दो कविता संग्रह है यहाँ भी जलऔर लिखना कि जैसे आग। जयपुर में प्रशासनिक अधिकारी।

मनुज धर्म

वे अनगिनत हाथ
जो उलझे रहे ताउम्र
ऐसे सारहीन कामों में
जिनका कतई योग न था
इस दृश्यमान दुनिया की बेहतरी में
मसलन : हत्याएं,लूटपाट, आतंक,
नरसंहार, ध्वंस- विध्वंस आदि
उठो!
उन हाथों को खींचकर लाओ
भीतर तक किसी के दुख में शामिल बनाते
प्रेम में आकंठ डूबी इस पृथ्वी पर
और रोप दो उन्हें खेतों की मेड़ पर
रोशनी की तरह : एक रक्तबीज
उठो! उठो! मोड़ दो मुंह प्रचंड धारा का
एक नए सपने की दिशा में
शायद वक्त के इस मोड़ पर
यही होगा तुम्हारा शाश्वत मनुज धर्म।

इस आपाधापी में

सब कुछ बचाया जा रहा है
जल, जंगल औ’ जमीन
ताजा हवा
आनेवाले कल के दाय में
एक साफ-सुथरी धरती
किसी अदेखे डर के खिलाफ
बचाया जा रहा
लड़ाई का हुनर
बचाया जा रहा अन्न अकाल के लिए
एक कार्य योजना बचाई जा रही है
आकस्मिक आपदा से निपटने के लिए
कुछ सपने बचाए जा रहे हैं
आनन-फानन ही सही
संभावित भूखे लोगों के लिए
हर तरफ अंतहीन दौड़ है कुछ बचाने की
फिर इस आपाधापी में
खुद बचे रह पाने की बेचैनी
चीजों औ’ चीखों से ठसाठस भरी इस दुनिया में
चाहता हूँ बस, बचा रहे थोड़ा – सा प्रेम
विकट समय के लिए ।

संपर्क : बी – 92, स्कीम 10 – बी, गोपाल पूरा बाई पास, जयपुर-302018 / मो. 7850873701