आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता पर बहस

उर्वशी : ‘वागर्थ’ के दिसंबर 2025 अंक में आयोजित उत्तर-आधुनिकता संबंधी परिचर्चा हिंदी आलोचना की उस वैचारिक बेचैनी को सामने लाती है, जो बीते कुछ दशकों से साहित्य, समाज और विचार के स्तर पर सक्रिय रही है। यह संवाद उत्तर-आधुनिकता को किसी तैयार-सिद्धांत या आयातित अवधारणा के रूप में स्वीकार करने के बजाय, उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक निहितार्थों को प्रश्नांकित करता है। सुधीश पचौरी, हरीश त्रिवेदी, अजय तिवारी और अच्युतानंद मिश्र जैसे आलोचकों के विचार इस बात का संकेत देते हैं कि उत्तर-आधुनिकता न तो हिंदी साहित्य के लिए कोई सहज मुक्ति-सूत्र है और न ही एकमात्र संकट-कारक, बल्कि वह एक ऐसी जटिल वैचारिक स्थिति है, जो आधुनिकता के अधूरे वादों, पूंजीवादी विस्तार और सांस्कृतिक पुनर्संरचनाओं के बीच आकार लेती है।

इस संवाद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ उत्तर-आधुनिकता को एकरैखिक ढंग से न तो खारिज किया गया है और न ही उत्साहपूर्वक अपनाया गया है। एक ओर जहां महावृत्तांतों के विघटन, अस्मिता-विमर्शों के उभार और बहुजन संस्कृतियों की दृश्यता को सकारात्मक हस्तक्षेप के रूप में देखा गया है, वहीं दूसरी ओर बाज़ार, उपभोग-संस्कृति और उत्तर-आधुनिक ‘खिलंदड़ेपन’ के भीतर छिपे सत्ता-संरक्षण के खतरे भी रेखांकित हुए हैं। इस पूरी परिचर्चा में आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा नहीं खींची जाती, बल्कि दोनों के बीच अंतर्विरोध, निरंतरता और विच्छेद की जटिल प्रक्रिया को समझने का प्रयास दिखाई देता है। इसी व्यापक वैचारिक पृष्ठभूमि में अच्युतानंद मिश्र का वक्तव्य विशेष ध्यान आकर्षित करता है।

अच्युतानंद मिश्र का वक्तव्य उत्तर-आधुनिकता को किसी एकांगी वैचारिक आंदोलन के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिकता के अंतर्विरोधों से उपजी एक संक्रमणशील सांस्कृतिक अवस्था के रूप में देखने का आग्रह करता है। वे स्पष्ट रूप से यह स्थापित करते हैं कि उत्तर-आधुनिकता आधुनिकता का पूर्ण निषेध नहीं है, बल्कि उसी के भीतर विकसित एक ऐसी प्रवृत्ति है, जिसमें अस्वीकार और विकास-दोनों साथ-साथ चलते हैं। इस दृष्टि से उनका विचार आधुनिकता- उत्तर- आधुनिकता के बीच किसी सरल द्वंद्व को अस्वीकार करता है।

अच्युतानंद मिश्र उत्तर-आधुनिकता को साहित्यिक या दार्शनिक विमर्श तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे उत्पादन-पद्धति, उपभोग-संस्कृति और तकनीकी विकास के व्यापक संदर्भ में रखकर देखते हैं। उनके अनुसार, उत्पादन-केंद्रित समाज से उपभोग-केंद्रित समाज की ओर संक्रमण ने चेतना, कला और संस्कृति की संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। इस क्रम में उत्तर-आधुनिकता केवल विचार का नहीं, बल्कि जीवन-शैली और सामाजिक अनुभव का भी प्रश्न बन जाती है। उनका यह विश्लेषण फ्रेडरिक जेमेसन की उस स्थापना से संवाद करता है, जिसमें उत्तर-आधुनिकता को उत्तर-पूंजीवाद की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति माना गया है।

उनका प्रसिद्ध रूपक-कि मनुष्य और मनुष्यता आधुनिकता की बस में बैठकर ही उत्तर-आधुनिकता के हवाई जहाज तक पहुंचे हैं-आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता के ऐतिहासिक संबंध को अत्यंत सटीक ढंग से व्यक्त करता है। यह कथन स्पष्ट करता है कि उत्तर-आधुनिकता आधुनिकता की उपलब्धियों, संघर्षों और संकटों के बिना संभव नहीं थी। इस प्रकार वे उस धारणा को खारिज करते हैं, जो उत्तर-आधुनिकता को आधुनिकता के एकदम बाहर खड़ा कर देती है।

अच्युतानंद मिश्र अस्मिता-विमर्शों और सामुदायिक चेतना के उभार को भी ऐतिहासिक संदर्भों में रखते हैं। फ्रैंकफर्ट स्कूल के चिंतकों का उल्लेख करते हुए वे यह संकेत देते हैं कि केवल वर्गीय दृष्टि समाज की जटिलताओं को समझने में अपर्याप्त सिद्ध होने लगी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सामाजिक संरचनाओं में आए परिवर्तनों ने स्त्री, दलित, नस्लीय और भाषिक पहचानों को वैचारिक केंद्र में ला खड़ा किया। इस दृष्टि से वे उत्तर-आधुनिकता को हाशिये की आवाज़ों के उभार की ऐतिहासिक ज़रूरत के रूप में देखते हैं।

हालांकि, उनके वक्तव्य की एक सीमा यह भी है कि वे उत्तर-आधुनिकता के बाजारोन्मुख स्वरूप पर अपेक्षाकृत कम ठहरते हैं। पहचान और समुदाय की राजनीति किस प्रकार पूंजी और मीडिया द्वारा उपभोग की वस्तु में बदल दी जाती है-इस प्रश्न पर और अधिक आलोचनात्मक विस्तार की संभावना यहां दिखाई देती है। इसके बावजूद, उनका चिंतन उत्तर-आधुनिकता को न तो पूर्णतः मुक्तिकारी घोषित करता है और न ही सिरे से अस्वीकार करता है।

अच्युतानंद मिश्र का वक्तव्य उत्तर-आधुनिकता को समझने के लिए एक संतुलित, द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक दृष्टि प्रदान करता है। यह दृष्टि आधुनिकता की विफलताओं को पहचानते हुए भी उसकी उपलब्धियों को अस्वीकार नहीं करती और उत्तर-आधुनिकता की संभावनाओं को स्वीकारते हुए भी उसके अंतर्विरोधों से आँख नहीं मूंदती।

‘वागर्थ’ की इस पूरी परिचर्चा में उनका हस्तक्षेप उत्तर-आधुनिकता को किसी वैचारिक फैशन से अधिक, एक जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में समझने का आग्रह करता है।

राजेंद्र प्रसाद द्विवेदी, लखनऊ : ‘वागर्थ’ स्तरीय तथा उच्च कोेटि की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सामग्री से भरपूर पत्रिका है जिसका जितना भी प्रचार एवं प्रसार हो उतना कम है। आकर्षक साज-सज्जा से युक्त ‘वागर्थ’ उत्कृष्ट एवं प्रकाशन के लिए भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता सभी पाठकों की सराहना  की पात्र है। इसके निरंतर विकास हेतु मेरी भी शुभकामनाएं स्वीकार करें।

फ़रहत अली ख़ान : ‘वागर्थ’ दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित पृथ्वीराज तौर की मराठी कहानी ‘कल्पनातीत सत्यकथा’  (अनुवाद : सुनील बाबुराव कुलकर्णी)। एक काल्पनिक आर्मी अफ़सर के उसकी पत्नी को लिखे ख़त के ज़रिये रची गई इस कहानी में लेखक इंसानी कद्र को किसी भी दूसरी भावना या पहचान से ऊपर बताने में कामयाब है। आखिरी वाक्य कहानी का हासिल है।

बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जीलिंग : उत्तर-आधुनिक बहुरंगी उपभोक्तावादी बाजार में फैशन, मनोरंजन तथा हर प्रकार की सेवा विकृत रूप में परोसी जा रही है। जिंस पैंट घुटनों में छेद बनाने तक सीमित न होकर ऊपर तक गई है।

कहा यह भी जा रहा है कि उत्तर-आधुनिकता की विदाई हो गई है और ‘उत्तर सत्य’ का प्रवेश हो चुका है, लेकिन हम अपने देश में तो वीरगाथा से आगे नहीं निकल पाए हैं। मानवीय संवेदना तथा सामाजिक मूल्य के अर्थ और बहस केवल साहित्य में सीमित है।