धीरेन्द्र सिंह -‘वागर्थ’ जून अंक।डॉ. कुसुम खेमानी के हिंदी साहित्य के विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए।कुछ कहानियां इस अंक में काफी लंबी हैं।पत्रिका का सबसे आकर्षक भाग लगा विविध भाषाओं के साहित्य का हिंदी में अनुवाद।सभी अनुवादकों को।शुभकामनाएं।पत्रिका का तकनीकी क्षेत्र काफी प्रभावशाली है।एक बार पुनः डॉ कुसुम खेमानी के योगदान और पहल की प्रशंसा।

संजू कुमार, मुरादाबाद-‘वागर्थ’ के जून 2022 अंक में विभा ठाकुर का थेरी गाथा पर आलेख बहुत सुंदर है।स्त्री विमर्श की आदि गाथा को पाठकों के सम्मुख लाने के लिए बहुत-बहुत धन्यावाद।

हरिराम हेतराम भार्गव-‘वागर्थ’ पत्रिका के बारे में सबसे पहले डॉक्टर हरमहेंद्र सिंह बेदी, कुलाधिपति, केंद्रीय विद्यालय हिमाचल प्रदेश ने हमें नियमित पढ़ने के लिए प्रतिबद्ध किया।इस पत्रिका को हम ऑनलाइन स्तर पर नियमित पढ़ते आ रहे हैं।इस पत्रिका से सच्चे अर्थों में साहित्यिक-सांस्कृतिक मूल्यों की जानकारी हमें मिलती है।

अजय कुमार सिन्हा– इस समाज की आधारभूत सोच अधिकांश मामले में दोहरापन है।यदि आपने किसी सोच के सकारात्मक पक्ष पर अपना व्यक्तित्व आधारित किया है, तो परिणाम भी सकारात्मक होते हैं, अन्यथा वैचारिकता के नकारात्मक हिस्से पर बुना गया व्यक्तित्व नकारात्मक नतीजों को उपजता है।इस समाज के बहुत सारे शिक्षित व्यक्ति ही सबसे अधिक भ्रष्ट और धूर्त्त रहे हैं।इनकी कथनी और करनी के बीच ज़मीन और आसमान की दूरी है।भ्रष्ट मानसिकता और व्यवहार के ऐसे शिक्षित व्यक्ति ही समाज पर बोझ रहे हैं।

बाबर खान-‘वागर्थ’ के जून 2022 अंक में ‘एलीट विमर्श और लोकमन’ जैसे चिंतनपरक संपादकीय के संदर्भ में कुछ लिखने से पूर्व यह स्पष्ट कर दूं कि इतने खूबसूरत लेख पर विचार रख पाना मुझ जैसे साधारण पाठक के लिए एक चुनौतीपूर्ण विषय है।लेकिन इसे पढ़ने के उपरांत, निःशब्द होते हुए भी हाथ में कलम आ ही जाती है।

बहरहाल, वैश्विक समाज जिस तेजी के साथ मॉडर्न से पोस्ट-मॉडर्न हुआ है, उसी तेजी के साथ मानवीय मूल्यों का ह्रास भी हुआ है।बाजार ने ऐसे जकड़ लिया है कि हम विभिन्न ब्रांड के मोह में चले गए है।फूहड़ता और सस्ता मनोरंजन ऐसे बिक रहा है, जैसे किसी ऑक्शन की होड़ में लोग इस सोच के साथ भाग ले रहे हों ताकि निश्चित समय-सीमा के भीतर किसी वस्तु की बोली नहीं लगा सकें।बौद्धिक सतहीपन का यह कोई एक उदाहरण नहीं है, बल्कि ऐसे ढेरों उदाहरण मौजूद हैं।

हमें अपने अतीत में झांकने की आवश्यकता है कि आखिर हमारा वैश्विक समाज मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों को सहेजने की कैसी नजीर पेश करता है।मेगास्थनीज की यात्रा वृतांत के हवाले से तत्कालीन लोक की जो झांकी प्रस्तुत की गई है वह राजनीतिक व्यापकता को दर्शाता है।लोकतंत्र और सोशल बैलैंस का वह दौर जहां एक ओर शाही रस्साकशी का एक दृश्य है और दूसरी तरफ कृषक शांतिपूर्ण अपनी फसल के ख्वाब बुन रहे हैं।यह तभी संभव हो सकता है जब प्रत्येक नागरिक संकीर्णता से परे, नवीन दृष्टि और ब्रॉडनेस के पक्षधर हो जाएं।किंतु उक्त संपादकीय-लेख में बहुत ही सरल किंतु सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया गया है कि बौने की परछाई जब लंबी हो जाती है, समझना चाहिए कि सूर्यास्त हो रहा है!

यह विचारणीय है कि वर्तमान परिदृश्य में कोई व्यक्ति एक सभ्य-मानव या किसी देश के नागरिक के रूप में अपने दायित्व का निर्वहन किस प्रकार करता है।व्यक्ति के रूप में अभिव्यक्ति, निजता और दूसरों के अधिकार और सम्मान के संदर्भ में उसके क्या विचार हैं।समाज निर्माण में व्यक्ति अपनी भूमिका को किस प्रकार देखता है।सरल शब्दों में रखा यह तथ्य ‘जिसे देखो वह धार्मिक साज-सज्जा में है, पर धर्महीन है’ काफी कुछ बयान करता है! अंत में यही कहा जा सकता है कि ‘एलीट विमर्श और लोकमन’ बाजारवाद के इस युग की सच्चाई को जिस प्रकार प्रस्तुत करता है, वह अतुलनीय है।

शंपा शाह-‘वागर्थ’ के जून अंक में अच्युतानंद मिश्र की कविता ‘कला ऐसे ही मरती है’ में आए बिंब अपने वेग से चकित करते हैं।फिर भी ये ऐन कविता के भीतर से, उसकी आत्यंतिक ज़रूरत में से निकलते हैं। ‘उतनी ही आवाज़’ में ध्वनियां हैं, गंध हैं, स्पर्श है और इनसे निर्मित एक निकट की ऐंद्रिक कविता है।तीसरी कविता ‘चिड़िया की आंख भर रोशनी में’ की पंक्तियां सबसे अधिक मुखर होती हैं।इन सुंदर कविताओं के लिए आभार।

सामबे– मल्टीमीडिया के अंतर्गत ‘बादल को घिरते देखा है’ सुंदर है।ओशो ने भी अपने प्रवचन में इसका पाठ किया था।बाबा नागार्जुन से हमने दिल्ली में पूछा था- बाबा, आप तो दिल्ली में रहते हैं, फिर इस प्रकार की कविताएं यहां बैठकर कैसे लिख लेते हैं? बाबा ने बताया था कि हमारे मित्र वाचस्पति मिश्र अल्मोड़ा में रहते थे, वहां मैं चला जाता था और रहता था।जरा सी हवा चलती थी, तो कबूतर की तरह बादल उड़ने लगते थे, उसे घंटों देखा करता था।बादल अपना रूप और रंग बदलता था।देखकर अभिभूत हो जाया करता था।फिर कविता निकलती थी

संजय जायसवाल– मल्टीमीडिया में भविष्य को बचाने की गहरी बेचैनी के साथ एक प्रभावी चित्रपाठ।मिट्टी की उर्वरता से ही जीवन की हरियाली बची रह सकती है।एक जरूरी विषय पर अर्थपूर्ण प्रस्तुति।उपमा ऋचा जी सहित ‘वागर्थ’ टीम को बधाई।

ॠतु वर्णवाल– वागर्थ के जून अंक में मल्टीमीडिया के अंतर्गत मिट्टी को बचाने, जीवन को बचाने का अद्भुत प्रयास।दर्शकों में एक तड़प जगा पाने में सफल रचना।उपमा ॠचा को बधाई।

शिखा शुक्ला– मल्टीमीडिया में बेहद गंभीर पर्यावरणीय समस्या की बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति!