ममतामयी चौधरी
ओड़िआ के प्रतिष्ठित कथाकार और कवयित्री। साहित्य की विभिन्न विधाओं में कई पुस्तकें प्रकाशित।ओड़िशा साहित्य अकादेमी पुरस्कार तथा अन्य कई पुरस्कारों से सम्मानित।
प्रदीप कुमार राय
बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी। अनूदित रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

 

 

अर्जुन के पेड़ की परछाई रेविन्यू ऑफिस की ओर पसर गई थी। अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक से सहेजती हुई सेवती अंदर टेबुल पर चाय-नाश्ता रख आई। दराज से शुगर-फ्री की दो गोलियां निकालकर विशंभर ने कप में डाला और कप को थोड़ा हिलाते हुए चाय में घोल लिया। सामने बैठे सज्जन को तसल्ली देते हुए कहा, ‘आप यहां आ गए, अच्छा हुआ। हर पहलू पर बड़ी बारीकी से हमने चर्चा कर ली, अन्यथा आप मुझे दसियों बार फोन करते, न जाने मैं तब किस परिस्थिति में होता और जवाब में शायद इतना ही कहता… जी हां, हां जी!’

उस सज्जन ने प्लेट से एक समोसा उठाया, ‘जनाब, आपने सही फरमाया। जैसे भी हो काम को इसी हफ्ते निपटा दीजिए। किसी चीज की जरूरत हो तो आप मुझे बेफिक्र कहिए। आप हैं तो मुझे चिंता किस बात की है! आप जैसे बड़ा बाबू क्या कोई है यहां?’

ठठाकर हँस पड़े विशंभर।

‘छोटे मोटे काम को मैं लटका कर नहीं रखता। यह मेरी फितरत में नहीं है, मैं क्या करूं! सुनो रमा, शंभूनाथ भुइयां की फाइल ले आओ। इस काम को तुरंत यहां निपटाना पड़ेगा। धत्! ये किरानी सभी भूसा खाए बैठे हैं। छोटे-मोटे काम भी मेरे लिए छोड़ रखे हैं, साले! अबे रमा, तूने सुना नहीं क्या!’

तीली से दांत कुरेदते हुए विशंभर ने फिर उस भले आदमी से कहा, ‘मैं हाथ लगाऊं तो काम एक बार में ही निपट जाएगा। लिखूंगा तो बस एक ही बार। देखा नहीं, उस दिन मेरा ड्राफ्ट पढ़कर कलेक्टर का पीए कैसे कान खुजलाने लगा था! क्यों, भाई साहब आप ने देखा था न!’

‘जी हां… ऊं! उस दिन न… , हां हां बिलकुल देखा था मैंने।’ महानुभाव ने सिर हिलाकर अपनी सहमति जताई। या यूं कहें, परिस्थितिवश शायद हां में हां मिलाई। 

‘तभी तो मैंने कहा न, यहां मेरे पास आने पर कागजी कारवाई, रजिस्टर में एंट्री सबकुछ एक दिन में ही हो जाता है। उसके बाद फाइल ही तो मूव करानी है। आप जितनी जल्दी चाहें, समझ लीजिए काम हो जाएगा। बेशक निश्चिंत रहें। मेरे होते हुए किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ती। मैंने इन सबको बता दिया है। नो टेंशन!’

विशंभर ने डीएम के कैबिन की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘देखिए, जिस दिन मैं नहीं रहता हूँ, सा’ब का फोन मुझे बारबार आता है। एक दिन के लिए भी मैं यहां से निकल जाऊं तो समझो सबकुछ डांवाडोल हो जाएगा। …और वे भी क्या कोई कम बड़े कलाकार हैं! मुझसे पूछे बगैर वे एक भी फाइल साइन नहीं करेंगे। एक दिन की भी छुट्टी नहीं देते हैं। न जाने मेरे रिटायरमेंट के बाद ये कैसे काम करेंगे! एक दिन भी मैं न आऊं तो उनका फोन आ जाता है। कहेंगे, पंडा बाबू ऐसा हो गया, वैसा हो गया, अब क्या करें?’

‘मैं किसी के साथ अन्याय नहीं कर सकता हूँ न! मेरा यह सिद्धांत है, आई हैव माय प्रिंसिपल्स! न मैं नियम के बाहर जाऊंगा, न अपना प्रिंसिपल छोड़ूंगा। नियम के तहत किसी का उपकार होता है तो मैं अवश्य करूंगा। देखिए, यह शंभूनाथ की फाइल है। बेचारा दिन में आठ घंटा मेहनत करता है, घास काटता है, नाली साफ करता है। मैंने आज उसकी पगार पांच सौ बढ़ा दी है। इतना सोचना ही क्यों, मेरे हाथ में जो कुछ था मैंने वह किया। किसी की रोजी-रोटी छीनना पाप है, वैसा काम करना ही क्यों? किसी का अन्याय मुझसे नहीं हो पाएगा। यह मेरा प्रिंसिपल है।’

तीली को नीचे फेंकते हुए विशंभर ने अपने वर्तुलाकार तोंद को हाथ से सहला दिया।

‘जिस लड़की को आपने अभी देखा न, अरे वही जो चाय लेकर आई थी सेवती! जानते हैं, उसे यहीं किसने रखवाया है! बेचारी का पति यहां स्टोर-कीपर था। साल-भर पहले अचानक एक दुर्घटना में वह गुजर गया। तीस साल का था। अपने दो छोटे बच्चों को लेकर यह बेचारी कैसे रहती? कोशिश कर मैंने यहां उसे ‘ग्रुप डी’ में रखवा दिया। मैंने सरकारी नौकरी दिलवा दी उसे! काम-वाम कुछ कर देती है यहां। मैं हमेशा उसे कहता हूँ, ‘बेटी, तू थोड़ी पढ़ाई कर ले। दसवीं की परीक्षा प्राइवेट से पास कर ले। फिर तेरी स्टोर-कीपर की नौकरी पक्की है समझ ले।’ फिर एक लंबी सांस भरते हुए कहा, ‘किसी के साथ मैं अन्याय नहीं कर सकता न! मेरा यह प्रिंसिपल है।’

‘अच्छा जी, मैं अब चलता हूँ! आपने ही तो करना है, और क्या मैं कहूँ?’ कहते हुए वे महानुभाव कुर्सी से उठ खड़े हुए।

‘बेफिक्र होकर जाइए आप। कल फोन पर पता कर लीजिएगा।’ पानी पीकर उसने एक लंबी डकार ली।

फाइल लेकर सेवती टेबल के पास खड़ी हो गई, ‘सर, साइन कर दीजिए, सा’ब के पास फाइल जाएगी।’

‘ऐं, हां-हां! विशंभर ने सेवती की ओर देख कर सिर हिलाया, ‘जा, पान ले आ। मैं साइन करता हूँ।’

टेबल के ऊपर फाइल रखकर सेवती पान लेने चली गई।

‘रमा! वहां ऊपर ताक पर नीले रंग की फाइल रखी है, उसे ले आओ। तिनके भर काम के लिए ये लोग घंटा लगा देंगे।’

‘सर, पान!’ रेवती ने पान की पुड़िया बड़े बाबू के हाथ में बढ़ा दी। पान की पुड़िया लेते हुए रेवती की उंगलियों को बाबू ने हल्के से दबा दी। सेवती ने सहमते हुए सिर झुका लिया।

‘साइन हो गया सर, अब इसे ले जाऊं?’

‘ठहर जा, साइन करता हूँ। इतनी भी जल्दी क्या है तुझे? ट्रेन निकली जा रही है क्या तेरी?’  विशंभर ने फाइल खोली।

तभी घनघनाते हुए फोन बज उठा..  लैंड फोन।

‘हां जी, सा’ब जी, जी.. जी..! साइन हो गया, सा’ब! अभी भेजता हूँ।’ कहते हुए विशंभर ने जानबूझ कर कलम नीचे गिरा दी। कलम उठाने के लिए सेवती झट से नीचे झुक गई। साड़ी के पल्लू के नीचे से उसका मांसल पेट और कमर का कुछ हिस्सा उभर कर दिखने लगा। विशंभर ने अपने कान के ऊपर लटकती हुई जुल्फों को हटाते हुए कनखियों से देखा। फिर एक बार कलम नीचे गिरा दी। इशारे से सेवती को कलम उठाने को कहा। सेवती फिर से झुक गई। अपनी ललचाई नजरों से देखते हुए विशंभर ने होंठों पर जीभ फेर ली।

शाम के पांच बजे सेवती को बुला कर विशंभर ने कहा, ‘तेरे पति का ग्रुप इंश्योरेंस फंड पेंडिंग है न? क्यों? तूने तो बताया नहीं। तेरा काम मैं याद रखूं! देख, तेरा मैं कितना ख्याल रखता हूँ।’

‘कितनी बार तो कहा है, सर!’ सेवती ने मुंह लटकाकर कहा, ‘मिन्नतें भी मांगी। तब आपने कहा, अमुक कागज चाहिए, अमुक कार्ड चाहिए। सबकुछ तो दे दिया मैंने, फिर भी… । आप इतने लोगों का काम कर देते हैं, मेरे काम में ही देर हो रही है।’

‘उहूं!’ माचिस की सींक से कीड़े वाले दांत को कुरेदते हुए विशंंभर ने कहना जारी रखा, तेरा और रघुआ का, दोनों का काम, समझी! दोनों के आधार कार्ड का जेरॉक्स चाहिए।’

‘सर, आधार की फोटोकापी तो मैंने दी थी।’ उम्मीद भरी नजरों से देखते हुए कहा।

‘चलो-चलो, तुझे जैसा कहा है, वैसा ही कर। और हां, इसके लिए जो खर्चा-पानी लगेगा, तुझे देना पड़ेगा।’

‘जी सर, मैंने कब मना किया है?’

‘आहा…! विशंभर ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘तुझे खर्चा करने के लिए मैंने कहा क्या? तुझे नौकरी पर किसने रखा है, बोल तो? मैंने रखा है या नहीं? बोल बोल, मैंने तुझे यहां रखा है या नहीं?’

‘जी सर!’ सेवती का स्वर नम्र था।

‘अच्छा सुन, जैसे मैंने कहा, फोटो और जरूरी कागजात लेकर आ जाना। काम हो जाएगा। लेकिन यहां नहीं, आज शाम को ऑफिस के बाद मेरे घर पर आ जा। देख ही तो रही है, यहां मुझे समय कहां मिलता है। पेचीदा काम है तेरा, इत्मीनान से घर पर करेंगे। अगले महीने तुझे ग्रुप इंश्योरेंस फंड के पैसे मिल जाएंगे। बस हो गया, अब खुश!’

सेवती ने सहमति में सिर हिलाया, ‘जी अच्छा सर!’

अर्जुन के पेड़ के नीचे दो गोरैए दाना चुग रहे थे। सेवती ने अपने सिर पर हाथ लगाते हुए कहा, ‘शुभ शुभ!’ शाम अपनी ढलान पर थी। हलवाई सउरी वड़े तलने के लिए पिसी हुई उड़द के घोल में आटा डाल कर फेंट रही थी। उसके चूल्हे से सुलगते हुए कोएले का धुआं निकल कर छप्पर की ओर पसरने लगा था। ऐसा लग रहा था, मानो सेवती के भीतर उमड़ा एक लंबा उच्छ्वास हो। ललाट पर बैठी मक्खी को सेवती ने हाथ से उड़ा दिया। दुखों की भी एक ज्यामिति होती है। इस सउरी की दुकान के छप्पर से पसरे हुए धुएं की लकीर की तरह… कभी सीधी तो कभी टेढ़ी, कभी आड़ी तो कभी तिरछी। विधाता भी बड़े चालाक हैं। पहले तो वह दुखों का पहाड़ पटक देता है सिर पर, फिर तनिक आश्वस्त करने वाला समाधान हाथ में थमा देता है। ताकि मनुष्य यह कह पाए कि दुनिया में भगवान होते हैं! सड़क दुर्घटना में रघुआ की मौत को साल हो गए लेकिन लगता है जैसे यह कल की बात है। सबसे छोटा वाला तब गोद में था। बड़े वाला तीन पूरा कर चौथे साल में था। सेवती सिर्फ पच्चीस की थी। उसके सिर पर जैसे छप्पर गिर पड़ा हो। वह मायके में थी कि एक दिन बड़े बाबू भगवान की तरह वहां प्रगट हो गए। कहा, ‘नौकरी करने चल।’ अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कर पिताजी ने शुक्र मनाया, ‘भगवान महान हैं। तेरी हालत सुधर जाएगी बेटी। जा, चली जा!’

हालात क्या सचमुच सुधर गए! हां, एक-कमरे वाला घर है सिर छुपाने को। दो वक्त चूल्हा जलता है। बड़ा स्कूल जाने लगा है। छोटा अभी दूध पीता है। अलगनी में कुछेक साड़ियां हैं, एकाध पेटीकोट और ब्लाउज लटक रहे हैं। इकलौते कमरे में धुंधला-सा एक बल्ब लटक रहा है, टेबल पंखा घूम रहा है। रात में किवाड़ को सब्बल से मजबूती से फंसा कर बंद करती है। तब कहीं जमीन पर चटाई बिछा कर दोनों बच्चों के बीच सोते हुए कितने ही सपने, कितनी ही हताशा और क्लांति की मिलीजुली सांसें भरती है।

हां, हालात ऐसे ही तो सुधरते हैं!

उसके सामने सउरी चाय का गिलास और साल के हरे पत्ते पर गुलगुले रख गई। पूछा, ‘तेरी छुट्टी हो गई क्या?

‘हां, हो गई। तले हुए वड़े की एक पुड़िया बांध दे, बड़े ने लाने को कहा है।’

पान की पीक थूकते हुए सउरी ने पूछा, ‘क्यों? तू ने क्या सोचा, बताया नहीं? इस बीच वो आदमी दो बार पूछ गया है। तुझे नौकरी नहीं छोड़नी है, कह दिया है मैंने उसे। इस पर वो राजी है। उसके गांव में भी नहीं रहना है तुझे, तू हमेशा यहीं रहेगी, नौकरी करेगी। इस पर भी उसे कोई आपत्ति नहीं है। और हां…’

‘बस रहने दे, सउरी!’ सेवती ने चाय का घूंट गटक कर बीच में टोकते हुए कहा।

‘नहीं, मुझे नहीं करनी है शादी। तुझे उस दिन भी मैंने कहा था। फिर क्यों तू उस बात को बारबार उठा रही है?’

गरम तेल की कढ़ाई पर उंगलियों से पानी के छींटे मार कर सउरी तेल का तापमान टोह रही थी। चड़चड़ाते हुए तेल के छींटे छिटकने लगे।

‘कैसी बात कर रही है तू! छोटी उमर है, कैसे काटेगी तू अपना जीवन? लड़का अच्छा है। तेरी ही सपेरा जात का है। खाता-पीता घर है। उमर होगी.. यही कोई बत्तीस या पैंतीस। आगे-पीछे कोई नहीं है उसका। बस एक लड़की है, छह-सात साल की। कह रहा था कि सेक्रेटरिएट में वह चपरासी की नौकरी करता है। फिर से एक बार सोच ले तू! ठंडे दिमाग से सोच-समझ कर बताना, मैं कहां हड़बड़ कर रही हूँ!’

सेवती ने ब्लाउज से रूमाल निकाला। रूमाल से दस का मुड़ा-तुड़ा नोट निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिया।

‘दे दो मुझे वह पुड़िया, मैं चलती हूँ अब। बुढ़िया के पास छोटे को छोड़ आई हूँ, भूखा होगा। बड़ा स्कूल से आ गया होगा।’

गनीमत है, घर के पास वह बुढ़िया रहती है। तभी तो दोनों बच्चों को संभाल लेती है। एवज में सेवती उसे रात की रोटी-सब्जी और पांच सौ रुपये महीना ऊपर से देती है।

घर वापस आ कर बच्चों को उसने खाने के लिए तले हुए वड़े दिए। रात के लिए रोटी-डालमा बनाई। साड़ी बदलकर साफ साड़ी-ब्लाउज पहने। बुढ़िया से कहा, ‘तू जरा बच्चों का ख्याल रख, मैं यूं गई और आई। बड़े बाबू ने जरूरी कागजात लाने को कहा है। बस, उनके घर पर दे कर आ जाऊंगी।’

सेवती ने साबुन से मुंह धोए और चेहरे पर हल्का सा क्रीम लगाकर पाउडर लगाया। गर्दन पर पाउडर छिड़ककर फाइल लेकर निकल गई।

चार बार घंटी बजाने के बाद बाबू ने दरवाजा खोला।

‘आजा आजा, मैं तो तेरी ही बाट जोह रहा था।’

‘सर, मां जी कहां हैं? दुकान से थोड़े पकौड़े और मिठाइयां लाई थी! मां जी को बहुत पसंद हैं न ये।’

‘अरे ये सब क्या है! इतनी मिठाइयां! ले जा अपने बच्चों को दे देना।’ पुड़िया को टेबल पर रखते हुए विशंभर ने कहना जारी रखा, ‘तेरे मां जी तो हैं नहीं, तीन दिन हुए उसे बिटिया के घर गए। बिटिया की तबीयत ठीक नहीं है न, इसलिए। अरे तू खड़ी क्यों है! बैठ जा!’ सेवती की बाहें पकड़कर विशंभर ने कुर्सी पर बिठा दिया।

‘मां जी नहीं हैं?’ सेवती घबरा गई।

विशंभर ने सफेद धोती पहन रखी थी। शरीर पर कपड़े नहीं थे। आषाढ़ की उमस वाली गर्मी थी।

सेवती के गाल को उसने धीरे से सहलाते हुए कहा, ‘अहा, कितनी सुंदर दिख रही है रे तू, सेवी! जो भी कह, तुझे देख कर कोई यह नहीं कह पाएगा कि तू सपेरा की बेटी है। खैर, तेरा जीआईएस फंड पेंडिंग है न! काम हो जाएगा। मैंने जो लाने के लिए कहा था, लाई है न तू?’

सेवती कुछ कहती कि विशंभर ने उसे रोकते हुए कहा, ‘देखता हूँ। तू यहां बैठी रह, मैं जरा दवा खा कर आया।’

विशंभर दवा खाने जैसे ही अंदर गए, अपने आंचल को सहेजते हुए सेवती जरा संयत हो गई। उंगली के नाखून को दांतों से चबाते हुए वह कुछ अन्यमनस्क-सी हो गई।

‘सेवी! आ, अंदर आ! बाहर गर्मी में क्यों बैठी है। कमरे में आ जा, यहां एसी चल रही है।’

सेवती सशंकित हो कर कमरे में चली गई।

विशंभर दाहिनी हथेली पर अपने सिर को टिकाकर कोहनी के सहारे बिस्तर पर लेटा हुआ था। पैर के पास एक तकिया थी।         

‘न जाने क्यों मुझे थकान-सी लग रही है, शरीर टूट रहा है। तेरी मां जी होती तो हाथ-पैर दबा देती, आराम मिल जाता। खैर छोड़, तू यहां आ जा, मेरे पास आ कर बैठ। तू पराई थोड़ी है। तुझे याद नहीं, तेरे लिए मैं तेरे मायके पहुंच गया था। ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। जब तक तुझे नौकरी न दिलवा दूं, मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था। मैं किसी के साथ अन्याय होने नहीं देख पाता हूँ। तू ही बता, इतने दिन से मेरे साथ तू काम कर रही है। किसी के साथ मैंने कभी कोई अन्याय किया है?’

‘नहीं सर!’ सेवती ने सहमते हुए कहा।

‘बुरा नहीं मानना, मेरे पैर को जरा दबा देगी तू? ओफ ओ, बड़ी पीड़ा हो रही है।’

सहमते हुए अपने दोनों हाथों से सेवती विशंभर के पैर दबाने लगी।

‘आहा, कितनी नाजुक हैं तेरी ये हथेलियां, रे सेवी! जरा जोर से दबा। हां-हां, ऊपर… और ऊपर!’

दबाते हुए सेवती ने कहा, ‘घर का काम करते हुए हथेलियां सख्त हो गई हैं। नाजुक कहां रहीं अब ये!’

‘न-न, ऐसा मत कह! आज तू क्या ही लग रही है! पीली साड़ी में लाल ब्लाउज! तेरे बदन पर कितनी फब रही है! इसे दफ्तर पहनकर नहीं जाना, सभी पागल जाएंगे। हें हें हें…!’

‘सर, पिछली बार जो मैं गांव गई थी न, महापात्र वालों ने यह साड़ी दी थी। बड़े महापात्र बाबू की तेरहवीं पर मुझे मिली थी। उनके घर-आंगन बुहार देती थी न, इसलिए। उसी खुशी में दी थी…।’

‘अच्छी बात है। तुझे देखकर हर कोई तुझे श्रद्धा करने लगेगा। तू है ही ऐसी रे, सेवती।’

विशंभर के पांव दबाते हुए सेवती उसके करीब आ कर तनिक सहमते हुए कहा, ‘सर, एक बात कहूं? मैंने यह किसी से नहीं कहा है।’

‘अरी बोल न! मुझसे कैसी शरम! जो कहना है मुझे कह, मेरे सिवाय तेरा है ही कौन!’

‘जी, मैं क्या बताऊं! पिछली बार जब मैं छुट्टी लेकर गई थी अपने पिता के पास… क्या हुआ न… , वो जो बड़े महापात्र बाबू थे न, वे हमारे माई-बाप थे। उनके खेतों में हल चला कर, घरबार की साफ-सफाई कर मेरा बाप गुजारा करता था। उनके कारण ही हमारा चूल्हा जलता था। मेरे बापू ने कहा, महापात्र बाबू के घर जा कर बीस सेर धान ले आ। मां जी ने देने को कहा था। मेरे हाथ पैर चलते नहीं हैं, तू धान की बोरी उठा ले आ। क्या कहूं बाबू, मुझे देखते ही मेरा बापू निठल्ला बन जाता है।’

विशंभर से रहा नहीं गया, उसने हाथ बढ़ा कर सेवती का हाथ पकड़ लिया। सेवती को अपने पास खींचते हुए कहने लगा, ‘तेरे चेहरे की तरह तेरी बोली भी कितनी कोमल है! भगवान ने तुझे बड़ा खूबसूरत बनाया है। आ, मेरे पास आ जा। घर में कोई भी तो नहीं है।’ 

विशंभर को रोकते हुए उसने कहा, ‘पहले मैं कह लूं। सर, उस दिन जैसे ही मैं महापात्र के घर पहुंची, बड़े महापात्र साहब ने कोठरी में से धान निकालने को कहा। उनकी तो बड़ी कोठरी थी धान की। अंदर अंधेरा था। जैसे ही मैं अंदर घुसी, बड़े सा’ब ने मुझे पीछे से कसकर पकड़ लिया। मेरे आंचल को खींचकर मेरे गर्दन के नीचे एक चुम्मा जड़ दिया। मैं छटपटा कर जब भागने लगी थी तो मेरे हाथ को पकड़कर उन्होंने कहा- रात में आना मेरे कमरे में। मैं पीछे का दरवाजा खुला रखूंगा। सबकी नजर बचा कर वहां से मैं भाग निकली।’

‘अच्छा किया तुमने…। अब बस भी कर।’ विशंभर अपना धीरज खोने लगे और सेवती को बाहों में भरने को बेताब होने लगे। उनकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी।

‘समझे न सर, वे तो बड़े साहब थे। आपकी तरह वे भी मुझे बड़ी श्रद्धा करते थे। मैं तो भाग कर घर आ गई थी। घर पर आते ही सिर पकड़ कर बैठ गई, सोचने लगी कि क्या करूं। फिर उठी। बापू की पेटी तलाशा। जड़ी-बूटियां निकालीं। बापू ने तो सपेरे का हमारा धंधा कब से छोड़ दिया है। लेकिन मैं जब छोटी थी तब मुझे उन्होंने मंत्र सिखाया था। सच कहती हूँ सर, जड़ी-बूटी के साथ एक कांच का बोतल लेकर खेतों के पास केवड़े की झाड़ियों में रख आई। ढक्कन खुला था। एक घंटे के बाद मैंने देखा उस बोतल के अंदर तीन-तीन सांप लिपटे पड़े थे। झट से ढक्कन बंद कर उस बोतल को अपनी साड़ी में छिपा कर मैं ले आई। रात में बड़े महापात्र साहब की खिड़की के पास खड़ी हो कर ताक-झांक करने लगी।’

खिड़की के पास उनका खाट पड़ा था। बोतल खोल कर धीरे से चित्ती सांप को खिड़की के अंदर छोड़ आई। सर, क्या कहूं! सुबह-सुबह उनके घर पर मातम छाया था।’

‘…माँ जी बड़ी अच्छी थीं। तेरहवीं तक उनके घर पर मैंने बहुत काम किया था, तभी तो उन्होंने यह साड़ी दी थी मुझे। इसके अलावा मेरे हाथ में उन्होंने चार सौ रुपए ठूंसकर कहा था- सेवी, तुझ जैसी लड़की को विधाता ने ऐसी किस्मत दी है। वही किस्मत आज मुझ जैसी बदनसीब को मिली है।’ ऐसा कहते हुए सेवती ने आंखों से आंसू पोंछे।

विशंभर की कुहनी संतुलन खोकर एक झटके से दाईं ओर सरक गई। खाट के बाड़े पर उनका सिर टकराते-टकराते बचा। मुंह खुला का खुला रह गया। हड़बड़ा कर उसने अपनी धोती संभाली।

‘अच्छा, अब तू जा!’

‘क्यों सर, जरा और दबा देती हूँ। आराम मिलेगा।’

‘नहीं नहीं, अब तू जा यहां से!’ विशंभर ने थूक गटककर विषय बदलते हुए कहा, ‘जीआईएस का काम हो जाएगा तेरा।’

उनके बताए गए जरूरी पेपर निकालकर सेवती ने कहा, ‘सर, ये हैं बाकी कागजात…!’

‘अब किसी चीज की जरूरत नहीं है, तू भाग यहां से…।’

‘सर, फोटू लाई थी!’

‘तू यहां से भागती है या नहीं?’

बाहर आकर सेवती ने दम लिया। लंबे-लंबे डग भरकर अंधेरे को चीरती हुई अपने घर की ओर भागी। बड़े को नींद आ रही होगी। छोटा भूखा होगा।

संपर्क :ममतामयी चौधरी ‘सारांश’, 179/2129, कल्याणी नगर, लेन- 7, पात्रपड़ा, भुवनेश्वर-751019 मो. 9937720054
प्रदीप कुमार राय ‘अनादि-सत्य’ 1 डी /195, सेक्टर – 11, सीडीए, कटक – 753015 मो. 9650925319