कमरे की फर्श पर सफेद चूने से एक मोटी लकीर खींच दी गई थी। इधर थीं किताबें, खिलौने और एक बेमन-सी खामोशी और उधर दोस्त, पार्क, खुले मैदान।

‘यह क्या है, मां?’ बच्ची ने पूछा।

‘तेरी हिफाज़त की लकीर है।’ मां ने दीवार की ओर देखते हुए कहा, ‘इससे बाहर खतरा है। वहां बहुत शोर है, बहुत भीड़ है, तू यहां सुरक्षित है।’

बच्ची ने कुछ पल उस लकीर को देखा, फिर पूछा, ‘लेकिन मां, उड़ने के लिए अगर पंख भी हो और लकीर भी हो तो क्या चुनना चाहिए?’

मां चुप रही। बच्ची ने किताब उठाई और लकीर के पास जाकर बैठ गई। उसने पेंसिल से फर्श पर एक नई लकीर खींचनी शुरू की, धीमे-धीमे सफेद लकीर को पार करती हुई, बाहर तक जाती हुई।

मां ने देखा, उसकी आंखों में हल्की-सी नमी आई लेकिन होठों पर एक थकी हुई सहमति  भी, जैसे वह ऐसी लकीरों को मिटाने का साहस खुद कभी न जुटा पाई हो और एक सूरज उग रहा हो।

विद्या भवन, वार्ड नंबर-17, सुकरी चर्च, जुन्नारदेव- 480551 जिला-छिंदवाड़ा (म.प्र.) मो. 9425837079