
युवा लेखक और कवि। भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित। किताबें– ‘जहां भी हो जरा–सी संभावना’ (कविता संग्रह), ‘आठवाँ रंगपहाड़–गाथा’, ‘काकड़ किस्सा’ (उपन्यास), ‘प्रार्थना समय’ (कहानी संग्रह)।

‘लोग न्याय और बराबरी के जन्मजात आदर्श को नहीं भूलते, इतिहास के किसी दौर में कुछ लोग अवश्य इन्हें भूल जाते हैं पर इन्हें याद कराने के लिए उनसे कहीं बड़ी संख्या में मनुष्य जीवित रहते हैं। इन्हीं के सामने अपने आंतरिक संघर्ष की जांच के लिए कवि अपनी रचना लाता है चाहे रचने के एकांत के बीच में से उठकर ही क्यों न आना पड़े।’
समकालीन कविता पर बात करते हुए और रघुवीर सहाय की इन पंक्तियों को स्मरण करते हुए सबसे पहला विचार तो मुझे यही आता है कि महज तीस वर्ष में ऐसा क्या हुआ कि ‘कविता की वापसी’ का ऐलान करने वाले कविता के अस्तित्व को लेकर ही चिंतातुर नजर आ रहे हैं, जबकि बीते वर्षों में न केवल पत्र-पत्रिकाओं की संख्या में आश्चर्यजनक इजाफा हुआ है बल्कि कवियों की संख्या में भी लगभग एक उफान-सा आया है।
कहीं ‘कविता की वापसी’ का जो ऐलान था, कोई छद्म प्रयास तो नहीं था? यानी कविता की वापसी ही नहीं हुई हो, बस इसे बहुप्रचारित किया गया हो और अभी भी कविता अपनी वापसी की प्रतीक्षा में हो! या कहीं कविता के अस्तित्व के संबंध में चिंताएं ही असंगत तो नहीं! ऐसे कई विचार हैं जो समकालीन कविता पर बात करते हुए सामने आते हैं।
समकालीन कविता के साथ जुड़े संकटों की प्रश्नावली यदि बनाने बैठें तो ऐसा प्रतीत होता है, जैसे ब्रह्मांड में सर्वाधिक संकट में कविता है। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि जो संकट गिनवाए जाते हैं, उनमें से अधिकांश समकालीन कविता के आंतरिक नहीं बल्कि बाहरी हैं। इन संकटों की फेहरिस्त में जो प्रमुखता से नजर आ रहे हैं उनमें एक है कविता की अलोकप्रियता का संकट, और दूसरा है आलोचना का संकट। तीसरा संकट समकालीन कविता की विश्वसनीयता को लेकर है, जो पाठकीय संकट से ज्यादा भिन्न नहीं है।
फिलहाल समकालीन कविता पर बात करना उसके संकटों पर बात करने तक ही सीमित होकर रह गया है। कविता के संकट की पहचान का संकट नहीं है, यह आसान कार्य है। सवाल संकट के लिए उत्तरदायी तत्वों की पहचान को लेकर है। संकट के उत्पादनकर्ता और उत्प्रेरक कौन हैं, इसकी निष्पक्ष पड़ताल की जानी चाहिए। तभी समकालीन कविता के संकट पर चर्चा करके किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। अन्यथा संकट पर हमारी चर्चा सिर्फ सूचियां बनाने तक सीमित होकर रह जाएगी।
कवि लीलाधर जगुड़ी ने अपने एक साक्षात्कार में विचारणीय बात कही थी, ‘कवि को खराब करते हैं प्रायोजित आलोचक और समीक्षक। कवि ही क्यों, वे हर रचनाकार को बर्बाद कर देते हैं। लेकिन कवि जब खुद की खराबियों की खुद मुरम्मत करता है और जब वह अपनी गति, अपना प्रवाह फिर पा लेता है तो उसके अनुभवों का ईंधन उसे कभी बंद नहीं होने देता।’
आज आलोचना के सामने एक संकट यह है कि समाज में चार-चार पीढ़ियों के कवि एक साथ रचनारत हैं और कविता की श्रीवृद्धि कर रहे हैं। ऐसे में आलोचना को अपने उपकरणों में आवश्यक तब्दीली करने और उन्हें विकसित करने की ज्यादा आवश्यकता दिखती है।
आज कविता में भाषा, शिल्प और स्वरूप को लेकर नित नए प्रयोग हो रहे हैं। दरअसल उसके समानांतर आलोचना का ऐसा विकास नहीं दिखता है जो समकालीन कविता के समस्त उपकरणों और प्रयोजनों का यथोचित अन्वेषण कर सके और उसके गुण-दोषों का तटस्थ मूल्यांकन कर सके। जो थोड़े प्रयास हैं, वे सीमाओं में हैं। नई कविता, समकालीन कविता, विचार कविता, गद्य कविता, प्रतिबद्ध कविता, शुद्ध कविता, राजनैतिक कविता जैसे नाम हमारी आलोचकीय अक्षमताओं के उदाहरण मात्र ही तो हैं। यह प्रश्न शायद हमारे समय के अति उत्साही आलोचकों को क्षुब्ध करें तो उनसे विनम्रतापूर्वक कहना है कि इस युग की कविता का सही मूल्यांकन और नामकरण जैसी औपचारिकता भविष्य की आलोचना ही करेगी या कर सकेगी, क्योंकि तब दिख रही भीड़ में से थोड़ी कविताएं ही बची रहेंगी, और निथरकर आई वे कविताएं ही इस युग का प्रतिनिधि चेहरा-मोहरा तय करेंगी, और यह काम आज की आलोचना को सिरे से खारिज करके होगा, ऐसी संभावनाएं ज्यादा हैं।
छायावाद एक अन्यतम उदाहरण है। कहते हैं, तकरीबन चार सौ से ज्यादा कवि तब एक साथ छायावादी कविता का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, लेकिन आज दर्जन भर नाम भी स्मरण में नहीं आते हैं। यहां तक कि छायावाद चार-आठ कवियों पर केंद्रित होकर रह गया है।
आलोचना का यह संकट विशेषकर तब और उभरकर सामने आता है जब आलोचना के केंद्र में रचना न होकर रचनाकार होता है। इस विषय पर ज्यादा लिखा और कहा गया है। उक्त बातों के संदर्भ में कवि अशोक वाजपेयी के शब्द उधार लिए जा सकते हैं, ‘एक अच्छी कविता बुरे से बुरे कवि को मरने नहीं देती।’
समकालीन कविता खासकर युवा कविता के संदर्भ में कहा जाता है कि यह परंपराभंजक है। कुछ इसे स्मृतिहीनता के संकट की तरह भी देखते हैं। वस्तुतः दोनों के सिरे एक ही छोर पर खुलते हैं। अपने अध्ययन और अपनी सीमाओं में कहूं तो मुझे ऐसा नहीं दिखता है, कम से कम अपनी पीढ़ी तक तो मैं यह नहीं देखता हूँ।
दरअसल हर पीढ़ी अपने से पूर्ववर्ती पीढ़ी को पढ़कर ही सीखती है। हमारे पास परंपरा से प्राप्त अकूत साहित्य धरोहर में मिला हुआ है, जिसे पढ़ने में संभवतः कई उम्रें कम पड़ सकती हैं। बहरहाल श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय या मुक्तिबोध को युवा पीढ़ी के किस कवि ने नहीं पढ़ा होगा या पढ़ना नहीं चाहेगा। इन्हीं को क्यों? समकालीन कविता में ऐसे कई लब्ध और काबिल कवि रहे हैं और हैं, जिनसे नई पीढ़ी भी कविता के संस्कार सीख रही है। अरुण कमल, राजेश जोशी, भगवत रावत, विष्णु खरे, वीरेन डंगवाल, चंद्रकांत देवताले आज की युवा पीढ़ी के ‘आयकॉन’ कवि हैं। और पहले की तरह यह पीढ़ी भी अपने से ऊपर की पीढ़ी से बाकायदा कुछ न कुछ ले रही है और लेती रहेगी। इस बीच जो थोड़ा नया दिखाई देता है, वह दरअसल पुराने की तोड़फोड़ ही होता है।
समकालीन कविता का एक अन्य संकट है इस कविता की बहुलता का संकट या आरोप, जैसा कि इन दिनों बहुप्रचारित है। हालांकि यह नितांत नकारात्मक दृष्टिकोण वाला विचार है, क्योंकि अपने उद्भव काल से कविता में कई ज्ञात-अज्ञात रचनाकारों ने अपना योगदान दिया है। इसलिए कविता की अति का प्रश्न निःसंदेह उस समय भी विद्यमान रहा होगा। उसी बहुलता के बीच कबीर, जायसी, सूर, तुलसी, खुसरो हुए हैं और उनके बाद निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध भी। लेकिन अच्छे कवि और कविता का अंततः मूल्यांकन हुआ है। आज हमारे बीच कविता बची है, यह इसी मूल्यांकन का नतीजा है। इसीलिए मैंने ऊपर लिखा है कि इस युग की कविता का सही मूल्यांकन भविष्य की आलोचना करेगी।
सैकड़ों पत्रिकाओं में हजारों की तादात में छप रही कविताओं पर अस्तित्व का अभी कोई इतना बड़ा खतरा नहीं है जितना प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन इससे अति उत्साहित और आत्ममुग्ध न होते हुए बस थोड़े से आत्ममंथन की आवश्यकता है। क्या हमारे समाज को कविता की आवश्यकता है? सोशल मीडिया के आत्मघाती युग में क्या इतनी (अति) मात्रा में कविता की जरूरत है? जब इन प्रश्नों से रचनाकार गुजरेगा, यकीनन उसकी कविता में विषय और विचार को लेकर एक जरूरी सतर्कता आएगी। यह एक कविता और एक अच्छी कविता के बीच की विभाजक रेखा तय करेगी। वरिष्ठ कवि विजेंद्र ने इसे बहुत सरल शब्दों में समझाया है, “कमजोर’ कविता को कोई भी सहारा ‘महत्वपूर्ण’ कविता नहीं बना सकता।’
समकालीन कविता पर एक बड़ा आक्षेप उसकी अलोकप्रियता को लेकर है। इसे विनम्रता से स्वीकार किया जाना चाहिए, मगर इसके लिए समकालीन कविता उतनी उत्तरदायी नहीं जितनी हमारी राजनैतिक, प्रशासनिक और अकादमिक इच्छाशक्ति का अभाव है।
अज्ञेय ने अपने कविता संग्रह ‘कितनी नावों में कितनी बार’ को ज्ञानपीठ मिलने पर उसके द्वितीय संस्करण की भूमिका में लोकप्रियता और रचना के अंतर्संबंधों पर अपने विचार रखते हुए लिखा है, ‘हमारे समाज की अद्यतन प्रवृत्तियां उन मूल्यों को महत्व नहीं देती हैं, जो इस दृष्टि का आधार हैं। जो मूल्य दृष्टि भौतिक जीवन की बाहरी सुख-सुविधा और सुरक्षा को गौण स्थान देती हुई लगातार एक सूक्ष्मतर कसौटी पर बल देना आवश्यक समझे, जो इससे भी न घबराए कि जीवन की प्रवृत्तियों और महत्वाकांक्षाओं के प्रति ऐसा परीक्षण भाव सफलता की खोज को ही जोखिम में डाल सकता है, वह ‘लोकप्रिय’ नहीं हो सकती, भले ही थोड़े लोग उसे महत्व देते रहें, बल्कि उससे प्रेरणा भी पाते रहें।’
यहां सबसे बड़ा प्रश्न उपस्थित होता है कि रचना की लोकप्रियता को हम कहां और किनके बीच पाना चाहते हैं? क्या जिस वर्ग के बीच हम रचना को लोकप्रिय देखना चाहते हैं, रचना उस वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व करती है? क्या वह उस वर्ग विशेष के चिंतन स्तर को प्रभावित करती है? ‘लोकप्रियता’ में जो ‘लोक’ शब्द ध्वनित है, समकालीन कविता क्या इस ‘लोक’ का अनुकरण करती है? ऐसे कई सवाल हैं जो समकालीन कविता और उसकी लोकप्रियता के संदर्भ में लंबी बहस का विषय है।
मैं यह नहीं कहता और न मानता हूँ कि समकालीन कविता नितांत अलोकप्रिय हो गई है या इसे अलोकप्रिय ही होना चाहिए, लेकिन लोकप्रियता की कुछ सीमाएं और संभावनाएं होती हैं। रचना की लोकप्रियता किसी की अंतिम इच्छा में शामिल हो सकती है, यह एक अनिवार्यता कतई नहीं है।
कुछ ये प्रश्न भी हैं कि हम समकालीन कविता की लोकप्रियता को किस संदर्भ में देखते हैं? कहां और कितना विस्तार देखते हैं? दरअसल यह क्षणिक आत्मतुष्टि और समर्थ वैचारिक धरातल की रचना का द्वंद्व है, जिसे साहित्य जगत में प्रारंभ से कोई जरूरी ‘स्पेस’ नहीं मिल सका है। इन दिनों बाजार की हवा जिस तरह सबको अपनी चपेट में ले रही है, कविता भी इस ‘लू’ से अछूती नहीं बच पा रही है और लोकप्रियता के लिए ‘लोक’ की तरफ लौटने के बजाय लोक को लालायित नजरों से देख रही है।
दरअसल बौद्धिक जुगाली और कविता के दुरूह पाठों ने समकालीन कविता को ‘लोक’ से इतना दूर कर दिया है कि उसकी वापसी फिलवक्त दूर तक संभव नहीं दिखती है। एक बात अंत में यह भी कि समकालीन कविता में ‘समकालीन’ शब्द कम आपत्तिजनक नहीं है। अपने समय में हर कविता समकालीन होती है। इस लिहाज से यह नाम भविष्य में वर्तमान कविता या इस कालखंड विशेष की कविता का कोई सही-सही स्वरूप या चित्र उपस्थित कर सकेगा, यह संदेह से परे नहीं है और शायद इसके लिए भी भविष्य की आलोचना का मुंह ताकने के सिवा कोई चारा नहीं है।
निदेशक, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, जनजातीय संग्रहालय, श्यामला हिल्स, भोपाल – 452002 मो. 9755980001
