युवा कवयित्री। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।

सभा में

सबकी जेबों में दुख था
नमक के ढेले जैसा
बारिश के मौसम के लिए बेताब
कि बाहर बरसे
भीतर से छीज कर त्वचा पर उभरे
पहचान लिया जाए
सभा में सभी के चेहरे की आब पर था
अलग-अलग तरह का दुख
सबके लटके चेहरे बोलते नहीं
जताते थे कि सभी घटाटोप दुख में हैं
सभा में सभी के दुखों को मापा गया
सब दुख हल्के पड़ गए एक चुप के आगे
जो चिड़िया की तरह कभी कुछ कहने के लिए
फड़फड़ाई नहीं थी
जहां इस कदर घना सन्नाटा था
कि एक बोल से चौंक उठता था कलेजा
एक व्यक्ति जिसके लिए मर चुके थे
उसके सारे इंतज़ार
जिसका रास्ता कोई नहीं देखता था
जिसे पता था
उसकी मृत्यु हो जाने पर
किसी की घुटी रुलाई नहीं फूटेगी
उसकी याद किसी के मन को
अपनी खरखराहट से नहीं रंधेगी
जिससे किसी को न गुस्सा था न शिकायतें
जिसके घर का दरवाजा, खिड़की
सब उसकी मर्जी से
उसी के हाथों से खुलता, बंद होता था
वह व्यक्ति जो नहीं कहना चाहता था अपना दुख
कि उसका होना, न होना
मायने खो चुका है दुनिया के लिए
उसने जेब टटोली तो चिपचिपा गुड़ निकला
उसके पास स्वाद भर का भी नहीं था नमक
इतना दैन्य था उसके जीवन में
कि उसकी चुप में स्पंदन है कि नहीं
इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था।

नकार

नकार में छिपा होता है अकार
जैसे परछाई में छिपा होता है वस्तुगत साकार
प्यास में आदतन एक रिसाव छिपा होता है
विज्ञापन में रहता है जिस तरह बड़ा-सा बाजार
अप्रेम के गहरे में
प्रेम का उतरा हुआ पहिया होता है
चुप में उखड़ा रहता है
नर्तक के शब्द का एक पांव
यदि तुम्हें प्रेम की कविताएं चिढ़ा देती हैं
तो जानो तुम कि ठीक-ठीक
अभी ही प्रेम के विरोध में लिखी गई है एक कविता
एक स्त्री की अप्रेम-कविता चुपके से कहती है
कि कविता से पहले
स्त्री से प्रेम करो।

संपर्क : 641, कृष्णा बाबू वाली गली, आलम नगर, गदियाना, सीतापुर-261001 उत्तर प्रदेश मो.9453388383