हर्ष देव:‘वागर्थ’ के सितंबर 2025 के अंक में प्रकाशित हरियश राय की कहानी ‘इबारत’ संकीर्ण मानसिकता को एक मानवीय और बहुलतावादी सोच की दिशा देने का प्रयास करती है। रचनाकार को साधुवाद।
धनेश दत्त पांडेय, देहरादून:‘वागर्थ’ सितंबर ’25 की कहानी- ‘पुआल की आग’ (गुरुप्रसाद मैनाली)! कितनी सहज, कैसी सरल और कितनी सजीव! निमा लामा का अनुवाद भी वैसा ही खूबसूरत- कहानी की आत्मा और कलेवर को हिंदी का जामा जोड़ा पहनाकर रत्ती-रत्ती समेटे हुए। काश, मैं भी हिंदी में एक कहानी इतनी ही सहज-सजीव लिख पाता और कोई इसे नेपाली में ढालकर इतनी ही मनोहारी बना पाती!
मनोज कुमार गुप्ता:‘वागर्थ’ सितंबर ’25 के अंक में पवन शर्मा की लघुकथा ‘एक नई लकीर’ पीढ़ियों का अंतर बताती है। लकीर पार करने की हिम्मत नई सोच और बदलाव की ओर संकेत है।
चमन लाल शर्मा, वाराणसी: भारत में धूमिल होती भारतीयता चिंतित करती है। भाषाई, जातीय, क्षेत्रीय लकीरों में भारतीयता को खंड-खंड होते देखकर बौद्धिक व्यग्रता का ज्वार उमड़ता है। भारत में विभिन्नता के साथ भारतीयता भी सशक्त हो, यही कामना है।
डॉ. कुसुम खेमानी के बतरस का रस छलका और पाठक प्यासे का प्यासा। यही बतरस का जादू है। जर्मनी यात्रा में जिस प्रकार की सहिष्णुता, पारस्परिक स्नेह और जर्मनी के इतिहास -भूगोल को जिस तरह मनोयोग से जिया गया है उससे यात्रा वृत्तांत जीवंत हुआ ही, जर्मनी के बारे में अधिक जानने को उत्सुक हो गया।
अगस्त अंक में हरियश राय की कहानी ‘इबारत सांप्रदायिक धुएं से धूमिल अतीत की दीवार को सौहार्द के रंग से रंग गई।
गोविंद उपाध्याय की कहानी ‘कीर्तन’ वृद्ध होती मानसिकता के उहापोह की उत्तम कहानी है। वृद्ध अवस्था की विवशता और परिवार के व्यवहार को बांचती सच्ची कहानी। आशीष दशोत्तर की कहानी ‘गिंडोले’ मनुष्य के झूठे व दोहरे ईमान की धज्जी उड़ाती एक धधकती कहानी है।
‘प्रेम’ हुस्न तबस्सुम निहां की उम्दा कहानी है। मानव स्वतंत्र पैदा हुआ है, पर यहां उसे धर्म-जाति के खांचों में फंसाकर परतंत्र जीवन के लिए विवश कर दिया जाता है। कहानीकार ने मुद्दे को मजबूती से सजाया है। प्रेम की तड़प धर्म की दीवार को हिला दे, यही कहानी का मकसद है। समाज के सख्त झटकों को झेलती ताकतवर कहानी।
कविताओं ने नए प्रतीक और विचारों से संतुष्ट किया। विनोद प्रकाश गुप्त ‘शलभ’ और प्रवीण पारीक ‘अंशु’ की गजल अपने-अपने पैमाने पर खरी। अपने स्तर को बनाए रखा है ‘वागर्थ’ ने।
आनंद भारती:‘वागर्थ’ के अगस्त 2025 अंक में गोविंद उपाध्याय की कहानी ‘कीर्तन’ घर-घर में मौजूद है। वर्षों पहले ‘सारिका’ में कीर्तन नाम से राजेंद्र राव की एक लंबी कहानी छपी थी। मैंने अपने गांव में भी काफी पहले एक कीर्तन समारोह में खुली आंखों से यह सब होते हुए देखा है। इसलिए इस कहानी से आसानी से जुड़ गया।
इंदर:‘वागर्थ’ के अगस्त अंक में प्रकाशित कहानी ‘प्रेम’ हुस्न तबस्सुम निहां की बहुत सुंदर है। लेखिका ने अपने परिवेश से कहानी का प्लॉट उठाया है। बहुत सही कहा है कि धर्म का लक्ष्य भीतर से परिवर्तन है। मानव धर्म ही सच्चा धर्म है, सारे धर्म आदमी को गुलाम बनाते हैं और आदमी पर बंदिशें लगाकर कठपुतली बना देना चाहते हैं।
अनाम: अगस्त अंक में हुस्न तबस्सुम निहां की कहानी ‘प्रेम’ शानदार कहानी है। उसका कथ्य बहुत अनुभवमूलक और बेजोड़ है। जिस तरह स उन्होंनेे प्रेम, धर्म और ‘स्व’ को व्याख्यायित किया है, वह लाजवाब लगा।
मनोज कुमार गुप्ता: ‘भारत को जीना सीखना होगा’। ‘वागर्थ’ अगस्त अंक में एक गंभीर प्रश्न उठाया गया है- क्या भारतीयता आज अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है? इसमें कहा गया है कि भारतीयता का आकर्षण धूमिल हो रहा है और नागरिक की पहचान अब जाति, धर्म और प्रांत से तय होती है, न कि भारतीय होने से। यह कथन गहरी चिंता जगाता है, क्योंकि राष्ट्र-राज्य की जगह बाजार-राज्य ने ले ली है और समाज पर समुदाय हावी हो गए हैं। फिर भी समाधान को केवल इस वाक्य तक सीमित छोड़ देना-भारत को जीना सीखना होगा-कुछ अधूरापन लिए प्रतीत होता है। सवाल है कि इस जीने की ठोस रूपरेखा कैसी होगी, और वह किस तरह शिक्षा, संवैधानिक मूल्यों या नागरिक पहल के जरिए सामने आएगी।
इस लेख का सबसे मूल्यवान योगदान यह है कि उसने भारतीयता को अर्जित अस्मिता बताया। यह पहचान जन्म से नहीं मिलती, बल्कि साझा जीवन और संघर्ष से अर्जित होती है।
भारतीयता कोई शुद्धतावादी समुच्चय नहीं है, बल्कि मिश्रणशीलता और साझी विरासत उसकी असली ताकत है। यदि हम शिक्षा, संवाद और संवैधानिक मूल्यों की रोशनी में इस साझी विरासत को पुनः खोज सकें, तो भारतीयता की पतंग फिर आसमान छू सकती है।
जितेंद्रसिंह ‘पथिक’, रतलाम: ‘वागर्थ’ का अगस्त 2025 अंक मिला, देखा-पढ़ा। ‘हम भारतीय क्यों है’ असरदार लगा। अंक में कुल पांच कहानियां हैं जिनमें से एक कोरियाई से हिंदी में अनूदित है। हरियश राय की कहानी ‘इबादत’, गोविंद उपाध्याय की ‘कीर्तन’, आशीष दशोत्तर की ‘गिंडोले’, हुस्न तबस्सुम निहां की कहानी ‘प्रेम’ पढ़ने से लगता है कहानियों को ‘अच्छी’ कहने में कोई हर्ज नहीं है। आशीष दशोत्तर की कहानी ‘गिंडोले’ का पात्र निसार निर्भीक, बिंदास, हरफनमौला और जाति, संप्रदाय, मजहम की परवाह न करते हुए संकीर्ण सोच तथा बेपेंदी लोगों को ‘गिंडोले’ समझते-कहते हुए अपनी जीवटता मृत्यु पर्यंत बरकरार रखता है।
सुखद लगता है अंक में पर्याप्त कविताएं, कुछ गजलें और लघुकथा रखी गई है। संवाद-समीक्षा, किताबें, बतरस, देश-देशांतर इत्यादि ढेर सारी पठनीय सामग्री के लिए संपादक मंडल साधुवाद का पात्र है।
