विशिष्ट कवि और अनुवादक। हिंदी राजस्थानी की दस पुस्तकें प्रकाशित। कविता संग्रह ‘विज्ञप्ति भर बारिश’, ‘तुरपाई : प्रेम की कुछ बातें’और राजस्थानी डायरी ‘हाट’ चर्चित। 

(एक)
जब लगभग
काटे जा चुके थे जंगल
तब जगह-जगह
बन रहे थे बग़ीचे

बग़ीचे में फूल थे
जंगलवाले नहीं
बग़ीचे में
बग़ीचेवाले फूल थे
जिन्हें हो चुकी थी गमलों में
खिलने की आदत

लेकिन बग़ीचे में
तितलियां नहीं थीं
बिना
खूशबू वाले फूलों की तरह थे
बिना
तितलियों वाले फूल
कभी एकाकी
कभी झुंड के झुंड।

(दो)
जब लगभग
पाटी जा चुकी थीं
नदियां
पूरे जा चुके थे
जोहड़
तब जगह-जगह
बन रहे थे स्विमिंगपूल

स्वीमिंगपूल में पानी था
नदीवाला नहीं
न कुएंवाला
न जोहड़वाला

वो ! धरती के पेंदे वाला था

मछलियों को नमालूम था
धरती के पेंदे के पानी का स्वाद

स्वीमिंगपूल में
मछलियां नहीं
मछलियों की तरह
तैर रहा था आदमी

कभी एकाकी
कभी झुंडके झुंड।

(तीन)
जब लगभग
खोदे जा चुके थे
पहाड़ के पहाड़
तब जगह-जगह
उग रही थीं इमारतें

इन
गगनचुंबी इमारतों में
मनुष्य नहीं
आदमियों की भीड़ रहती थी

जो खिड़कियों पर
जड़वाकर रखती थी
लोहे के मजबूत सींखचे

पीठ पर
टिक जाने की सीमा तक
थोड़ी-सी खुली दिखतीं
नए दड़बों की पुरानी खिड़कियां

उनसे
विस्मित आदमी झांकता अकसर
आकाश की ओर
धरती की ओर

कभी एकाकी
कभी झुंडके झुंड ।

(चार)
जब लगभग
काटे जा चुके थे जंगल
पाटी जा चुकी थी नदियां
पूरे जा चुके थे जोहड़
खोदे जा चुके थे पहाड़

तब एक कवि
कविता में उगा रहा था पेड़
तब एक कवि
कविता में बहा रहा था नदी
तब एक कवि
गेंती -फावड़ा ले खोद रहा था जोहड़
तब एक कवि
मुट्ठी-मुट्ठी कंकड़-पत्थर से
चिन रहा था पहाड़

इस लगभग
अस्तित्व खो चुके समय में
एक नन्ही
चींटी की तरह था एक कवि

जो
शब्दों के दाने मुंह में दबाए
वक़्त की दीवार पर
चढ़ रहा था धीरे-धीरे

कभी एकाकी
कभी झुंड के झुंड ।

संपर्क :साहित्य अकादेमी, 172, मुंबई मराठी ग्रंथ संग्रहालय मार्ग, दादर (पूर्व), मुंबई-400014 मो.9460677638 ई-मेल: omnagaretv@gmail.com