रवि की मां का पांच दिन पहले निधन हुआ है।परिवार के लोग तेरहवीं के विषय में सलाह-मशविरा कर रहे हैं।

रवि – चाचा जी, कितना खर्च हो जाएगा?

चाचा – यही कोई डेढ़-दो लाख और बाकी तुम्हारी श्रद्धा है।

रवि – ठीक है।

चाचा – क्या ठीक है? क्या करना है, कैसे करना है कुछ बता ही नहीं रहे हो।

रवि बाहर चला गया।उपस्थित परिवार जनों में कानाफूसी शुरू हो गई कि रवि की मां के नाम काफी संपत्ति और गहने हैं।कितना कुछ छोड़कर गई है, अकेला ही सब चीजों का वारिस है।खुद सरकारी लेक्चरर है।लगता है कि मृत्यु भोज करने का इसका मन नहीं है।इज्जत का जरा भी ख्याल नहीं है और न मां की आत्मा की शांति की परवाह।

कुछ देर बाद रवि एक वृद्ध व्यक्ति के साथ अंदर आया- चाचा जी, मैंने फैसला किया है कि मैं मृत्यु भोज का आयोजन नहीं करूंगा।

क्या? सभी लोगों के मुंह हैरानी से खुले के खुले रह गए।

चाचा जी को ताव आ गया।सख्त लहजे में बोले – तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, रवि?

रवि – मैं सोच समझकर बोल रहा हूँ।मेरी मां अनपढ़ थी, लेकिन मुझे और मेरी बहन को उन्होंने अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए।मैंने निर्णय किया है कि मृत्युभोज पर धन खर्च करने के बजाय मैं कॉलोनी के सफाई कर्मचारी राम किशोर की पोती की स्कूल से लेकर कॉलेज तक की अच्छी शिक्षा का खर्च वहन करूंगा।इसमें चाहे कितने लाख लगें।

इतना कहकर रवि ने सामने बैठे वृद्ध व्यक्ति रामकिशोर की ओर इशारा किया।

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