ज्ञान प्रकाश विवेक, बहादुरगढ़, हरियाणा:‘वागर्थ’ का अक्टूबर अंक। यह अंक इसलिए भी विशिष्ट है कि मोहन राकेश की जन्मशती पर खास चर्चा है। वागर्थ कुछ मायने में बहुत भिन्न है अन्य पत्रिकाओं से। यह बिलकुल नए विमर्शों पर केंद्रित होता है और आखरी पन्ने पर डॉ. कुसुम खेमानी का महत्वपूर्ण बतरस होता है।
पत्रिका का जो उदार चेहरा है, वह बहुमूल्य है। कविताएं, कहानियां, गीत और गजलें भी होती हैं। साफ नजरिया और निष्पक्षता ये गुण तो पत्रिका में समाए हुए हैं।
हम मोहन राकेश पर विशिष्ट सामग्री के इंतज़ार में थे। वे अपने समय के लीजेंड, आत्मसम्मान से भरपूर बड़े लेखक तथा रंगकर्म से गहरे से जुड़े अदीब थे। मोहन राकेश के स्त्री चरित्रों की उलझनों के बावजूद दिशा स्पष्ट है। मल्लिका न अपनी जगह-जमीन छोड़ती है और न भावुक होती है। लेकिन मृत्युंजय श्रीवास्तव का यह कहना कि अब मोहन राकेश साहित्य के किसी कोने में दबे पड़े हैं, यह बहुत सख़्त और गैर-मुनासिब टिप्पणी है। मोहन राकेश अब भी हैं। उनका ‘आषाढ़ का एक दिन’ भी क्लासिक नाटक है। कुछ अरसा पहले रामगोपाल बजाज के निर्देशन में ‘आषाढ़ का एक दिन’ का दिल्ली में शो था। लेखक, युवा और वरिष्ठ रंगकर्मी टूट कर पड़े थे। कीर्ति जैन मृत्युंजय के विपरीत बहुत सही कहती हैं कि भारतीय रंगमंच, विशेष रूप से हिंदी रंगमंच में मोहन राकेश का योगदान असाधारण है।
रंगकर्मी चेतना जालान अपने अनुभवों का बयान करती हैं कि वे निरंतर अपने किरदारों को लेकर सोचते रहते थे। विनय शर्मा, सेवा राम त्रिपाठी, राम गोपाल बागला, हृषीकेश सुलभ ने भी मोहन राकेश के नाटकों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। मोहन राकेश की याद में दो कविताएं भी हैं धर्मवीर भारती और कवि शमशेर बहादुर सिंह की। हमें इनके दोसताना मिजाज का खैरमकदम करना चाहिए जो अब हमारे लेखन परिसर से बाहर हो चुका है।
मोहन राकेश की डायरी, जीवन शैली और उनकी कहानी पर भी संक्षिप्त बात होती तो अच्छा था। लेकिन अब भी यह खंड बहुत समृद्ध है।
इस अंक में स़िर्फ एक कहानी पढ़ी है अभी तक अनुजीत इकबाल की ‘पापा की प्रोफाइल’, बहुत सधी हुई। कहानी छोटी सी, लेकिन, अपनी आंतरिक लय में बड़ी।
हर्षदेव :‘वागर्थ’ के अक्टूबर 2025 अंक में प्रकाशित अनुजीत इकबाल की कहानी ‘पापा की प्रोफाइल’ मन को कुरेदती है। भाषा ऐसी है, जैसे तितली हवा में उड़ती है। संवेदनाएं छूती हुई बहती हैं। नई और पुरानी पीढ़ी के अंतर को बख़ूबी उद्घाटित करती है कहानी।
चमन लाल शर्मा, वाराणसी:‘वागर्थ’ का सितंबर अंक। हिंदी संस्कृति की जमीन हिंदी दिवस माह में पाठकों और अधेय्यताओं के लिए एक उपहार सरीखा है। सितंबर अंक में ‘चकरी पर दर्ज तारीख’ सूर्यनाथ सिंह की जातीय खून खराबे में झुलसी निर्दोष जनों की सिसकती कहानी है। सहायता शिवरों में रहकर काम-धंधे से अलग होती स्थितियों का सजीव वर्णन कहानी का टीसता घाव है जिसका मरहम किसी के पास नहीं है। सशक्त कहानी।
प्रियंका ओम की कहानी ‘रेड वेलवेट क्लब’ औरत या मर्द होने के उहापोह में जीती कुंठित होती और अपने स्व को पहचानने के भ्रम को जीती सुंदर मनोवैज्ञानिक कहानी है।
‘मुस्तफा का पहला रोजा’ में अनुपमा ऋतु ने धर्म की कट्टरता को बालमन के कोमल विचारों से तोड़ने की कोशिश की है। धार्मिक जड़ता बालमन को न जकड़ पाए, यही कहानी का उद्देश्य दिखता है।
नृसिंह राजपुरोहित की राजस्थानी कहानी ‘भारत भाग्य विधाता’ सरकारी स्कूलों की गिरती व्यवस्था और बढ़ते धंध-फंद की सच्ची कहानी है। स्कूल में उल्टे पहाड़े पढ़ते भोले बच्चों की एक चालाक कहानी। अनुवादक नीरज दइया ने कहानी की लय को प्रवाहमान रखा है।
पति-पत्नी के व्यवहार की खाट पर हुक्का गुदगुड़ाती मेहनत कश स्त्री पुरुष के राग-विराग की अपनी सी लगती कहानी है गुरुप्रसाद मैनाली की ‘पुआल की आग’। अनुवाद में नीमा लामा कहानी में घुल मिल गई हैं।
कहानियों की तरह ही कविताओं की विविधता तथा बहुलता न्याय के पलड़े की तस्वीर उभारती है।
कुमार विश्वबंधु की कविताएं यथास्थति के आग्रह के साथ मूल में लौटने को व्यग्र लगती है।
प्रतिभा चौहान की कविताएं संवेदना के झूले पर आशा की पींगें बढ़ाती सुंदर कविताएं हैं।
सुभाष राय की कविताओं में युद्ध के प्रेरक तत्वों की चिंता और दर्द झलकता है। इसी तरह सुशील स्वतंत्र, अर्चना लार्क, चंद्रबिंद, ऋषभ तिवारी, निवेदिता पाठक और अन्य की कविताएं हिंदी कविता में एक आशा हैं।
विश्व साहित्य को स्थान देकर ‘वागर्थ’ पाठक को विदेशी दृष्टि से परिचित करा रहा है, यह भी बहुत उपयोगी कदम है।
‘परिचर्चा’ में लब्ध प्रतिष्ठित विचारकों के विचार ज्ञान को गहरा बना रहे हैं।
कुसुम खेमानी का ‘बतरस’ मानो सोने की गगरी से छलकता गंगाजल!
गीता चौबे गूंज, बेंगलुरु:‘वागर्थ’ मेरी प्रिय पत्रिका है। अति व्यस्तता की वजह से जुलाई, 2025 का अंक अभी पढ़ पाई। भक्तिकालीन आंदोलन, दर्शन एवं कवियों के विचारों से अवगत होने का अवसर प्राप्त हुआ।
राजतरंगिणी के काव्यात्मक अंश का अनुवाद पढ़ना रुचिकर लगा।
प्रिया राणा की कहानी ‘सुक्खो देवी’ अत्यंत मार्मिक और दिल को छू लेनेवाली है। ‘बेबी सूट’ के लेखक शंकर हैं। वाह! क्या कहानी है। सांप्रदायिकता की क्षुद्र सोच इस तरह जनमानस में घर कर गई है कि एक हिंदू और एक मुस्लिम इंसान के बीच स्वस्थ रिश्ते की कल्पना तक नहीं की जा रही है! एक हिंदू द्वारा किसी मुस्लिम लड़की को भेजे गए उपहार को संदेह के घेरे में रखकर इस तरह उसकी चीर-फाड़ की गई कि उपहार पानेवाला उस बेबी सूट की तस्वीर भेजकर उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने के बजाय सिर्फ ‘बहुत-बहुत शुक्रिया’ कहकर ही संतोष कर लेता है। यह मार्मिकता का चरमोत्कर्ष है।
‘अरबी के उस्ताद और गोभी मंचूरियन’ बुकर पुरस्कार (अंग्रेजी अनुवाद) प्राप्त बानू मुश्ताक की रचना का हिंदी अनुवाद है। हिंदी अनुवादक उपमा ऋचा ने इतनी खूबसूरती से अनुवाद किया है कि कहानी की एक-एक घटना स्मृतियों में अंकित हो गई।
इस अंक की कविताएं उत्कृष्ट लगीं। दीप्ति कुशवाह, राजेंद्र कुमार, मनीषा झा, धनंजय शर्मा, नंदा पांडेय आदि की कविताएं अच्छी हैं।
रामशंकर भारती: संवेदनाओं के संवाद में भीगी एक सशक्त कथा है अनुजीत इकबाल की कहानी ‘पापा की प्रोफाइल’ जहां किरदारों के संग प्रकृति भी बतियाती है।
बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जीलिंग:‘वागर्थ’ का सितंबर अंक। शोचनीय है कि लगभग डेढ़ हजार सालों से पली-बढ़ी हमारी इंद्रधनुषी संस्कृति पर सवाल खड़े करने वालों की एक जमात खड़ी है सजधज कर दलबल और अपनी बुद्धि के साथ।
हमारा देश बहुभाषिक, बहुसांस्कृतिक और बहु जातीय और कई वर्गों का है। चंद संकीर्ण राजनीतिक मानसिकता के पोषक अंग्रेजी के वर्चस्व पर सवाल न उठाकर हिंदी पर सवाल उठाने में अपना विवेक खर्च कर रहे हैं और छोटी-बड़ी भारतीय भाषाओं और बोलियों के क्षय का दोष हिंदी पर थोप रहे हैं।
इसके अलावा, प्रांतीय स्वार्थ और वर्चस्व बढ़ता जा रहा है, फलस्वरूप अन्य प्रांत में रहने वाले या प्रांतविहीन लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में अवहेलना के शिकार हो रहे हैं।
‘बतरस’ में श्रद्धेय कुसुम खेमानी ने ‘भाषा : हमारी अस्मिता’ में मौजूदा वक्त के गहन और विचारणीय मुद्दों पर चिंतन-मनन का प्रतिफलन रखा है, जो सराहनीय है।
अर्जुन प्रसाद सिंह, बिहारशरीफ: सितंबर 2025 का अंक ‘हिंदी में भाषा प्रदूषण संकट’ पर प्रोफेसर रविकांत ने शब्दों के उच्चरित होने का श्रेय मनुष्य को दिया है। परिचर्चा ने इस तथ्य से परिचित करा दिया है कि अपभाषा, हिंसक शब्दों की पैदाइश यद्यपि पिछली शताब्दियों में हुई, किंतु धर्मांधता, राजसत्ता और पूंजीवाद के गठजोड़ ने इक्कीसवीं सदी, खासकर पिछले कुछ वर्षों में भाषागत विकृति को शर्मनाक बढ़ावा दिया है। प्रोे. अवधेश प्रधान ने अपने कथ्य के लिए विश्वस्तरीय फलक पर चित्रों का दिग्दर्शन किया है। अजय तिवारी जी ने बिलकुल सही बतलाया है कि अगर हम अपसंस्कृति और व्यक्तिवाद के पूंजीवादी आधार को समझते हैं तो पर्यावरण प्रदूषण से भाषा प्रदूषण तक समस्याओं को समझने में कठिनाई नहीं होगी।
कमलेश कुमार दीवान:‘वागर्थ’ के अक्टूबर अंक में अनुजीत इकबाल की कहानी ‘पापा की प्रोफाइल’ स्टीव के जन्म का ऊहापोह और स्मिथ लारा के द्वंद्व और फर्टिलिटी सेंटर की गलतियों पर बिलकुल नए प्रकार की कहानी है।
निशि प्रभा:‘वागर्थ’ के अक्टूबर अंक में शेखर मल्लिक की कहानी ‘फूलडूंगरी पहाड़े’ पढ़ते हुए कई तरह के भाव एक साथ मन में आ रहे हैं। इसमें हक के लिए संघर्ष की बात है। साथ ही पहाड़ के आसपास प्रकृति का सौंदर्य का वर्णन स्थानीय मेला और उसके साथ वहां के लोगों का उत्साह उमंग सब कुछ बड़े ही रोचक तरीके से व्यक्त हुआ है।
