चमनलाल शर्मा, वाराणसी:‘वागर्थ’ की प्रतीक्षा रहती है। वागर्थ जो विविध साहित्यिक सामग्री से परिपूर्ण होता है और पाठक को लुभाता है और प्रतीक्षा कराता है।
साहित्य से आत्मध्वंसक दूरी आज की एक चिंतनीय समस्या है। भौतिक साधनों की बहुलता ने स्वस्थ व पारंपरिक साहित्य के प्रति रुचि को लगभग निगल लिया है।
दिव्या विजय की कहानी ‘शाखसार’ कोमल- खुरदरे, कच्चे-पक्के अनुभवों की सुगढ़ कहानी है। भाषा सौष्ठव के रंगीन गलीचे पर व्यंजना, प्रतीक, रूपक और कहन के खिलौनों से किलोल करती कच्ची इमली-सी कहानी।
कैलाश वनवासी की कहानी सही या गलत मजबूरियों में भाप बने आदमी की मार्मिक कहानी है। कभी-कभी परिस्थितियां आदमी के स्वरूप को, शक्ल को, विश्वसनीयता को इतना बदरंग कर देती हैं कि उसकी ओर बढ़े हाथ पत्थर हो जाते हैं।
शिवेंदु श्रीवास्तव की कहानी ‘उबाल’ दलित दलन और कथित उच्च दु:साहस की कहानी है जो अपनी शैली और सरलता में प्रेमचंद की याद दिला गई।
‘टिटकी’ जयमाला की सामयिक समस्या की सुंदर कहानी है जिसमें हरियाली को निगलते विकास को लेकर चिंता है।
कविता भाग भी नए भावों व शैली से अंक की शोभा में चार चांद लगा गया है।
गजल में अश्विनी कुमार त्रिपाठी की गजलें सामयिक, साहसिक और सशक्त गजलें हैं।
अर्जुन प्रसाद सिंह, बिहार शरीफ:‘वागर्थ’ मार्च 2026 के अंक में भारतीय ज्ञान परंपरा प्रायः सभी विश्वविद्यालयों में एक प्रमुख विषय बना हुआ है। भारत में पुनरुत्थानवाद और सांप्रदायिक कट्टरता की चुनौतियां बढ़ी हैं। प्रसन्नता हुई कि इतने कम शब्दों में पूर्ण अर्थवत्ता के साथ परिचर्चा की प्रस्तुति हुई है।
विद्वानों ने माना है कि वाद-प्रतिवाद-संवाद के वैचारिक दर्शन और आदान-प्रदान के आधार पर भारतीय परंपराओं का विकास हुआ है। ज्ञान परंपरा के अध्ययन की सबसे बड़ी समस्या परंपरा के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण है। निश्चय ही आधुनिक हिंदी साहित्य ने भारतीय वाङ्मय और विश्व क्लासिक साहित्य से सहयोग कर ज्ञान परंपरा को महत्वपूर्ण अवदान दिया है। परिचर्चा से स्पष्ट हुआ कि भारतीय ज्ञान परंपरा का विश्व की सभ्यताओं और दर्शनों से संबंध है।
पंपा सेन गुप्ता : ‘वागर्थ’ के फरवरी 2026 अंक में महमूद फलाकी की ईरानी कहानी ‘एक खुशमिजाज वृद्ध जर्मन महिला से छोटी-सी गुफ्तगू’ बहुत ही रोचक है। यह केवल जर्मनों तक ही सीमित नहीं है, यह सार्वभौमिक है। श्रुति जैन का अनुवाद उत्कृष्ट है।
