चित्तरंजन मिश्र, गोरखपुर:‘वागर्थ’ के मार्च अंक में उर्मिला शिरीष की कहानी ‘बहस के बाहर’ पढ़ने को मिली। ऐसे समय में जब बहस के केंद्र में बहुसंख्यकवाद, बहुमतवाद और मेरा धरम – तुम्हारा धरम, तुम लोगों ने ये किया तो हमलोगों ने उसका बदला ऐसे चुकाया कि खौफनाक मनुष्यता-विरोधी बहस जारी है, उर्मिला शिरीष ने ठीक ही बहस के बाहर बचे कुछ संवेदनशील कृतज्ञ लोगों की कथा रचकर समाज को भीतरी तौर पर टूटने से बचाने का जतन किया है। इस दौर में यही एक जैनुइन लेखक का दायित्वबोध है। सराहनीय कहानी है।

अजय प्रकाश, इलाहाबाद:‘वागर्थ’ का जनवरी 2024 अंक। परिचर्चा में ‘हिंदी कहानी का वर्तमान’ अद्भुत है। इसपर विमर्श तो होते रहते हैं, लेकिन इस ढंग से नहीं। नीतू सिंह को संयोजन के लिए बधाई। नई कहानी में लेखक तिकड़ियों में बंटे हैं। सठोत्तरी पीढ़ी में चार ही लेखकों की चौकड़ी बनी है। समांतर कहानी में ढेर सारे लेखक हैं। इसी तरह अकहानी, सचेतन कहानी आदि पर आंदोलन हुए जिसका असर कहानियों पर भी पड़ा, लेकिन इसका प्रभाव कहानीकारों पर पड़ा। आज के कहानीकार कंटेंट और थीम को लेकर उतने चिंतित नहीं है। सोशल मीडिया का बहुत असर कहानीकारों पर है। ‘वागर्थ’ पत्रिका इसकी ओर इशारा करती है, लेकिन कहानियों के अच्छे आलोचक इस समय नहीं हैं। ‘वागर्थ’ पत्रिका इसके लिए साधुवाद का पात्र है कि वह विषय पर चर्चा कराती है। नए और पुराने लेखकों को लेकर चलना बड़ी बात है। इस तरह के विमर्श पत्रिकाओं में चलते रहने चाहिए।

इस अंक में गांधी पर जो सामग्री है, वह हमें विश्वास दिलाती है कि गांधी आज भी प्रासंगिक हैं, भले ही हमने उन्हें जीवन में भुला दिया है। कहानियों में सीमा स्वधा की कहानी ‘केसर कॉटेज’ अंत तक उत्सुकता बनाए रखती है और अंत तक नीला डरी रहती है कि आगे क्या होगा? इसी तरह नगेन शइकिया की कहानी ‘बहुत शर्म आई’ अद्भुत कहानी है। किसी के बारे में निर्णय तुरंत नहीं लिया जाता- इस कहानी से यही सीख मिलती है। ‘वागर्थ’ का हर अंक अच्छी कहानियां देती है। आपने कहानी, कविता को अच्छा मंच दिया है। नए कवियों और कहानिकारों को इतनी अच्छी पत्रिका मिल रही है। इसके अलावा अनुवाद शृंखला भी आपने कायम की है जिसमें अच्छी कहानी और कविताएं रहती हैं। पूरी टीम को साधुवाद।