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युवा कवि। कविता संग्रह ‘सब तुम्हारा’ प्रकाशित।संप्रति : ‘हिन्दुस्तान’ रांची के संपादकीय विभाग में कार्यरत। |
कविता से उम्मीद
ओस से भी ज्यादा कोमल
और आंसू से भी ज्यादा खामोश
अपने प्रेम को कहां रखूं
मैं देखता हूँ
हर चीज के लिए
खोजी जाती है एक मुफीद जगह
दुख से बचने की जद्दोजहद
मैं देखना चाहता हूँ
देह की भाषा से इतर
शब्दों के बेमेल अर्थ के बीच
मौसमी अनुराग के पेड़ पर
फलते हुए संशयरहित संबंध
धूप-छांव की तरह
इसलिए आज के समय में
मुझे उम्मीद है केवल कविता से
वह कोशिश करती है
पत्थरों से भी बहे निर्झर
कवि का आत्मसंघर्ष
इसी में निहित है कि
तलवार पर फूल जीत दर्ज कर सके
बंदूक पक्षियों की
चहचहाहट के सामने झुक जाए।
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