अंकेश मद्धेशिया, इलाहाबाद : बचपन की स्मृतियों में बसंत पंचमी की स्मृति स्कूल में होने वाली सरस्वती वंदना और सरस्वती पूजा के बाद मिलने वाले प्रसाद के रूप में ही है। उम्र की कुछ और सीढ़ियां चढ़कर आगे आने पर बसंत की गरिमा का कुछ अनुमान हुआ, जब बसंत पर हिन्दी के महत्वपूर्ण कवियों के गीत और कविताएं पढ़ी। यह भी मालूम हुआ कि हिन्दी के श्रेष्ठ एवं लोकप्रिय कवि श्री सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को ‘बसंत का अग्रदूत’ भी कहा जाता है। वह स्वयं को सरस्वती का पुत्र मानते थे और बसंत पंचमी के दिन अपना जन्मदिन मनाते थे। उनके इस नाम को सार्थक करने वाली बहुत सी कविताएं उनके यहां मिल जाती है जिनमें से एक है, ‘अभी न होगा मेरा अन्त/ अभी ही तो आया है मेरे वन में मृदुल वसन्त’

निराला जी जहां ‘मैं अकेला ; देखता हूं , आ रही मेरे दिवस की सान्ध्य बेला।’ जैसा गीत रच सकते थे वहीं उन्होंने वसन्त पर भी हिन्दी के श्रेष्ठतम गीतों को रचा। शायद, राग और विराग से भरे जीवन और गीतों से ही उन्होंने अपने कविता संग्रह का नाम पाया हो ‘राग-विराग’! भारतेन्दु युग के लेखकों ने पर्व-त्योहारों पर भी ललित-निबन्ध लिखे हैं जिनमें उत्सव का उल्लास और उत्साह देखने को मिलता है। पर क्रमशः समय के साथ इस उत्सवी भाव को हम कम होता हुआ पाते हैं। अपनी बात करूँ तो जिस तरह रघुवीर सहाय ‘बसंत आया’ शीर्षक कविता में लिखते हैं – ‘किसी बँगले के किसी तरु (अशोक?) पर कोई चिड़िया कुऊकी/ चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराये पाँव तले/ ऊँचे तरुवर से गिरे बड़े-बड़े पियराये पत्ते/ कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहायी हो/ खिली हुई हवा आयी फिरकी-सी आयी, चली गयी/ ऐसे, फुटपाथ पर चलते-चलते-चलते/कल मैंने जाना कि बसन्त आया।’ इसी तरह कॉलेज के दिनों में मैंने जिज्ञासावश  कविता के रूप में यह लिखा था कि ‘क्या वसन्त का अस्तित्व केवल कवियों की कल्पना या कविता तक ही हैं या उसके बाहर भी वसन्त का कोई अस्तित्व है?’ पर तब यह बात कहां पता थी कि बसंत एक मौसम या पर्व ही नहीं, एक भाव भी है। भले प्रकृति के इस सौन्दर्य का महत्व उनके लिए अधिक है जो अपने प्रिय के संग हो। प्रिय यदि दूर कहीं महानगर में रोजगार की फ़िक्र में फंसा हुआ हो तो बसंत भी पतझर सा लगने लगता है, पर जीवन अपनी राह बना ही लेता हैं। ठीक वैसे ही, जैसे प्रकृति और हरियाली से दूर महानगरों के कृत्रिम परिवेश में रहते हुए भी कहीं गुनगुनी धूप का खिलना और मन में किसी कविता का उगना भी बसंत की बयार सा मालूम पड़ता है।  

अभिषेक श्रीवास्तव : बहुत ही प्रभावशाली अंक। ‘झब्बू’ कहानी यथार्थ को कुरेदकर वर्तमान के वास्तविक चरित्र को उजागर करती है। शिल्प की दृष्टि से सशक्त, संक्षिप्त, सारगर्भित और उद्देश्यपूर्ण। निःसंदेह उन्मेष कुमार सिन्हा ने उस बल्ब और उससे निकलनेवाली रोशनी के गुम होने का मानवीकरण सफलतापूर्वक किया है। ये रोशनी हमारी आत्मा की, चरित्र की, दृष्टि की और विचारधारा की है, जो धीरे धीरे सिमटती जा रही है। जुगाड़ से कब तक मनुष्यता को संभाला जाएगा? लेखक ने कहानी में झब्बू के माध्यम से अपनी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि की प्रयोगधर्मिता को साझा किया है। इस उम्दा कहानी के लिए लेखक के साथ-साथ वागर्थ टीम का आभार।

सुरेंद्र प्रजापति : ‘डायरी में नीलकुसुम’ एक शानदार कहानी है। पंकज सुबीर जिस खुबसूरत तरीके से कहानी में प्रेम के प्रतिरोधों को बढ़ाते हैं वह बहुत ही प्रभावित करती है। सुखिया और हरिया का चित्रण अत्यंत मार्मिक है।

शैलेंद्र शरण, खंडवा : ‘डायरी में नीलकुसुम’ कहानी बहुत दिनों तक गूंजेगी, मस्तिष्क के एक हिस्से में फिर हमेशा के लिए दर्ज हो जाएगी। एक नया कलेवर दिया है पंकज सुबीर ने इस कहानी को। कॉटेशन को कहानीकार ने जिस तरह से  जस्टिफाई किया है वह अद्भुत है। शुभ्रा याद रह जाएगी, उसका न्याय भी। सुखिया और हरिया का दर्द सालता रहेगा । अपराजिता के फूल और बेल का चित्र होता तो और अधिक स्वाभविक वातावरण बनता।

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव, दिल्ली : आयशा आरफीन की ‘लकड़ी का घोड़ा’ बहुत अच्छी और मार्मिक कहानी है। ऐसे समाज की कहानी जहां चांदी के सिक्कों की चमक में कोई प्रेम का मतलब ही नहीं समझता। दूसरी ओर, एक छोटे से खिलौने की चोरी का अपराधबोध इतना विशाल होता गया कि आखिरकार उसके नीचे दब कर उसकी जान चली गई।

तमाल बंद्योपाध्याय की बांग्ला कहानी ‘पिता’ बहुत अच्छी लगी, ‘तुमलोग मुझे कभी समझ ही नहीं पाए। यंत्रणा का कोई बोध ही नहीं है मुझमें, कभी नहीं रहा।’ यह पंक्ति बहुत कुछ कह जाती है। संजय राय का अनुवाद इतना अच्छा हुआ है कि लगा की मूल कहानी ही पढ़ रहा हूं। साधुवाद!

खुशबू : उन्मेष कुमार सिन्हा की ‘झब्बू’ कहानी में आधुनिक कहे जानेवाले समाज की आर्थिक विसंगतियों को बहुत इत्मीनान से ढाला गया है। जिस नई पीढ़ी के कंधों पर समाज का भविष्य टिका है उसके मन में पूरी व्यवस्था की कैसी छवि बन रही है, इसका मार्मिक दस्तावेज है यह कहानी।

रश्मि रावत : ‘वागर्थ’ में व्यक्त विचार उद्वेलित करते हैं- किसने पैदा किए इतने ‘अन्य’? हमारा अन्नदाता इतना विपन्न क्यों है? पुरुष वाणी को मानने और बोलने के लिए क्यों मजबूर है स्त्री आखिर?

इन ‘दूसरों’ की बढ़ती तादाद का नतीजा है कि किसी बड़े संकट से जूझते हुए हम ‘दूसरे’ हैं, ऐसा महसूस करते हैं। जिनके साथ मिलकर हम संघर्ष करने के लिए प्रतिबद्ध थे, वे उस हाथी की तरह व्यवहार करने लगते हैं जो युद्ध क्षेत्र में अपनी ही सेना को रौंदने लगता है।

इसलिए आपस में विभाजित होते विभिन्न समूहों के पीछे अक्सर ‘दूसरे’ को गढ़नेवाली निर्णायक शक्तियां ही ज्यादा जिम्मेदार हैं, जबकि इस समय सख्त जरूरत है एकजुट संघर्ष की।

विनय कुमार सिंह : प्रयाग शुक्ल जी का रोचक संस्मरण! निस्संदेह, शैलेंद्र एक बड़े रचनाकार हैं! फिल्मों के लिए लिखनेवाले अनेक ऐसे कवि थे या हैं, जिनका योगदान महत्वपूर्ण है, पर अवधारणात्मक आलोचना की सीमाओं के कारण उनका सम्यक मूल्यांकन नहीं हो सका है।

इस्तियाक अहमद : आयशा आरफीन की  कहानी ‘लकड़ी का घोड़ा’ समाज की सच्चाई को गहराई से बयान किया गया है। समाज का रामो सेठ को हमदर्दी से देखना और नौकरानी को शक की नजर से देखना, उस पूरी व्यवस्था पर चोट है जिसे पुरुष प्रधान समाज कहा जाता है। कहानी उन महिलाओं पर भी व्यंग्य करती है जिनकी मानसिकता पुरुषों के अनुरूप ढल गई है।

नरेंद्र झा, रांची : ‘वागर्थ’ के जनवरी-फरवरी अंक में उन समस्याओं को उभारा गया है जिनका सामना सामान्य कृषकों एवं आम आदमी को करना पड़ रहा है। आज के राजनीतिज्ञ से लेकर शहर का सुविधाभोगी वर्ग की कारपोरेट व्यवस्था के आगोश में सामान्य से सामान्य जन आ गए हैं! कुछ व्यक्ति मनुष्यता छोड़कर सब कुछ कर गुजरने को तैयार हैं। समाज, संस्कृति और आचरण की नितांत निजी अवधारणाएं विकसित होने लगी है। अब सार्वजनिक कुछ नहीं रहा! रचनात्मक और चिंतनपरक सामग्री से सजे इस अंक में बहुआयामी दृष्टि का परिचय है, जिसकी वजह से यह अंक भी एक विशेषांक की तरह महत्वपूर्ण बन गया है।

अबुलैश अंसारी : उन्मेष कुमार सिन्हा, पंकज सुबीर, आयशा आरफीन, पानू खोलिया आदि की कहानियां गहरा प्रभाव छोड़ने वाली हैं। उन्मेष कुमार सिन्हा की कहानी झब्बू विशेष रूप से उल्लेखनीय है। एक बच्चे के माध्यम से प्रतिरोध की वर्गीय चेतना का ऐसा मार्मिक अंकन हिंदी कहानी में दुर्लभ है।

गौरव : यह सत्य है कि गांधी विभाजन नहीं चाहते थे, पर उन्हें इसे स्वीकार करना पड़ा। प्रश्न उठता है कि गांधी ने विभाजन के विरोध में क्यों कोई कड़ा कदम नहीं उठाया, मसलन अड़ नहीं गए या कोई आंदोलन क्यों नहीं किया। ध्यान देने योग्य है कि केवल गांधी को छोड़कर सभी चाहे-अनचाहे रूप में विभाजन की वास्तविकता को स्वीकार कर चुके थे। जिन लोगों ने विभाजन का जहर उसे खाद पानी देकर बड़ा किया, वही कह रहे हैं कि गांधी ने वह कंटीला पेड़ काट क्यों नहीं गिराया। सवाल उनसे भी होना चाहिए जिन्होंने इसे रोपा। यदि हमें आत्मनिर्भर राष्ट्र बनना है तो सामूहिक उत्तरदायित्व से किनारा नहीं कर सकते।

चैताली सिन्हा : मल्टीमीडिया में कामायनी के स्वप्न सर्ग का बहुत सुंदर पाठ एवं प्रस्तुति है। सभी सर्गों का सस्वर पाठ आवश्यक है, विशेषकर श्रद्धा सर्ग का।

चित्तरंजन मिश्र : पंकज चतुर्वेदी की कविताएं देश की सत्ता द्वारा प्रायोजित एक वर्चस्वी छल को साहसिक रूप में सामने लाती हैं। ये कविताएँ उम्मीद जगाती हैं कि अहिंसा की छाती को चाहे जितनी बार छलपूर्वक छलनी किया जाएगा, पर वह पर्वत की तरह अविचल है और रहेगी। गांधी एक सतत शाश्वत विचार हैं और विचार गोली से नहीं मरते। पंकज सीधी सरल भाषा में किंतु कौशल के साथ गांधीजी की कीर्ति को लोगों की आंखों में एक सार्थक सपने के साथ जीवित कर देते हैं।