पल्लवी विनोद:‘वागर्थ’ के फरवरी 2026 अंक में प्रकाशित दिव्या विजय की नई कहानी ‘शाख़सार’ सिर्फ एक कहानी नहीं बल्कि प्रेम के संदर्भ में दिया गया एक हलफ़नामा है। मैं इसके भाषाई सौंदर्य से अभिभूत हूँ। कहन इतना सुंदर है कि आप कहानी के साथ बहना नहीं बंधना चाहेंगे। दिव्या, भाषा और शिल्प के इस स्फुरण के लिए आपको खूब सारी बधाई।
इला साधु: दिव्या विजय की ‘शाख़सार’ बहुत उम्दा कहानी है और ‘वागर्थ’ के फरवरी 2026 अंक में आना उसकी महत्ता सिद्ध करता है।
फरहत अली खान:‘वागर्थ’ जनवरी-2026 अंक। दुनिया में रौनक बच्चों और बुजुर्गों से है। सत्यनारायण पटेल ने अपनी कहानी ‘दादी के ठुमके’ में खूबी के साथ एक मध्यमवर्गीय घर का माहौल बनाया और कहानी रचते गए। इतनी खूबसूरत कहानी बहुत दिनों बाद पढ़ने को मिली।
कुलदीप सिंह भाटी:‘वागर्थ’ के जनवरी 2026 अंक में चाहत अन्वी की कहानी ‘तिरिल’ पढ़ी। बेहतरीन कहानी। सर्वप्रथम पूरी ‘वागर्थ’ टीम के संपादकीय विवेक को साधुवाद जो इस प्रकार की उम्दा कहानियां पढ़ने को मिलती हैं। आदिवासी समूह के प्रति हमारे मन में जो (गलत) धारणाएं निर्मित की जाती हैं, उनको यह कहानी उजागर करती है।
यह कहानी जंगल और इसकी संपदा के प्रति प्रेम को प्रकट करती है। बताती है कि कैसे हमारी प्रकृति-विरोधी और पूंजीवादी-बाजारवादी सोच जल, जंगल और जमीन के आदिवासी हितों पर कुठाराघात कर रही है। प्रकृति को हम शहरी या कस्बाई लोग तब तक नहीं समझ सकते जब तक हम ‘सोमा’ की भूमिका में किसी ‘फुआ’ के सानिध्य में न रहें। हम सब प्रकृति के इन संरक्षकों के प्रति ‘गिन्नी’ की तरह दिग्भ्रमित हो जा सकते हैं। हालांकि इसके लिए गिन्नी से ज्यादा हमारा शैक्षणिक माहौल उत्तरदायी है।
अर्जुन प्रसाद सिंह, बिहारशरीफ:‘वागर्थ’ का जनवरी 2026 अंक लगभग पूरा पढ़ गया। ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ को बड़ा फलक दिया गया है जो सर्वथा उचित है। परिचर्चा है ही, कहानियों और जीवन-संदेश स्तंभ को भी स्थान देना इनके महत्व का परिचायक है। निष्कर्ष निकलता है कि एआई साहित्य रचना करने के बावजूद संवदेना और संवेग नहीं ला सकता। वह भारत जैसे गरीब देशों में बेरोजगारी, प्रकारांतर से गरीबी और अन्य संकट बढ़ाएगा। भारतीय समाज में दलित, आदिवासी तथा स्त्री विमर्श को तेवरदार बनाने की योग्यता का अधिकारी वह नहीं हो सकता।
काहानियों में ‘दो घरों का एक घर’, ‘जहर’ और ‘तिरिल’ बहुत अच्छी लगीं। ‘दो घरों का एक घर’ में साधारणीकरण की अद्भुत शक्ति है। तभी गोदावरी (मौसी) और चंदू (चंद्रप्रकाश) की पीड़ा पाठकों की पीड़ा बन जाती है। भाषा में काव्यात्मकता है, स्थानीयता भी है। ‘जहर’ और ‘तिरिल’ की लाक्षणिकता यह है कि दोनों में प्रतिरोध की चिनगारी है। ‘जहर’ की सेवती में भी और ‘तिरिल’ की ‘फुआ’ में भी। ‘तिरिल’ में आदिवासी क्षेत्र में बोले जाने वाले शब्दों की भरमार पात्रानुकूल प्रयुक्त होकर कहानी के शिल्प को प्रवाह देती है, सौंदर्य में वृद्धि करती है।
क्रांति कबीर, पौड़ी गढ़वाल: एप्सटीन की फाइलें कइयों का पोल खोल रही है। कहना न होगा कि मुझे गरीबों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों, मजदूरों के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले अधिकतर लेखक, नेता, कारोबारी बस खुद के मन के दागों को ढकने के लिए ही लंबी जुबान निकालते प्रतीत होते हैं। ये सब खोखली बातें उनके खुद के अपराधबोध के प्रतिबिंब के अलावा और कुछ नहीं हैं।
‘वागर्थ’ के नवंबर, 2025 अंक की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। मैंने उसकी एक नहीं बल्कि दो-दो प्रतियां संभाल कर रख ली हैं। इस साल हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने पर उसमें छपा एक-एक ऐतिहासिक कार्टून हमें बिना किसी लंबी चौड़ी भूमिका के तत्कालीन पत्रकारिता और सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य का सांगोपांग दर्शन करा देता है।
पत्रकारिता विषयक शानदार लेखों के अलावा, यश मालवीय और जयप्रकाश मानस की कविताएं हैं। मनोज साहू जी की गजलें तथा विजय नायक की कहानी भी बहुत अच्छी लगी।
अंत में, यह बात अपनी तरह से दोहराना चाहता हूँ – सत्य का मुंह स्वार्थ से भरा है!
चमन लाल शर्मा, वाराणसी:‘वागर्थ’ के जनवरी 2026 अंक में सत्य नारायण पटेल की कहानी ‘दादी के ठुमके’ बाल सुलभ इच्छा का भावुक नृत्य दिखा गई कहानी बताती है कि खुशियां धन में नहीं होती हैं। वे बसती हैं, निश्छल मन के कोनों में।
‘दो घरों का एक घर’ दिनेश पाठक की सरल तथा भावुक कहानी है। रिश्ते-नाते, बात-व्यवहार सब मन के होते हैं। मन जुड़ा तो संसार जुड़ा। निश्छलता, स्नेह और सहयोग के शिखर पर किलोल करती बर्फ सी ठंडक देती कहानी।
छोटी छुरी से आकाश चीर देने वाली लघुकथा है रवि शंकर की ‘बराबरी’। अरुणेंद्र नाथ वर्मा की कहानी ‘आत्मक्षरण’ एआई संबंधित शंकाओं को प्रस्तुत करती साधारण कहानी बनकर रह गई है।
चाहत अन्वी की कहानी ‘तिरिल’, पढ़कर लगा, शहरी विकास की स्याह सड़क आदिवासी प्राकृतिक सौंदर्य को निगल रही है। आदिवासी व्यथा की सच्ची कहानी।
पंजाबी कहानी ‘हशमत चाचा’ संदेश दे गई कि मनुष्य का जीवन महत्वाकांक्षाओं का श्मशान है। सब यहीं छोड़ना होता है, जानते हुए भी कब्र पर पट्टी ठोकना अधूरी इच्छाओं का रुदन है। अनुवादक ने कहानी की आत्मा को जीवित रखा है।
ओड़िया कहानी ‘जहर’ में ममतामयी चौधरी पुरुष मानसिकता पर करारी चोट करती हैं।
अरुण आदित्य की कविताएं सामयिक चिंताओं पर कसी हुई हैं। प्रेम रंजन अनिमेष की छोटी-छोटी कविताएं स्त्री को साहस देती सुंदर कविताएं हैं। श्वेता शर्मा की कविता ‘आंकड़ा’ कछुआ की पीठ पर लदी सरकारी योजनाओं की नीयत और किसान की अंतिम नियति को गाती एक सच्ची-सी कविता है। राजहंस सेठ अपनी कविताओं में देह के प्रवचनों से ऊपर नहीं उठ सके।
मुख़्तार अहमद की कविताएं थोड़े शब्दों में बड़ी बात की कविताएं लगीं। इंदु श्रीवास्तव की ग़ज़ल, वाह, क्या भाषा सौष्ठव है, ‘तुमने बांटी, गर्म वादों की मुलायम रोटियां…’!
सबसे सुंदर रही महाकवि निराला की एक झलक। धन्य हो गया पाठक इतना सब पाकर।
कुल मिलाकर ‘वागर्थ’ की नव वर्ष की शुरुआत श्रेष्ठ रही। इसके बहुआयामी रचना संसार ने तृप्त किया। आगे और भी श्रेष्ठ हो, इसकी कामना है।
