
इलिका को चैन न था। उसने अपने दिल की बेचैनी पर काबू पाना चाहा। मगर बेचैनी बढ़ती गई। सड़क पर लोग बात कर रहे थे।
घबराहट में भरकर इलिका गेट से ही बोले जा रही थी, ‘हद है, यह भी कोई बात हुई। अचानक ही हिंसा भड़क गई। आखिर यह प्रशासन कर क्या रहा है। बसें जलाई जा रही हैं। इस समय स्कूलों की छुट्टी का वक्त है। कौन हैं ये लोग जो इस तरह शहर की शांति को भंग करते हैं?’ तभी एक बस आकर रुकी। इलिका के दोनों बच्चे आराम से उतरे और हँसते हुए उससे लिपट गए। इलिका की भावुक आंखों में संतोष उमड़ आया।
वह बच्चों के साथ खुशी-खुशी घर के भीतर चली गई। खिलखिलाहट के साथ वह बच्चों से गपशप करने लगी।
बाहर की सुगबुगाहट बढ़ती जा रही थी। सुनने में आ रहा था कि हिंसा विकराल रूप ले रही है। मगर अब इलिका को किसी भी बात से कोई लेना-देना नहीं था!
दुर्गेश पुश्कर रोड, कोटरा, अजमेर, राजस्थान-305004 मो.9828792720

सच लिखा है हमें दूसरों की चिंता नहीं होती है । बहुत सुंदर लघु कथा