राजेन्द्र उपाध्याय

सुपरिचित कवि, अद्यतन कविता संग्रह ‘ईश्वर एक अनाड़ी फोटोग्राफर है’

जेबें होती हैं हरेक के पॉकेट में

शर्ट में, कोट में, पतलून में,

पाजामे में, ओवरकोट में, कुर्ते में,

छतरी में, पर्स में, झोले में

 

जेब के भीतर जेब होती है

एक नहीं कई जेबें होती हैं।

 

बनियान के भीतर जेब

कच्‍छे में जेब

जूते में जेब

मोजे में जेब

टोपी में जेब …..

 

जेबों का यह संसार विचित्र है

हर जगह जेब है

उसके पास भी जिसके पास पैसे नहीं

करोड़ों रूपये वालों की भी जेबें देखीं खाली,

भिखारी की भरी हुई….

 

मंदिर में पुजारी की जेब

तो जेल में बंद कैदी की वर्दी में जेब

साहूकार की जेब, कारीगर की जेब

फोटोग्राफर की जेब

 

बचपन में अक्‍सर खाली रहती जेबें

तब कटती नहीं थीं

फटती थीं……

 

उनमें रखने को बहुत कुछ था

वह भी जो पैसे से नहीं खरीदा जा सकता

फिर भी कीमती था…..

मोरपंख, रूई, फूल, कलियां, तितलियां, खोटे सिक्‍के

टूटे शंख, कंचे, बीज, चांद, धूप, छाया, किरणें

 

पैसे आने के बाद जेबें छोटी पड़ गईं

उनमें ये सब रखने को जगह नहीं बची

फिर कटने लगी जेबें

उनमें कुछ भी काम का नहीं रह गया।

 

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