युवा कवि।चार साझा ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित।

1.

सूखे हुए तटों को भिगोने लगी नदी
दुनिया की प्यास देख के रोने लगी नदी
पहले निकल के आई निगाहों के रास्ते
फिर धीरे-धीरे मुझको डुबोने लगी नदी
मीलों चली पहाड़ की पथरीली देह पर
उतरी ज़मीं पे जैसे ही सोने लगी नदी
अंधे विकासवाद का जंगल उगा है यूँ
शहरों की भीड़ में कहीं खोने लगी नदी
बदला है इसका हाल जमाने ने इस तरह
अनजान अपने आपसे होने लगी नदी
मरने के बाद जब इसे कंधा न मिल सका
अपनी ही लाश पीठ पे ढोने लगी नदी।

2.

रख के हम सीने पे पत्थर छोड़ आए अंततः
दाल-रोटी के लिए घर छोड़ आए अंततः
एक डर जो था हमारे मन के कोने में कहीं
हम शहर आए तो वो डर छोड़ आए अंततः
जब तुम्हारे प्रश्न का उत्तर न दे पाए तो हम
मौन के कागज़ पे उत्तर छोड़ आए अंततः
आसमां की बेरुखी जब हद से आगे बढ़ गई
ख़ुद को हम वापस ज़मीं पर छोड़ आए अंततः
कुछ भी जब हासिल न हो पाया बहस के बाद भी
हम बहसबाजी का चक्कर छोड़ आए अंततः
शक के गुंडे जब कभी हावी हुए विश्वास पर
घर के रिश्तों को सड़क पर छोड़ आए अंततः
आते-आते अपने आंसू हम छुपा लाए मगर
मां की आंखों में समंदर छोड़ आए अंततः।

संपर्क :आर 3- 553 एफ, भेल टाउनशिप, कैलासपुरम, त्रिचुरापल्ली, तमिलनाडु – 620014 मो. 8903768162