प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की ने महज़ सुकुमार रंगों को ही नहीं सहेजा, उनकी दृष्टि सृष्टि के उस छोर तक गई, जहां जीवन के सबसे दारुण रंग बिखरे थे। यह समय, यह दुख की दारुण बेला जो हमारे सामने है उसमें उनकी यह कविता और प्रासंगिक हो उठी है। दुख की छाया ने सबको घेरा है, लेकिन अंधकार की सबसे गहरी गुहा में खड़े हैं वर्ग सभ्यता के रथ को हाँकने वाले लोग। कोरोना के इस हाहाकार में उनके दुख-दैन्य की कहानी को दोहराती जान पड़ती हैं ये पंक्तियाँ…

रचना- वे आँखें
रचनाकार- सुमित्रानंदन पंत
रचना आवृत्ति- नैना प्रसाद
ध्वनि संयोजन- अनुपमा ऋतु
दृश्य संयोजन एवं संपादन- उपमा ऋचा
प्रस्तुति वागर्थ, भारतीय भाषा परिषद कोलकाता।