शेफालिका सिन्हा, रांची : ‘वागर्थ’ का अक्टूबर 2025 अंक सितंबर के अंतिम सप्ताह में ही मिल जाने से बहुत खुशी हुई। इस अंक का विशेष आकर्षण मोहन राकेश की जन्मशती पर चर्चा लगी। इतनी कम जीवनावधि में इनके कालजयी नाटक उनकी अद्वितीय लेखकीय प्रतिभा की मिसाल हैं।
जन्मशती चर्चा में पूछे गये सवाल और उन पर अपने अपने क्षेत्र के वरिष्ठ व्यक्तियों के जवाब से बहुत कुछ जानने-समझने को मिला। वैसे नाट्यालोचक मेरे पिताजी डॉ. सिद्धनाथ कुमार एम ए हिंदी के विद्यार्थियों को ‘आधे अधूरे’ पढ़ाते थे। हमें ऐसा लगता रहा है कि मोहन राकेश की कृतियों से हमारा बहुत निकट संबंध है, उनकी जन्मशती पर उनको शत्-शत् नमन।
दूसरा आकर्षण हमारे झारखंड के कथाकार शेखर मल्लिक की कहानी ‘फूलडूंगरी पहाड़े’ रही। इसमें कहानी के नायक सुकू के जीवन की जद्दोजहद है, अपनी ही जमीन के मुआवजा के लिए उसका संघर्ष है, इसमें बढ़ रही जागरूकता भी। एक पठनीय कहानी!
जसबीर भुल्लर की पंजाबी कहानी ‘परिंदों के देश की यात्रा’ का हिंदी अनुवाद बहुत ही अच्छा लगा। ऐसा लगा, जैसे कोई सच्चा संस्मरण हो।
अनुजीत इकबाल की कहानी ‘पापा की प्रोफाइल’ की भाषा काव्यात्मक है और उपमाओं से भरे वाक्य हैं। संवेदना-भावना दिल को छू लेती है। सभी कहानियां उम्दा और आज के परिवेश को उजागर करती हैं। विश्वदृष्टि स्तंभ के तहत स्पेनी कहानी, सरल भाषा में अभिव्यक्त एक चलचित्र की तरह है। यह मध्यम आयु वर्ग की वैवाहिक जटिलताओं को दिखाती है। लगता है यह तो ‘मेरा आदमी’ नहीं, सबका आदमी है और मार्मिकता में भी एक मुस्कान आ जाती है!
‘वागर्थ’ की सभी कविताएं रंग बिरंगे विभिन्न पुष्पों से बने पुष्पगुच्छ का आभास कराती हैं। कुछ कविताएं समझ में आती हैं तो कुछ पार भी हो जाती हैं। अपने शहर के कवि नीरज नीर की कविताएं अच्छी लगीं, उनको बधाई!
आज अनिश्चिता के दौर से छोटे परिवार से लेकर पूरा विश्व प्रभावित है। झूठ-सच-फरेब, बड़ा बनने की चाहत और प्रभुत्व ने आपसी संबंध, जीवन, विचार-व्यापार सबको एक कोहरे से ढक लिया है।
संजीव : ‘हिंदी संस्कृति की जमीन’ सितंबर अंक में श्रेष्ठ लेख है जिसे पढ़कर ‘वागर्थ’, हिंदी, हिंदी संस्कृति सब पर श्रद्धा उत्पन्न होती है और उसकी धरोहर की सच्ची पड़ताल से पाठक रूबरू होता हुआ इसके समक्ष उपस्थित चुनौतियों का उत्तर देने की प्रतिबद्धता और साहस से पुष्ट होता है। हृदय से बधाई स्वीकार करें।
संजय यादव, नैहाटी : ‘वागर्थ’ के सितंबर 2025 अंक में छपी कुमार विश्वबंधु की कविता ‘कोई तो है’ में कवि ने सरल भाषा और मार्मिक प्रतीकों के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि मनुष्य चाहे जितना स्वतंत्र दिखाई दे, उसके भीतर और बाहर कोई अदृश्य शक्ति सतत सक्रिय रहती है। यह शक्ति मनुष्य के निजी क्षणों तक उसका पीछा करती है, उसकी हँसी तक पर अंकुश लगाती है और उसके जीवन के प्रत्येक पहलू की साक्षी बनती है।
इस कविता का संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि हमारी स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। हमारे हर कर्म, हर विचार और हर गतिविधि का कोई न कोई साक्षी अवश्य है। चाहे वह ईश्वर हो, समाज हो, तकनीक हो या हमारी अपनी अंतरात्मा- यह सत्ता हमें अनुशासित और सजग बनाए रखती है। यह कविता हमें चेतावनी देती है कि हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुननी चाहिए और जीवन को ईमानदारी और सजगता से जीना चाहिए।
यह कविता केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की विडंबना, दार्शनिकता और मनोवैज्ञानिक यथार्थ का सशक्त दस्तावेज है।
बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जीलिंग : ‘वागर्थ’ अगस्त 2025 अंक। सवाल तो बनता है , क्या हम खुद को भारतीय कहने से मुकर रहे हैं? आज के राजनीतिक माहौल में प्रायः सभी लोगों की ध्यान-धारणा संकुचित हो रही है। बात राष्ट्रप्रेम की भले ही करते हैं, समर्पण और समर्थन अपनी जाति, भाषा तथा आंचलिक मुद्दों का करते हैं। हमारी भारतीयता की पहचान धूमिल होने पर हमें तनिक भी चिंता नहीं है। आए दिन चुनावी और राजनीतिक भाषणों में भाषा या जाति के मुद्दे को ज्यादा उछाला जा रहा है, जिसके कारण आपसी लगाव या सद्भाव नष्ट हो रहा है।
उर्वशी : ‘वागर्थ’ का सितंबर अंक। उत्तर सत्य के इस दौर में हिंदी संस्कृति के मूल आदर्शों की ओर लौटना ही एकमात्र राह है। यह सचमुच आत्ममंथन की गंभीर पुकार है।
मुझे प्रियंका ओम की कहानी ‘रेड वेलवेट क्लब’ बेहद प्रभावित कर गई। यह आत्मकथा-सदृश कथा भीतर तक उतर जाती है। इसे पढ़ना मानो किसी पुराने घर का दरवाज़ा खोल देना हो-जहां दबी आवाजें, धूल की गंध और दबे एहसास अचानक जी उठते हैं।
कहानी का ‘मैं’ अपनी मां के कठोर-संरक्षक व्यक्तित्व और समाज की अपेक्षाओं के बीच झूलता है। मां का प्रेम और कठोरता दोनों ही उसे गढ़ते हैं, मगर भीतर का खालीपन उसे निरंतर मथता है। प्रियंका ओम की भाषा सरल भी है और तीक्ष्ण भी। कभी सहज बहती धारा, तो कभी शब्दों की तलवार-जो पाठक के भीतर कहीं गहरे जख्म को छू ले। लिपस्टिक, साड़ी, संदूक जैसी छोटी-सी वस्तुएँ स्मृतियों की संरक्षक बनकर सामने आती हैं।
यह कहानी पहचान, छुपाव और आत्म-सत्यापन के संघर्ष को जिस नाजुकता से चित्रित करती है, वह पाठक के भीतर लंबे समय तक गूंजती रहती है। ‘रेड वेलवेट क्लब’ सिर्फ कथा नहीं, बल्कि मुक्ति का सांकेतिक स्थल है-जहाँ कोई अपने वास्तविक चेहरे को स्वीकार करने का साहस जुटाता है।
