठक का जुड़ाव भी महत्वपूर्ण होने लगा। रचना से बनने वाली लेखक की छवि और रचना के बाहर एक औसत मनुष्य के रूप में लेखक -इन दोनों के बीच की दूरी बढ़ने लगी।

पाठक रचना में जिस लेखक को देखता था, रचना के बाहर वह अनुपस्थित दिखाई देने लगा। रोलां बार्थ ने लेखक की मृत्यु की घोषणा की और देरिदा ने पाठ के निश्चित अर्थों के अतिक्रमण और विखंडन की बात की। दोनों ही संदर्भ लेखक की केंद्रीयता के नष्ट होने की उद्घोषणा करते हैं। यहां से न सिर्फ पाठक महत्वपूर्ण हो चला, बल्कि ‘जितने पाठक उतने अर्थ’ की संभावनाएं भी व्यक्त की गईं।

माना जाने लगा कि पाठक और पाठ मिलकर किसी कृति का अर्थ निर्धारित करते हैं। वह अर्थ जरूरी नहीं है कि लेखक का सोचा या दिया हुआ अर्थ हो। इस प्रक्रिया ने रचना विधाओं की पारंपरिक शुचिता को भी खत्म कर दिया। पाठ के सौंदर्य मूलक संदर्भों को अपर्याप्त मानकर उसमें व्यक्त होने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक रूपाकारों की पहचान की जाने लगी। छिपे हुए और अनुद्घाटित रहस्यों से पर्दा उठने लगा। अतीत के जिस लेखन की महिमा गाई जा रही थी, जिसके विषय में लेखकीय प्रतिमान गढ़े गए थे अब वे किन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों के दायरे में संदिग्ध प्रतीत होने लगे।

उत्तर-आधुनिकता ने उच्च कला और लोकप्रिय कला के भेद के मिटने की बात कही। इस अर्थ में उसने बहुजन की संस्कृति की वकालत की। पढ़ने और समझने की नई संस्कृति पर बल दिया गया जिसमें पाठ को किन्हीं सौंदर्यशास्त्रीय मूल्यों के तहत न देखकर सांस्कृतिक विमर्श के रूप में देखे जाने की बात की गई। कहने का तात्पर्य यह कि साहित्य संस्कृति का ही रूप है। सांस्कृतिक रूप ही उसकी रचना को निर्धारित करते हैं, इसलिए साहित्य के किसी पाठ का अर्थ सांस्कृतिक विमर्श के दायरे में ही संभव है- इस धारणा के तहत साहित्य को पढ़ने और व्याख्यायित करने पर बल दिया जाने लगा।

साहित्य की निर्मिति का आधार क्या है? क्या वह कोई सार्वभौमिक सत्य का निर्माण करती है?

उत्तर-आधुनिक चिंतकों ने साहित्य को व्यापक विमर्श का हिस्सा माना और इस बात पर बल दिया कि लेखन अप्रकट रूप में सामाजिक सांस्कृतिक विमर्शों का ही हिस्सा है। इससे स्वतंत्र उसकी कोई मूल्यवत्ता नहीं है। इसलिए साहित्य को पढ़ने, समझने और जानने के मूल्य इन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शों द्वारा निर्मित होंगे। लेखक अपने अवचेतन में इन मूल्यों को आत्मसात किए रहता है, आलोचक का कार्य है कि पाठ में प्रयुक्त अवचेतन की धारणाओं का विखंडनवादी पाठ प्रस्तुत करे। रामकथा को सीता के नजरिए से, शंबूक या शबरी के दृष्टिकोण से भी पढ़ा जा सकता है। पाठक राम की केंद्रीयता को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है । राम को केंद्रीयता प्रदान कर लेखक के अवचेतन में बैठी धारणा और उस धारणा के मूल में अंतर्निहित सामाजिक सांस्कृतिक विमर्श को उजागर करना आलोचक का मूल लक्ष्य होना चाहिए।

(5)यह तो स्पष्ट ही है कि उत्तर-आधुनिकता ने सामाजिक सांस्कृतिक रूपों में आए बदलावों को रेखांकित किया है। रोजमर्रा का जीवन पिछले पचास वर्षों में वर्गीय सीमाओं अतिक्रमण कर  चुका है। सूचना माध्यम दुनिया के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। इस अर्थ में हर व्यक्ति की एकमात्र मौलिक या अनिवार्य पहचान है उसका उपभोक्ता होना। लेकिन यह याद रखना होगा कि उपभोग मात्र भौतिक वस्तुओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि लालसा के रूप में ढलकर वह अवचेतन तक प्रविष्ट हो चुका है। यह लालसा मनुष्य के अंतर्जगत को उसकी चेतना को प्रभावित कर रही है।

व्यक्ति जिस क्षण कुछ नहीं भी खरीद रहा है, वह उपभोग की प्रक्रिया में लिप्त है। वह दुनिया का हर काम करते हुए उपभोग की प्रक्रिया को ही अंजाम दे रहा है। उत्तर-आधुनिकता इन दशाओं का वर्णन करती है। लेकिन इससे निजात का कोई रास्ता नहीं बताती। वह स्थितियों, घटनाओं, परिवेश एवं परिप्रेक्ष्य का वर्णन करती है। इस अर्थ में वह उत्तर पूंजीवाद का सांस्कृतिक तर्क निर्मित करती है (जेमसन), लेकिन वह इन स्थितियों, घटनाओं, परिवेश एवं परिप्रेक्ष्य का कोई दर्शन निर्मित नहीं करती। इसका बड़ा कारण यह है कि वह न तो कोई सुसंगत दृष्टिकोण रचती है और न ही कोई यूटोपिया या भविष्य बांचती है। इसके उलट यह कहना चाहिए कि सुसंगत दृष्टिकोण एवं वैचारिकता की सीमाओं ने, असफलताओं ने, विखंडन की स्थिति निर्मित की और यह स्थिति ही उत्तर-आधुनिकता की स्थिति है।

(6)यहां मैं ऊपर कही बात को फिर दुहराऊंगा कि उत्तर-आधुनिकता कोई सुसंगत दृष्टिकोण या विचारधारा नहीं है। वह तो सुसंगत दृष्टिकोण और विचारधारों के अपर्याप्त साबित होने पर उत्पन्न एक मर्सिया या शोकगीत है। हम यह कह सकते हैं कि उत्तर-आधुनिकता वस्तुतः बीसवीं शताब्दी के अंतर्विरोधों का मर्सिया है। इसमें पर्याप्त निराशा, हताशा और उदासी है। लेकिन प्रश्न उत्तर-आधुनिकता का नहीं बल्कि उत्तर आधुनिक स्थितियों का, जीवन समाज और मनुष्य के अंतर्जगत में हो रहे परिवर्तनों का है। सामाजिक सांस्कृतिक रूपाकारों के बदलने का है। मुक्ति के विचारों का ताकत की धारणा में ढल जाने का है।

हमें आलोचनात्मक विवेक के साथ यह पूछना चाहिए कि क्या सचमुच, बीसवीं सदी के विचार मानव मुक्ति का कोई स्वप्न जगाते थे? हर विचार ताकत की विचारधारा में परिणत क्यों हुआ? सभी विचारधाराओं का लक्ष्य मनुष्य और समाज को नियंत्रित निर्धारित करना क्योंकर हो गया?

सभी विचारधाराओं ने अंततः किसी मसीहा की खोज पर बल दिया और अंततः जब मुक्ति का यह महास्वप्न, महाख्यान धराशायी हुआ (क्या उसका होना पूर्व-निर्धारित नहीं था?) तो उसे उत्तर-आधुनिकता का संकट कहकर नकारना कहां तक उचित होगा यह प्रश्न विचारणीय है।

सवाल अतीत के पुनर्मूल्यांकन और वर्तमान के अंतर्विरोधों को जानने और समझने का है। सवाल उम्मीद के विफल होने और ना-उम्मीदी के पसर जाने भर का नहीं किसी उम्मीद के न बचे रहने का है।

यह कितना दिलचस्प है कि अगले दो दशकों में सूचना क्रांति संसार के हर मनुष्य के हाथ में मोबाइल होने का लक्ष्य तो निर्धारित कर सकती है। उसे पूरा करने के लिए वह राष्ट्राध्यक्षों, वैज्ञानिकों, मैनेजमेंट गुरुओं की असंख्य बैठकों और योजनाओं को कार्यान्वित करवा सकती है, मगर हर मनुष्य के हाथ में रोटी और हर बच्चे का हाथ में कलम- इसे सुनिश्चित नहीं कर सकती।

सवाल मनुष्य के अंतर्जगत में हो रहे परिवर्तन और मनुष्य रूपी प्रजाति के होने वाले विघटन के प्रति सचेत होने का है। सवाल प्रकृति के विरुद्ध ठूंठ की तरह खड़े मनुष्य का है, जिसे आने वाले समय में तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से असल लड़ाई लड़नी है। इन प्रश्नों को सिर्फ उत्तर-आधुनिकता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। बल्कि ज्यादा जरूरी यह है कि वर्तमान में प्रकृति और मनुष्य के बुनियादी संबंधों की नई संभावनाओं की खोज की जाए।

‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’ बीसवीं शताब्दी के आकाश में उड़ रहे पतंग पर लिखे इस वाक्य की डोर कट चुकी है। जरूरत है कि इस कटी पतंग की डोर को नई कल्पनशीलता और इंसानी फिक्रमंदी के हाथों थमा जाए। उड़ान के नए विकल्पों की खोज की जाए। जरूरत है कि आत्म-निरीक्षण एवं सामाजिक-परीक्षण के बुनियादी सिद्धांतों की और लौटा जाए, चाहे यह बात अगंभीर, हास्यास्पद और काल्पनिक ही प्रतीत क्यों न हो!

हिंदी विभाग, श्री शंकराचार्य संस्कृत यूनिवर्सिटी, कलाडी-683574, जिला : अर्नाकुलम, केरल  मो.9213166256

 

उत्तर-आधुनिकता समापन नहीं बल्कि प्रश्नों की नई शुरुआत है

अमल सिंह ‘भिक्षुक’
नई पीढ़ी के प्रबुद्ध आलोचक, कवि और कथाकार। पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन।

 

बीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध मानव सभ्यता के इतिहास में वह मोड़ है जहां हर स्थापित सत्य, हर निश्चित मूल्य और हर स्थिर संरचना पर प्रश्न उठाया गया। आधुनिकता के लंबे युग में मनुष्य ने यह विश्वास पाल लिया था कि विवेक, विज्ञान और तर्क के बल पर वह संसार की हर समस्या का समाधान कर सकता है। किंतु जैसे-जैसे इस आत्मविश्वास का स्वर अहंकार में बदलता गया, मनुष्य को यह अनुभव होने लगा कि तर्क की मशीन ने उसकी संवेदना को कुचल दिया है। दो विश्वयुद्धों की विभीषिका, औद्योगिक पूंजीवाद का अमानवीय स्वरूप और तकनीकी वर्चस्व ने उस आधुनिक स्वप्न को चकनाचूर कर दिया जिसमें प्रगति ही मुक्ति का पर्याय मानी गई थी। इसी असंतोष और आत्मसंदेह से जन्म लेती है उत्तर आधुनिकता – एक विचारधारा जो आधुनिकता के दर्प को तोड़ते हुए यह घोषणा करती है कि कोई भी सत्य अंतिम नहीं होता।

आधुनिकता यूरोपीय पुनर्जागरण और औद्योगिक क्रांति की उपज थी। इसने तर्क, प्रगति, वस्तुनिष्ठता और मनुष्य की केंद्रिकता को अपने आधार बनाए। दकार्त्त का कथन है ‘मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ’। यह आधुनिक चेतना का घोष था जिसमें ‘सोचने वाला मनुष्य’ ब्रह्मांड का केंद्र बन बैठा। परंतु इस मनुष्य-केंद्रित दृष्टि ने बाकी सबको प्रकृति, समाज, स्त्री, उपनिवेश- को ‘विषय’ बना दिया। आधुनिकता के भीतर छिपा यह सत्ता-तत्व धीरे-धीरे सामने आने लगा।

विज्ञान जो मुक्ति का साधन माना गया था वही विनाश का उपकरण बन गया। तर्क की अंधी आस्था ने भावनाओं, अनुभवों और विविधताओं की उपेक्षा की। उत्तर आधुनिकता इसी ‘एकरेखीय’ दृष्टिकोण के प्रतिरोध से उभरती है। यह कहती है- इतिहास कोई रैखिक यात्रा नहीं बल्कि अनेक आवाजों और दृष्टियों का जाल है। हर संस्कृति, हर व्यक्ति, हर वर्ग की अपनी-अपनी सचाई है। अतः कोई भी एक महाकथा (ग्रांड नैरेटिव) समग्र सत्य का प्रतिनिधि नहीं हो सकती। ल्योतार के शब्दों में- ‘अब महा वृत्तांत विश्वसनीय नहीं रहे।’

उत्तर आधुनिकता का केंद्रीय भाव है- विखंडन और बहुलता। यह हर उस संरचना को तोड़ती है जो किसी एक ‘सत्य’ को स्थायी बनाना चाहती है। देरिदा का ‘डिकंस्ट्रक्शन’ इसी विखंडन की दार्शनिक प्रक्रिया है – किसी भी विचार, पाठ या संस्था के भीतर छिपे विरोधाभासों और सत्ता-संबंधों को उजागर करना। इस दृष्टि में भाषा केवल यथार्थ को ‘प्रकट’ नहीं करती, बल्कि स्वयं यथार्थ का निर्माण करती है।

मिशेल फूको ने दिखाया कि ज्ञान और सत्ता परस्पर गुंथे हुए हैं; जो ज्ञान रचता है, वही सत्ता को स्थिर करता है। इसलिए उत्तर आधुनिकता केवल दार्शनिक आंदोलन नहीं, बल्कि प्रतिरोध की चेतना भी है। यही कारण है कि इसने हाशिए की आवाजों- स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, क्वीयर समुदाय को वैचारिक बल दिया। आधुनिकता ने जिस सार्वभौमिक मनुष्य की बात की, उत्तर आधुनिकता ने बताया कि वह वास्तव में श्वेत, पश्चिमी, पितृसत्तात्मक पुरुष था। इस प्रकार यह विमर्श ‘केंद्र बनाम हाशिया’ की बहस को जन्म देता है, जहां हर आवाज को समान महत्त्व देने की मांग की जाती है।

उत्तर-आधुनिकता को कई आलोचक ‘विखंडन की विचारधारा’ कहते हैं, क्योंकि यह परंपरागत मूल्यों और इतिहास को तोड़ती है। पर वास्तव में यह केवल तोड़ती नहीं, बल्कि पुनःपाठ करती है। यह कहती है कि इतिहास और परंपरा स्वयं भी ‘निर्मित कथाएं’ हैं, जिन्हें नए सिरे से पढ़ा जा सकता है। भारतीय साहित्य में जब स्त्री लेखिकाएं- पौराणिक पात्रों जैसे सीता, द्रौपदी या अहिल्या को नए रूप में प्रस्तुत करती हैं, तो वे परंपरा का नकार नहीं करतीं, बल्कि उसका उस दृष्टि से पुनरुत्थान करती हैं, जो पहले अनुपस्थित थी। इस प्रकार उत्तर आधुनिकता विरोध नहीं, संवाद की संस्कृति को जन्म देती है। यह अतीत के साथ एक नए रिश्ते की खोज है जिसमें पूजा नहीं, आलोचनात्मक आत्मसंवाद है।

साहित्य सदैव अपने समय की चेतना का दर्पण है। उत्तर आधुनिकता ने जब यह चेतना बदल दी कि सत्य एक नहीं, अनेक हैं, तो साहित्य की भाषा और संरचना भी बदल गई। अब कहानी रैखिक नहीं रही; आरंभ, मध्य और अंत की परंपरागत धारा टूट गई। पात्र स्थायी नहीं, बल्कि गतिशील और अनिश्चित हैं। लेखक अब सर्वज्ञ नहीं, बल्कि पाठक के साथ संवादरत सहभागी है। अर्थ अब लेखक के पास नहीं, बल्कि पाठक की व्याख्या में जन्म लेता है।

हिंदी साहित्य में 1980 के बाद यह परिवर्तन स्पष्ट हुआ। उदय प्रकाश के लेखन में सत्ता-संरचनाओं का विखंडन है; विनोद कुमार शुक्ल के कथानक जीवन की लघुता में अनंत संभावनाएं खोजते हैं; मन्नू भंडारी और मृदुला गर्ग स्त्री अस्मिता के नए रूप रचती हैं। कविता में रघुवीर सहाय, मंगलेश डबराल, अशोक वाजपेयी और अन्य कवियों ने उस मनुष्य की तलाश की है जो अपने ही बनाए तंत्र में खो गया है।

साहित्यिक रूप से उत्तर आधुनिकता के कुछ प्रमुख लक्षण हैं-

विखंडित संरचना : रैखिकता की जगह कोलाज और अंतःपाठ।

पैरोडी और पेस्टिश : पुराने रूपों की विडंबनात्मक पुनरावृत्ति।

लोकप्रिय संस्कृति का समावेश : ‘उच्च’ और ‘निम्न’ संस्कृति का विभाजन टूटना।

आवाजहीन का स्वर : हाशिए के पात्रों की उपस्थिति।

इन सबके माध्यम से साहित्य अब किसी एक ‘सत्य’ का प्रवक्ता नहीं, बल्कि अर्थ उत्पन्न करने की प्रक्रिया का मंच बन गया है।

उत्तर-आधुनिकता ने समाज को बहुलता, विविधता और भिन्नता के मूल्यों से परिचित कराया। परंतु इसने एक नई चुनौती भी पैदा की- जब हर सत्य सापेक्ष है, तो नैतिकता का आधार क्या होगा? जब हर दृष्टि सही है, तो सामूहिक दिशा कौन देगा? उत्तर आधुनिकता ने बड़े आख्यानों – जैसे प्रगति, समाजवाद, धर्म, राष्ट्र को तोड़ दिया, पर उसके स्थान पर कोई नया सामूहिक स्वप्न नहीं गढ़ा। परिणामस्वरूप उपभोक्तावाद, बाजारवाद और पहचान की राजनीति का जोर बढ़ा। यह वही स्थिति है जहां स्वतंत्रता की असीम संभावनाएं अर्थहीनता की पीड़ा में बदल जाती हैं। यही उत्तर आधुनिक युग की सबसे बड़ी विडंबना है।

फिर भी, इसके भीतर यह गहरी चेतावनी छिपी है कि किसी एक सत्य को परम न मानो। यही चेतावनी हमें कट्टरता, उग्र राष्ट्रवाद और विचारों के एकाधिकार से बचाती है। उत्तर आधुनिकता ने यह बोध दिया कि ज्ञान और सत्ता का रिश्ता जितना खतरनाक है, उतना ही आवश्यक भी – क्योंकि प्रश्न करने की स्वतंत्रता वहीं से उपजती है।

अब जबकि उत्तर आधुनिकता स्वयं एक स्थापित विचार बन चुकी है, उसकी सीमाएं भी उजागर हो चुकी हैं। यह बहुलता के नाम पर कभी-कभी विखंडन और आलोचना के नाम पर निरर्थकता में बदल जाती है। सबकुछ संदिग्ध ठहर जाने पर संवेदना, विश्वास और प्रतिबद्धता  की जमीन कमजोर पड़ती है। इसलिए आज  आवश्यक है कि हम उत्तर-आधुनिकता को अतिक्रमित करें – उसे नकारें नहीं, बल्कि उसके भीतर से नई दिशाएं खोजें।

वर्तमान युग में जब जलवायु संकट, सामाजिक असमानता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल यथार्थ जैसी चुनौतियां सामने हैं, तो केवल बहुलता पर्याप्त नहीं है, साझा जिम्मेदारी की भावना भी चाहिए। इसलिए एक नई वैचारिक दिशा- ‘उत्तर-उत्तर-आधुनिकता’ या नव-मानव केंद्रित यथार्थवाद  की आवश्यकता है, जो विविधता का सम्मान करते हुए सामूहिक सह-अस्तित्व की चेतना रचे।

उत्तर-आधुनिकता का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि इसने प्रश्नों को पुनः जीवित किया। यह किसी युग के अंत का नहीं, बल्कि संवाद का युग है, जहां प्रश्न स्थायी हैं और उत्तर अस्थायी। यह युग हमें सिखाता है कि सत्य केवल तर्क में नहीं, अनुभव में भी है; कि हर व्यक्ति अपनी दृष्टि से संसार रचता है; और कि केंद्र कोई नहीं, सब केंद्र हैं।

इस प्रकार उत्तर-आधुनिकता एक साथ चेतावनी भी है और संभावना भी – चेतावनी कि किसी भी एक विचार को अंतिम मत मानो; और संभावना यह कि हर भिन्न आवाज को सुनो। यही उसकी सबसे बड़ी देन है- विविधता में एकता का, संदेह में विश्वास का, और विखंडन में निर्माण का दर्शन। यही कारण है कि उत्तर-आधुनिकता को केवल ‘युगांत’ कहना अधूरा है। वह एक नए युग की खोज है- जहां अर्थ स्थायी नहीं, पर संवाद शाश्वत है; जहां प्रश्न ही मानवता के सबसे बड़े प्रमाण हैं।

उत्तर-आधुनिकता ने मनुष्य को यह सिखाया कि अस्तित्व का कोई स्थिर सूत्र नहीं है। हर युग अपने प्रश्नों के साथ आता है, और उत्तर हमेशा अधूरा होता है। पर यही अधूरापन जीवन की सबसे सुंदर संभावना है निरंतर खोज, पुनःपाठ और पुनर्निर्माण की। इसलिए उत्तर-आधुनिकता का वास्तविक अर्थ अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है- प्रश्नों के पुनर्जागरण की, भिन्नताओं के उत्सव की, और संवादमय मानवता की। यही वह द्वार है जहां से युगांत एक नए युगारंभ में बदल जाता है।

133/30, भारती गंज, सासाराम-821115,  जिला- रोहतास (बिहार) मो. 9135704800

संपर्क :​20/1, खगेंद्र चटर्जी रोड, काशीपुर, कोलकाता-700002मो.8420627693