आर चंद्रशेखर, बेंगलुरु : ‘वागर्थ का दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित धनंजय चोपड़ा की कहानी ‘एक कप कॉफी और बारिश की बूंदें’ अति अर्थगर्भित एवं मन को लुभानेवाली कहानी है। अनुवादकला में सिद्ध रजनीकांत एस शाह की ‘पलायन’ (वर्षा अडालजा) कहानी और सुनील बाबूराव कुलकर्णी द्वारा अनूदित मराठी कहानी ‘कल्पनातीत सत्यकथा’ (पृथ्वीराज तौर) वास्तव में अनुवाद जैसी नहीं है। लगता है मानो गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक सौरभ की झांकियां देखने को मिल रही हैं।
केदार नाथ सविता, मीरजापुर : ‘वागर्थ’ के दिसंबर 2025 अंक में पूनम सिंह की कहानी ‘रेता को टीला’ और कृष्णा सोबती पर श्रद्धांजलि सिंह का लेख प्रभावशाली है। मेरे मीरजापुर की कवयित्री अनुराधा ओस की दोनों कविताओं को पढ़कर उनपर गर्व महसूस होता है। अगले अंक की प्रतीक्षा है।
निर्दोष कुमार यादव : ‘वागर्थ’ के दिसंबर अंक में छपी धनंजय चोपड़ा की ‘एक कप कॉफी और बारिश की बूंदें’ खूबसूरत और सही राह दिखाती हुई कहानी है।
शायद इसने लेखक के व्यक्तित्व से भी हमारा परिचय करा दिया। मसलन लेखक के कॉफी बनाने का अंदाज़, संभवतः लेखक का कोई बहुत करीबी ऐसी गगनचुंबी इमारत में रहता है। हो सकता है ये सिर्फ अनुमान ही हो पर उनकी शागिर्दी में कहानी बनाना और लिखना तो हमने सीख ही लिया है, यह तो अब स्पष्ट है।
चमन लाल शर्मा, वाराणसी : अक्टूबर 25 का ‘वागर्थ’ पेपर एजेंसी पर उपलब्ध नहीं हुआ। मानसिक यायावर अंत तक खोजता रहा, नवंबर 25अंक हाथ में आने तक। नवंबर 25 के कसे रूप ने अक्टूबर की बेताबी पी ली।
सबसे पहले जो पढ़ा, उसी से शुरुआत उचित होगी। बात बतरस की है जिसने सिनेमा की संप्रेषणियता के महत्व को सरलभाषा में विस्तार से प्रस्तुत किया।
जनार्दन की कहानी ‘दस्तूर’ धर्म को धंधा बनने की रामकहानी है। सामाजिक समरसता के फटे दुपट्टे पर सिसकती है यह कहानी।
हर्षदेव की बाजारवाद की कालिखों से लिखी सुंदर कहानी ‘परोपकार’ है। यह बताती है कि धर्म के घोड़े पर सवार होकर बाजारवाद किस तरह सरपट दौड़ रहा है। ‘तटों के बीच ज्वार’ अर्चना पैन्यूली की कम प्रचलित विषय पर लिखी विद्रोही कहानी है।
विजय नायक की ‘मंत्रणा’ बाल मन की जिज्ञासा का तमाचा लगाती ऐसी कहानी है जो राजनीति का गाल लाल कर देती है।
कविताएं व गज़ल श्रेष्ठ हैं। मर्म पर चोट करती… शवगृहों में पड़े इतिहास को कौन ले जाएगा श्मशान!..संख्या हूँ, नाम हूँ, जाति हूँ, लिंग हूँ, भाषा हूँ। पर मुझे जो होना था-वह नहीं हूँ(उत्तम पीयूष)..बाढ़ राहत शिविर में बोतल खुली है कैसी ये राहतें हैं, …टोपियां हैं, फ्लैशगन हैं, कैमरे हैं.. कढ़ी बासी है, उबाला जा रहा है (यश मालवीय)। पन्ना त्रिवेदी, कुमार लव, अशोक अंजुम, ऋतु त्यागी आदि सभी कुशल कवि हैं। और सबसे मार्मिक कविता गाज़ा के पीड़ित आम जन के दर्द पर है।
परिचर्चा सार्थक रही। विश्व दृष्टि में साहित्य के नोबेल विजेता लास्लो क्रास्नाहोरकाई के विषय में जानकर ज्ञान वृद्धि हुई।
कुलदीप सिंह भाटी : ‘वागर्थ’ का नवंबर अंक। चिकित्सा के नाम पर हो रही लूट पाट तथा इसपर हावी होते बाज़ार पर करारा तंज कसती हुई लघुकथा है- ‘इलाज का धंधा’। ऋतु त्यागी की कविताएं और मराठी में अनूदित कविताएं भी बहुत सुंदर हैं। ‘वागर्थ’ का बेहतरीन अंक!’
फरहान, कोलकाता : ‘वागर्थ’ में अर्चाना पैन्यूली की कहानी ‘तटों के बीच ज्वार’ पढ़ी। इसने मुझे भीतर से छू लिया। इन्होंने बेहद शानदार तरीके से ऐसे विषय को चुना है जो शायद हिंदी साहित्य जगत में अनछुआ है। बहुत-बहुत बधाई, आगे भी मैं इनकी अन्य रचनाएं पढ़ूंगा। यह कहानी बेहद संवेदनशील होने के साथ-साथ बेइंतहा खुबसूरत है।
अश्वनी शांडिल्य, चंडीगढ़ : बहुत अधिक व्यस्त होने के कारण वागर्थ का अक्तूबर अंक संपादकीय पढ़ने के बाद एक तरफ रख दिया था मैंने। आज सुबह उठने के बाद साढ़े चार बजे आपकी कहानी ’पापा की प्रोफाइल’ पढ़नी शुरू की। इस कहानी की एक ताकत तो यह है कि यह खुद मुझसे पढ़वा रही थी। अत्यंत रोचक तो है ही जिज्ञासा भी अंत तक बनी रहती है। भाषा की बुनावट तो अद्वितीय है ही साथ में आपकी कल्पना शक्ति और चिंतन इसमें चार चांद लगा रहे हैं। तात्विक दृष्टि से तो एकदम सफल है ही लेकिन आपने जो विभिन्न उपमाएँ दी हैं, वे इस कहानी का वजन बढ़ा देती हैं। पढ़कर बहुत देर तक ऐसा लग रहा है जैसे मैं उन पात्रों के साथ हूँ, उनके घर में, उनके वातावरण में!
यश मालवीय, इलाहाबाद : ‘वागर्थ’ के नवंबर अंक के संपादकीय पर एक गीतात्मक प्रतिक्रिया-
सूर्योदय कुएं में नहीं होता
आंख सूरज कभी नहीं धोता
आईने बातचीत करते हैं
हर घड़ी को अतीत करते हैं
बीज बंजर में सच नहीं बोता
तीरगी कहकहे लगाती है
रोशनी को मगर जगाती है
चैन का क्या कहां नहीं खोता?
बात खुद से भी बहुत होती है
आंसुओं को नदी संजोती है
पथ में खरगोश आज भी सोता है
हर जगह दुख कयाम करता है
सुख को भी राम राम करता है
बोलता वक्त ही कि ज्यों तोता
दुश्मनी धूप से भी होती है
जो घनी छांव को संजोती है
दिन कभी फूटकर नहीं रोता।
