युवा लेखिका। प्रकाशित कहानी संग्रह ‘वो अजीब लड़की’, ‘मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है’ (कहानी संग्रह), ‘साज-बाज’ (उपन्यास)। तंज़ानिया (अफ्रीका) में रहवास, स्थायी पता – जमशेदपुर (झारखंड)।

 

‘असल में किस्सागोई बड़ी ही नफासत का काम है, खास कर तब जब कहानी अपनी हो। कितना छुपाना है कितना बताना है यह भी एक कारीगरी है। ऐसी कारीगरी बड़ी ही जहीनी से हासिल होती है, यह यों नहीं कि बस कहना शुरू कर दिया और कहते चले गए बिना रुके धाराप्रवाह यह कहकर डॉरेथी ने मेरी आंखों में देखा था एक घुड़क थी उसकी निगाहों में कि ‘कहना ऐसे जैसे सुनने वाले पर कोई जादू चलाया हो, मंत्रमुग्ध कर देना उन्हें अपने कहन से!’

वह मुझे बेहतर जानती है। मेरे साथ ऐसा नहीं हैं। मुझमें कहने का शऊर तनिक भी नहीं। मैं मामूली-सी बात भी ठीक से नहीं कह पाती हूँ। पता नहीं कहां से ऐसी हड़बड़ाहट आ जाती है कि बहुत-सी बातें विराम और अल्पविराम के मध्य गायब हो जाती है या फिर पंक्तियां एक-दूसरे पर चढ़ बैठती हैं, जैसे कुछ छूटता हो और कभी-कभी तो हकलाने भी लगती हूँ।

हकलाहट से घबराहट होती है या घबराहट से हकलाहट, यह मैं कभी समझ नहीं पाई, किंतु कहीं कह न दूं सच की घबराहट से मैं अधिकतर चुप रहने लगी, तब भी जब कहना निहायत जरूरी था। बेहद गैरजरूरी तरीके से चुप्पी मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बनती गई, तबीयत में खामोशी घुलती गई और मैं चुपचाप देखती रही। मौन मेरे जीने का ढंग रहा उम्र भर, लेकिन डॉरेथी कहती है मुझे कहना चाहिए कि ‘स्वीकारोक्ति भी दरअसल मुक्ति है!’

मैं चौंक जाती हूँ, क्या वाकई मुक्ति इतनी सुगम है? एक सच जिसपर वर्षों से झूठ का मुलम्मा चढ़ा है उसे इतनी सरलता से उतार फेंकना कितना ही मुश्किल होगा। यूं मुश्किलों से मेरा वास्ता पुराना है, इतना पुराना कि चाह कर भी मैं उसे अनदेखा नहीं कर सकती। मेरा जीवन तलवार की धार पर चलता रहा है तमाम उम्र।

उम्र जो बीती है अब तक, उस कहानी के दो अध्याय है। पहले के केंद्र में मां है। मां मेरा केंद्र रही है। कभी मेरा जीवन मां से विलग नहीं रहा। मां ढाल रही है जिसके पीछे मैं हमेशा सुरक्षित रही। मां कवच थी मेरा, कोई भेद नहीं सका मुझे कभी उनके रहते। वह एक अभेद परत-सी बनी रही मुझपर सदा। अब मां नहीं है तो मैं निहंग हो गई हूँ। वही थी दुनिया मेरी, अब उनके बिना हो गई हूँ दुनिया की। मैं तैयार हो रही हूँ दुनिया के लिए, उस सच को बेपर्दा करने को जो ढका छुपा रहा है अब तक।

वह एक निजी कमरा, जिसपर पर ताला चढ़ा रहता है हरदम। अलमारी में मां की साड़ियां तह कर रखी हैं, शृंगारदान में लिपस्टिक, काजल और बिंदियां हैं। विदेशी फूलों की सुगंध वाली खुशबुएं और चूड़ियां भी। मां चूड़ियां नहीं पहनती थी, पीसी मां पहनती थी। वह बोलते हुए अधिकतर अपने हाथों से भी कहा करती थी। उनके कहने में घुला चूड़ियों का संगीत मेरे भीतर अव्यक्त मोह-सा आकर ठहर गया है, वह स्थायी रूप से बस गया कभी नहीं जाने के लिए!

इस कमरे में मैं कभी-कभी आती हूँ, अरसे बाद आज आई हूँ। लिपस्टिक लगाते हुए हाथ कंपकंपा रहे हैं धड़कन बढ़ी हुई है। रह-रह कर विगत की तुर्श यादें सुई-सी चुभ रही हैं। पहले एक, फिर दूसरी, फिर तीसरी। एक-एक कर याद की अनगिनत सुइयां मेरे जेहन को बींधती हैं, लहूलुहान आत्मा अपनी आंखें बंद किए अंतिम सांसों के साथ रीत रही है। बदनुमा कल। धब्बेदार कल। इसपर चढ़ी गाढ़े रंग की पुताई बोसीदा हो उतरने लगी है जगह-जगह से और फिर से नुमायां होने लगे हैं स्याह चकत्ते जिन्हें छुपाने की जद्दोजहद में चुक गई जिंदगी, आज फिर उभर आई है पुराने घाव की टीस की तरह। कराहती, कपसती। और इस सबके साथ उभर आता है माँ का गुस्से से तमतमाया चेहरा, औचक ही जैसे नीरव में चीखता है कोई रव!

पहला अध्याय  :

एक झन्नाटेदार थप्पड़ की आवाज से समूचा हॉल गुंजायमान था, ग्यारहवें जन्मदिन पर भी कोई रियायत नहीं।

मां को मेरा लिपस्टिक लगाना नागवार गुजरा था।

अबोध है अभी। मां की सहेलियों ने मेरे मासूम होने की दुहाई दीअ वह अनसुनी कर अपने पल्लू से मेरे होंठ रगड़ रही थीं।

‘आपकी तरह सुंदर दिखना है’, आधी रात उनके सिसिकने की आवाज सुनकर मैंने सफाई दी। पीड़ित गाल को कई बार चूमने-सहलाने के बाद मुझे सीने से लगाकर सुबकने लगी थी मां। न जाने कब तक अपराधबोध की आग में झुलसती मैं मां से लिपटी रही। उनका रोना असह्य था मेरे लिए मैं उन्हें दुख नहीं देना चाहती थी लेकिन अनजाने ही उनके आंसू का कारण बन जाती जब-तब।

‘तुम्हें नहीं शोभता यह सब’, मां कई-कई दफे समझाती। किंतु शृंगार का लुभाव दिन ब दिन मुझे अपने मोहपाश में कसता जा रहा था- तंग, बतंग। मैं बेदम हुई कसमसाती, छटपटाती किंतु छूट निकलने में खुद को अबस, असहाय पाती। अकसर छुपकर, चोरी से जब मां नहीं होती काजल, लिपस्टिक और बिंदी सजाकर उनकी कोई साड़ी लपेट लेती, इतराती, शरमाती, खुद पर मोहित हुआ करती।

कभी कृत्रिम बरौनियों में रंग भरती अपने लावण्य पर मैं आप ही आसक्त होती रही हूँ। मां की साड़ी लपेटे मैं हुबहू मां जैसी लग रही हूँ, उन जैसी ही दिलकश, दिलफरेब। मां की तमाम साड़ियों में मेरी पसंद की सबसे सुंदर सुनहले बॉर्डर वाली लाल सिल्क साड़ी। इस साड़ी में मां की एक तस्वीर है। मां ने उस तस्वीर और साड़ी को एक संदूक में बंद रखा था। फोटो में मां के बगल में पिताजी हैं। दोनों खुश लग रहे हैं, अधिक दिनों तक नहीं रह सके थे खुश भी और साथ भी। मेरी चेतना में पिताजी की याद तनिक भी नहीं, मेरे जेहन में सिर्फ मां की स्मृतियां हैं। पिताजी ने कभी पलट कर नहीं देखा, मेरी सुध भी नहीं ली। मेरे लिए मां ही भगवान है और इस तस्वीर में मां, दुर्गा मां लगती है। मैंने तस्वीर से पिताजी को काटकर नाले में बहा दिया।

एक बार मैंने मां से पूछा था ‘पिताजी क्या बुरे इंसान निकले?’

थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद मां ने संयत स्वर में कहा, ‘नहीं, आम इंसान’। 

प्रेम में देवत्व की चाह होती है। इस बाबत मैं अनजान थी उन दिनों।

मालूम हुआ पिताजी सुदूर, अन्यत्र देश में खुशहाल जी रहे हैं। कोई विशेष स्त्री संग-साथ निभा रही है। ‘पिताजी’ की पुकार लगाने वाली एक जोड़ी आवाज से मैं बिसरा गई शायद!

मां की संदूक में और भी कई चीजें बंद हैं, मेरी मासूमियत भी। गुलाबी रंग की झीनी झबला फ्रॉक और सफेद हेयर बैंड के साथ मेल खाती पॉमशू। स्कूल के एनुअल फंक्शन पर मैंने राजकुमारी का किरदार निभाया था। मां ने खुद अपने हाथों से सजाया था मुझे। भौंहों के ऊपर सफेद और लाल रंग की टिप, होंठों पर लिपस्टिक और नाखूनों पर पॉलिश लगाती मां बेहद खुश लग रही थी। मैंने उन्हें इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था, वह बलैयां ले रही थी। कहा, मैं बेहद प्यारी लग रही हूँ। मेरे जीवन का सबसे सुंदर दिन था वह जब मां खुश थी। मेरे लिए मां की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं था!

कभी-कभी किसी आम दिन भी मैं उस फ्रॉक को पहनती, मां उसी तरह सजाती लेकिन न खुश दिखती न बलैयां लेती बल्कि एक खीज होती उनके वर्ताव में अजीब-सा चिड़चिड़ापन, रोष पर संयम बरतते हुए वह सामान्य बने रहने का अभिनय करतीं जरूर, लेकिन उनकी भाव भंगिमा नापसंदगी का स्पष्ट संकेत देती। सिकुड़ी भवें, भींचे होंठ मां मुझे पहले जैसी खुश नहीं लगतीं। वह बदल रही थीं। मेरे शृंगार प्रेम के प्रति उनका रवैया सख्त होता जा रहा था। उस सुंदर दिन की याद कड़वाहट में तब्दील होती जा रही थी जिसे मैंने सबसे छुपाकर निज में संभाल रखा था!

उस इतवार किसी के जन्मदिन पर मैंने फिर से गुलाबी फ्रॉक पहनने की जिद्द की तो मां ने थप्पड़ लगा दिया। यह पहली बार था जब मां ने मुझे थप्पड़ मारा था और मैं चुप हो भी गई थी। हां, आखों से प्रश्न की एक पतली धार जरूर बह निकली थी जिसका कोई ठोस जवाब मां के पास नहीं था सिवाय उन्हें पोछने के। इसके बाद मुझे चुप कराने का यह मां का अचूक हथियार बन गया था जिसका इस्तेमाल वह बहुत जरूरत पड़ने पर ही किया करती थीं और कभी-कभी कम जरूरत पर भी, फिर बाद में रोती, पुचकारती, दुलारती खूब। मगर उनकी सख्ती फांस बनकर अटक गई थी मेरे भीतर, चुभती रहा करती थी रात-दिन!

फिर एक दिन मेरी अलमारी से फ्रॉक गायब हो गया, बहुत ढूंढ़ने पर भी नहीं मिला। मैं उदास रहने लगी थी, जैसे मेरी खुशी का एकमात्र कारण वह फ्रॉक ही रहा हो अब तक और अब कभी खुश नहीं रह पाऊंगी। जी नहीं पाऊंगी उस फ्रॉक के बिना, ताप चढ़ आया था लेकिन मां पर कोई असर नहीं हुआ। ठंडी पट्टियां बदलती वह वैसी ही बनी रही सख्त जान, पाषाण। जब प्यार करती मुझे सच्चा नहीं लगता। ढोंग, दिखावा लगता।

मां के प्रेम पर संदेह होने लगा था मुझे। यह संदेह और गहरा गया जब मैंने देखा धीरे-धीरे वे सभी चीजें गायब होने लगीं जो मुझे मोहती थीं, खींचती थीं, बुलाती थीं, हाथ पकड़ रोकती थीं, अपने पास बिठा लेती थीं। मां के शृंगारदान से शृंगार की तमाम चीजें गुम हो गईं, रंग बिरंगी नेल पॉलिश की शीशियां, लिपस्टिक की काली दाबियां, काजल की चुनौटी और खुशबूओं का बंद, सब नदारद। मां को मुझसे रत्तीभर प्रेम नहीं, मेरा यकीं पक्का हो गया था!

फिर जलसों में भी उन्हें सादा देखकर मुझे कोफ्त होती थी, खुद के लिए रोष से भर जाती थी हर मर्तबा। एक ग्लानि भीतर ही भीतर मुझे जोंक की तरह चूसती। अपने आप से चिढ़ होने लगी थी मुझे।

खुद से विरक्त कई-कई बार बेहद असहाय महसूस करता मेरा बालमन और लगता काश मेरे हाथ कोई जादू की छड़ी होती जिसे घुमाकर सब ठीक हो जाता, या कोई ऐसा यंत्र जिसे धारण करते ही चमत्कारिक रूप से वक्त में पीछे लौट कर सब पहले जैसा सुंदर हो जाता जब माँ शृंगार किया करती थी और सजाया करती थी मुझे और लेती थी बलैयां।

मां के जीवन में अपने होने को लेकर सशंकित रहने लगी थी मैं उन दिनों। उन्ही दिनों हमारे बीच एक रस्सी तन गई थी, अबोलेपन की। बिना बोले, खामोशी से कोई चुप्पी घोंट रहे थे हम दोनों। एक ही छत के नीचे कभी मैं केंद्र पर तो कभी मां धुरी पर। न बोलने के खेल में वक्त की खूंटी पर टंग गया था अनकहा, उतरे कपड़ों की तरह। वे बातें जो मैली नहीं थीं फिर भी गंदला रही थीं हमारे दरमियां को। घुन की तरह सच हमें भीतर ही भीतर खा रहा था। हम खोखले होते जा रहे थे अपने झूठ के आवरण में!

मां ने कहा ‘हम सभी आवरण ओढ़े हुए हैं, हमें कोई न कोई सच दुनिया से छुपाना होता है’ और फिर उस दिन एक गिद्ध ने मुझे ताड़ लिया!

पता नहीं क्यों पीसी मां ने मुझे साथ लाने की जिद्द की थी, उनकी पोती की छठी थी। मां रोज समझाती, घुट्टी की तरह पिलाती वहां ठीक से चलना, संभल कर बोलना लेकिन माँ ने जाना कुछ चीजें कभी नहीं छुपती हैं, लाख यत्नों के बाद भी नहीं।

गिद्ध घर के आस-पास मंडराने लगा था, कुछ सूंघता हुआ, कुछ ढूंढ़ता हुआ। कभी-कभी मैं खिड़की का पर्दा जरा-सा हटाकर उसे देखती और यह भी देखती कि वह मुझे ही देख रहा है। उसकी नजर शिकारी थी, वह मेरा शिकार करना चाहता था। उसकी आंखें, उसके देखने का अंदाज- एक डर बैठ गया था मेरे बाहर-भीतर, मैं सिहर जाती!

घर की सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई थी, मां सोने से पहले तस्दीक करतीं कि तिहरे बंद वाला दरवाजा ठीक से बंद है या नहीं। कमरे का सांकल भी जांच लेती, वह मुझे साथ सुलाने लगी थीं अपने से चिपटाकर। मैं मां की धड़कनें सुनते-गिनते सो जाती। सपने में लकड़बग्घों का एक झुंड मुझे घेर लेता। खून उबलती आंखें, लार टपकती जीभ, नुकीली दंत पंक्तियां, गहरी-गहरी सांसें इतनी कि समूचा वजूद कंपकपा जाता। लकड़बग्घे धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ते, उनकी आंखों में मैं अपनी मौत देखती, भय से मेरी चीख निकल जाती और मां मुझे और कस लेती। मेरा शक बह कर दूर हो गया था, मां के प्रेम पर यकीं लौट आया था!

फिर एक दिन गिद्ध की मौत की खबर अखबार में छपी। मां ने मेरे सामने अखबार रखते हुए कहा कि अब डरने की जरूरत नहीं, केवल सतर्क रहने की है। मैं सतर्क होने लगी, ऊंची आवाज में बात करना और तनकर चलने का अभ्यास मुझे बदलने लगा था।

‘बिना पुरुष स्त्री को कमजोर समझते हैं!’ मां अकसर बड़बड़ाती।

उच्च अधिकारी मां यूं एक मजबूत स्त्री का जीवंत उदाहरण है, चेहरे पर हमेशा ही कठोरता की जिल्द और आवाज में रौब मानो विरासत में मिले हों। लेकिन आजकल बेतरह व्यथित रहती हैं, नामालूम-सा विचलन उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हो गया है जैसे। उनके चेहरे पर तिरती बेचारगी मुझे पश्चाताप के उस गहरे गर्त में ले जाती जहां रोशनी की एक किरण भी लब्ध नहीं। अपने कदमों को कंधे पर रख बाहर निकल आना चाहती थी उस अंधेरे और बदबूदार एकांत से, किंतु न जाने कौन-सी शक्तियां खींचती थीं नीचे से जहां अपनी छाया भी पराई थी। इतनी पराई कि हाथ लगते ही गुम हो जाती अनंत में!

बिना खटखटाए खुलने की उम्मीद लिए मैं अकसर ही उस दरवाजे के पास जा बैठती जो हमेशा तालाबंद रहता। मैं अपनी मुट्ठी में चाभी लिए देर तक कश्मकश में रहती। मेरे भीतर चटक रंग का कुछ खिलता, फिर बदरंग हो जाता देखते-देखते, जैसे किसी ने फूंक दिया हो विष। मैं उस पेड़ को सिर उठाकर, टकटकी लगाए देखती जिसपर जीवन का एक भी चिह्न नहीं था। फिर लौट आती उस चबूतरे पर जहां बैठी मैं उम्मीदों के सब्ज ख्वाब देखती। फिर उसमें आग लग जाती, सब राख हो जाता पलभर में!

मेरे भीतर एक द्वंद्व चल रहा था सच और झूठ के बीच। अधिकतर मैं अपने सच के साथ होना चाहती लेकिन मां की आंखों में तैरती बेचारगी मुझे उनके झूठ का कर देती। मैं ही मां की दुनिया हूँ, उनके जीने का एकमात्र सहारा। यह बात भावुक क्षणों में वह मुझसे कई मर्तबा दुहरा चुकी थी। तुम्हारे अलावा मेरा कोई और नहीं इस दुनिया में। मेरा भी नहीं कोई और उनके अलावा!

मैंने एक चित्र बनाया अपना और मां का, तस्वीर में मैं पुरुष के भेष में हूँ। हां मैं पुरुष हूँ!

मैं अपनी चिट्ठियां लिफाफे में रखने लगी थी। वह लिखता था मुझे। मैं उन्हें पढ़ने से बचती रही, लेकिन कभी-कभी एकांत के पलों में चिट्ठी से निकल शब्द बिखर जाते थे जैसे आस-पास पत्ते टूटकर शाखों से। मैं उन शब्दों को समेटकर ओढ़ लिया करती, जब रूमानियत थर्रा देती थी पूस की ठिठुरती रात-सी। 

और अंत में पछतावों के असभ्य मवेशी मुझे भीतर ही भीतर नोचते, खसोटते, पसलियों में ममोड़ उठती। मैं घुटनों में सिर दिए होती!

दूसरा अध्याय :

सरसरी तौर पर देखने पर जीवन का दूसरा अध्याय भी पहले जैसा ही है। कुछ खास नहीं बदला है सिवाय इसके कि मैं गिद्ध और लकड़बग्घे वाली दुनिया छोड़ एक ऐसी दुनिया में आ बसा हूँ जहां इस बात से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं पुरुष हूँ या स्त्री। हालांकि पहले खंड के अंत अंत में यह मान चुका हूँ कि मैं पुरुष हूँ। झूठ का यह पैरहन ओढ़े-ओढ़े इतना आदी हो चुका हूँ कि अब यह झूठ ही मुझे मेरा सच लगने लगा है। मेरा कड़वा सच यही है कि मैं एक पुरुष हूँ, लिंग के साथ पैदा हुआ हूँ लेकिन मन स्त्री का रहा सदा। मां ने मुझे मेरे मन का नहीं होने दिया, मैंने अपने शरीर को जिया और जीता आ रहा हूँ अब तक!

पीछे पलट कर देखता हूँ तो लगता है मैंने जिंदगी जी नहीं है, निभाया मात्र है और क्या खूब निभाया है! स्वयं पर गर्व होता है, इस ख्याल से मुस्कुराहट तिर आती है चेहरे पर और आंखों में एक चमक उतर आती है। मैं अपनी पीठ खुद थपथपा लेता हूँ। इसके साथ दर्द की एक हल्की-सी चीख बाईं कोहनी से निकल कंधे से लेकर उंगलियों तक सरपट दौड़ गई। फिर चुपचाप आकर वहीं बैठ गई ऐसे जैसे अब कोई इसे हिला नहीं सकता। चीख चिपक गई है, किसी तरह नहीं निकलेगी। जम गई है, पिघलने से बाज आता दर्द का यह कतरा अनजाने ही मेरे एकाकीपन का संगी हो गया। मुझे दर्द का होना सुहाता है, भला-सा लगता है उसका होना। मेरा कोहनी के बल गिरना, ठीक हुआ था उस दिन!

मेरे जीवन में यूं कभी कुछ ठीक नहीं रहा, मगर मैं ठीक मानता रहा हमेशा। जब भी गलत हुआ, मुझे लगा यही होना ठीक है। मैं इतना अधिक आश्वस्त होता कि शायद केश के लिए भी जगह नहीं बनती, मेरे जीने का ढंग यही रहा। मुझे कोई शिकायत नहीं, मेरा जीवन उलाहनों से रिक्त रहा, तमाम अधिकताओं पर मैं मात्र मुस्कुराता रहा। मैं निभाता रहा, जिंदगी जिस तरह पेश आती रही।

आजकल निभा रहा हूँ अपने होने की दोहरी भूमिका। दुनिया के सामने एक है, दूसरी वह जहां मैं होता हूँ। जो मैं यहां हूँ वही मैं हूँ। मेरा असल दुनिया से छुपा है। कई बार मुझे लगता है स्वयं को छुपाए रखना बेहद जरूरी कामों में से एक है, क्योंकि जब आपके पास कोई और नहीं होता तब आपका स्वयं अपना होता है और आप स्वयं के होते हैं। स्वयं की तरह से स्वयं के लिए होते हैं। मैं यहां स्वयं से मिलने आता रहता हूँ, यहां आनेवाले सभी स्वयं से ही मिलने आते हैं। ठीक तैंतीस मिनट पहले आया ऊपर का कॉलम। मुझे यकीन है मेरे बाद का कॉलम भी स्वयं की खोज में आता होगा!

आजकल हर व्यक्ति स्वयं को अपने भीतर कई तहों में छुपाए रखता है और जो बाहर दिखाई देता है वह कोई और होता है। वह किसी और दुनिया का होता है।

दुनिया को जीना सरल है बनिस्बत खुद के जीने के। स्वयं को जीने की खातिर, बाज दफे मैं यहां चला आता हूँ या यूं कहूं कदम आप ही इधर मुड़ आते हैं। तलवों को एक चाह हौले-हौले सहलाती है, गुदगुदाती है और मैं चल देता हूँ यंत्रवत उन्हीं चीन्ही राहों पर जिनसे संबंध सध गया है एक  नामालूम-सा। मूंद भी लूं यदि आंख तो बिना किसी भटकाव के पहुंच आऊंगा यहां।

मेरे कदमों को यहां का पता ठीक उसी तरह याद है जैसे रास्ते बताने वाले मैप को हर जगह का होता है। कोई बुलाहट है इस जगह, एक गूंज घुली हुई है आबोहवा में, पुकार की सांय-सांय करती। मैं अपना नाम सुनता- कौशिकी… कौशिकी… अपने भीतर की खामोशी में यह अनुगूंज लिए मैं दोहरा होता रहता हूँ कि इस दुनिया में कहीं कोई एक जगह है जहां मेरा स्वागत उसी तरह होता है जैसा मैं हूँ याकि जैसी मैं हूँ!

मेरे ऐसे होने से मां को दुख होता था, मां के दुख से मुझे दर्द होता था। यह दर्द मेरे भीतर सुरक्षित रखा हुआ है किसी कीमती वस्तु-सा, मैंने इसे कभी अपने आप से दूर नहीं होने दिया, इसकी मौजूदगी मुझे मां की उपस्थिति का एहसास कराती है!

रेड वेलवेट क्लब हम जैसों की अपनी बनाई दुनिया है। यहां हम अपनी तरह से होते हैं। अपने आप में खोए, दूसरों की मौजूदगी से बेपरवाह और विरक्त, आप में मगन। यहां बिताया एक-एक लम्हा नितांत निजी होता है। बेहद व्यक्तिगत लम्हे, यहां मैं, मैं की तरह होता हूँ- खुद में आपादमस्तक, कोई और मैं नहीं होता यहां!

शहर के पश्चिमी छोर पर समुंदर किनारे बसा यह क्लब झूठ से तंग हुई मेरी जिंदगी का एक ऐसा साझीदार है जिसके साथ रहते हुए वक्त पारे-सा पिघल तो जाता है फिर भी ठहरा हुआ रहता है, एक विशेष आकृति में। वह न दिन-सा उलझा-सुलझा होता, न रात-सा संजीदा। गोधूली-सा बदगुमां एक गंध लिए अलहदा-सा, सांसों में घुलता हुआ, मगज पर चढ़ता हुआ। कोई कशिश है जादुई इसमें, मुझपर तारी, मुझे बेसुध करती, एक मृगतृष्णा, भटकाव कि मैं सब भूल-बिसर जाता हूँ, कोहनी का दर्द भी। सच तो यह है जिंदगी के दिए सारे दर्द भूल जाता हूँ मैं यहां आकर!

डॉरेथी कोहनी के दर्द के साथ आई है जिंदगी में। फिजियोथेरेप्सिट है, मेरी खिसकी हुई कोहनी को दुरुस्त करने का प्रयास कर रही है।

औसत कद, पुरुषों जैसे कटे सुनहले-सफेद खिचड़ी बाल, चेहरे पर फ्रैकल्स और हल्की नीली आंखें। सफेद और लाल रंग की आड़ी धारियों वाली पोलो और खाकी शॅर्ट। बढ़े-रंगे नाखून भी नहीं, न कान में बूंदें, न गले में कुछ। हां, दाईं कलाई में मौली जैसा कुछ जरूर है, शायद किसी स्थानीय ने इसकी सादगी का फायदा उठाया या जानते-बूझते वह उनके झांसे में आई, मदद के ख्याल से। पहली बार में बस इतनी ही छाप पड़ी डॉरेथी की। पैरों में बिर्केस्टॉक और एक बैग पैक भी था साथ में। हफ्ते के तीन दिन की मुलाकातों में कुछ खास नहीं बदला। हां, पोलो की जगह टी शर्ट या शर्ट और शॉर्ट की जगह ट्राउजर या जीन्स।

यह जानते हुए कि सभ्य समाज में ऐसी बातें पूछना उचित नहीं माना जाता लेकिन तब भी थोड़ी ढीठता दिखाते हुए एक दिन मैंने पूछा ‘तुम्हें ड्रेस पहनना पसंद नहीं?’

‘नहीं’, कहकर चुप हो गई थी। मैं भी चुप रही अपनी धृष्टता पर पछताते हुए। फिर न जाने क्या सोचकर उसने कहा ‘मुझे लड़कियों जैसा रहना अच्छा नहीं लगता।’

एक पल की चुप्पी के दौरान अपने चेहरे पर उभरी कठोरता को वह छुपा नहीं पाई थी। मैंने आगे कुछ और पूछना उचित नहीं समझा। फिर एक दिन उसने खुद कहा ‘मुझे लगता है भीतर से मैं पुरुष हूँ’। यह कहते हुए वह बेहद सामान्य थी, हालांकि नजरें किसी संगीन गुनहगार-सी बचती-बचाती इधर-उधर लुकती-छुपती रहीं जरूर।

‘शायद मुझमें एस्ट्रोजन की मात्रा सामान्य से कम है’, उसने कहा।

डॉरेथी का छुअन पुरुषों के स्पर्श जैसा एहसास देता है और देह गंध मर्दाना है।

उसने आगे कहा ‘यह ख़ुशबू हमेशा से मेरी अपनी है और मैं भटकती रही दर-ब-दर एक झूठ की तलाश में। एक भ्रम, भटकाव मुझमें पैबस्त रहा हमेशा।’

‘कई मर्तबा हम खुद की तलाश में भटकते हैं ताउम्र जैसे मृग कस्तूरी की खोज में।’ कहकर मैंने लंबी सांस ली, आवाज बहुत भीतर से निकली थी।

वह बड़ी शाइस्तगी से मेरी पोशीदा चिट्ठियां पढ़ रही थी, जो यूं ही पड़ी थी बरसों बरस अनछुई, अनमनी अनगिनत चिट्ठियां जिन्हें मैंने नहीं पढ़ी। वह लिफाफा-दर-लिफाफा उधेड़ रही थी, मैं हर हर्फ बेआबरू हो रहा था। नंगेपन का एहसास मुझे पैर पकड़कर जिल्लत के गहरे गर्त में खींच रहा था, मैं उतरता जा रहा था गहरे और गहरे फिर एक दिन अचानक ही ‘नग्नता किसी और की खाल से बेहतर है’ कहकर उसने मुझे उबार लिया हीनता के दलदल से!

कहीं पढ़ा था मैंने, ‘चिट्ठियां रखी-रखी जर्द पड़ जाती हैं’। यह भी पढ़ा है कि ‘पढ़ना अच्छी आदत’ है। फिर मैंने क्यों नहीं पढ़ी ये चिट्ठियां, क्यों नहीं बचा लिया उन्हें जर्द होने से? मैं क्यों रोकता रहा खुद को उन्हें पढ़ने से?

डॉरेथी ने कहा, ‘उसे पता मालूम है ऐसी जगह के बारे में, जहां जर्द हुई चिट्ठियां पढ़ी जाती हैं।’

मेरी उम्मीद भरी आंखों को उसने दिखाया रेड वेलवेट क्लब का मूनिंगा वुड वाला खुला अहाता। यहां से सबकुछ उज्ज्वल और सुस्पष्ट दिखता है, फैला आसमान, पसरा समंदर, मुर्गाबी परिंदे और उसकी आत्मा के छाले। पैरों पर भूरे दाग भी। उसने कहा कि वह अपनी टोली की सबसे शानदार गोलबाज थी। फुटबॉल के खेल में वह लड़कों को मात देती थी, लेकिन गोल के इनाम में पिता गर्म चिमटियां चटका देते!

मैंने उसके दाग सहलाए और देखा उसकी आंखें तरल हो गई थीं।

मैंने जाना दिखाई देने वाले दाग और अदृश्य दागों में कोई अंतर नहीं होता। सहलाने से सजीव हो आते हैं दोनों ही!

क्लब के स्वागत कक्ष में कोने की टेबल पर सूखे फूलों की माला चढ़ी, सफेद बिल्ली की तस्वीर बरबस ही मुझे रोक लेती है। उसकी गहरी काली आंखें इतने ममत्व से देखती मालूम पड़ती हैं मानों पुरखिन हो कोई- स्नेह उमड़ी, अपनेपन से लबालब भरी, हाल पूछती चमकीली आंखें! कैसी तो जीवंत तस्वीर है। मैं उसपर हाथ फिराता हूँ। कोमल रोएंदार स्पर्श, ऐसा लगता है वह तस्वीर में मुझमें जीवित हो गई है। मुझे लग रहा है कि मैं वही बिल्ली हूँ और यह तस्वीर मेरी है!

इसे कालीन बुनने वाले एक तुर्किश कारीगर ने बनाया है, सिल्क धागे से। नीचे कुर्दिश में लिखा है ‘तुम्हारे प्रेम में, ओजन’। डॉरेथी ने बताया कि कुछ बरस पहले वह यहां कालीन का व्यवसाय करने आया था और इस क्लब में उसका आना-जाना था। उसे यहां की कॉफी बेहद पसंद थी और कॉफी के साथ कषाटा पर तो वह मर मिटता था। कुछ तो यह भी कहते हैं, वह यहां अंद्रू के लिए आता था और जब भी आता यह बिल्ली उसके आस-पास ही मंडराती। वह प्याली में थोड़ी-सी कॉफी छोड़कर बिल्ली की तरफ बढ़ा देता।

कहने वाले यह भी कहते हैं कि यह बिल्ली कोई और नहीं बल्कि वह ईरानियन किस्सागो है जो घंटों यहां बैठकर जाने क्या लिखती रहती थी, कॉफी दर कॉफी मंगाती और जब लौटती तब मुड़े-तुड़े कागजों का ढेर लगा होता और कॉफी की खाली प्यालियां पड़ी होतीं। कहती थी कि वह ऐसी कहानी कहना चाहती थी जो पहले कभी किसी ने न लिखी पढ़ी हो!

मैंने वह कहानी पढ़ी है जो उनकी आखिरी कहानी थी और उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई थी।

‘वह हम जैसी थी।’ डॉरेथी की आवाज में निराशा थी!

‘मरने के बाद मैं भी यहां फिरा करूंगा बिल्ली बनकर’, मैंने बेसाख्ता कहा।

‘मुझे बिल्लियां पसंद हैं’, कहते हुए डॉरेथी की आंखों में रेशम उतर आया। उसने बढ़कर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वह चिट्ठी जो अधूरी लिखी रह गई थी स्कूल के बाथरूम में, अब मुकम्मल हो गई थी!

मां की साड़ी में मैं समुद्र किनारे चेयर पर अधलेटा डेनेज स्मिथ की ‘डोंट कॉल अस डेड…’ पढ़ रहा हूँ। एक रुपहली किरण नोज रिंग से टकरा कर वापस लौट रही है। झुमके कंधे चूम रहे हैं।

डॉरेथी मेरी यह तस्वीर मुझे दिखाते हुए कहती है ‘यह तुम हो कौशिक, वाकई!’

मैं अपने होने के एहसास में डूब जाता हूँ आकंठ!!