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| प्रकाश किनगावकर महाराष्ट्र सरकार के ‘बालकवी’ पुरस्कार से सम्मानित कवि। कविता संग्रह ‘गावाच्या आकाभोंवती’ प्रकाशित। |
तेजपाल चौधरी लेखक, अनुवादक। आत्मकथा की एक पुस्तक प्रकाशित। कोरोना काल में देहांत। |
सिसकियों का बांध
बेटी के घर से लौटते समय
गोफण के कंकड की तरह
बाहर निकला
मुंह फेरकर
भरभराती आवाज में
इतना ही कहा, ‘अच्छा, चलता हूँ’
मैं देखना नहीं चाहता था
उसकी आंखों में बिछुड़ने की पीड़ा
टपकने नहीं देना चाहता था
पत्ते से गिरती ओस की बूंदों-से
उसके आंसू
फिर भी सीढ़ियों से उतरते समय
मुझे सुनाई दीं
उसकी सिसकियां
मैं डगमगाया
थोड़ी देर ठहरा
पर मुड़ न सका
कि कहीं
हाल ही में जन्मी उसकी पीड़ा
सिसकियों का बांध तोड़कर
बह न निकले
और नए फूटते जीवन के अंकुर को
ठेस न पहुंचे।
आली में रखी ढिबरी
सास-बहू की
रोज रोज की तू-तू मैं-मैं से
तंग आकर
बेटे ने घर में दीवार निकाल ली
और मां को छोड़कर
अपना चूल्हा अलग कर लिया
उसके जन्म के समय
घर कितना खिला-खिला सा था
भादो की कपास की तरह
और कुछ डगमगाती-सी उसकी नाव
ससुराल में स्थिर हो गई थी
हथेली के फोड़े की तरह
बच्चे को सहेजती
और
पेट पर पट्टी बांधकर
उसे पालती कष्टों में भी
हँसते तवे की तरह
दमकता था उसका चेहरा
लंबी बीमारी के बाद
पति साथ छोड़कर चला गया
वह तूफान में उखड़े पेड़ की तरह
गिर पड़ी
पास-पड़ोस की औरतों ने
दिलासा दिया
कि ‘तेरी गोद में बच्चा है उसे पाल’
उसका दुख कुछ हल्का हुआ
धीरे-धीरे
मन में जीने की चाह जागी
जैसे
ईख काट लेने के बाद
खेत की जली पत्तियों की राख में
हरे अंकुर फूट आए हों
लेकिन
बुढ़ापे में बेटे का सहारा
बहू के हाथ की रोटी
और सुख के चार दिनों के लिए
तरसती ही रह गई वह
बुझती चली गई धीरे-धीरे
तेल सूख जाने के बाद
आली में रखी ढिबरी की तरह।
संपर्क :
प्रकाश किनगावकर फिनिक्स, 84/31, श्रीराम नगर, दादावाडी, जलगाव, महाराष्ट्र– 425002 मो.8806666058
तेजपाल चौधरी 56, रामदास कॉलोनी, जलगाव, महाराष्ट्र– 425001




Excellent translation by Tejpal Sir