अद्यतन कहानी संग्रह मैं, फूलमती और हिजड़े’, अद्यतन उपन्यास बिन ड्योढ़ी का घर

खिड़की के बाहर नए देवदार लंबे, घने, छतों से ऊपर निकलने की होड़ लगाते। इनसे होकर बराबर के घर को नजर में लाना मुश्किल होता।

अभी हाल में रोपे गए हैं, अपनी जगहों से निकाल कर यहां काफी गहरे गड्ढे खोद-खोद कर उन्हें लगाया गया है।उनकी जड़ों में उनकी पुरानी मिट्टी का भरोसेदार स्पर्श मौजूद है, जो उन्हें सुरक्षा का आभास देता रहे कि वे पूरी तरह से बेघर नहीं हुए हैं।

मैं भी तो अपनी जड़ों से उखड़कर, सबकुछ पीछे छोड़ यहां इस देश में आई थी… इस सर्द देश में।चमेली और मधुमालती की खुशबू से महकती वे रातें, खुले आसमान के नीचे पानी के छिड़काव से ठंडी की हुई छत और एक दूसरे से सटी चारपाइयां, फिर किस्से कहानियों का दौर, मां की मीठी झिड़की, सुबह समय पर उठने की हिदायत… पर उससे पहले दूध का गिलास पहले कौन खत्म करेगा, उसे इनाम का वायदा।मीठे मुंह सोएंगे, बिना कुल्ला किए, तो भूत-प्रेत सारी रात सताएंगे- किसी बड़े की सीख।

बहुत कुछ पीछे छूटा है। घर-द्वार, स्कूल-कॉलेज, संगी-साथी, रिश्ते-नाते।यह कैसी यात्रा थी एक भरे-पूरे परिवेश से एकाकी जीवन की ओर।

कहीं बहुत दूर अंधेरी सड़क पर भागती गाड़ियों की बत्तियां, सड़क को रोशनी और अंधेरे के खेल में अपना भागीदार बना रही हैं।खिड़की के बाहर दिखती है एक छोटी झील।सर्दियों में जब पानी जम जाएगा सफेद बर्फ जैसा, तो बच्चे वहां स्केटिंग करने निकलेंगे और यह शांत बैकयार्ड उनके शोर से भर जाएगा।

सबकुछ कितनी जल्दी-जल्दी हुआ उस साल।कॉलेज से निकलते ही मां-बाबा को लगने लगा कि एकाएक अब मैं बहुत बड़ी हो गई हूँ। मेरी शादी की फिक्र उन्हें सताने लगी।तीन और छोटी बहनों के लिए भी तो वर खोजना है उन्हें।बस अच्छा घर-बार देखकर मेरा विवाह संपन्न हो गया बीस साल की छोटी उम्र में।भोली-भाली नादान आंखों में असीम सपने और कुछ बनने की चाह, आगे पढ़ने की ललक मन में ही रह गई।पति मिले तो वे भी ऐसे जिनका सारा ध्यान अपनी पढ़ाई, अपने करियर पर रहा, मेरी पढ़ाई-लिखाई उनकी सूची में कहीं बहुत पीछे थे या थे ही नहीं।

दोपहर का सूरज बहुत चमकीला है।पेड़ों और पानी पर पड़ती उसकी तीखी रोशनी हवा के साथ लगता है नाच रही हो।एक साफ धूप नीले आसमान पर इक्का-दुक्का बादलों के मुलायम रूई जैसे चकत्ते।भ्रम होता है कि मौसम सुहाना होगा, गुनगुनी गरमाहट से भरा।पर यह सब एक मरीचिका जैसा था।जादुई यथार्थ।बाहर मौसम माइनस एक दो डिग्री सेंटीग्रेड होगा।चुभती ठंडी हवा एक मिनट में फेफड़ों को बेज़ार करने के लिए काफी थी।दरवाजे खिड़कियां सभी बंद हैं।घर का तापमान बढ़ा दिया गया है।इस महीने बिजली का बिल जरूर बढ़ा हुआ आएगा।

घर के अंदर तो अकेलापन है ही, बाहर भी एक सन्नाटा पसरा है।सामने की सड़क एकदम सूनी है।अब तो सड़क भी जान गई है कि कोई नहीं आएगा।

चालीस साल पहले… एक लंबा अंतराल… सर्दी के इन्हीं दिनों में ही तो मैं यहां अमेरिका, हरिहर झवेरी की ब्याहता पत्नी के रूप में आई थी।सोचा था कुछ दिनों की ही तो बात है, जैसे ही हरि की पीएच-डी खत्म होगी, हम भारत लौट चलेंगे।शुरू-शुरू में तो लगता था, इस साल नहीं तो अगले साल अपने देश वापस जा सकेंगे।एक के बाद दूसरा, फिर तीसरा, ऐसे दसियों साल गुज़र गए, यहीं दोनों बच्चे भी पैदा हुए।अमेरिकी माहौल में बढ़े हुए बच्चों के लिए भारत एक अजनबी देश था, और अब तो हैरी (हरिहर अब हैरी बन चुके थे) को भी भारत में नए सिरे से जिंदगी शुरू करना असंभव सा लगने लगा था।एक मैं ही थी, जिसका मन अभी भी अपने देश के लिए हुलसता था।पर मेरी इच्छा-अनिच्छा पूरे परिवार के लिए कहां मायने रखती थी।तब भी, जब मैं हरि की पत्नी बनी या तब, जब हरि फैलोशिप लेकर अमेरिका रिसर्च करने आए।हरि का सारा दिन अपने काम में निकल जाता और मेरा हरि के यूनिवर्सिटी से लौटने के इंतजार में।बहुत ही एकरस हो गई थी मेरी जिंदगी।हर दिन एक सा।न आस-पड़ोस, न रिश्तेदार, न दोस्त।थके-मांदे हरि घर आते।कितनी बातें होतीं मेरे मन में।मैं इस शहर को जानना चाहती।हरि तो पोस्ट-ग्रेजुएशन के दौरान इस शहर में रह चुके थे।मेरे लिए तो सबकुछ नया था।उत्सुकता से भरी मैं नए देश के नए तौर तरीकों को आत्मसात करना चाहती।अब जब यहां घर बनाना है तो यहां जैसा बनना पड़ेगा।हरि को जैसे कोई जरूरत ही नहीं लगती कि मैं यहां के तौर-तरीकों में रचूं-बसूं।उनको समय पर खाना मिल जाए, धुले-धुलाए कपड़े, व्यवस्थित घर, बिस्तर में एक औरत।किसी आदमी को और क्या चाहिए, मैं सोचती, मैं कहीं भी होती – देश में या विदेश में- यही सब कर रही होती।

तीन साल लगे हरि की पीएच-डी खत्म होने में।अब तक मेरी गोद में एक बच्चा आ चुका था।काम बढ़ गए थे और जरूरतें भी।हरि अपने ही डिपार्टमेंट में एसिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हो गए।यह वही साल था जब हमारी शादी के बाद हम पहली बार भारत जा रहे थे।बहुत उत्साहित थी मैं।पर हरि दस दिन में ही उकता गए।यहां मेरे करने के लिए कुछ भी नहीं है, वहां कोई प्रोजेक्ट लेता तो डालर मिलते।मैंने टिकट बदलवा लिए हैं, अगले हफ्ते निकल जाएंगे।उनके घर में बस मां और एक बड़े भाई – उनसे चार साल बड़े।उनके दोस्त भी तो दूसरे शहरों में बस गए थे, जिसको जहां नौकरी मिली।और मुझे तो यह एक महीना भी कम लग रहा था।हरि को मेरे परिवार या दोस्तों में कोई रुचि नहीं थी।

‘मुझसे पूछा तो होता’ मैं रुआंसी हो चली।

हरि सलाह नहीं लेते, जो करना हो बस कर डालते हैं।मन दो-चार खरी खोटी सुनाने का कर रहा था, बस इतना ही कह पाई, ‘आर्यन के मुंडन की तारीख बदलवानी पड़ेगी।मैं अम्मा को कहती हूँ।’ हरि को इस तरह के आयोजन में कोई दिलचस्पी नहीं थी-‘इन सब ढकोसलों में मेरा विश्वास नहीं है।जो भी करना चाहो, जल्दी निपटाओ।’ हरि तो कब के हैरी बन चुके थे।मैं ही थी जो सुधा से स्यू नहीं बनी!

अगला ट्रिप दो साल बाद ही संभव हुआ जब हरि की मां गुजरीं।संबंधों की डोर जो मां के रहते एक सीमा तक बंधी हुई थी, अब एकदम टूट गई।तब तक मेरी गोद में एक और बच्चा आ गया।एक लड़की।आर्यन और सारा।दो बच्चों के बीच सारा समय कैसे निकल जाता, पता ही नहीं चलता।अब मेरे पास अपनी गाड़ी थी।बच्चों को स्कूल छोड़ने से लेकर उनकी पढ़ाई के अलावा सारी दूसरी चीजें-म्यूज़िक, स्पोर्ट्स, डान्स – सभी कुछ, यहां से वहां लेकर जाना, सब मेरी जिम्मेदारी थी।अपने घर की चारदीवारी जैसे मेरे कंधों पर टिकी थी।मैं इधर से उधर हुई कि घर ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा।गर्मी की छुट्टियों में, वह भी हर साल नहीं, मैं बच्चों के साथ भारत आती, हरि अधिकतर कोई न कोई समर प्रोजेक्ट ले लेते।दो बड़े होते बच्चों की पढ़ाई के लिए यह जरूरी था कि हरि अपनी आमदनी बढ़ाएं।और फिर जब बच्चे यूनिवर्सिटी पहुंच गए तो वे इन पेड़ों की तरह अपनी जड़ों से जैसे बिलकुल ही अलग हो गए।भारत उनके लिए बस एक पुरानी याद बन कर रह गया।वे हर तरह से अमेरिकी थे, सिर्फ रंग-रूप को छोड़कर।हरि तो बरसों से हैरी थे, पर मैं अपनी हजारों साल पुरानी स्मृतियों और संस्कारों को नहीं मिटा पा रही थी।

यह सबको सूट करता था कि मैं वैसी ही रहूं जैसी थी।अच्छी पत्नी, अच्छी मां।चालीस साल निकल गए।कुछ पता ही नहीं चला।हरि ने, दस साल हुए यूनिवर्सिटी की नौकरी छोड़ कर अपना बिजनेस शुरू किया।औरों की तरह वह भी इस रैट रेस में शामिल थे।अमेरिकी ड्रीम के पीछे।विदेशी शिक्षा और देसी बुद्धि- दोनों का सही अनुपात, तो क्यों न हरि को प्रत्याशित सफलता मिलती।मैंने जैसे हमेशा साथ दिया वैसे ही अब भी दिया।हरि के सारे निश्चय नितांत अपने होते थे।मैं तो चाहती थी कि वह रिटायरमेंट ले लें और हम भारत में रहें।बच्चे तो सैटल हो ही गए हैं।कभी यहां अमेरिका में तो कभी वहां भारत में।वैसे भी बच्चों की अपनी जिंदगी है कौन सा।हम से पूछ कर अपने जीवन के निर्णय लिए हैं उन्होंने।

पेड़ों ने नई मिट्टी में अपनी जड़ें फैला ली हैं।जीवन के नए स्रोत से जुड़ गए हैं वे।पानी, धूप और हवा की ऊर्जा से भरपूर अब यहां की सर्दी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।इन लंबे, ऊंचे पेड़ों की नुकीली पत्तियों पर कोई पक्षी अपना घोंसला नहीं बनाता।निर्मोही ये पेड़ केवल अपने लिए जीते हैं गर्वित …आसमान छूते हुए।इनसान ऐसे जी सकता है क्या… आत्मलिप्त।हरि- हैरी ऐसे नहीं जिए क्या? उन्हें अपना ठौर मिल गया था, अपनी मिट्टी भी।अपने शहर में बारिश की सोंधी मिट्टी की याद अभी भी मेरे मन में सुगबुगाती, मुझे विचलित कर देती।

घर में दूध खत्म है।काली काफी या चाय क्या बनाऊं? हिम्मत नहीं थी कि महामारी के इन दिनों में, इस उम्र में गाड़ी निकालूं और एक मील दूर स्टोर से दूध ही ले आऊं।दूध के लिए जाऊंगी तो कुछ और भी याद आ जाएगा… क्या-क्या लाना है।मन ही नहीं करता कुछ करने का… याद आया पंद्रह दिन हो गए कोई ग्रोसरी नहीं लाई हूँ।बहुत लोग ऑनलाइन सामान मंगा रहे हैं।अब मुझे भी ऐसा ही करना होगा।ग्रोसरी के बहाने घर से बाहर तो निकलती हूँ।अब तो वह सब भी नहीं हो रहा।अन्यमनस्क उठती हूँ।ब्लैक काफी ही सही।एक सैंडविच बनाऊं।कुछ चीज़ पड़ा है एक डिब्बे में।थोड़ा टमाटर तो होगा ही, हेलीपिनो पैपर डाल कर बढ़िया सैंडविच बनेगा।

मैं उत्साहित हो उठी।सारा सामान मिल गया।कौन अवन में रखे, ऐसे ही ठीक रहेगा।किचन काउंटर पर इतना सामान बिखरा है।एक दिन सफाई करनी होगी।अभी तो अपनी प्लेट और काफी मग के लिए जगह बनाती हूँ।कई डिब्बे तो खाली हैं, फेंके तक नहीं मैंने।कूड़ेदान भर गया है ऊपर तक।एक हफ्ते से पुराना कूड़ा, मैं बाहर निकलती तो फेंकती।बुधवार को कूड़े का ट्रक आकर चला गया।सुबह मैं सोती रही और मंगल को कूड़ा बाहर निकालना भूल गई।अब एक हफ्ते की छुट्टी।बाहर का बड़ा ड्रम भरा नहीं होगा।किचन का कूड़ा तो बाहर फेंक ही सकती हूँ।आलस ने मेरे मन-देह-दिमाग सबको जकड़ लिया हो जैसे।खुद को धक्का देकर उठाती हूँ।काफी के बड़े-बड़े घूंट और सैंडविच के छोटे-छोटे बाइट के बीच मैंने निर्णय लिया कि विंड-चीटर पहनूँ और रसोई का कूड़ा तो बाहर फेंक ही आऊं।

हरि को गए हुए छह महीने हो चले।कैसे आराम से चला गया हरि।जैसा वह हमेशा कहा करता और ऐसे अवसर कम ही आते कि वह अपने मन की बात करता हो, ‘सुधा, मैंने जिंदगी अपनी शर्तों पर जी है और इस जिंदगी से कूच भी मैं अपनी शर्तों पर करूंगा।किसी भी आर्टिफिशियल तरीके से मुझे जिंदा मत रखना।उम्मीद करता हूँ, तुम और बच्चे मेरी इच्छा पूरी करोगे।’

‘यह जरूरी तो नहीं कि तुम पहले जाओ।हां, अपने लिए मैं भी यही चाहूंगी।’

‘मैंने एंड-ऑफ-लाइफ की वसीयत बनाई है।उसमें सबकुछ ब्यौरेवार बताया है।और हां, मेरे वकील से तुम्हें मेरे बिजनेस वगैरह के ब्यौरे भी मिल जाएंगे।तुम्हें कोई कमी नहीं होगी।’

‘कैसी बातें कर रहे हैं आप?’ मैं प्रतिवाद करती,  बगैर किसी इमोशन के, एकदम बिजनेस लाइक।जैसे हमेशा रहे हैं हरि।वे अपनी बात मेरे सामने रख रहे थे।

कुछ महीने ही गुजरे होंगे हमारी इस बातचीत को हुए।हरि को जैसे अपने जाने का आभास हो गया हो।

पांच दिन का बुखार और कोविड का हमला सीधे दिल पर।बीस साल पहले हार्ट अटैक के बाद बाईपास हुआ था।अब तक सबकुछ आराम से चल रहा था।

कहते हैं, मौत कोई न कोई वजह ढूंढ़ लेती है।यह नई बीमारी हरि की मौत का कारण बनी।मौत ने हरि को चुना।

मेरी बारी जब तक नहीं आती तब तक तो मुझे जीना ही है।

मैंने जैकेट पहनी।किचिन सिंक के नीचे सड़ांध मारते गारबेज-बैग को निकाला और बड़े ड्रम में उछाल कर फेंक दिया।अच्छा हुआ कि ड्रम का ढक्कन मैं बंद करना भूल गई थी।मुझे ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा।

अंदर आकर फिर एक ब्लैक काफी बनाई।फोन पर रिमाइंडर सेट किया-कूड़ामंगलवारकोबाहररखनेकेलिए।मन में खत्म हुई चीजों की लिस्ट बनाने से अच्छा है फोन पर लिख लूं।

फोन खोला तो व्हाट्सऐप पर नजर गई- अरे विली का मैसेज़ है।पूरा नाम विलियम पोलैक।यहीं की पैदाइश।ठेठ अमेरिकन।कुछ दिन पहले ही फेसबुक पर मिला था।

भला आदमी लगता है।नर्मदिल और संवेदना से भरा।हम दोनों की संगीत और किताबों की पसंद बहुत मिलती है।उसे पहाड़ पसंद हैं, मुझे भी।कितनी छोटी-छोटी बातें हैं- जैसे बसंत में खिलते रंग-बिरंगे डैफोडिल या पतझड़ के तबंई या गहरे पीले पत्ते।मीलों गाड़ी चलाकर वह मिनेसोटा के फाल कलर्स देखने जाता।हमने तो यहीं पास में रहते हुए पतझड़ की इन रंग-बिरंगी पत्तियों की अनोखी छटा देखने का कभी सोचा तक नहीं।

विली ने बताया कि वह आजकल सिंगल है।तलाकशुदा या विधुर, मैंने जानने की कोशिश नहीं की।मैंने देखा, अपने रख-रखाव को लेकर वह काफी सतर्क है।मुझे ढीले-ढाले लोग कभी पसंद नहीं आए।हरि को चाहे कोई शौक न रहा हो, पर अपने पहनावे और कपड़ों को लेकर वह हमेशा बहुत सतर्क रहे।

विली मुझे जीवन के हर पल को पूरी तरह जीने की चाहत से भरा लगा।उसका उत्साह मुझे भी छूने लगा था और मैं कोशिश करती कि मैं भी जीवन को एक उत्सव समझूं और अपने अवसाद से बाहर निकलूं।

विली की बातों में कितनी सचाई है, फिलहाल  इन सब पचड़ों में मैं नहीं पड़ना चाहती।भले ही इस आभासी दुनिया का एक पात्र हो वह, पर अभी तो उससे बात करना मुझे अच्छा लगता है।उसकी आवाज मेरे अकेलेपन में गूंजती, मुझे एक नासमझ सी खुशी देती।चलो पहले उसके मैसेज का जवाब दे दूं।ऑनलाइन हुआ तो बातों का अंत नहीं।न जाने कहां से इतनी बातें होती हैं हमारे पास।कभी एकदम बचकानी, तो कभी गहरी।इतने कम समय में इतना जुड़ाव! मैंने उसे भारत के विषय में बताया।वह सब-कुछ जान लेने के लिए उत्सुक होता।उसके दादा-दादी पहले विश्व-युद्ध के बाद जर्मनी से अमेरिका आए थे।दूसरे बहुत सारे यहूदियों की तरह हिटलर के यातना-शिविर की जख्मी यादें लिए।विली हँसता – ‘सुधा’ -मुझे हैरानी होती कि वह मेरा नाम ठीक से बोल पा रहा है, सूडाऽ जैसा कुछ नहीं।हरि ने तो बहुत कम मेरे नाम से मुझे बुलाया होगा।किसी नेहभरे जुड़ाव को मन में गुंजाता कोई नाम तो शायद उनके जेहन में कभी आया ही न हो!

‘सुधा, अमेरिका प्रवासियों का देश है, हम सबने मिलकर इसे बनाया है, अब यह हमारा देश है’ विली कहता।

इतने सालों के बाद, बहुत चाहने पर भी, मैं अमेरिका के साथ वह नाता नहीं जोड़ पाई, जो मेरा भारत के साथ आज तक बना हुआ है।कहने को ही मैं अमेरिकी नागरिक हूँ।

‘विली, तुम यहीं पैदा हुए, यहीं बड़े हुए, तुम्हारा नाता यहां की मिट्टी से है।जर्मनी से तुम्हारा रिश्ता एक ऐतिहासिक सचाई है, बस इतना ही।’

‘सुधा, यह सच है, पर यह भी सच है कि तुम्हारे जीवन का सबसे अहम, सबसे लंबा हिस्सा यहीं गुज़रा है।जब तक तुम इस देश को अपना नहीं बनाओगी, तुम यहां बसी हुई महसूस नहीं कर सकोगी।’

विली को बहुत कुछ बताया था मैंने।कैसे शादी के तुरंत बाद मैं अमेरिका आ गई।अपने भरे-पूरे परिवार को पीछे छोड़ यहां अकेली।हरि के साथ अपने रूखे रिश्ते की बात मैंने आजतक किसी से साझा नहीं की है …न कोई आंतरिकता, न कोई भावनात्मक जुड़ाव।यह सब विली के साथ शेयर करूं इसका तो सवाल ही नहीं उठता।फिर भी विली समझता था मेरे जीवन के अकेलेपन को।

‘अगर हम पुराने वक्त में ही डूबे रहे तो वह अवसाद और मरण की ओर ले जाएगा।’ कभी-कभी विली कविता की भाषा में बात करता-‘हर नया गीत नई संभावना और नए जीवन से भरा होता है।एक नई सुधा बनो, जिसमें उदासी की नहीं, जीवन की सुनहली धूप हो।’ उसका आग्रह मुझे बेचैन कर देता।अंदर ही अंदर मुझे कुछ चटख़ता सा लगता।पहली बार किसी ने मुझसे ऐसा कुछ कहा, स्वयं में बड़े साधारण शब्द, पर मेरे लिए जिंदगी की नई रोशनी एक प्रेम-निवेदन की तरह।

महामारी के वीरान दिनों में विली का मेरे जीवन में आना जैसे देव प्रदत्त हो, नहीं तो अकेलेपन की जिन गुहाओं में मैं गिरती जा रही थी, मुझे लगता, कहीं मैं मानसिक रूप से पूरी तरह टूट न जाऊं।

हरि के जाने के बाद तो मैं और भी अकेली हो गई थी, भले ही हरि मेरी भावना के संसार का अंग न रहे हों पर उनका होना मेरी रोजमर्रा की जिंदगी की जरूरत भी थी और पहचान भी।

विली ने मेरे जीवन के उस कोने में प्रवेश कर लिया था जो बरसों से सूना पड़ा था।और अब मैं आने वाली जिंदगी से बेफिक्र, बस आज के पल में जी रही थी।

मेरे पास पूरी दोपहर है, मेरा लंच हो ही गया है।विली को चेक करती हूँ।उसने बताया था न कि वह भी और अमेरिकियों की तरह जल्दी लंच कर लेता है।सारा का फोन शाम को आएगा आफ़िस से लौटते समय-‘कैसी हो मॉम? ज़्यादा बाहर तो नहीं निकलतीं?’ हर रोज फोन करती है सारा।अब तो आर्यन भी हफ्ते में एक बार फोन करने लगा है।बच्चों की अपनी-अपनी दुनिया है फिर भी मेरे लिए समय निकाल ही लेते हैं।इस बार दीवाली, थैन्क्सगिविंग दोनों में वे लोग घर नहीं आ पाए।फ्लाइट्स लेने के दसियों झमेले थे।पास होते तो ड्राइव कर लेते।

आज की इस ठंडी दोपहर में विली के शब्दों की उष्मा मुझ पर हावी हो रही थी।शब्दों में इतनी कशिश? विली जर्मन जानता था।हमारे बच्चों की तरह वह अपनी मातृभाषा से अपरिचित नहीं था।संयोगवश उसकी मां भी उसके पिता की तरह जर्मन मूल की थीं।वह जर्मन में लिखता और मुझे अनुवाद कर सुनाता और आग्रह करता कि मैं जर्मन में भी सुनूं।उसने भारतीय साहित्य पढ़ रखा था।दोनों भाषाओं के आदान-प्रदान से परिचित है वह।

विली ने एक छोटी सी कविता भेजी थी जर्मन में।सारे शब्द मेरी समझ से बाहर।यह उसका तरीका था कि कविता के प्रति मेरी उत्सुकता वह इस तरह जगाए और फिर मैं उसे फोन करूं।क्या यह सब मेरी भावनाओं के साथ खिलवाड़ तो नहीं है? कितनी आत्मीयता है उसके सारे व्यवहार में? क्या कोविड में लॉकडाउन के चलते उसे भी किसी मानवीय साथ की जरूरत महसूस तो नहीं हो रही?

पर मैं तो उसे एक ख़ास दोस्त मान कर चल रही हूँ।अगर यह सब सच न भी हो तो क्या? मैं सब-कुछ भुला कर नए सिरे से जीवन जीना चाहती हूँ।

मैंने विली के लिए मैसेज टाइप कर दिया था और उसके उत्तर की प्रतीक्षा में थी।उसने उत्तर दिया कुछ हँसते और छेड़ते हुए- ‘यह एक प्रेम कविता है, मेरी नहीं है, चाहो तो मेरी कह सकती हो, क्योंकि भाव मेरे हैं।कहो तो मैं गाकर सुना सकता हूँ।’

मैं अचकचा गई… प्रेम या उस जैसे किसी और शब्द ने बरसों से मेरे कानों को नहीं छुआ था।असहज-सी मैंने कहा, ‘फिर कभी’, अपने भीतर की इस सिहरन को मैं खुद नहीं समझ पा रही थी।

मेरे इस द्वंद्व को विली समझने लगा था, ‘जब कहो, मैं सुनाने के लिए तैयार रहूंगा।’

मेरे जीवन में ‘फिर कभी’ का ज्यादातर मतलब बनता जा रहा था ‘कभी नहीं’।निश्चय-अनिश्चय की मन:स्थिति और सही-गलत के पैमानों पर झूलती रहती मैं।पर अब मैं अपने लिए जीना चाहती हूँ।

आज हरि के जाने के बाद मैं ईश्वर से अपने लिए कुछ मांग रही थी- वह सब जो मैं इस जीवन में अनुभव नहीं कर पाई।नहीं तो मैंने हमेशा पति और बच्चों के लिए व्रत रखे हैं।आज मेरी कल्पना में मेरे अतृप्त स्वप्न थे, मेरी असीमित इच्छाएं, मेरी उद्दाम कामनाएं उन्हें जिंदगी के इस पड़ाव पर पूरा करने की ललक।उस प्यार को पाने की चाहत, जो शायद विली मुझे दे पाए।

क्या विली ही उस सवाल का जवाब है जो मैं जीवन भर स्वयं से पूछती रही।मैंने ईश्वर से कुछ ज्यादा तो नहीं मांग लिया!!

मेरे शहर में पतझड़ के वे पेड़, जिनके हरे से पीले फिर लाल, लाल के भी अनेक रंग, इतने कि आंखों में सिमट न पाएं, मेरे सामने घूम गए।अरे, मैंने मेरा शहर कहा.. ठीक ही तो है… एक व्यक्ति के होने मात्र से यह बेगाना देश मुझे अपना लगने लगा।

मैंने विली को मैसेज किया- ‘वह प्रेम-गीत सुनाओ मुझे, विली!’ एक धड़कते हुए दिल की ईमोजी के हस्ताक्षर के साथ।

फिर जोड़ा ‘इस बार पतझड़ के रंग जल्दी आए हैं।देखने आओगे क्या?’

मैं उत्सुकता से उत्तर की प्रतीक्षा में थी।

‘तुम बुलाओ सुधा और मैं न आऊँ!’

विली अगले वीकेंड आने वाला है।

मेरी रसोई का काउंटर एकदम चमक रहा है।कितने दिनों से खाली फ्रिज खाने पीने के समान से भर दिया है।मैंने देखा, बार में हरि की पसन्द की व्हाइट वाइन तो है पर बियर नहीं।सुन रखा था मैंने, जर्मन बियर के शौकीन होते हैं।

मेरे सपनों में विली था …, जंगल की पगडंडियों पर पास-पास चलते हुए।उसका स्पर्श अपने तन- मन में भरते हुए और फिर.. और फिर… उसके आलिंगन में बंधते हुए।जिससे मैं कभी मिली नहीं, उसने मेरी कल्पना पर इतना अधिकार कैसे जमा लिया?

जाने दूं… शायद वह वैसा ही हो जैसा मेरा मन मानने लगा है।जैसा भी हो हम एक लंबी ड्राइव पर जाने वाले हैं।हां, और भी, मुझे वह किसी और की लिखी प्रेम कविताएं भी सुनाए, भले ही वह जर्मन में हों मुझे पसंद हैं।

बाहर सूनी सड़क पर सन्नाटे को चीरती एक गाड़ी बहुत तेज़ी से निकल गई।

लगता है इस रास्ते पर फिर से गाड़ियों की आवाजाही शुरू हो गई है।

संपर्क : बी 503-504,हाई ब्लिस, कैलाश जीवन के पास, धायरी, पुणे 411041 मो. 9850088495