दिलीप दर्श, पुणे: मई अंक में हरिमोहन झा की बेहतरीन कहानी ‘विनिमय’ का शुभंकर मिश्र द्वारा बेहतरीन अनुवाद। मैथिली साहित्यकार हरिमोहन झा को बचपन से ही पढ़ता आ रहा हूँ। उनके लेखन में व्यंग्य की जो धार है, वह हास्य के प्रवाह में कुंद नहीं होती। इस कहानी में मूल्यों के क्षरण को बड़ी सूक्ष्मता के साथ रखा गया है। लगता है, यह आज की लिखी कहानी है।

पंकज की कविताएँ दिन ब दिन निखरती जा रही हैं। ऐसा लगता है कवि के अंदर प्रेम और श्रम के बीच सदा एक सामंजस्य की अथक कोशिश जारी है। अक्सर देखता हूँ, उनका प्रेम एक श्रमिक का प्रेम है और कविता में यही प्रेम उनकी बेबसी, लाचारी और आत्म-संघर्ष की मिश्रित छवि लेकर प्रकट होता है। पंकज की कविता टीस देती है जो निम्न मध्यवर्ग की टीस है। उन्हें बहुत बहुत बधाई।

जयचंद प्रजापति, प्रयागराज:‘वागर्थ’ मई 2024 अंक में धनंजय चोपड़ा की कहानी ‘खाट टोटका’ बेहतरीन कहानी है। शब्दों का बेहतरीन इस्तेमाल है। गंवई रंगत में सजी धजी कहानी है।

शकील सासरामी, पटना: वागर्थ का मई  2024 अंक हर प्रकार से बहुत अच्छा लगा। वागर्थ की टीम को मेरी ओर से बहुत बहुत बधाई।

विनय कुमार सिंह:‘वागर्थ’ अप्रैल 2024 अंक। वर्तमान दौर में आर्थिक उदारीकरण के बावजूद, समाज में उदारवाद का लगातार क्षय हुआ है। शिक्षा के पांच सितारा भवनों के बावजूद आम बौद्धिक दरिद्रता बढ़ गई है। अधिक शिक्षा अधिक खुदगर्जी ला रही है। संवेदना के अनगिनत शिविर बन गए हैं। अधिक राजनीति अधिक वि-मानवीयकरण ला रही है। लोग शत्रुता की हद तक आपस में विभाजित हैं।

अंक का संपादकीय सुचिंतित और अर्थपूर्ण दृष्टि के साथ प्रभावपूर्ण है!

नीभा कुमारी, हरिहरपुर:‘वागर्थ’ के अप्रैल 2024 के अंक में अरुण अर्णव खरे बेहद सधे हुए और अपूर्व कल्पनाशीलता के साथ आए कथाकार हैं। आज जिस तेजी से आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है, हिंदी कथा को विज्ञान कथा की अजनबी दुनिया में प्रवेश मिलना लाज़िमी है। समय की सीमा को लांघकर अतीत और भविष्य की यात्रा का विवरण मन में एक सुखद अनुभूति को जन्म देती है। अतीत की रोमांचकारी दुनिया में ले जानेवाले यान की कल्पना आज कल्पना से परे है, पर विज्ञान के अनुसंधान कब किस कल्पना को साकार कर दे यह एक ख़ूबसूरत रहस्य है। कथा का अंत कुछ ज्यादा ही प्रभावित करता है, क्योंकि लोभ और लाभ के लिए मानवता का सर्वनाश कर देनेवाली बुरी शक्तियां इस विश्व को अपनी चपेट में लेने लगी हैं।

पुराना समय ही नहीं, पुराने संस्कार और जीवन-शैलियां भी विलुप्त हो रही हैं। तकनीकी रूप से हम कल्पनातीत विकास कर रहे हैं पर संवेदनात्मक रूप से अत्यधिक दरिद्र होते जा रहे हैं। संवेदनाशून्य मनुष्य किस काम का है भला! विकास की सीढ़ियां खटाखट चढ़कर आज हम जिस दौर में पहुंच गए हैं वह भयोत्पादक है, क्योंकि आज मानवीय संवेदनाओं को मानवीय कमजोरी की तरह पेश किया जा रहा है। उपमा शर्मा की कहानी ‘प्रोग्रामिंग’ पढ़कर कह सकती हूँ कि यह युवा लेखिका संभावनाओं से भरी है!

विश्वनाथ भालेराव: दुनिया में नारी अस्मिता को लेकर बहुत गंभीरतापूर्वक विचार हो रहे हैं। इसी दौर में कहीं स्त्री को निर्वस्त्र कर भीड़ में घुमाया जा रहा है। आधुनिकता के नाम पर भी आज अनेक अत्याचार हो रहे हैं। जिनमें धर्म, जाति, बिरादरी, प्रांत और वर्ग के आधार पर स्त्री का भयानक शोषण होता है। बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था कि नारी दलितों में भी दलित है। दरअसल स्त्री पर होने वाले अत्याचार कम नहीं होंगे, केवल उसके स्वरूप में बदलाव होगा।

आज भारतीय समाज में जाति व्यवस्था में बदलाव हुआ है, ऐसा लगता है। लेकिन अंदर से इसकी फसल जोरों से फल-फूल रही है। कहीं-कहीं दलित स्त्री को आज तक अपने देश में आजादी का सूर्य नहीं दिखा है। हम सब आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं और कह रहे हैं भारत मेरा देश है, सभी भारतीय मेरे भाई-बहन है। हमें इसपर विचार करना चाहिए, नहीं तो हम चांद पर भले पहुंच जाएं, सामान्यतः स्त्री को मान-सम्मान मिलना कठिन होगा।

संपादकीय पढ़ना मुझे चुनौती-भरा और संवेदनशील बना देता है।

शैली:‘वागर्थ’ का मई अंक। दिनेश पाठक की कहानी ‘समय की धार में’ एक यथार्थ है। यह किसी अकेले का दर्द नहीं है कमोबेश सभी वृद्धों का हाल है।

रमेश शर्मा की कविताएं बहुत अच्छी हैं, बधाई। खबरों को ख़बर इस लिए बनाया जाता है कि हम कुछ दुखद, रोमांचक और हिंसक देख-पढ़कर प्रभावित होते हैं। वास्तव में दुनिया भर की खबरों से दूर रहकर भी जीवन सुख और आराम से चल सकता है। लेकिन मनुष्य को संभवतः दुखी और चिंतित होने में ही आनंद आता है। पहले स्थानीय खबरों से चिंतित होता था, अब ग्लोबल खबरों से। रविवार को ख़बर न पढ़ें, न टीवी देखें, छुट्टी का भरपूर आनंद मिलेगा!