युवा कवयित्री।कोलकाता के दिल्ली पब्लिक स्कूल में गणित की शिक्षिका।

बोलने और न बोलने के बीच
बोलने के हजार दुख थे
न बोलने के असीमित

बावजूद इसके हमने न बोलना चुना

बाहर के शोर की बनिस्बत
अंदर का तूफान
तन, मन और पूरे जीवन को
छिन्न-भिन्न करने के लिए पर्याप्त था
लेकिन हम अंदर के सुनामी के मध्य
बाहर किसी अटल छायादार वृक्ष की तरह
चेहरे पर मुस्कान लिए
खुश रहने का शानदार अभिनय करते रहे

वितृष्णा से देखते रहे
डिओड्रेंट की खुशबू से पागल होती
और रंग-रूप, देहयष्टि निखारकर
मर्दों को लुभाती
औरतों के विज्ञापन

यह सब केवल फिल्मों में ही होता है
पसीने से भीगी देह
रसोई के मसालों की गंध में
तलाशती है एक नक्शा
और मंजिल मिलने के पहले ही
थककर चूर हो जाती है
दो इंच की दूरी के मध्य
सिमट जाते हैं सैकड़ों प्रकाशवर्ष

हम चुप्पी में ली जाने वाली सिसकियों में माहिर हैं

कामना से इज्जत नहीं मिलती
और कुंठा को तोड़ने से कहीं अधिक जरूरी है
सबसे आख़िर में ही सही…
लेकिन पेट की भूख तोड़ना
प्रेम का बदल मांग में खिंची लक्ष्मण रेखा है
और देह का बदल जिम्मेदारियां
चाह का बदल सदैव आंसू ही होते हैं

हम कामनाओं को कविताओं
और किताबों में खोजने वाले लोग हैं
धर्म, संस्कृति और अध्यात्म
हमारे सजग प्रहरी हैं
हमारा चरित्र हमारा सबसे बड़ा आभूषण है
जिसे हमारे अलावा
हर कोई परिभाषित कर सकता है
हमारी नियति अहिल्या बनकर
राम की प्रतीक्षा करना है
सीता बनकर अपनी कब्र में स्वयं जाएंगे
तभी पूजे जाएंगे
द्रौपदी होना चुनेंगे तो केवल महाभारत होगा

लेकिन जाने क्यों
ख़ुद को मेरा प्रेमी कहने वाला एक शख्स
आजकल अक्सर मुझसे कहता है
बोलने से सब होता है।

संपर्क : गुरुकुल ग्रांड, फ्लैट नं. ४ई, फेज, ब्लॉक, ४था तल, ठाकदारी, न्यूटाउन, ग्लैक्सी हेल्थ केयर सेंटर के पास, पोकाशिमपुर, कोलकाता७००१०२, मो.९३३०६५५९८३