सुपरिचित कवि। अद्यतन संपादित कहानी संग्रह कोसी की नई जमीन

 

दुनिया का सबसे निरीह आदमी मर गया
पर दुनिया में कोई हलचल नहीं हुई
कोई नहीं जानता था उसका नाम
उसका निवास-स्थान
अथवा यह कि वह मरा कैसे?
अगर दुनिया इतनी गतिशील न होती
सब अपने ही काम-धंधों में फँसे न होते
तो शायद किसी की नजर
उसपर पड़ी होती
शायद तब पता चलता
उसकी मृत्यु का कारण
लेकिन किसी को कुछ पता न चला
और दुनिया ने उसके प्रति
कुछ भी न कहा, न किया
दुनिया के ठेंगे से…
कुछ कहे, न कहे; करे, न करे
परलोक तो गुंजित है
उसी की जय-ध्वनि से
परमेश्वर ने उसके मरने की घोषणा की
सातों आसमान में
और एक-से-एक सुंदर देवदूत
घूम-घूमकर हर एक को
देने लगे यह शुभ समाचार
कि वह मर गया!
धर्मराज के न्याय-द्वार पर
भव्य स्वागत हुआ उसका
यह रत्नजटित सिंहासन
ये मूल्यवान राजभूषण
यह हीरों जड़ा मुकुट, यह…यह…यह…
‘किसके लिए है यह सब?’
अचरज से पूछा
ऋषियों की पवित्र आत्माओं ने…
‘क्या फैसले से पहले ही
मिल जाएगा यह सब उसे?’
‘हां, हां, फैसला तो बस हुआ समझो’
एक साथ गूंजीं कई आवाजें
कि उसके विरुद्ध
किसी को कोई शिकायत नहीं!
देख-सुनकर यह सब, उसे लगा
कि शायद वह देखता है सपना कोई
और इतना मोहक सपना
नहीं चाहता था खोना वह
इसलिए मूंद लीं उसने
अपनी आंखें चुपचाप
पर स्वप्न-भंग का भय
इतना गहरा था
कि सुनी नहीं उसने
अपनी जयकार
और सुध न रही उसे इतनी भी
कि जब उसे लाया गया सम्मुख धर्मराज के
तब वह प्रणाम करे उनको
कि वहां मौजूद थे
तैंतीस कोटि देवी-देव भी
तभी चित्रगुप्त ने प्रस्तुत किया मामला उसका
उनकी मेज पर, उनकी अगल-बगल
कि उनके पीछे भी
जखीरा था पोथियों का
कहा उन्होंने
कि यह सब उसके पुण्य का
सिर्फ और सिर्फ पुण्य का लेखा-जोखा है
आदेश धर्मराज का
कि संक्षेप में, अतिसंक्षेप में
उसका मुकदमा पेश हो
चित्रगुप्त जरा भी न घबराए
गागर में सागर भर
इतना ही बोले वे
कि असंख्य अवसर आने पर भी
कभी स्वार्थभरी प्रार्थना की दृष्टि से
नहीं देखा आसमान की ओर इसने
कि नहीं उभरा इसकी आँखों में
घृणा का भाव
कि सहकर भी दुख सारे
कभी कुछ न कहा इसने
ईश्वर या मनुष्य के खिलाफ
विस्मित हुए सब
निःस्तब्ध हुआ न्याय-कक्ष
विह्वल हो उठे ईश्वर
कि गूंजे सिर्फ उनके मृदु स्वर
‘मेरे पुत्र!
तुम मेरे सबसे प्रिय पुत्र हो।’

संपर्क: क्षेत्रीय सचिव, साहित्य अकादेमी, 4 डी एल खान रोड, कोलकाता 700025 पश्चिम बंगाल मो.9868456153 /ईमेल : devendradevesh@yahoo.co.in